हिन्दी नवजागरण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की भूमिका

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हिन्दी नवजागरण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की भूमिका आधुनिक हिन्दी साहित्य में युग निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र उन महान लेखकों में से हैं जो जिस समय

हिन्दी नवजागरण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की भूमिका


धुनिक हिन्दी साहित्य में युग निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र उन महान लेखकों में से हैं जो जिस समय इतिहास में होते है, उसी समय इतिहास भी बदल रहे होते हैं. भारतेन्दु एक जागरूक एवं कालदृष्टा साहित्यकार थे. उन्होंने सामंत- वादी परम्परा से हिन्दी साहित्य को मुक्त कर नवजागरण की चेतना जगाकर ऐसी गतिशील परम्परा का निर्माण किया जो अनेक सन्दर्भों में आज भी प्रासंगिक है.
 
अपने समकालीन लेखकों को साथ लेकर भारतेन्दु ने हिन्दी साहित्य में एक नये युग की आधारशिला रखी जिसे 'भारतेन्दु युग' के नाम से जाना जाता है. साहित्य और समाज को लेकर जितनी चिन्ता, सक्रियता और संघर्ष भारतेन्दु युगीन लेखकों में दिखाई पड़ता है, उसके प्रेरणा केन्द्र भारतेन्दु ही थे. रामविलास शर्मा के शब्दों में, “हम निसंकोच कह सकते हैं कि ऐसा सजीव और चेतन युग एक बार ही आया है."

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय की युगीन परिस्थितियाँ

हिन्दी नवजागरण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की भूमिका
सन् 1857 के असफल विद्रोह के बाद भारतेन्दु का समय (सन् 1850 – 1885) राजनीतिक दृष्टि से हताशा का समय था, किन्तु राजनीतिक चेतना सक्रिय रूप में बनी हुई थी. विद्रोह के बाद सम्पूर्ण भारत ब्रिटिश राष्ट्र का उपनिवेश बन चुका था. ब्रिटिश शासक आर्थिक क्षेत्र, शिक्षा व प्रशासन में नई-नई नीतियाँ लागू कर रहे थे. साथ ही उनका शोषण व दमन भी बढ़ता जा रहा था.
 
समाज में पाश्चात्य शिक्षा, यातायात के साधनों का प्रसार व मुद्रणकला के प्रचार-प्रसार से नये-नये प्रभाव लक्षित हो रहे थे. ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज व आर्य समाज जैसी संस्थाएं धार्मिक नवजागरण का कार्य कर रहीं थीं. फलतः छुआछूत, जाति-प्रथा, बाल विवाह, सतीप्रथा जैसी अमानवीय प्रथाओं का विरोध होने लगा था. स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह तथा स्त्री-पुरुष की समानता के समर्थन में लोग आगे आने लगे थे. इसके साथ ही राष्ट्रीयता का नवोन्मेष भी इस युग की विशेष उपलब्धि थी.

आर्थिक क्षेत्र में अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियाँ जारी थीं. लघु एवं कुटीर उद्योग धन्धे सिमट रहे थे. हस्तकला से अधिक विदेशी वस्तुओं का बाजार बन रहा था. कच्चे माल के रूप में भारत की धन-सम्पदा विदेश जा रही थी. अकाल, महामारी ने देश को आर्थिक रूप से और कमजोर कर दिया था.

ऐसे संक्रमण के समय में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने साहित्य के माध्यम से नवजागरण को प्रभावी बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं-कविता, नाटक, निबन्ध, पत्रकारिता में अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय देते हुए युगान्तरकारी साहित्य की रचना की और नवजागरण की चेतना को प्रचारित- प्रसारित करने का कार्य किया.

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पत्रकार के रूप में 

'अगर तोप सामने हो तो अखबार निकालो'- इस उक्ति को भारतेन्दु ने विदेशी शासन के खिलाफ समाज में जनजागरण करने के लिए अपनाया. एक पत्रकार के रूप में उनका प्रमुख उद्देश्य था- सामाजिक तथा राष्ट्रीय उन्नति एवं जातीय स्वाभिमान को जगाना. वे मानते थे कि, “जिस समाज में समाज और देश की भाषा में समाचार-पत्रों का जब तक प्रचार नहीं होता, तब तक उस देश और समाज की उन्नति नहीं हो सकती."
 
सन् 1862 में भारतेन्दु ने 'कविवचन सुधा' मासिक पत्र निकाला जो लोकप्रिय होकर साप्ताहिक रूप में निकलने लगा. इसमें उन्होंने 'नारि-नर सम होहि' कहकर स्त्री-पुरुष की समानता की आवाज उठाई. कांग्रेस के जन्म से पहले ही भारतेन्दु ने 'स्वत्वनिज गहै' कहते हुए 'स्वराज' का शंखनाद फूँका था. नवजागरण में सक्रिय भूमिका के कारण 'कविवचन सुधा' ब्रिटिश सरकार का कोप भाजन बना और सन् 1885 में बन्द हो गया.
 
सन् 1873 में भारतेन्दु ने 'हरिश्चन्द मैगजीन' मासिक पत्र निकाला जिसने साहित्य के क्षेत्र में आधुनिक ज्ञान- विज्ञान के साहित्य द्वारा जनजागरण का कार्य किया. ब्रिटिश सरकार के प्रति तीखे व्यंग्यात्मक लेखों के कारण यह पत्रिका भी सन् 1884 में बन्द हो गई. इसके अतिरिक्त स्त्रियों की शिक्षा के लिए भारतेन्दु ने 'बालाबोधिनी' पत्रिका भी चार वर्ष तक निकाली. हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में भारतेन्दु का विशिष्ट महत्व इसलिए है कि उन्होंने अभिव्यक्त के तमाम खतरों का सामना करते हुए भी मृत्युपर्यन्त राष्ट्रीय चेतना का प्रचार- प्रसार करने के लिए पत्र-पत्रिकाएं निकालीं. इतना ही नहीं, इस कार्य के लिए उन्होंने अपने समकालीन लेखकों को भी प्रेरित किया. देखा जाय तो भारतेन्दु युग की पत्रकारिता ने भारतीय नवजागरण में अपनी ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह पूरे दायित्व के साथ एक मिशनरी भावना के तहत किया.

भारतेन्दु की भाषाई चेतना

भारतेन्दु के समय में अंग्रेजी देश में अपने पैर जमा रही थी. कचहरी तथा शासन में उर्दू का बोलबाला था. हिन्दी का कोई स्पष्ट और स्थिर स्वरूप न था. अंग्रेज हिन्दी को हिन्दुओं और उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपना रहे थे. सन् 1857 के विद्रोह में हिन्दू-मुस्लिम एकता को देखकर उन्होंने भाषा को लेकर भी दोनों वर्गों में फूट डालने का प्रयास किया.

ऐसे समय में भारतेन्दु ने अंग्रेजों की साम्राज्यवादी और फूट डालने की नीति को समझा और कहा- “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। विन निज भाषा ज्ञान कै, मिटत न हिय को सूल ॥"

भारतेन्दु ने 'निज भाषा' कहकर केवल हिन्दी का ही समर्थन नहीं किया बल्कि अंग्रेजी के विरोध में सभी भारतीय भाषाओं को आगे आने का आह्वान किया. भारतेन्दु ने सरल- सुबोध आम भाषा के रूप में हिन्दी का पक्ष लिया. वे हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने के उतने ही विरोधी थे जितने कि उर्दू को अरबी-फारसीनिष्ठ बनाने के. भारतेन्दु ने खड़ी बोली को आमजन की भाषा के रूप में ढालने की कोशिश की. उनका उर्दू से कभी विरोध नहीं रहा. उन्होंने 'रसा' उपनाम से उर्दू में गज़लें लिखीं. उनकी गज़लों का संग्रह 'गुलजारे पुरबहार' के नाम से प्रकाशित हुआ.
 
अंग्रेजों की भाषा नीति के विरुद्ध भारतेन्दु की भाषा नीति देश की जातीय संस्कृति और जातीय भाषा के उत्थान की नीति थी. उन्होंने हिन्दी को देश की जातीय अस्मिता से जोड़ा.

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी गद्य के प्रवर्तक

भारतेन्दु से पूर्व खड़ी बोली हिन्दी का गद्य इतना विकसित नहीं था. भारतेन्दु ने खड़ी बोली हिन्दी को गद्य का सशक्त माध्यम बनाया. एक गद्यकार के रूप में उन्होंने निबन्ध और नाटक विधा में मौलिक योगदान दिया. हिन्दी निबन्ध और नाटक का प्रारम्भ ही भारतेन्दु से माना जाता है. भारतेन्दु ने इतिहास, धर्म, पुरातत्व, कला, समाज-सुधार, राष्ट्रीयता, देश-प्रेम, भाषा आदि पर अनेक निबन्ध लिखे. इन निबन्धों में उन्होंने सर्वत्र आधुनिक दृष्टिकोण और नवजागरण की चेतना को जगाने का प्रयास किया है. उनके निबन्धों का मुख्य उद्देश्य ही जनता में नई चेतना को जाग्रत करना था.



भारतेन्दु के नाटकों में नवजागरण के प्रयासों का जीवन्त रूप देखने को मिलता है. वस्तुतः नवजागरण की चेतना की प्रभावी अभिव्यक्ति उनके नाटकों में ही मिलती है. उन्होंने कुल सत्रह नाटक लिखे. अनेक नाट्य मण्डलियाँ स्थापित कीं और नाटकों में अभिनय भी किया. उस समय पारसी थियेटर की बहुत धूम थी जिसमें सतही मनोरंजन वाले कुरुचिपूर्ण, दोहरे संवाद वाले नाटक खेले जाते थे. भारतेन्दु ने अपने नाटकों से जनता का मनोरंजन भी किया और अंग्रेजों की शोषण और दमनकारी अन्यायपूर्ण व्यवस्था का विरोध भी किया. राष्ट्रीय भावना और नवजागरण की चेतना के सशक्त संवाहक के रूप में भारतेन्दु के 'अंधेर नगरी' जैसे नाटक आज भी प्रासांगिक बने हुए हैं.
 

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कवि के रूप में

एक कवि के रूप में भारतेन्दु ने ब्रज भाषा में राधाकृष्ण की भक्तिपरक रचनाएं लिखकर अपनी जातीय संस्कृति के प्रति अनुराग प्रकट किया है, वहीं खड़ी बोली हिन्दी में लिखी उनकी कविताएं देश-प्रेम, भाषा-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना की उदाहरण हैं. नवजागरण की चेतना प्रायः उनकी खड़ी बोली की कविताओं में ही व्यक्त हुई है. अंग्रेजी शासन की शोषण नीति, अंग्रेजी सभ्यता की नकल और अंग्रेजी भ्रष्ट व्यवस्था पर इन कविताओं में बहुत ही सीधे-सरल ढंग से पैने व्यंग्य किए गए हैं-

चूरन अमलै सब जो खावें । दूनी रिश्वत तुरंत पचावैं । 
चूरन साहब लोग जो खाता। सारा हिन्द हजम कर जाता । 
चूरन पुलिस वाले खाते। सब कानून हजम कर जाते।

वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था के संदर्भ में भारतेन्दु की यह व्यंग्य कविता आज भी कितनी प्रासांगिक है. इस तरह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अपने सीमित जीवनकाल के बावजूद हिन्दी साहित्य में नवजागरण की चेतना के अग्रदूत के रूप में उभरे. उन्होंने अपनी प्रखर मेधा से भाषा, साहित्य समाज, धर्म-सभी क्षेत्रों में नई चेतना का संस्कार दिया.

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