भूमंडलीकरण और हिंदी

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भूमंडलीकरण और हिंदी भारत की सम्पर्क भाषा हिन्दी ही है. बोलचाल के रूप में हिन्दी देश के कोने-कोने में बोली जाती है. विगत दो-तीन दशकों में विज्ञापन में

भूमंडलीकरण और हिंदी


विगत दो दशक से 'भूमंडलीकरण' शब्द ने भारतीय जनमानस को गहरे तक प्रभावित ही नहीं किया है, बल्कि अपने वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचने-विचारने पर भी विवश कर दिया है. भारतीय जन-जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जो 'भूमण्डलीकरण' के प्रभाव से बच पाया हो. तो पहले यह जान लें कि क्या है भूमंडलीकरण?
 
भूमंडलीकरण मूलतः उदारवादी आर्थिक संरचना की देन है. यह एक ऐसी संकल्पना है जो बहुस्तरीय विश्लेषण में अर्थतांत्रिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और सिद्धान्तवादी को परस्पर सम्बन्धी बनाती है. शब्दकोश में इस अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा गया है-“ऐसा कोई भी कार्य या प्रसंग जिसका प्रभाव समूची दुनिया को अपने घेरे में लपेट लेता हो- 'ग्लोबलाइजेशन' कहा जा सकता है. 'ग्लोबलाइजेशन' का ही पर्याय है-भूमण्डलीकरण.भूमण्डलीकरण के अन्तर्गत उदार आर्थिक व्यापार संरचना को अनेक देशों ने स्वीकार कर लिया है जिसके कारण उनमें व विश्व के अन्य देशों के बीच आर्थिक व्यापार अबाधित हो गया है. विश्व स्तर की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पादन मुक्त व्यापार के तहत दुनिया के कोने-कोने में छा गए हैं. इस तरह आर्थिक व्यापार की दृष्टि से राष्ट्र से राष्ट्र या राज्य की अवधारणा कमजोर या धुँधली पड़ती जा रही है.

यदि केवल खान-पान या दैनिक जीवन में उपयोग आने वाली तेल, साबुन, क्रीम, शैम्पू, घड़ी, और वस्त्रों को ही लें तो हम पाएंगे कि इनकी पहुँच मेट्रो सिटी से लेकर नगर, कस्बे और गाँवों तक बन गई है. उदाहरणार्थ पेप्सी, कोको कोला, लिम्का जैसे पेय अब नगरों तक सीमित नहीं रहे. सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक इनका बाजार देखा जा सकता है. इस तरह मुक्त व्यापार या उदारीकृत अर्थव्यवस्था की ही देन हैं कि हमारे जीवन में विदेशी या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पाद सहज रूप से प्रयोग होने लगे हैं. परिणामस्वरूप देश, समाज, जीवन, संस्कृति, जीवन-शैली, लोक-व्यवहार, खान- पान, आदतें, रुचियाँ सभी कुछ प्रभावित हुई हैं.भूमंडलीकरण में वस्तुओं को एक व्यापक बल्कि कहें असीमित बाजार मिलता है. संचार माध्यम इस बाजार के विस्तार और उपयोग की सार्थक और प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं. संचार माध्यमों के द्वारा भारतीय जनमानस को उसी के भाषा व मुहावरे में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आर्थिक हितों के अनुकूल बनाया जाता है. विज्ञापन इसका प्रमुख और शक्तिशाली माध्यम है. इन विज्ञापन के जरिए अनेक अनावश्यक अथवा गैरजरूरी वस्तुओं को भी आधुनिकता की आवश्यकता के रूप में प्रतिपादित करके बेचा जाता है. 

भूमंडलीकरण और हिंदी
भारत की सम्पर्क भाषा हिन्दी ही है. बोलचाल के रूप में हिन्दी देश के कोने-कोने में बोली जाती है. विगत दो-तीन दशकों में विज्ञापन में हिन्दी की भाव-व्यंजना शक्ति की इतनी वृद्धि हुई है कि इस पर अलग से शोधकार्य किया जा सकता है. विज्ञापन में हिन्दी की भाव-व्यंजना इतनी समृद्ध है कि वस्तुओं से सम्बन्धित नए-नए मुहावरे बन गए हैं. जैसे-'ठंडा मतलब कोका कोला'. ये विज्ञापन केवल नया उपभोक्ता वर्ग ही नहीं तैयार कर रहे हैं बल्कि नई मानसिकता, नई संस्कृति का निर्माण भी कर रहे हैं, जिसके सारे स्वार्थ पूँजी के विस्तार में निहित हैं.

इसमें कोई संदेह नहीं कि इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों ने दुनिया को एक गाँव में बदल दिया है. ग्लोबलाइजेशन इसी को कहते हैं. कई विदेशी चैनलों ने अब हिन्दी में चौबीस घण्टे अपने कार्यक्रम देने शुरू कर दिए हैं. विदेशी फिल्मों के हिन्दी संस्करण भी आने लगे हैं. हिन्दी में चौबीस घण्टे देश- विदेश की खबरें सातों दिन आती रहती हैं. प्रमुख चैनलों के संवाददाता चाहें भारत के किसी कोने में हो, ईरान-इराक के युद्ध के मैदान में हों, वाशिंगटन के 'व्हाइट हाउस' में हों या फिर किसी अभियान के साथ दुर्गम क्षेत्रों में हों, पर्दे पर वे हमसे हिन्दी में ही बात करते, खबरें देते दिखाई पड़ते हैं. इन्हें देखकर लगता है कि मानो हिन्दी का ही भूमण्डलीकरण हो गया है या हिन्दी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा हो गई है.

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि टी. वी. चैनल में खबर भी व्यापार का एक हिस्सा है. वह भी एक उत्पाद है. अतः इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए (यानि आर्थिक लाभ कमाने के लिए) या टी. आर. पी. बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक लोगों की भाषा का उपयोग करना ही लाभदायक होगा जोकि हिन्दी के द्वारा सिद्ध किया जा रहा है. टी. वी. चैनलों में हिन्दी के बढ़ते प्रयोग को देखकर हिन्दी-प्रेमियों को खुशफहमी हो सकती है, किन्तु इसके पीछे दो बातों पर ध्यान देना अति आवश्यक है.

पहली बात, हिन्दी देश की जन सम्पर्क भाषा है. उसके बोलने-समझने, पढ़ने-लिखने वालों का एक विशाल वर्ग है. यह विशाल और व्यापक हिन्दी वर्ग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दृष्टि में बड़ा बाजार है, जिससे अपने आर्थिक हित लाभ साधने के लिए वे उसी की भाषा, उसी के मुहावरे का उपयोग कर रहे हैं. किसी सेवा भाव या हिन्दी प्रेम के कारण चैनलों में हिन्दी का प्रयोग नहीं बढ़ रहा है.दूसरी बात, चैनलों में जिस हिन्दी का प्रयोग हो रहा है, वह हिन्दी नहीं, उसे बोलचाल की हिन्दी का भी भ्रष्ट रूप कह सकते हैं. वह हिन्दी हिन्दी कम अंग्रेजी अधिक है. चूँकि इन चैनलों के अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दर्शक हैं. इसलिए वे हिन्दी - अंग्रेजी के मिश्रित रूप का प्रयोग करने के लिए विवश हैं. बहुत पहले ही चैनलों की इस हिन्दी को आलोचकों ने 'हिंगलिश' कहते हुए हिन्दी की दुर्दशा की आलोचना की थी.

भूमंडलीकरण में जिस प्रकार एक नई 'आर्थिक संहिता' लिखे जाने का प्रयास हो रहा है, उसी प्रकार हिन्दी को भी अपने ढंग से, अपने हित में प्रयोग करने का क्रम जारी है. भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हिन्दी के प्रति दिन प्रतिदिन बढ़ता मोह वस्तुतः भाषा के प्रति नहीं वरन् उसके बाजार के प्रति है. यही कारण है कि संचार तकनीक में भी हिन्दी के प्रति मोह दिखाई पड़ता है. मोबाइल में 'नोकिया' जैसी विदेशी कम्पनी भी हिन्दी में एस. एम. एस. भेजने तथा अन्य सुविधाएं प्रदान कर रही है. यह बिडम्बना है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मार्केटिंग हिन्दी में होती है और मैनेजमेन्ट यानि प्रबन्धन अंग्रेजी में होता है.
 
भूमंडलीकरण का व्यापक प्रभाव प्रिन्ट मीडिया पर भी व्यापक रूप से पड़ा है. उनमें वही प्रमुख रूप से छपता है जो समाचार पत्रों की दिन प्रतिदिन प्रसार वृद्धि में सहायक हो. सामाजिक सरोकार, पत्रकारिता के मूल्य, जनहित, भाषा, संस्कृति, साहित्य हाशिए पर चले गए हैं. बलात्कार, हत्या, राजनीतिक षड्यंत्र और सनसनी फैलाने वाली खबरें प्रमुखता में है. समाचार-पत्रों से साहित्य धीरे-धीरे हाशिये पर रहता हुआ अब बिल्कुल गायब हो गया है क्योंकि उसका बाजार नहीं है. हिन्दी की अनेक पत्रिकाएं 'धर्मयुग', 'सारिका' 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' इतिहास का विषय बन गए हैं.

इस तरह समाचार-पत्रों का पाठक 'उपभोक्ता' में बदल गया है. समाचार-पत्रों का भी तर्क है कि साहित्य के पाठक कहाँ हैं? कभी यही तर्क व्यावसायिक फूहड़ फिल्में बनाने वाले निर्माता भी दिया करते थे. बाजार में आँकड़ों की दौड़ में सारे सामाजिक सरोकार पीछे रह गए हैं. 

हम कह सकते हैं कि भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी को इतनी लोकप्रियता मिली है जितनी कि स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान भी नहीं मिली होगी जब हिन्दी को राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ते हुए उसे राष्ट्रभाषा का गौरव दिया गया था. भूमंडलीकरण के वर्तमान समय में हिन्दी की अपनी अस्मिता ही खतरे में है. उसके प्रयोग का जितना सीमा विस्तार हुआ है. उतना ही उसका रूप अपनी जातीय चेतना, अस्मिता से दूर होता हुआ भ्रष्ट होता गया है.

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