भारत में महाकाव्यों की परंपरा और विश्व शांति के प्रयास कोलकाता। अंतर्राष्ट्रीय संस्था इस्सार ने 1 से 3 मार्च तक त्रिदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लेख
भारत में महाकाव्यों की परंपरा और विश्व शांति के प्रयास
कोलकाता। अंतर्राष्ट्रीय संस्था इस्सार ने 1 से 3 मार्च तक त्रिदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लेखकों और चिंतकों का एक सम्मेलन रोटरी सदन में आयोजित किया, जिसमें देश-विदेश से कई विद्वानों ने शिरकत की। इस दौरान एक दिन में एक सत्र कोलकाता ट्रांसलेटर्स फ़ोरम के लिए था, जिसमें परिचर्चा का विषय था- भारत में महाकाव्यों की परंपरा। ये कार्यक्रम दो सत्रों में विभाजित था और दोनों सत्रों की अध्यक्षता कर रहे थे वरिष्ठ साहित्यकार रावेल पुष्प और संचालन कर रहे थे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार श्यामल भट्टाचार्य।
प्रथम सत्र में सबसे पहले कोलकाता ट्रांसलेटर्स फ़ोरम के अध्यक्ष रावेल पुष्प ने आयोजकों की ओर से स्वागत करते हुए फ़ोरम के गठन तथा उसके द्वारा देश के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद तथा कुछ विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद किये जाने की जानकारी दी। उसके बाद उन्होंने मूल विषय की चर्चा करते हुए बताया कि भारत में महाकाव्यों की सुदीर्घ परम्परा रही है और उसमें रामायण और महाभारत प्रमुख हैं। उसमें रामायण जहां संस्कृत में बाल्मीकि ने लिखी थी, वहीं गोस्वामी तुलसीदास ने इसे अवधी(हिन्दी) में लिख कर घर-घर पहुंचा दिया।इसके साथ ही उन्होंने बांग्ला,मराठी, मलयालम, उड़िया,असामी जैसी कई भाषाओं में रामायण के अलग-अलग रुपों का जिक्र किया।इसी क्रम में उन्होंने गुरु गोविंद सिंह द्वारा रचित रामावतार की भी चर्चा की जो उनकी रचनाओं के वृहद संकलन दशम ग्रंथ में दर्ज हैं। उन्होंने कहा कि जहां गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं वहीं गुरु गोबिंद सिंह ने उनके खासतौर से योद्धा रुप को चित्रित किया है। उनकी इस रचना की घटनाएं स्पष्ट तौर पर इस ओर इशारा करती हैं कि धर्म की रक्षा केवल पूजा-पाठ और प्रार्थना से नहीं होगी बल्कि उसके लिए साहस और पराक्रम की आवश्यकता है। उन्होंने इस अल्प परिचित रामावतार के आखिरी अंशों का जिक्र करते हुए कहा कि जितने भी धर्म ग्रंथों में देवी देवता या और किसी की चर्चा होती हो लेकिन गुरु गोबिंद सिंह तो सिर्फ और सिर्फ निराकार ईश्वर यानि अकाल पुरख के ही दास हैं।
इसके बाद विद्वान चंद्रशेखर भट्टाचार्य और अनुवादक लिपिका साहा ने बताया कि पूरे देश और बाहर भी मिलाकर सैंकड़ों रामकथाएं मिलती हैं और महाभारत भी,और सबमें पात्रों को देखने का दृष्टिकोण अलग-अलग है। लिपिका साहा कहती हैं कि किसी भी भारतीय महाकाव्य का हूबहू अनुवाद नहीं हुआ है, और उनका अनुवाद करना संभव नहीं था। वह कई उदाहरणों के साथ सीता को रामायण के सबसे मज़बूत किरदारों में से एक बताती हैं। चंद्रशेखर भट्टाचार्य रामायण और महाभारत के साथ-साथ दक्षिण भारत के पाँच महाकाव्यों के अनुवादों का ज़िक्र करते हैं, और गोंड रामायण और भील महाभारत में घटनाओं और किरदारों की विविधता पर भी ज़ोर देते हैं।
कार्यक्रम का दूसरा सत्र विश्व शांति के लिए काव्य पाठ को समर्पित था, जिसमें मूल कविता तथा उसके अनुवाद को भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें शिरकत कर रहे थे- सर्वश्री कमल बोहरा,जोबा मुर्मू, पद्मजा आयंगार पैडी,मारता एलोए चिहोका(पोलैंड),श्रावणी गुप्ता, पद्मश्री डॉ शीतांशु यशीसचन्द्र, मुनियम अल फ़कार(डेनमार्क), अहमद अल सहाय(इजिप्ट),सारा हमीद हवास(इजिप्ट),फटिक चौधरी, श्रीनिवास राव सबांगी,बप्पादित्य राय बिस्वास,गैरी जेम्स,विमलेश त्रिपाठी, सुपर्णा बोस,अभिजीत मंडल,सुप्तश्री सोम तथा अन्य।
विश्व युद्ध की ओर जा रही दुनिया में शांति के लिए किये जा रहे प्रयासों की एक कड़ी के रूप में इस्सार के समर्पित सचिव डॉ सुदीप्तो चटर्जी द्वारा परिकल्पित ये कार्यक्रम सचमुच याद रखने लायक कहा जा सकता है।
- रावेल पुष्प, वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता/ 9434198898


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