खून और लाल रंग से जलता जंगल

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मुझे नहीं पता” — इन शब्दों के बिना और कुछ भी नहीं है। यही तो जीवन-ज्ञान का सच्चा शब्दकोश है। जब मनुष्य कहता है “मैं नहीं जानता,” तभी खुलती है ज्ञान

ऋतु संहारिणी को बधाई पत्र हसीना को


क नज़र में, एक अकेला जंगल—
हसीना एक ऐसा फूल है जो खिला नहीं है,
बल्कि अभी अंकुरित हुआ है।

फिर यह आश्चर्यजनक है—
यह मौसम की परवाह किए बिना
कैसे फल-फूल सकता है
ऐसे लाल जंगल में?

शहर के प्रतिष्ठित बैलों में,
जो हर दिन पीले पड़ते हैं,
अलग-थलग पड़ जाते हैं,
और दिन के सम्मान में
उनका मज्जा निचोड़ा जाता है;

ऋतु संहारिणी को बधाई पत्र हसीना को
शहर की संवेदनहीनता की जटिल
धातु की कीलों को
जंगल के तेज, अतृप्त,
रक्त-स्खलित सींगों द्वारा
कितनी आसानी से मोड़ा जाता है!

हसीना कई मायनों में अकेली है;
एक अकेला जंगल
जो अपनी जड़ों से नहीं डगमगाता।

रक्त—
मन को कलंकित करने वाले शब्द,
भाषा की महानता के शब्दों को
सूँघकर उसे गंधित करते हैं।

रक्त, आँसू और दुःख—
बस।

शब्दों की बाढ़ में
तुम एक विषैली भाषा-साँप हो,
अभिवादन।

एक लाल अभिवादन
जो रक्त से खाली हो गया है।

लेकिन—
हसीना,

खून और लाल रंग से जलता जंगल
एक नज़र में
शहर का सुसंस्कृत श्वेत चेहरा
चकनाचूर हो उठता है।

एक भी फूल नहीं खिलता;
हसीना, जिसने
शहर के गौरवशाली नगरों को
दिन-प्रतिदिन फीका कर दिया है,
एक अकेला जंगल है।

मैं पित्त से भरा हूँ,
मेरी आँखें चिढ़ गई हैं;

लेकिन मैं
शहर का गधा हूँ
जो मुझे विस्मित होकर देखता है,

मेरी आँखें क्रोध से भरी हैं,
और मैं शहर की भाषा का दर्द
सहन नहीं कर पा रहा हूँ,
और मुझे इतनी शर्म आ रही है
कि मैं जा रहा हूँ।

हर कोने पर,
हर नज़र में,
ऋतुएँ कुचली और फेंकी जाती हैं।

हसीना—
जिसने शहर के महान हृदय को
अंदर तक छलनी कर दिया है;

वह इतना लाल रंग
कैसे सह सकती है?

उसकी हड्डियों का मज्जा भी
अंधेरे की कोमल शांति
महसूस नहीं कर पाता;

वह कैसे लड़ती है
और इतना साहस बनाए रखती है?

एक नज़र में खून—
हे भगवान!

लुप्त होता जंगल!

वह युवा पीढ़ी
जो अविकसित समय को रौंदती है।

हर पल
जंगल अपनी सुंदरता को
छिपाए बिना हँसता है।

एक ही वृक्ष के शीर्ष पर
वह जो बढ़ता और फैलता गया है—
ऋतुओं का नाश करने वाला।"


बहिर बधिर

सूर्य
अपने तपते आदर्शों का
निरंतर प्रवचन करता है—
आकाश के ऊँचे मंच से।

काले बादल
अपनी गरम चुप्पियों में
बिजली की भाषा लिखते हैं,
और बारिश
धरती की जड़ों तक
धीरे-धीरे उतरती है।

पर एक मनुष्य है—
जो केवल इन्हीं को सुनने के लिए
अपने कान खुले रखता है,
मानो संसार की बाकी आवाज़ें
उसके लिए
मूक हो चुकी हों।

समय
रेत-घड़ी की छाया में
उँगलियों से फिसलती
क्षणिक रेत बन जाता है।

और यह एकाकी जीवन—
जो कभी
वसंत के बगीचे तक नहीं पहुँचता,

समुद्र और रेगिस्तान को
एक ही पलक में
मिला देता है—

जैसे
गर्मियों का वर्ष
क्षण भर में
पूरी उम्र बन जाता हो।"

जीवन-ज्ञान का शब्दकोश

मुझे नहीं पता” —
इन शब्दों के बिना
और कुछ भी नहीं है।

यही तो
जीवन-ज्ञान का
सच्चा शब्दकोश है।

जब मनुष्य कहता है
“मैं नहीं जानता,”
तभी खुलती है
ज्ञान की पहली खिड़की।

अज्ञान की स्वीकारोक्ति
बन जाती है
सीखने का आरम्भ।

प्रश्नों की पगडंडी पर
चलते-चलते
मनुष्य खोजता है
अनुभव की रोशनी।

“मुझे नहीं पता”—
यही विनम्र शब्द
जीवन को
ज्ञान की ओर ले जाते हैं।"


- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
Kerala state, email:binoymb2008@gmail.com,
phone:9847245605(office)

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