सारा आकाश उपन्यास में अम्मा का चरित्र चित्रण राजेन्द्र यादव अम्माजी चार पुत्रों, एक पुत्री की माँ और बाबूजी की पत्नी हैं। वह गँवार, अपशब्द बोलने वाली,
सारा आकाश उपन्यास में अम्मा का चरित्र चित्रण | राजेन्द्र यादव
राजेन्द्र यादव के उपन्यास 'सारा आकाश' में अम्मा का चरित्र एक पारंपरिक, रूढ़िवादी और अधिकारवादी भारतीय मां का है, जो मध्यमवर्गीय परिवार की जटिलताओं को पूरी तरह से अभिव्यक्त करता है। वह परिवार की सत्ता का मुख्य केंद्र हैं, जहाँ बाबूजी के बाहरी कठोर अनुशासन के साथ-साथ अम्मा का आंतरिक और मानसिक नियंत्रण चलता है। अम्मा का व्यक्तित्व उस पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है जो मानती है कि बहू का अर्थ केवल सेवा और समर्पण है, इसीलिए वे प्रभा की शिक्षा और उसके स्वाभिमान को स्वीकार नहीं कर पातीं।
अम्माजी चार पुत्रों, एक पुत्री की माँ और बाबूजी की पत्नी हैं। वह गँवार, अपशब्द बोलने वाली, बहुओं पर रौब गाँठने वाली, बीमार और खाट पर माला जपते हुए पूरे घर की निगरानी रखने वाली महिला हैं। अम्मा के चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएं दृष्टिगोचर होती है -
- साधारण महिला - अम्मा एक गरीब निम्न मध्यम परिवार की महिला है। उसे घर का कोई काम करते हुए नहीं बताया गया है, लेकिन घर की पूरी खोज खबर रखती है। दो बहुएँ घर में हैं और वे ही पूरे घर का काम करती हैं। इनका काम तो खाट पर माला जपते रहना या माला जपने का ढोंग करना और बहुओं को विशेषकर छोटी बहू को डाँटना है।
- क्रोधी और शंकालु - वह अपने पति की तरह क्रोधी और शंका करने वाली है। उनका क्रोध समर पर तथा उसकी पत्नी प्रभा पर उतरता है। जब बाबूजी प्रभा को छत पर जाने के लिए डाँट लगाते हैं तो वे भी चुप नहीं रहतीं। प्रभा ने जब गणेशजी बने हुए मिट्टी के ढेले से बर्तन माँज लिए तो अम्माजी फुंकार उठीं—“सादा मिट्टी का ढेला तो है ही, और हमारी पुरखा हमें जवाब दिये चली जा रही है। तूने समझा काहे को। तेरे तो हिथे माथे की फूट गई थी न ? अन्धी थी दिखाई थोड़े ही दिया होगा कि इसमें कलावा बँधा था या नहीं ? बात पर बात कहे चली जा रही है, जो एक भी बात बिना जवाब दिये छोड़ी हो। अच्छी सीख सिखाई है तेरे माँ-बाप ने, बड़ों से जुबान लड़ाने की।" जब बाबूजी ने छोटी बहू के छत पर जाने की बात उठाई तो अम्मा ने भी उसके चरित्र पर शंका की और अनकहे शब्द कहे।
- अदूरदर्शी – अम्मा में भी दूरदर्शिता का अभाव है। वह अपनी बेटी को यद्यपि प्यार करती है, लेकिन ससुराल जाने से उसे रोक नहीं सकी। उनमें अगर दूरदर्शिता होती तो मुन्नी को हरगिज नहीं जाने देतीं। उन्होंने विरोध तो किया, लेकिन सादा रूप में कहकर । यदि वह अड़ जातीं तो मुन्नी वहाँ नहीं जा पाती और उसकी जान भी बच जाती।
- समर और छोटी बहू प्रभा पर क्रोधित रहने वाली - एक दिन समर ने अपने छोटे भाई अमर की उद्दण्डता पर उस पर हाथ उठा दिया तो अम्मा उसका पक्ष लेते हुए बोली-"खबरदार जो लड़के पर हाथ उठाया, अभी तो मैं जिन्दा हूँ। देखती हूँ, मेरे रहते कैसे तू उसकी तरफ टेड़ी नजर से देखता है। अब तो तुझे हम दुश्मन लगते ही होंगे। हम तो तेरे इन लक्षणों को पहले ही जानते थे। देखो कोई, उस काले सिर वाली के लिए भाई पर हाथ उठा रहा है।"
अम्माजी ने अपनी कुछ मानवीय दुर्बलताओं जैसे कठोर वाणी, बिना सोचे समझे कुछ भी कह देना, बहुओं पर रौब जमाना, अपने को बीमार बताकर खाट पर बैठे रहना और अपने ऊँचे ओहदे का पूरा फायदा उठाना आदि के होते हुए भी प्रधान भूमिका निभाई है। उनके चरित्र के अनुसार उनके काम में या बोलने में कोई कमी दिखाई नहीं देती।
इस प्रकार अम्मा एक ऐसी जटिल पात्र हैं जो परिवार को जोड़कर तो रखना चाहती हैं, लेकिन अपनी संकुचित सोच और पुराने ढर्रे के कारण अनजाने में ही घर में घुटन और अलगाव का माहौल पैदा कर देती हैं।


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