सारा आकाश उपन्यास में संवाद योजना राजेन्द्र यादव उपन्यास के संवाद केवल पात्रों के बीच की बातचीत भर नहीं हैं, बल्कि वे उस घुटन, कुंठा और पारिवारिक तनाव
सारा आकाश उपन्यास में संवाद योजना | राजेन्द्र यादव
राजेंद्र यादव कृत 'सारा आकाश' की संवाद योजना उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति है, जो मध्यमवर्गीय जीवन की विडंबनाओं को पूरी नग्नता के साथ पाठकों के सामने रख देती है। इस उपन्यास के संवाद केवल पात्रों के बीच की बातचीत भर नहीं हैं, बल्कि वे उस घुटन, कुंठा और पारिवारिक तनाव का जीवंत दस्तावेज़ हैं जिसमें निम्न-मध्यमवर्ग का व्यक्ति रोज जीता है। लेखक ने संवादों के माध्यम से एक ऐसे घर का ढांचा खड़ा किया है जहाँ दीवारों से ज्यादा चुप्पी और कर्कश शब्दों की गूँज है।
मानव एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक-दूसरे से सम्पर्क स्थापित करने के लिए संवादों का सहारा लेना पड़ता है। वह अपने भावों की अभिव्यक्ति कथोपकथनों या संवादों के माध्यम से करता है । राजेन्द्र यादव लिखित उपन्यास 'सारा आकाश' के कथानक में संवादों का विशेष महत्व है। संवाद कथानक की गतिशीलता का आधार हैं। कथोपकथन की दृष्टि से 'सारा आकाश' की समीक्षा इस प्रकार की जा सकती है -
कथानक के विकास में सहायक
पात्रों के पारस्परिक वार्तालाप से ही कथा आगे बढ़ती है। संवाद ही वर्तमान और भविष्य की घटनाओं की जानकारी देते हैं। समर, बाबूजी, अम्माजी, प्रभा, दिवाकर और शिरीष भाई के संवाद इसी प्रकार के हैं। पात्रों की भाषा उनके चरित्र के अनुरूप ही है । कथानक के संवाद कहानी को गतिशील बनाने के साथ ही साथ पात्रों की मनःस्थिति तथा परिस्थितियों का पूर्ण ज्ञान करा देते हैं। यथा—“उठो-उठो फेरों का वक्त हो गया। सोना ही है तो जाकर जनमासे में सोना ।.. का होश, न कपड़ों का ख्याल. यहाँ पड़े हो, न शरीर का ख्याल... क्या कहेंगे लोग कि अच्छे बराती लेकर आये हैं... उठो... उठो ।”
पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को उद्घाटित करने वाले
संवादों के माध्यम से उपन्यासकार अपने पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को अभिव्यक्त करता है। समर, बाबूजी, अम्माजी और शिरीष भाई के संवाद इसी प्रकार के हैं। प्रारम्भ में समर के संवादों से उसके निराशावादी और कमजोर व्यक्तित्व का पता चलता है। जैसे— “मुन्नी मैं सच कहता हूँ, मैं घर छोड़कर भाग जाऊँगा। भले ढंग से पढ़ना चाहता हूँ सो पढ़ाया तक तो जाता नहीं, अब चार-चार शादियाँ करके रख दो।"
पात्रानुकूलता
इस उपन्यास के संवाद निम्न मध्यम वर्ग के पात्रों की भावनाओं को अभिव्यक्त करने के कारण पात्रों के अनुकूल हैं। चिन्ता, पीड़ा और धन का अभाव संवादों के माध्यम से व्यक्त हुआ है। उपन्यास के कुछ पात्र ही शिक्षित हैं। ऐसी स्थिति में उनके संवाद भी उन्हीं के अनुसार हैं। पात्रों के संवादों की अनुकूलता इस प्रकार है-
- समर-शिक्षित है, लेकिन घर की परिस्थिति में पढ़ नहीं पा रहा है। ऊपर से उसकी इच्छा के विरुद्ध उसकी शादी भी कर दी है।
- भाभी ने समर से कहा- "तुम्हारा ब्याह भी क्या हुआ, लालाजी ! क्या-क्या अरमान थे, सब पर पानी फिर गया। लेन-देन की तो खैर कोई बात नहीं, एक आध साल में आई-गई बात हो जाती है। लेकिन वह महारानी जी तो जिन्दगीभर को बँध गई। उन लोगों ने शायद भेजने को लिखा है।"
- बाबूजी - इनके संवादों में कठोरता और असभ्यता दिखाई देती है। " और कोई जगह दाल बीनने की रह ही नहीं गई ? दाल छत पर ही बिनेगी ! ऐसे ही उस दिन छत पर बाल्टी ले जाकर सिर धोया गया ।.... कुछ दिमाग ही समझ में नहीं आते साहबजादी के ।"
- अम्मा जी- बुर्जुग महिला है और प्रभा और भाभी की सास हैं इनकी भाषा में कठोरता और रौब दिखाई देता है – “ओहो, अब तो ये जताने लगी कि मैं इतना काम करूँ, क्यों ? वाह री ! अच्छी बहू है, तू तो काम के ताने देने लगी। अरे ! तुझे अपना काम करने की फुर्सत नहीं मिलती ? खाने की तो मिल जाती है न ?”
भावानुकूलता और संक्षिप्तता
सारा आकाश के संवाद पात्रों की भावनाओं को प्रकट करने वाले तथा पाठकों के अन्तःस्थल को छू लेते हैं। इसके संवाद पाठकों को पात्रों की भावनाओं से जोड़ देते हैं।इस उपन्यास के संवाद लंबे और बोझिल नहीं हैं। लेखक ने छोटे और चुटीले वाक्यों का प्रयोग किया है जो कथा की गति को बनाए रखते हैं। विशेषकर समर के अपने भाइयों और पिता के साथ होने वाले संवाद बहुत संक्षिप्त हैं, जो उनके बीच की दूरियों (Communication Gap) को रेखांकित करते हैं।
उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि संवादों की दृष्टि से 'सारा आकाश' उपन्यास एक हैं अनुकूल सफल रचना है। उपन्यास के संवाद सरल, संक्षिप्त लेकिन कहीं-कहीं बड़े भी, मनोभावों के किसी-किसी पात्र के एक संवाद से उसका चरित्र हमारे सम्मुख स्पष्ट हो जाता है। इस उपन्यास के संवाद ही वह माध्यम हैं जो एक साधारण पारिवारिक कहानी को एक गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विमर्श में बदल देते हैं।


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