बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय विषय पर हिंदी निबंध हम जैसा भी कार्य अर्थात् कर्म करते है हमें उसका वैसा ही फल मिलता है।
बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय विषय पर हिंदी निबंध
हम जैसा भी कार्य अर्थात् कर्म करते है हमें उसका वैसा ही फल मिलता है। प्रत्येक मनुष्य कर्म करने के लिये स्वतन्त्र है परन्तु उन कर्मों का फल तो ईश्वर देता है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का जो भी फल हो भोगना ही पड़ता है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन् ।
मा कर्मफलहेतुर्भूमति सङ्गडस्त्वकर्मणि ॥
अर्थात् मनुष्य को अपना कर्म करना चाहिये। फल देना तो ईश्वर का काम है। जो कर्म दूसरों की भलाई के लिए किये जाते हैं वे सत्कर्म कहलाते हैं। ऐसे कर्म करने वाला व्यक्ति सदैव सुखी रहता है। दूसरों को कष्ट पहुँचाने वाले कर्मों को असत् कर्म कहते हैं। हम जैसे भी कर्म करते हैं हमें वैसा ही फल मिलता है।
प्रायः कर्म करते समय मनुष्य यह भूल जाता है कि अच्छे और बुरे जैसे भी कर्म कर रहा है। उन कर्मों का फल उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्म के अनुसार फल अवश्य मिलता है। इस सम्बन्ध में निम्न उदाहरण देखने को मिलते हैं। हम बीज बो कर अर्थात् कर्म करके भूल जाते हैं किन्तु बीज उगना नहीं भूलता।
भीष्म पितामह ने एक दुमही को तीर की नोंक से उठाकर बेरिया के पेड़ पर पटक दिया जहाँ उसे छः महीने तड़पना पड़ा। वही फल शर-शय्या पर सोकर उन्हें भोगना पड़ा। राजा दशरथ ने श्रवण के तीर मारा। उनके माता-पिता ने पुत्र वियोग में प्राण त्याग दिये, उसी प्रकार पुत्र-वियोग में राजा दशरथ को प्राण त्यागने पड़े। दुर्योधन ने पाण्डवों को राज्य प्राप्ति की इच्छा से नाना प्रकार के कष्ट दिये तो अन्त में उसका फल उन्हें पराजय और नाश के रूप में भोगना पड़ा। आज भी लोग दुर्योधन से घृणा और युधिष्ठिर का सम्मान करते हैं । इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जो जैसा कर्म करते हैं उन्हें उसका परिणाम अवश्य मिलता है।
विद्यार्थी जीवन में तो कर्म का विशेष महत्व है। क्योंकि विद्या रूपी धन को बिना परिश्रम के कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता। जो विद्यार्थी परिश्रम एवं लगन से पढ़ाई करते हैं, वे हमेशा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर अपना, अपने माता-पिता का एवं विद्यालय का नाम रोशन करते हैं। इसके विपरीत जो विद्यार्थी अपना समय खेल में व्यर्थ बिताते हैं वे अक्सर परीक्षा में अनुत्तीर्ण होकर जीवन की दौड़ में पीछे रह जाते हैं तथा अपने माता-पिता और शिक्षकों के कोप का भाजन बनते हैं ।
तुलसीदास, कबीरदास, गुरुनानक, चन्द्रशेखर आजाद, राजा हरिश्चन्द्र, राजा राममोहन राय, महात्मा गाँधी आदि महापुरुषों ने अपने कर्मों से यह सिद्ध कर दिया है कि जो जैसी करनी करता है उसका फल उसे वैसा ही मिलता है। दूसरों को सुख पहुँचाने वाला सुखी और दूसरों को दुःख पहुँचाने वाला हमेशा दुःखी ही रहता है। कहा भी गया है जैसा बोओगे, वैसा काटना पड़ेगा - ' As you sow, so you reap'. अपने द्वारा किये गये कर्म के फल से कोई भी बच नहीं सकता। तुलसीदास जी के अनुसार-
कर्म प्रधान विश्व करि राखा ।
जो जस करइ सो तस फल चाखा ॥
इतिहास ऐसे असंख्य उदाहरणों से भरा पड़ा है जिससे सिद्ध होता है कि जो व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य ऊँचा बनाकर चलते हैं, वे ऊँचा प्रयास करते हैं और ऊँचाइयों पर पहुँच जाते हैं।यदि हमारे कर्म ही अच्छे न हों तो हमें अच्छे फल की भी आशा नहीं करनी चाहिए। कहावत भी है-
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय ।
अंगुलिमाल जब तक हिंसा के कर्मों में लगे रहे तब तक उन्हें शान्ति नहीं मिली। हिंसा छोड़कर ही उन्हें सुख शान्ति का अनुभव हुआ ।
अतः कहने का तात्पर्य यह है कि हमें सदैव अच्छे कर्म करने चाहिए। यदि हमारे कर्म ही अच्छे न होंगे तो उनका फल कैसे अच्छा होगा। जो व्यक्ति दूसरों को कष्ट पहुँचाता है उसे स्वयं भी कष्ट उठाने पड़ते हैं। हमें सदैव दूसरों का उपकार करना चाहिये और उस कर्म के फल की आशा नहीं करनी चाहिये। क्योंकि फल तो एक न एक दिन अवश्य मिलेगा। केवल सत्कर्म करना ही मनुष्य का उद्देश्य होना चाहिये।


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