प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप एवं प्रयोग क्षेत्र

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प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप एवं प्रयोग क्षेत्र प्रयोजनमूलक हिंदी भाषा का वह रूप है जो दैनिक जीवन, व्यावसायिक गतिविधियों और सामाजिक संदर्भों में व्या

प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप एवं प्रयोग क्षेत्र


प्रयोजनमूलक हिंदी भाषा का वह रूप है जो दैनिक जीवन, व्यावसायिक गतिविधियों और सामाजिक संदर्भों में व्यावहारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विकसित हुआ है। यह हिंदी का वह आयाम है जो साहित्यिक या काव्यात्मक अभिव्यक्ति से अलग, स्पष्टता, सरलता और प्रभावी संप्रेषण पर जोर देता है। प्रयोजनमूलक हिंदी का उदय आधुनिक भारत के विकास के साथ जुड़ा है, जहां भाषा को मात्र भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि कार्यसिद्धि का उपकरण बनाया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, जब हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला, तब से इसकी उपयोगिता में वृद्धि हुई, क्योंकि सरकारी दस्तावेजों, कानूनी प्रक्रियाओं और जनसंचार माध्यमों में इसका प्रयोग अनिवार्य हो गया। इस प्रकार, प्रयोजनमूलक हिंदी भाषा की उस शाखा का प्रतिनिधित्व करती है जो सामान्य बोलचाल से लेकर विशेषज्ञ क्षेत्रों तक फैली हुई है, और इसका मुख्य उद्देश्य सूचना का त्वरित और सटीक आदान-प्रदान सुनिश्चित करना है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप

प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप एवं प्रयोग क्षेत्र
अंग्रेजी शब्द Functional के लिए हिन्दी में 'प्रयोजन' तथा 'प्रकार्य ' शब्दों का प्रयोग किया जाता है और Functional Hindi के लिए 'प्रयोजनमूलक हिन्दी' इसे प्रकार्यात्मक, व्यावहारिक तथा कामकाजी हिन्दी आदि संज्ञाएँ भी दी जाती रही हैं। श्री रमाप्रसन्न नायक आदि विद्वान् 'व्यावहारिक हिन्दी' की संज्ञा उचित नहीं मानते हैं। उनके अनुसार 'प्रयोजनमूलक' सम्बोधन से लगता है कि इसके अतिरिक्त जो है वह निष्प्रयोजनपरक है। 'प्रयोजनमूलकता' का अर्थ यहाँ अन्य तरह के भाषा व्यवहार से प्रयोजनमूलक भाषा के भेदक लक्षण के रूप में लिया गया है। किसी वस्तु का अस्तित्व मूलतः उसके प्रयोजन के कारण ही होता है। लेकिन यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि किसी भी वस्तु का स्वरूप उसके प्रयोजनानुरूप ही होता है। 'प्रयोजनमूलक' वह भाषा रूप है, जो अपर्ने विशिष्ट प्रयोजन के परिप्रेक्ष्य में विशिष्ट स्वरूप धारण किया हुआ है। अतः यहाँ 'प्रयोजनमूलक' विशेषण हिन्दी के व्यावहारिक रूपों की ओर ही संकेत करता है। डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा ने प्रयोजनमूलक विशेषण में निहित संकेत को रेखांकित करते हुए लिखा है- “निष्प्रयोजन कोई चीज नहीं है, लेकिन प्रयोजनमूलक विशेषण उसके व्यावहारिक पक्ष को अधिक उजागर करने के लिए प्रयुक्त किया गया।" डॉ. नगेन्द्र नामकरण को उचित साबित करते हुए कहते हैं- वस्तुत: प्रयोजनमूलक हिन्दी के विपरीत अगर कोई हिन्दी है तो वह निष्प्रयोजनमूलक नहीं वरन् आनन्दमूलक हिन्दी है। आनन्द व्यक्तिसापेक्ष है और प्रयोजन समाज सापेक्ष । आनन्द स्वकेन्द्रित होता है और प्रयोजन समाज की ओर इशारा करता है। हम आनन्दमूलक हिन्दी के विरोधी नहीं हैं इसलिए आनन्दमूलक साहित्य के हम भी हिमायती हैं। पर सामाजिक आवश्यकता के सन्दर्भ में हम सम्प्रेषण के बुनियादी आधार को भी अपनी नजर से ओझल नहीं करना चाहते।"
 

व्यावहारिक हिन्दी से तात्पर्य

दैनिक जीवन के कार्य-साधन के लिए प्रयुक्त की जाने वाली हिन्दी। इस रूप में यह संज्ञा अतिव्याप्ति के दोष का शिकार है। क्योंकि दैनिक कार्य साधन की व्याप्ति अति विशाल है। भाषा से परिचित बच्चे से लेकर वृद्धों तक के सम्पूर्ण भाषाई क्रिया-कलापों का समावेश इसमें होता है। छोटा बच्चा भूख लगने पर माँ से दूध माँगता है और कहता है 'माँ दूध ।' उसका यहाँ भाषा का प्रयोग कार्य-साधन के रूप में ही है। हमारा सम्पूर्ण दैनिक भाषा प्रयोग किसी-न-किसी कार्य साधन के लिए ही होता है। हर तरह के व्यवहार में प्रयुक्त भाषा अर्थात् पिता-पुत्र का व्यवहार, मित्र-मित्र का व्यवहार तथा सम्पूर्ण सामाजिक व्यवहार में प्रयुक्त हिन्दी भाषा से तात्पर्य व्यावहारिक हिन्दी होगा। इस संज्ञा से एक भ्रम यह भी होता है कि यह सामान्य स्तर की भाषा है। इस सम्बन्ध में डॉ. विनोद गोबरे ने लिखा है- "व्यावहारिक हिन्दी नामकरण के साथ एक भ्रमं यह भी जुड़ जाता है कि व्यावहारिक हिन्दी का अर्थ ऐसी हिन्दी से है, जिसमें व्याकरण एवं सामाजिक आचरण के बजाय व्यावहारिक उपयोग पर अधिक बल दिया जाता है, ऐसी भाषा जिसकी संरचना में व्याकरण की अनिवार्यता के बजाय व्यावहारिक उपयोगिता अधिक हो। इसके विपरीत प्रयोजनमूल भाषा के प्रशासन, सम्पर्क तथा सम्प्रेषण आवश्यक होता है और उसमें उच्चरित वाक्य-प्रयोग से लेकर लिखित वाक्य तक व्याकरण सम्मत शुद्धता एवं सामाजिक भद्रता का आग्रह होता है।” इससे स्पष्ट हो जाता है कि 'व्यावहारिक हिन्दी' की तुलना में 'प्रयोजनमूलक हिन्दी' सम्बोधन अधिक संगत, अर्थ गर्भित, लक्ष्यभेदी, स्पष्ट तथा सरल है।

प्रयोजनमूलन हिन्दी का व्यवहार क्षेत्र

प्रयोजनमूलक हिन्दी के विविध रूपों का आधार उनका प्रयोग क्षेत्र होता है। स्वतन्त्रता के बाद हिन्दी भाषा के प्रयोजनमूलक रूपों का संतोषप्रद विकास एवं विस्तार हुआ है। आज हिन्दी सिर्फ सृजनात्मक साहित्य लेखन की भाषा नहीं है, आधुनिक विषयों तथा ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों में भी उसका प्रयोग हो रहा है। एक समय था कि साहित्य एवं साहित्यिक भाषा के माध्यम से ही लौकिक एवं पारलौकिक प्रयोजनों के सिद्धि की कामना की जाती थी- 'काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये', लेकिन आज यश, अर्थ तथा व्यवहार ज्ञान प्राप्त कर अपने लौकिक कल्याण के लिए काव्य तथा काव्यभाषा के साथ प्रयोजनमूलक भाषा भी आवश्यक है। वास्तव में राष्ट्रीय विकास के लिए भाषा के साहित्यिक और साहित्येतर दोनों पक्षों की आवश्यकता है। कोई भाषा कितनी ही विकसित और कितनी ही समर्थ तथा सशक्त क्यों न हो, उसका मूल्यांकन इस आधार पर किया जाता है कि उसके साहित्य में कितनी विविधता है। उसमें सभी विषयों से सम्बन्धित पारिभाषिक शब्दावली विद्यमान है और वह प्रशासन, वाणिज्य, जनसंचार तथा ज्ञान-विज्ञान एवं तकनीकी आविष्कारों को व्यक्त करने में कितनी सक्षम है। उस भाषा का प्रयोग किन-किन क्षेत्रों में, कितनी मात्रा में हो रहा है आदि। इसके साथ यह भी देखा जाता है कि क्या वह आधुनिक युग की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सक्षम है और भविष्य में इसकी प्रगति के लिए उसमें कितनी सम्भावनाएँ हैं? आधुनिक युग की आवश्यकताएँ प्रयोजनमूलक भाषा रूपों का निर्धारक तत्त्व है। इस दृष्टि से प्रयोजनमूलक हिन्दी का क्षेत्र विशाल एवं बहुआयामी है। डॉ. विनोद गोदरे के शब्दों में कहना हो, तो "प्रयोजनमूलक हिन्दी एक ओर केन्द्र व राज्य शासन के पत्र-व्यवहार, विधान मंडल की कार्यवाही, संसदीय विधियाँ, कार्यालयीय पत्राचार, सरकारी संकल्पों, अधिसूचना, प्रेस विज्ञप्तियाँ, आयोग, समितियाँ, अभिकरण, मसौदे, निविदा फार्म्स, लायसेंस, परमिट, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली, विधि, बैंकिंग सेवा तथा डाकतार आदि में प्रयुक्त होती और दूसरी ओर व्यावसायिक पत्रों, विज्ञापनों की रंगीन दुनिया, दृक्-श्रव्य माध्यमों आदि में शब्द की भूमिका निभाती है। इसके अलावा जीविकोपार्जन में सेवा-माध्यम के रूप में भी प्रयुक्त भाषा के विविध आयाम प्रयोजनमूलक हिन्दी के व्यापक व्यवहार क्षेत्र की ओर संकेत करते हैं।"

इस प्रकार प्रयोजनमूलक हिंदी का विवेचन करते हुए यह स्पष्ट होता है कि यह भाषा की विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो परंपरागत साहित्यिक हिंदी से अलग होकर आधुनिक आवश्यकताओं को पूरा करती है। एक ओर जहां यह भाषा की पहुंच को बढ़ाती है, वहीं दूसरी ओर इसमें चुनौतियां भी हैं, जैसे शब्दावली की कमी या अंग्रेजी के प्रभाव से उत्पन्न मिश्रितता। फिर भी, इसका योगदान भारत की बहुभाषी संरचना में एकता लाने में है, क्योंकि यह ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में समान रूप से उपयोगी है। भविष्य में, डिजिटल क्रांति के साथ प्रयोजनमूलक हिंदी और मजबूत होगी, जहां एआई और मशीन अनुवाद इसके विस्तार को सहायता प्रदान करेंगे। अंततः, यह न केवल भाषा का व्यावहारिक रूप है, बल्कि राष्ट्र की प्रगति का प्रतिबिंब भी, जो उपयोगिता और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करता है।

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