प्रयोजनमूलक हिंदी हिंदी भाषा का वह व्यावहारिक और उपयोगी चेहरा है जो साहित्यिक सुंदरता के बजाय जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करने पर केंद्रित रह
प्रयोजनमूलक भाषा का अर्थ स्वरूप और विशेषताएं
वर्तमान समय में भाषा ही नहीं, किसी भी चीज का निष्प्रयोज्य या प्रयोजनहीन होना निरर्थक है। एक शब्द इधर काफी प्रचलन में आया था- प्रयोजनातीत। वास्तव में यह प्रयोजनातीत शब्द केवल प्रवचन के लिए है। व्यावहारिक रूप से देखें तो प्रयोजन से परे किसी भी वस्तु की जरूरत और जगह हमारे जीवन में नहीं है। यही बात भाषा पर भी पूरी तरह लागू होती है। बिना प्रयोजन के कोई भी भाषा मृतप्राय भाषा होती है। उसे प्रयोजनमूलक होना चाहिए और प्रयोजनात्मक भी। भाषा की जीवन्तता और वैज्ञानिकता का प्रमाण यही है कि उसमें प्रयुक्ति की प्रक्रिया को अनवरत दिशा मिलती रहे। इस दृष्टि से हिन्दी का प्रयोजन मूलक रूप अपनी अनेक-आयामी क्षमता के कारण आकृष्ट करता है।
हिन्दी ने मध्यकाल में साधु-सन्तों की भाषा के रूप में भक्ति-आन्दोलन को अखिल भारतीय विस्तार दिया था। स्वाधीनता-संग्राम के दिनों में यह आजादी की लड़ाई में जूझने वाले राष्ट्र-भक्तों की सम्पर्क भाषा के रूप में काम करती रही। आशयतः कहा जा सकता है कि अधिकाधिक प्रयुक्ति-क्षेत्रों में प्रवेश कर अनुभव और सम्प्रेषण के अनगिनत प्रयोजनों की सिद्धि करने वाली प्रयोजनमूलक भाषा अपनी विशिष्ट सोद्देश्यता के कारण ही प्रयोजनमूलक बनी रहती है। प्रयोजनमूलक भाषा नदी की धारा की तरह अपना मार्ग स्वयं बनाती है। वह अपनी प्रयोग-क्षमताओं का निरन्तर विस्तार करती रहती है। सम्प्रेषण भाषा का मूल प्रयोजन है। इसी की नींव पर भाषा के सभी प्रयोजन टिके हैं। जहाँ तक हिन्दी के प्रयोजनमूलक स्वरूप का प्रश्न है, हम इसे निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत देख सकते हैं -
- साहित्यिक हिन्दी
- सामाजिक हिन्दी
- व्यापारिक हिन्दी (मंडियों, दलालों, सट्टाबाजारों की भाषा)
- कार्यालयीय हिन्दी
- जनसंचार माध्यमों में प्रयुक्त हिन्दी
- शास्त्रीय हिन्दी (संगीत, दर्शन, सौन्दर्य, भाषा, विधि आदि शास्त्रों की भाषा)
- तकनीकी हिन्दी (इंजीनियरिंग, प्रेस, फैक्टरी आदि की भाषा)
प्रयोजनमूलक भाषा की विशेषताएँ
प्रयोजनमूलक भाषा की प्रमुख विशेषताएँ अधोलिखित हैं-
- अनुप्रयुक्तता - अनुप्रयुक्तता और प्रयोजनीयता प्रयोजनमूलक भाषा की सबसे बड़ी विशेषता है। प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में जहाँ तक हिन्दी का प्रश्न है, उसमें अनुप्रयुक्तता की दृष्टि से राजभाषा, कार्यालय, वाणिज्यिक, व्यावसायिक, वैज्ञानिक, प्रौद्यं गिक आदि क्षेत्रों का समावेश है।
- वैज्ञानिकता- प्रयोजनमूलक भाषा की दूसरी अहम् विशेषता वैज्ञानिकता है। किसी भी विषय के तर्क-संगत, कार्य-कारण-भाव से युक्तं विशिष्ट ज्ञान पर आधृत प्रवृत्ति को वैज्ञानिकता कहा जा सकता है। इस दृष्टि से प्रयोजनमूलक हिन्दी सम्बन्धित विषय-वस्तु को विशिष्ट तर्क एवं कार्य-कारण सम्बन्धों पर आधारित नियमों के अनुसार विश्लेषित, व्याख्यायित और रूपायित करती है। अस्तु प्रयोजनमूलक हिन्दी अपनी अन्तर्वृत्ति, प्रवृत्ति, प्रयुक्ति भाषिक संरचना, विषय- विश्लेषणादि स्तरों पर वैज्ञानिकता युक्त है।
- सामाजिकता - सामाजिक गुण ही भाषा की प्रयोजनमूलकता का आधार है। प्रयोजनमूलक हिन्दी अन्तर्निहित सिद्धान्त और प्रयुक्त ज्ञान मनुष्य के सामाजिक प्रयुक्तिपरक क्रिया-कलापों का कार्य-कारण सम्बन्ध से तर्कनिष्ठ अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है। प्रयोजनमूलक हिन्दी में सामाजिकता के तत्त्व एवं विशिष्टता अनिवार्यतः विद्यमान हैं।
- भाषिक वैशिष्ट्य- यह विशेषता प्रयोजनमूलक भाषा की स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता को रूपायित कर उसे सामान्य और साहित्यिक भाषा से अलग करती है। प्रयोजनमूलक हिन्दी की भाषा सटीक, सुस्पष्ट, गंभीर, वाच्यार्थ प्रधान, सरल तथा एकार्थक होती है। वस्तुतः भाषा प्रयोग एवं व्यवहार की सामाजिक वस्तु है। आधुनिक युग में सामाजिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रयोग में लायी जाने वाली भाषा प्रयोजनमूलक भाषा कहलाती है और भाषा प्रकार्य के अनुसार उनके अनेक रूप-भेद होते हैं।
- वाच्यार्थ प्रधानता- हिन्दी में पर्यायवाची शब्दों की संख्या अधिक है। अतः ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्र में उसके अर्थ को स्पष्ट करने वाले भिन्न पर्याय चुनकर नये शब्दों का निर्माण सम्भव है। अंगरेजी के 'जनरल मैनेजर' और 'जनरल नालेज' में 'जनरल' दो अर्थ दे रहा है। हिन्दी में दोनों के लिए अलग-अलग शब्द है- महाप्रबन्धक तथा सामान्य ज्ञान । अतः हिन्दी का वाच्यार्थ भ्रान्ति नहीं उत्पन्न करता।
- सरलता और स्पष्टता - हिन्दी की प्रयोजनमूलक शब्दावली सरल और एकार्थक है, जो प्रयोजनमूलक भाषा का मुख्य गुण है। प्रयोजनमूलक भाषा में अनेकार्थकता दोष है। हिन्दी शब्दावली इस दोष से सर्वथा मुक्त है।
इस प्रकार प्रयोजनमूलक हिंदी हिंदी भाषा का वह व्यावहारिक और उपयोगी चेहरा है जो साहित्यिक सुंदरता के बजाय जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करने पर केंद्रित रहता है। यही कारण है कि आज के समय में इसका महत्व और विस्तार लगातार बढ़ रहा है।


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