प्रयोजनमूलक हिन्दी के प्रमुख तत्व और विशेषताएं

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प्रयोजनमूलक हिन्दी के प्रमुख तत्व और विशेषताएं प्रयोजनमूलक हिन्दी आधुनिक भाषाविज्ञान की अत्याधुनिक उपशाखा के रूप में विकसित हुई है। प्रयोजनमूलक

प्रयोजनमूलक हिन्दी के प्रमुख तत्व और विशेषताएं


प्रयोजनमूलक हिन्दी आधुनिक भाषाविज्ञान की अत्याधुनिक उपशाखा के रूप में विकसित हुई है। प्रयोजनमूलक एक पारिभाषिक शब्द है जो भाषा की अनुप्रयुक्तता और् प्रायोगिकता के निश्चित अर्थ में प्रयुक्त होता है। सामान्य रूप से हिंन्दी भाषा का प्रयोग तो हम सभी अपने दैनिक जीवन के विचार-विनिमय व कार्य-व्यवहारों में करते हैं, किन्तु प्रयोजनमूलक हिन्दी का प्रयोग विशिष्ट प्रयोजन के लिए ही होता है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी के प्रमुख तत्व और विशेषताएं
प्रयोजनमूलक हिंदी भाषा के उस रूप को संदर्भित करती है जो किसी विशिष्ट उद्देश्य या कार्य की सिद्धि के लिए प्रयुक्त होती है, जिसमें व्यावहारिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भाषा का उपयोग किया जाता है। यह हिंदी का वह अनुप्रयुक्त स्वरूप है जो साहित्यिक अभिव्यक्ति से अलग होकर कार्यालयी, विधिक,पत्रकारिता, विज्ञापन, अनुवाद और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में अपनी उपयोगिता सिद्ध करता है।

प्रयोजनमूलक हिंदी का विकास आधुनिक समय की आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ है, जहां भाषा न केवल संवाद का माध्यम है बल्कि सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक कार्यों को सुगम बनाने का उपकरण भी बन जाती है। इसकी जड़ें भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने से जुड़ी हैं, जिसने सरकारी कार्यों में हिंदी के उपयोग को बढ़ावा दिया और इसे प्रयोजनपरक बनाने की दिशा प्रदान की।

प्रयोजनमूलक हिन्दी के प्रमुख तत्व

इस प्रकार प्रयोजनमूलक हिन्दी की विशिष्ट विशेषताएँ व तत्त्व हैं, जो इसे सामान्य हिन्दी भाषा से अलग करते हैं। प्रयोजनमूलक हिन्दी की संरचना, संकल्पना और संचेतना के विश्लेषणोपरान्त उसके प्रमुख तत्त्व सामने आते हैं, जो निम्नलिखित हैं- 
  1. पारिभाषिक शब्दावली- यह प्रयोजनमूलक हिन्दी का प्रमुख तत्त्व हैं। प्रयोजनमूलक हिन्दी की अपनी पारिभाषिक शब्दावली होती है, जिसके अन्तर्गत शब्दों के वर्गीकरण, तद्भव, तत्सम, देशज, विदेशी और आगत शब्दों का वर्गीकरण किया जाता है। इसमें शब्दों के वर्गीकरण के अनेक आधार हैं, जैसे- नाम और व्यापार के आधार पर संज्ञा और क्रिया- येँ दो भेद किये जाते हैं। रचना के आधार पर मूल और यौगिक अन्तर किये जाते हैं। शब्द किस भाषा से आया है; इस आधार पर तद्भव व तत्सम और देशज आदि का वर्गीकरण प्रस्तुत किया जाता है। कुछ विद्वान् प्रयोग के आधार पर शब्दों के तीन अन्य भेद भी करते हैं- (i) पारिभाषिक (ii) अर्द्ध पारिभाषिक (iii) सामान्य । 
  2. अनुवाद - अनुवाद, प्रयोजनमूलक हिन्दी का दूसरा मूलतत्त्व है। अनुवाद की प्रक्रिया अनेक स्तरों पर होती है। उसका एक स्तर विज्ञान की तरह विश्लेषणात्मक है, जो क्रमबद्ध विवेचन की अपेक्षा रखता है। उसका दूसरा स्तर संक्रमण का स्तर है, जो शिल्प के अन्तर्गत आता है और तीसरा स्तर पुनर्गठन अथवा अभिव्यक्ति का स्तर है जो कला के अन्तर्गत माना जाता है। प्रयोजनमूलक हिन्दी के साथ-साथ वर्तमान समय में एक अत्याधुनिक माध्यम के रूप में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। विश्व फलक पर आविर्भूत होते ज्ञान-विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के अनेकविध क्षेत्रों का फैलाव समस्त जगत में तीव्रगति से हो रहा है। ज्ञान-विज्ञान के उक्त सभी क्षेत्रों, देश-विदेशों की संस्कृति तथा देश के प्रशासन आदि को यथाशीघ्र समुचित ढंग से अभिव्यक्ति देने में एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में अनुवाद का महत्त्व स्वयंसिद्ध है। इस प्रकार प्रयोजनमूलक हिन्दी के रूप, ज्ञान क्षेत्र, पारिभाषिक शब्द भण्डार तथा भाषिक संरचना की विशिष्टता आदि की श्रीवृद्धि में अनुवाद की अनिवार्य तथा अहम् भूमिका बनी हुई है। 
  3. भाषिक संरचना - यह प्रयोजनमूलक हिन्दी का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। प्रयोजनमूलक भाषा की प्रयुक्ति में विशेष प्रयास, प्रयुक्ति बोध तथा क्षेत्र - विशेष का विशेष ज्ञान होना प्रयोक्ता के लिए अनिवार्य होता है, क्योंकि इसकी शब्दावली, भाषिक संगठन तथा प्रयुक्ति के उद्देश्य सामान्य व्यवहार की हिन्दी-भाषा से पृथक होते हैं। इन्हीं आवश्यकताओं के आधार पर यह प्रयोजनमूलक भाषा कहलाती है। प्रयोजनमूलक भाषा एकार्थक तथा स्पष्ट होती है, जिससे प्रयोक्ता की बात को निश्चित और सही सटीक अर्थों में समझा जा सके। प्रयोजनमूलक भाषा में व्यंग्यार्थ तथा अलंकार आदि का प्रयोग नहीं होता है। इस भाषा की भाषिक अभिव्यक्ति शैली गम्भीर, वाच्यार्थ प्रधान तथा व्यंग्यार्थ-रहित होती है। इसका एक मानक रूप निश्चित होता है। प्रयोजनमूलक हिन्दी की भाषिक संरचना में वैज्ञानिक तथा तकनीकी (पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग-बाहुल्य अनिवार्य रूप से विद्यमान रहता है। चूँकि प्रयोजनमूलक हिन्दी माध्यम से विज्ञान, प्रौद्योगिकी, विधि, मानविकी तथा प्रशासन जैसे गम्भीर विषयों का विवेचन-विश्लेषण किया जाता है, अतः उसकी भाषा-शैली में भी विचारात्मकता, गम्भीरता तथा दुरूहता का होना स्वाभाविक है। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी जैसे विषयों के निरूपण हेतु उसकी संकल्पनाओं, व प्रतीक-चिह्नों आदि के कारण इसकी संरचना में गम्भीरता के साथ-साथ जटिलता एवं दुरूहता आ जाती है। फलतः विभिन्न ज्ञान-विज्ञान तथा प्रशासन की शाखाओं और उपशाखाओं की अभिव्यक्ति के सन्दर्भ में स्थिति तथा विषयवस्तु के अनुसार प्रयोजनमूलक हिन्दी की भाषा-संरचना में विभिन्नता पायी जाती है, किन्तु इसके बावजूद उसकी भाषिक संरचना की विशिष्टता अनवरत बनी हुई है जिसके कारण प्रयोजनमूलक हिन्दी अपने विकास पथ पर अबाध रूप से अग्रसर होती जा रही है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी की विशेषताएँ

सामान्यतः हिन्दी भाषा को हम सभी अपने दैनिक जीवन के विचार-विनिमय एवं कार्य-व्यवहार में प्रयुक्त करते हैं, लेकिन प्रयोजनमूलक भाषा का प्रयोग हम अपने दैनिक व्यवहार में नहीं कर पाते हैं। दूसरे शब्दों में सामान्य भाषा तो सभी पढ़े-लिखे लोग बोल और लिख लेते हैं परन्तु जब किसी प्रयोजन विशेष से भाषा का प्रयोग किया जाता है तो भाषा के इस प्रायोगिक रूप को प्रयोजनमूलक भाषा कहा जाता है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ होती हैं, जो इसे सामान्य व्यवहार की भाषा से पृथक् करती हैं, वे विशेषताएँ निम्नलिखित हैं -
  1. प्रयोजनमूलक भाषा के शब्द साहित्यिक भाषा की तरह अनेकार्थी नहीं होते; इनका एक निश्चित पारिभाषिक अर्थ होता है। यदि ऐसा न हो तो प्रशासन-तंत्र में परस्पर मतभेद पैदा हो जाये। न्यायालयों में न्याय प्रभावित होने लगे। 
  2. प्रयोजनमूलक भाषा के शब्दों का प्रयोग एक सीमित क्षेत्र में होता है, इसीलिए प्रत्येक क्षेत्र की प्रयोजनमूलक भाषा की पारिभाषिक शब्दावली अलग होती है- बीमा, बैंक, प्रशासन, न्यायालय, सभी में काम करने वाले को इनसे सम्बन्धित शब्दावली का ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य होता है। 
  3. प्रयोजनमूलक भाषा उपर्युक्त आधारों की दृष्टि से सामान्य भाषा से थोड़ी भिन्न होती है। सामान्य भाषा ही कुछ प्रयोजनमूलक शब्दावली के मिल जाने से अपना मूल स्वरूप सुरक्षित रखते हुए, कुछ भिन्न भाषा के रूप में व्यवहृत होने लगती हैं। 
  4. प्रयोजनमूलक भाषा न तो अलंकार-प्रधान होती है और न कहावतों तथा मुहावरों से लदी हुई लच्छेदार । यह एकदम सपाट, सार्थक और नीरस भाषा होती है; क्योंकि इसका उद्देश्य आनन्द-प्राप्ति न होकर, यथार्थ परिस्थितियों पर आधारित राज-काज होता है। 
  5. विदेशों में सामान्य भाषा की पढ़ाई हाईस्कूल स्तर तक समाप्त हो जाती है। इसके बाद छात्र कामकाजी विषयों का अध्ययन शुरू करता है और उसका पूर्व का भाषा ज्ञान इसका आधार बनता है। भारत में इसका ठीक उल्टा होता है, यहाँ व्यक्ति नौकरी पा लेने के बाद अपनी नौकरी से सम्बन्धित भाषा का ज्ञान प्राप्त करने लगता है। राजनीतिज्ञों के साथ तो और भीं विडम्बना है; कुछ तो ऐसे होते हैं, जिन्हें सामान्य भाषा का ही ज्ञान नहीं होता। वे बिना पढ़े ही सचिव की सलाह पर जरूरी फाइलों पर हस्ताक्षर कर देते हैं। इस तरह कभी-कभी बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता है। इन नेताओं के लिए प्रयोजनमूलक भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, प्रयोजनमूलक हिंदी आधुनिक भारत की भाषाई आवश्यकताओं का प्रतिबिंब है, जो हिंदी को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में सहायक है। यह भाषा न केवल राष्ट्रीय एकता को मजबूत करती है बल्कि आर्थिक और सामाजिक विकास में भी योगदान देती है, जहां इसकी विशेषताएं इसे एक समर्थ और लचीली भाषा के रूप में स्थापित करती हैं।

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