कुंडली में ग्रहों की युति और फल | Planetary Conjunction

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कुंडली में ग्रहों की युति और फल | Planetary Conjunction जब दो या दो से अधिक ग्रह पत्रिका में एक ही राशि या एक ही भाव में हों, तो उनकी ऊर्जाएँ आपस में

कुंडली में ग्रहों की युति और फल | Planetary Conjunction

ब दो या दो से अधिक ग्रह पत्रिका में एक ही राशि या एक ही भाव में हों, तो उनकी ऊर्जाएँ आपस में मिलकर एक नया और संयुक्त प्रभाव डालती हैं, इसे ग्रहों की युति कहा जाता है। युति के परिणाम शुभ या अशुभ हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-से ग्रहों की युति किस राशि और भाव में हो रही है।

यदि दो ग्रह एक दूसरे के साथ युति में होते हैं तो दोनों एक दूसरे पर अपना प्रभाव अवश्य डालते हैं। इस स्थिति में यह भी देखना आवश्यक हो जाता है कि वे दोनों ग्रह किन भावों के स्वामी हैं। इसे समझने के लिए निम्नलिखित कुंडली पर विचार करते हैं:


इस पत्रिका में मंगल लग्नेश व अष्टमेश होकर लग्न भाव में स्थित है तथा शुक्र द्वितीयेश व सप्तमेश होकर लग्न भाव में मंगल के साथ युति में है। शुक्र धनेश है और अष्टमेश मंगल के साथ युति में है। अतएव यह कहा जा सकता है कि जातक के धन प्राप्ति के मार्ग में अष्टमेश मंगल रुकावट डालने का कार्य करेगा। अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि धनेश, अष्टमेश के बंधन में है। लेकिन जो ग्रह को बाँधता है, वही ग्रह बंधन को खोलता भी है। अर्थात् इस स्थिति में अष्टम भाव से संबंधित कार्य करने से जातक को धन की प्राप्ति होगी। उसीप्रकार सप्तमेश शुक्र भी अष्टमेश मंगल के बंधन में है। अतः जातक को वैवाहिक जीवन में परेशानियों का सामना करना होगा लेकिन यदि जातक या जातिका का जीवन साथी इंजीनियर (मंगल से संबंधित), ज्योतिष (अष्टम भाव से संबंधित), रिसर्चर (अष्टम भाव से संबंधित) इत्यादि हो तो उसे कोई परेशानी नहीं होगी।


एक अन्य उदाहरण के द्वारा भी इसे निम्न प्रकार समझा जा सकता है:

A red and white grid with numbers

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उपरोक्त पत्रिका में मंगल, नवम तथा चतुर्थ भाव का स्वामी है तथा शुक्र दशम तथा तृतीय भाव का स्वामी है। नवम भाव में शुक्र और मंगल की युति है। इस युति की सहायता से जातक के जीवनके बारे में अनेक बातें बताई जा सकती हैं। तृतीय भाव छोटी यात्राओं को इंगित करता है तथा नवम भाव धर्म भाव है। अतः जातक धार्मिक यात्राएं करेगा। तृतीय भाव छोटे भाई बहनों का होता है तथा शुक्र विलासिता को इंगित करता है अतः इस जातक के छोटे भाई अथवा छोटी बहन का झुकाव का विलासिता पूर्ण जीवन की ओर होगा। नवम भाव पिता का भाव भी है तथा अतः संभव है कि इस व्यक्ति के पिता ने अपने कार्य के लिए यात्राएँ की हो। चतुर्थ भाव माता का भाव भी है तथा दशम भाव अधिकार को भी दर्शाता है अतः संभव है कि जातक की माता बोल्ड तथा अधिकारों के प्रति सचेत रहने वाली महिला हो।

लेकिन ग्रहों की युति कितनी प्रभावी होगी यह उनकी अंशात्मक दूरी पर निर्भर करता है। एक ही भाव में स्थित दो ग्रहों के अंशों का अंतर उन दोनों ग्रहों के दीप्तांशों के औसत मान से कम हो तो ग्रहों की युति अधिक प्रभावी होती है। ग्रहों के दीप्तांश भिन्न-भिन्न होते हैं, सूर्य का दीप्तांश 15°, चंद्रमा का 12°, मंगल का 8°, बुध का 7°, गुरु का 9°, शुक्र का 7° तथा शनि का 9° होता है। दीप्तांशों के ये मान ज्योतिषियों द्वारा प्रमाणित किए गए है, विशेषकर पाश्चात्य ज्योतिषगण इन दीप्तांशों का उपयोग बहुतायत से करते हैं। दीप्तांशों का सीधा अर्थ ग्रहों के कक्षीय प्रभाव से लिया जाना चाहिए, अर्थात् कोई ग्रह कितनी दूर तक अपना प्रभाव डालने में सक्षम है, यह उसके दीप्तांश से जाना जा सकता है। उदाहरण के लिए माना कि किसी पत्रिका में सूर्य व बुध की युति है तथा पत्रिका में सूर्य व बुध के अंश क्रमशः 17° व 4° हैं। इस स्थिति में सूर्य व बुध के दीप्तांशों का औसत मान (15°+ 7°)/2=11° होगा तथा पत्रिका में सूर्य व बुध के अंशों का अंतर 17- 4=13° है, जो कि दीप्तांशों के औसत मान 11° से अधिक है। अतः यह युति अधिक प्रभावी नहीं होगी। एक अन्य उदाहरण के अंतर्गत माना कि किसी पत्रिका में बुध व शुक्र की युति है तथा बुध व शुक्र के अंश क्रमशः 11° व 7° हैं। बुध व शुक्र के दीप्तांशों का औसत मान (7°+ 7°)/2=7° होगा तथा पत्रिका में बुध व शुक्र के अंशों का अंतर 11°- 7°=3° है जो कि दीप्तांशों के औसत मान से कम है। अतः यह युति अत्यधिक प्रभावी होगी। यदि किसी पत्रिका में गुरु व शनि की युति है तथा उनके अंशों का मान क्रमशः 18° व 9° है। गुरु व शनि के दीप्तांशों का औसत मान (9°+9°)/2=9° होगा तथा पत्रिका में उनके अंशों का अंतर भी 18°- 9°=9° ही आएगा। इस स्थिति में भी यह युति प्रभावी ही मानी जाएगी।

यदि किसी ग्रह की युति किसी अन्य ग्रह के साथ होती है तो उस अन्य ग्रह के कारक तत्वों अथवा उसके स्वामित्व वाले भावों का प्रभाव उस ग्रह पर अवश्य पड़ता है। इस बात को उदाहरण के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है।

उपरोक्त उदाहरण में लग्नेश बुध द्वादश भाव में स्थित है तथा वह किसी भी ग्रह के साथ भी युति में नहीं है, क्योंकि शुक्र तथा बुध के अंशों में 21.1° का अंतर है जो कि उनके उनके दीप्ताशों के औसत मान (7°) से काफी अधिक है। द्वितीयेश चंद्र, गुरु के साथ युति में है, क्योंकि क्योंकि गुरु और चंद्र के बीच अंशों का अंतर 6.5° है जो कि उनके दीप्तांशों के औसत मान (10.5°) से कम है। चंद्रमा द्वितीयेश है तथा गुरु सप्तमेश और दशमेश है। द्वितीय भाव धन भाव है। अतः यह कहा जा सकता है कि जातक को उसके व्यापार अथवा प्रोफेशन के द्वारा धन की प्राप्ति होगी। दशमेश गुरु द्वितीयेश के साथ युति में है, अतः संभव है कि जातक अपना पैत्रिक व्यवसाय करे क्योंकि द्वितीय भाव परिवार का भाव भी है। इस स्थिति में जातक चंद्रमा से संबंधित कार्य भी कर सकता है (जैसे भोजन अथवा किसी द्रव जैसे दूध से संबंधित कार्य)। इस पत्रिका में मंगल व सूर्य की प्रभावी युति भी हो रही है क्योंकि मंगल व सूर्य के अंशों का अंतर उनके दीप्तांशों के औसत से कम है। मंगल एकादशेश है तथा सूर्य तृतीयेश है। अतः यह कहा जा सकता है कि जातक को सरकार से या पिता से लाभ प्राप्त हो सकता है। यह भी संभव है कि जातक को टूर-टैवल (छोटी-छोटी यात्राओं) से, कमीशन से, मार्केटिंग से या कम्युनिकेशन से लाभ प्राप्त हो।


डॉ. सुकृति घोष
ग्रहों के नैसर्गिक कार्यकत्वों का उपयोग करके युति का विश्लेषण किया जा सकता है। पत्रिका में दशमेश या शनिदेव किसी ग्रह के साथ युति में हों तो उसका विश्लेषण करके जातक के प्रोफेशन के बारे में जानकरी प्राप्त की जा सकती है। यदि किसी पत्रिका में दशमेश की युति बृहस्पति के साथ हो तो यह कहा जा सकता है कि जातक शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर सकता है, वह प्रोफेसर, अध्यापक या गाइड बन सकता है। यदि दशमेश की युति राहु के साथ हो तो जातक के प्रोफेशन का संबंध विदेश से हो सकता है। यदि दशमेश की युति केतु के साथ हो तो जातक ज्योतिष बन सकता है। यदि दशमेश की युति अष्टमेश व द्वादशेश के साथ हो तो जातक इंवेस्टमेंट कंसल्टेंट का कार्य अपनाकर प्रोफेशन में सफलता प्राप्त कर सकता है, क्योंकि द्वादश भाव इंवेस्टमेंट का भाव है तथा अष्टम भाव दूसरों के धन को इंगित करता है। इसीप्रकार यदि दशमेश की युति अष्टमेश व द्वादशेश के साथ हो तो जातक रिसर्च के कार्य को भी प्रोफेशन के रूप में अपनाकर सफल हो सकता है, क्योंकि अष्टम भाव रिसर्च को इंगित करता है तथा द्वादश भाव अनजानी चीजों/बातों को जानने का भाव है (क्योंकि यह मोक्ष का भाव है और मानव के लिए मोक्ष ही सर्वाधिक रहस्यमय है)। बारहवाँ भाव जातक की छुपी हुई प्रतिभा को भी बताता है, अतः यदि लग्नेश के साथ द्वादशेश की युति हो तो जातक के अंदर कोई न कोई छुपी हुई प्रतिभा अवश्य होती है। द्वादश भाव के अनेक कार्यकत्वों में से एक दान भी है, इसलिए यदि दशमेश की युति द्वादशेश के साथ हो और जातक नियमित रूप से दानधर्म का पालन करता हो तो उसका प्रोफेशन अच्छा चलता रहेगा।

यदि पत्रिका में लग्नेश की युति सूर्य के साथ हो तो जातक अपने पिता जैसा हो सकता है, उसीप्रकार यदि लग्नेश चंद्रमा के साथ युति में हो तो जातक माता के जैसा हो सकता है। यदि शनि की युति सूर्य के साथ हो तो जातक सरकारी नौकरी में हो सकता है अथवा जातक के कामकाज में सरकार का योगदान हो सकता है। शनि व सूर्य की युति में यह भी कहा जा सकता है कि जातक अपने पिता के व्यवसाय को ही अपना सकता है, साथ ही जातक कार्यक्षेत्र में जातक के पिता की सलाह और आशीर्वाद जातक के लिए सफलता प्रदान कर सकती है। यदि शनि और चंद्रमा की युति हो तो संभव है कि जातक की माता कामकाजी महिला हो या जातक की माता अनुशासन का पालन करने वाली हो सकती है या संभव है कि जातक की माता ने जीवन में संघर्षों का सामना किया हो। इस स्थिति में जातक चंद्रमा से जुड़े हुए कार्य कर सकता है जैसे द्रव या मातृत्व से संबंधित कार्य (उदाहरण के लिए पानी, दूध, दही, भोजन, झूलाघर आदि से संबंधित), साथ ही कार्यक्षेत्र में जातक की माता की सलाह व आशीर्वाद जातक के लिए उपयुक्त हो सकती है। यदि शनि के साथ मंगल की युति हो तो संभव है कि ऐसे जातक को अपने कार्यक्षेत्र में लड़ाई-झगड़ा, शत्रुता या विरोध का सामना करना पड़े। इस स्थिति में यदि जातक मशीनरी, सेना इत्यादि से संबंधित कार्य करे तो उसे अच्छे परिणामों की प्राप्ति होगी। राहु एक छाया ग्रह है, अतः यदि पत्रिका में शनि के साथ राहु की युति हो तो जातक को अपने प्रोफेशन में आगे बढ़ने के लिए छाया या भ्रम का सहारा लेना होगा, अर्थात् यदि जातक अपने कार्य में इन्टरनेट, टीवी, सिनेमा आदि का उपयोग करता है तो उसे सफलता प्राप्त हो सकती है।

राहु विदेश का भी कारक है, अतः सफलता प्राप्त करने के लिए जातक विदेश से संबंधित अथवा विदेश में कार्य कर सकता है अथवा अपरंपरागत कार्य में भी सफल हो सकता है। केतु की प्रवृत्ति एक योगी के समान है। अतः यदि पत्रिका में शनि और केतु की युति हो तो जातक को अपने कार्यक्षेत्र में सफल होने के लिए एक योगी की तरह बर्ताव करना चाहिए, अर्थात् उसे बिना किसी लाभ की अपेक्षा करते हुए देने की भाव रखना चाहिए। ऐसे जातक ज्योतिष में सफल हो सकते हैं बशर्तें वे पवित्र भावना से कार्य करें। ऐसे जातक आयुर्वेद के क्षेत्र में सफल हो सकते हैं क्योंकि उसमें जड़ी-बूटी का उपयोग होता है और केतु जड़ का कारक है। बागवानी का कार्य भी किया जा सकता है। केतु कैंची को भी इंगित करता है, इसलिए ऐसे जातक दर्जी या बुटीक का कार्य भी कर सकते हैं। यदि पत्रिका में शनि व शुक्र की युति हो तो जातक की पत्नी कामकाजी महिला हो सकती है। इस स्थिति में जातक रेडीमेड ब्रांडेड कपड़ों का, ब्यूटीपार्लर का, साज-सज्जा, ज्वेलरी का, शो-बिजनेस इत्यादि का कार्य कर सकता है। यदि पत्रिका में शनि व गुरु की युति हो तो जातक पढ़ाने का, कंसल्टेंसी का, गाइडेंस देने का, कर्मकांड करवाने का कार्य कर सकता है। यदि पत्रिका में शनि व बुध की युति हो तो जातक बिजनेस में, मार्केटिंग में, कम्युनिकेशन तथा नेटवर्किंग अथवा कमीशन के द्वारा सफलता प्राप्त कर सकता है।

पत्रिका में शनिदेव जिस ग्रह के साथ युति में हों, उस ग्रह से इंगित होने वाले रिश्ते को संभालकर रखने से जातक को कार्यक्षेत्र में सफलता की प्राप्ति होती है। उदाहरण के लिए यदि शनि के साथ सूर्य की युति हो तो जातक को अपने कार्यक्षेत्र में सफल होने के लिए अपने पिता के साथ सदा अच्छे संबंध बनाए रखना चाहिए। उसीप्रकार यदि शनि व चंद्रमा की युति हो तो जातक को कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए अपनी माता के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहिए। शनि-मंगल की युति में छोटे भाई के साथ, शनि-बुध की युति में दोस्तों के साथ, शनि-गुरु की युति में गुरु के साथ, शनि-शुक्र की युति में पत्नी/स्त्रियों के साथ अच्छे व सम्मानजनक संबंध रखने से जातक को कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त हो सकती है।


यदि पत्रिका के किसी भाव में दो से अधिक ग्रहों की युति हो तो सर्वप्रथम युति में सबसे कम डिग्री वाले ग्रह को ढूँढना चाहिए, क्योंकि उस ग्रह का प्रभाव युति में सर्वाधिक होता है। उदाहरण के तौर पर निम्नलिखित पत्रिका पर विचार करते हैं:

पत्रिका के नवम भाव में सूर्य, गुरु, शुक्र व बुध की युति है, जिसमें सूर्य के अंश सबसे कम हैं। सूर्य तृतीयेश है। सूर्य अपना सर्वाधिक प्रभाव गुरु पर डालेगा क्योंकि गुरु, सूर्य के सबसे ज्यादा करीब है। गुरु सप्तमेश तथा दशमेश है। अतः जातक के सप्तम भाव तथा दशम भाव पर तृतीय भाव का प्रभाव पड़ेगा। अतः यह कहा जा सकता है कि जातक अपने व्यापार अथवा प्रोफेशन में कमीशन का कार्य कर सकता है। तृतीय भाव कम्युनिकेशन तथा नेटवर्किंग का भी भाव है, अतः यह भी कहा जा सकता है कि जातक की पत्नी नेटवर्किंग तथा कम्युनिकेशन में बहुत अच्छी होगी। नवम भाव में गुरु से थोड़ा आगे शुक्र है, अतः जिस प्रकार पत्रिका में, गुरु में सूर्य के गुण समाहित हैं, उसीप्रकार शुक्र में गुरु व सूर्य दोनों के गुण समाहित हैं। शुक्र पंचम व द्वादश भाव का स्वामी है। पंचम भाव संतान का भाव है, अतः जातक की संतान में तृतीय, सप्तम व दशम तीनों भावों का प्रभाव होगा। अर्थात् जातक की संतान कम्युनिकेटिव होगी साथ ही वह व्यापार तथा प्रोफेशन के बारे में जागरूक होगी। नवम भाव में बुध इन सभी ग्रहों से आगे है। अतः बुध के अंदर सूर्य, गुरु तथा शुक्र इन तीनों ग्रहों का प्रभाव होगा। पत्रिका में बुध लग्न तथा चतुर्थ भाव का स्वामी है। अर्थात् पत्रिका के लग्न व चतुर्थ भाव के परिणामों में तृतीय, सप्तम, दशम, पंचम प द्वादश भाव अपना प्रभाव डालेंगे। अतः जातक अपना करियर जन्म स्थान से दूर कहीं बनाए तो सफल हो सकता है, क्योंकि जन्म स्थान को चतुर्थ भाव इंगित करता है तथा चतुर्थ भाव पर तृतीय भाव तथा द्वादश भाव का प्रभाव है। तृतीय भाव चतुर्थ का बारहवाँ है तथा बारहवाँ भाव स्वयं विदेश का ही भाव है। इसके साथ ही जातक को यह भी कहा जा सकता है कि वह अपनी प्रॉपर्टी घर, जमीन इत्यादि अपने जन्म स्थान से कहीं दूर खरीदे।

इसप्रकार यदि किसी पत्रिका में दो से अधिक ग्रहों की युति हो तो उसे युति में सर्वाधिक कम अंश वाला ग्रह सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि उसका प्रभाव युति के अन्य सभी ग्रहों पर पड़ेगा। तब उस ग्रह को साधने से युति के अन्य सभी ग्रहों पर अच्छा प्रभाव पड़ सकता है। माना कि किसी पत्रिका में दो से अधिक ग्रहों की युति हो रही हो और सर्वाधिक कम अंश वाला ग्रह सूर्य हो, तो इस स्थिति में चूँकि सूर्य जातक के लिए पिता का कारक है, अतः यदि जातक पिता का सम्मान या सेवा करता है तो युति के सभी ग्रहों पर उसका अच्छा परिणाम प्राप्त होगा। यह सिद्धांत प्रत्येक युति में लागू होगा। एक अन्य उदाहरण के अंतर्गत यदि किसी युति में चंद्रमा सर्वाधिक कम अंश वाला ग्रह हो तो चूँकि चंद्रमा माता का कारक होता है, अतः माता की सेवा या सम्मान करके युति के सभी ग्रहों पर अच्छा प्रभाव डाला जा सकता है। यह लेख मैंने गुरुदेव श्रीमान् राहुल कौशिक जी के व्याख्यानों से प्रेरित होकर उनके श्री चरणों में सादर नमन करते हुए लिखा है।

इसप्रकार किसी भी पत्रिका में होने वाले विभिन्न ग्रहों की युति को समझकर तथा उनका विश्लेषण करके, ग्रहों के संयुक्त प्रभाव के बारे में जानकारियाँ प्राप्त की जा सकती है।




- डॉ. सुकृति घोष
प्राध्यापक, भौतिक शास्त्र
शा. के. आर. जी. कॉलेज

ग्वालियर, मध्यप्रदेश

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