पहाड़ का जीवन और साहित्य | शैलेश मटियानी की कहानियों का संसार

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पहाड़ का जीवन और साहित्य शैलेश मटियानी की कहानियों का संसार पहाड़ का जीवन सदैव से ही अपनी अनोखी सुंदरता और अथाह कठोरताओं का अद्भुत मेल रहा है। हिमालय

पहाड़ का जीवन और साहित्य | शैलेश मटियानी की कहानियों का संसार

हाड़ का जीवन सदैव से ही अपनी अनोखी सुंदरता और अथाह कठोरताओं का अद्भुत मेल रहा है। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्रों में जहां बर्फीली चोटियाँ, घने जंगल, तेज़ नदियाँ और सीढ़ीदार खेत मन को मोह लेते हैं, वहीं जीवन की वास्तविकता गरीबी, पलायन, प्राकृतिक आपदाओं और सामाजिक बंधनों की जंजीरों से बंधी हुई है। ऐसे पहाड़ी जीवन को साहित्य की भाषा में उतारने वाले हिन्दी के उन विरले कथाकारों में शैलेश मटियानी का नाम सबसे प्रमुख है। उनकी कहानियों का संसार न केवल पहाड़ की भौगोलिक और सांस्कृतिक सच्चाई को उजागर करता है, बल्कि उसकी मानवीय संवेदनाओं, संघर्षों और आशाओं को भी जीवंत रूप प्रदान करता है। मटियानी जी की रचनाएँ नयी कहानी आंदोलन के दौर की उपज हैं, परंतु इनमें आंचलिकता की गहराई इतनी प्रबल है कि वे पहाड़ के प्रतिनिधि साहित्यकार के रूप में सदैव याद किए जाते हैं।

शैलेश मटियानी का जीवन परिचय और साहित्यिक यात्रा

पहाड़ का जीवन और साहित्य | शैलेश मटियानी की कहानियों का संसार
शैलेश मटियानी का जन्म 14 अक्टूबर 1931 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना नामक एक छोटे से गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। मात्र बारह वर्ष की आयु में माता-पिता के असामयिक निधन के बाद उनका बचपन संघर्ष की आग में तपता रहा। पढ़ाई बीच में छूट गई, चाचा के संरक्षण में वे बूचड़खाने में काम करने और जुए की नाल उघाने जैसे कठिन कार्यों में लग गए। सत्रह वर्ष की उम्र में उन्होंने पढ़ाई फिर शुरू की और हाईस्कूल उत्तीर्ण किया। इसके बाद रोज़गार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, इलाहाबाद और अन्य शहरों की गलियों में भटकना पड़ा। होटल में कुलीगिरी, चाट-ढाबे पर काम, फुटपाथ पर सोना—ये सब उनके जीवन के अंग बने। पहाड़ से मैदान तक की यह यात्रा उनके अनुभवों को इतना समृद्ध बनाती है कि उनकी कहानियाँ कहीं भी कृत्रिम नहीं लगतीं। 1950 के दशक से उन्होंने लेखन शुरू किया और 'अमर कहानी', 'रंगमहल' जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होना शुरू हुआ। उन्होंने लगभग तीस उपन्यास, दो दर्जन से अधिक कहानी संग्रह, निबंध, संस्मरण और लोककथाएँ लिखीं। 'बोरीवली से बोरीबन्दर', 'मुठभेड़', 'गोपुली गफूरन' जैसे उपन्यास और 'मेरी तैंतीस कहानियाँ', 'चील', 'अर्धांगिनी' जैसे कहानी संग्रह उनकी साहित्यिक यात्रा के मील के पत्थर हैं। 24 अप्रैल 2001 को हल्द्वानी में उनका देहांत हुआ, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी पहाड़ की धड़कन को जीवित रखे हुए हैं। उत्तराखंड सरकार द्वारा उनके नाम पर दिए जाने वाले शैक्षिक पुरस्कार इस बात का प्रमाण हैं कि उनका साहित्य मात्र शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवंत विरासत है।

पहाड़ी परिवेश का चित्रण

मटियानी जी की कहानियों में पहाड़ का जीवन बहुआयामी रूप में उभरता है। सबसे पहले तो प्रकृति का चित्रण है, जो उनके संसार का मूल आधार है। पहाड़ की नदियाँ—जैसे सुँयाल—कभी जीवनदायिनी तो कभी प्रलयकारी बन जाती हैं। जंगल की छायाएँ, चीड़ के वृक्ष, बर्फीली ढलानें और घने कोहरे उनके पात्रों के मनोभावों का दर्पण बनते हैं। 'प्रेत-मुक्ति' कहानी में सुँयाल नदी पार करते हुए किसनराम का संघर्ष पहाड़ी परिवेश की कठोरता को जीवंत कर देता है। नदी का वेग, श्मशान का धुआँ, चीड़ों की छाया और मछलियों से भरा तालाब—ये सब मिलकर एक ऐसे संसार का निर्माण करते हैं जहाँ प्रकृति मनुष्य को घेर लेती है। इसी प्रकार 'एक शब्दहीन नदी' में दिल्ली की होटल नौकरी से लौटते शंकर और हंसा का जीवन पहाड़ की शांत नदी की तरह बहता है, लेकिन पलायन की लहरें उसे शब्दहीन बना देती हैं। पहाड़ की सुंदरता यहाँ केवल दृश्य नहीं, बल्कि पात्रों की भावनाओं का हिस्सा बन जाती है।

पहाड़ी जीवन की आर्थिक और सामाजिक वास्तविकता

पहाड़ी जीवन की आर्थिक और सामाजिक वास्तविकता मटियानी जी की कहानियों का केंद्र है। गरीबी, पशुपालन, सीढ़ीदार खेतों में मेहनत और पुरुषों का पलायन इनकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। पहाड़ के युवक सेना में भर्ती होकर या मैदानी शहरों में नौकरी की तलाश में चले जाते हैं, तो घर में महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। 'बित्ता भर सुख' में किसनराम का हलिया जीवन, बैलों को जोतना, खेत चीरना और हाथ की चोट के बावजूद संघर्ष जारी रखना पहाड़ी किसान की दैनिक पीड़ा को उजागर करता है। महिलाओं की स्थिति इन कहानियों में और भी मार्मिक है। 'अर्धांगिनी' जैसी कालजयी कहानी में नैनसिंह सूबेदार की पत्नी का इंतजार, गोधूली में लौटती गाय-बकरियों के साथ घर लौटने की कल्पना और दाम्पत्य प्रेम की कोमलता पहाड़ी स्त्री के मनोवैज्ञानिक संसार को खोलती है। फौजी पत्नियों का दुःख, ससुराल-मायके के बंधन, जातीय व्यवस्था और यजमानी प्रथा—ये सब मटियानी जी की लेखनी में यथार्थ रूप में उतरते हैं। वे ब्राह्मण-शूद्र संबंधों, अछूतपन की दुविधा और प्रेत-योनि की आशंका जैसे सामाजिक विषाद को भी बिना अतिरंजना के चित्रित करते हैं। 'पोस्टमैन' कहानी तो पूरे युग की दास्तान बन जाती है, जहाँ विधवाओं का दर्द, माता-पिता का मर्मांतक दुःख और सेना की नौकरी से जुड़ी आशा-निराशा पहाड़ी समाज की पूरी तस्वीर खींच देती है।

स्त्री चरित्र और दाम्पत्य संबंधों की मार्मिकता

मटियानी जी की कहानियाँ केवल वर्णनात्मक नहीं हैं; उनमें मनोवैज्ञानिक गहराई है। उनके पात्र जीवंत हैं—वे हँसते-रोते, संघर्ष करते और कभी-कभी हार भी जाते हैं, लेकिन पहाड़ की मिट्टी से जुड़े रहते हैं। 'गोपुली गफूरन' उपन्यास में स्त्री की विवशता और बदलते परिवेश का चित्रण, 'चील' में प्रकृति की क्रूरता और मानवीय संवेदना का मेल, या 'दो दुखों का एक सुख' में सामाजिक संबंधों की जटिलता—ये सब पहाड़ी जीवन को एक व्यापक कैनवास पर चित्रित करते हैं। उनकी भाषा सरल, किंतु प्रभावशाली है। कुमाऊँनी लोक-जीवन के रंग इसमें झलकते हैं, बिना कृत्रिमता के। राजेंद्र यादव ने ठीक ही कहा था कि मटियानी हमारे बीच वह अकेला लेखक हैं जिनके पास दस से अधिक कालजयी कहानियाँ हैं। वे भारत के 'अभागे गोर्की' कहे जाते हैं, क्योंकि उनका जीवन और लेखन दोनों ही गरीबी, संघर्ष और मानवीय संवेदना से भरे हैं।

शैलेश मटियानी की भाषा शैली और साहित्यिक महत्व

शैलेश मटियानी की कहानियाँ पहाड़ के साहित्य को नई ऊँचाई देती हैं। वे मात्र मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण हैं। इनमें पहाड़ की सुंदरता के साथ उसकी पीड़ा भी है, आशा के साथ निराशा भी। पलायन की समस्या, पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न आज भी प्रासंगिक हैं, और मटियानी जी की रचनाएँ इन्हें समय से परे ले जाती हैं। उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए पाठक महसूस करता है कि पहाड़ केवल भूगोल नहीं, बल्कि एक भावना है—एक संसार है जहाँ मनुष्य प्रकृति के साथ एकाकार होकर भी उससे लड़ता रहता है। आज जब पहाड़ी क्षेत्र पलायन, पर्यटन और विकास की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तब मटियानी जी की कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य ही वह माध्यम है जो जीवन की सच्चाई को अमर बना देता है।उनके संसार में पहाड़ का जीवन न केवल जीवित है, बल्कि बोलता भी है—एक ऐसी आवाज़ में जो कभी दब नहीं सकती।

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