अँधेरे में जागी हुई नींद

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अँधेरे में जागी हुई नींद अँधेरे में आँखें खुली रहती हैं, पर नींद देह छोड़ भटकती है कहीं। शरीर बिस्तर पर है स्थिर, पर आत्मा किसी किनारे रोती है।

असुंदर केरल का विलाप


न्हे सपनों की राख पर जलती हुई रात,
अँधेरों में गूँजता जेफ़्री एप्स्टीन — का अभिशप्त नाम।
क्रूर दृश्यों पर झुकी उत्सुक निगाहें,
और फिर करुणा के अभिनय में बहते बनावटी आँसू।

लिंक की डोर से फैलती काली सुरंगें,
भोले चेहरों पर नैतिकता का उजला मुखौटा—
भीतर ही भीतर सिसकता केरल, अपने ही प्रतिबिंब से आहत।


प्यास और पाश

आशाएँ नहीं,
दुराशाएँ ही
मनुष्य–जीवन को दुःखमय बनाती हैं—
यह कह पाना
गौतम बुद्ध के लिए भी
इतना सरल कहाँ था?

क्योंकि
अपने जीवन की देहरी से परे
दर्शन के महल खड़े करना
सर्वज्ञ होने का अभिनय माँगता है।

असुंदर केरल का विलाप
जब श्वास स्वयं
क्षणभंगुर धूप-सी काँपती हो,
तब कौन कह सकता है—
किस इच्छा को स्वीकारें,
किसे निर्वासित करें?

इसलिए,
मनुष्य के अस्तित्व के लिए
जो न्यायपूर्ण आकांक्षाएँ हैं—
रोटी की,
प्रेम की,
सम्मान की,
स्वप्न देखने की—
उन्हें भी नकारना पड़े
यदि पूर्ण विरक्ति ही सत्य हो।

पर जीवन
सिर्फ त्याग का नाम नहीं;
उसमें एक धड़कन है—
एक ताप,
जो हमें जीवित रखता है।

उसी ताप को
मैं जीवन की ‘पैशन’ कहता हूँ—
न्यायपूर्ण इच्छाओं की
धधकती हुई स्वीकृति।"

अँधेरे में अर्थ

अँधेरे की धार पर काँपता जीवन,
रोशनी में भी खोजता अपना कारण।
ऋतुओं की थरथराती साँसों के बीच
मनुष्य क्या है—एक प्रश्न, एक कंपन।

समय की धूल में भीगती देह,
आशा की लौ से जलती आत्मा।
क्षणभंगुरता की ठंडी हवा में
वह अर्थ का दीप बचाए फिरता—
मर्त्य होकर भी अमरता का सपना।

अँधेरे में जागी हुई नींद

अँधेरे में आँखें खुली रहती हैं,
पर नींद देह छोड़ भटकती है कहीं।
शरीर बिस्तर पर है स्थिर,
पर आत्मा किसी किनारे रोती है।

निद्रा का एक सूना तट है,
जहाँ सपनों की नावें टूट चुकी हैं।
मैं सुनता हूँ उस किनारे की सिसकी,
जैसे लहरें पत्थरों से सिर टकराएँ।

रात अपनी काली चादर फैलाकर
मेरे ऊपर झुकती रहती है।
पर उसकी गोद में शांति नहीं,
केवल अनाम पीड़ा की ध्वनि है।

आँखों के भीतर एक दीप टिमटिमाता,
पर उसकी लौ भी काँपती है।
कौन पुकारता है इस निस्तब्धता में?
किसका करुण रुदन हवा में घुला है?

मैं जागता हूँ, फिर भी सोया हूँ,
सोता हूँ, फिर भी जागा हूँ।
अँधेरे की इस दहलीज़ पर
नींद का शरीरहीन विलाप सुनता हूँ।
और स्वयं को धीरे-धीरे खोता जाता हूँ।"

चुराई हुई हवा का आलिंगन

हवा चाहे रक्त-सी रिसती रहे,
मैं फिर भी उसे बाँहों में भरने का यत्न करूँगा।
समय यदि मेरी ही हवा चुरा ले जाए,
तो भी मेरे आस्वाद का चित्र मैं स्वयं बनूँगा।

साँझ की शोनित-लालिमा में डूबकर,
उस दुरूह स्वतंत्रता-समीर को चूम लूँगा।
अंतर के पवन को बाँधकर नहीं—
उसे मुक्त कर दूँगा अपने ही स्पर्श से।

जो हवा मेरी नहीं भी है,
उसे पीकर मैं अपना आकाश रचूँगा—
और उसी में स्वयं को स्वाधीन कर लूँगा।



- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
Kerala state, email:binoymb2008@gmail.com,
phone:9847245605(office)

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