महाराजा का इलाज कहानी का सारांश समीक्षा उद्देश्य और प्रश्न उत्तर राजा की बीमारी की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की बीमारी की कहानी है जहाँ काम
महाराजा का इलाज कहानी का सारांश,समीक्षा, उद्देश्य और प्रश्न उत्तर
यशपाल द्वारा रचित कहानी 'महाराजा का इलाज' उनके कथा-साहित्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ वे अपनी चिरपरिचित यथार्थवादी और व्यंग्यात्मक शैली के माध्यम से समाज की विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। यशपाल अक्सर अपनी कहानियों में वर्ग-भेद और सामंती मानसिकता को निशाने पर लेते हैं, और यह कहानी भी उसी श्रेणी में आती है।
महाराजा का इलाज कहानी का सारांश यशपाल
महाराजा का इलाज व्यंग्यात्मक कहानी उत्तर प्रदेश की रियासत के महाराज मोहाना से संबंधित है। जितनी प्रतिष्ठा उत्तरप्रदेश की रियासतों में मोहाना की रियासत की थी उतनी ही अधिक प्रतिष्ठा व सम्मान महाराज मोहाना की बीमारी की थी। उन्हें राजरोग हो गया था। जिसकी चर्चा जिला कोटि की बार में, जिला मैजिस्ट्रेट के यहाँ और लखनऊ के गवर्नमेंट हाउस तक में थी।
महराजा की बीमारी का निदान करने के लिए देश-विदेश से डॉक्टर आए। लोगों का विचार था कि चिकित्साशास्त्र के इतिहास में ऐसा राजरोग अब तक देखा सुना नहीं गया। महाराजा के साथ उनके निजी डॉक्टर हमेशा साथ रहते थे। सितंबर के महीने में जब महाराज मोहाना पहाड़ से अपनी रियासत से लौटते तो मसूरी में डॉक्टरों की धूम मच जाती। सब डॉक्टर महाराज की परीक्षा और उनकी बीमारी का निदान करने के लिए बुलाए गए थे। डॉक्टरों के सम्मेलन में डॉक्टरों की सम्मिलत राय से महाराजा की बीमारी पर एक बुलेटिन प्रकाशित किया जाता। सब डॉक्टर अपनी फीस, आने जाने का किराया और आतिथ्य पाकर लौट जाते, पर मोहाना के महाराज की बीमारी में कोई अंतर न पड़ता। बम्बई मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. कोराल को भी सम्मेलन में आने का निमंत्रण दिया गया। उन्हें इसमें कोई आपत्ति न होती, पर भारत सरकार ने डॉ. कोराल को अमेरिका जाने वाले डॉक्टरों के शिष्टमंडल में नियुक्त कर दिया।
डॉक्टर कोराल ने महाराज मोहान के निमंत्रण के उत्तर में सुझाव दिया कि डॉक्टर संघटिया के नए अनुसंधान का प्रयोग महाराज के उपचार के लिए करके देखा जाए। महाराज के यहां भी नए डॉक्टर के आने की बात को उत्साह की दृष्टि से देखा गया। डॉक्टर संघटिया निश्चित समय पर मुंबई पहुंचे। उन्होंने दो घंटे से अधिक समय तक रोगी की परीक्षा ली। महाराज के रोग के निदान के संबंध में प्रकाशित बुलेटिन देखे। दो दिन और तीसरे दिन मध्यान्ह तक डॉक्टर महाराज की बीमारी का परीक्षण करते रहे।
तीसरे दिन दोपहर बाद उन डॉक्टरों की एक सभा का आयोजन हुआ। महाराज मोहाना को एक पहिये लगी आराम कुर्सी पर हॉल में लाया गया। डॉक्टरों ने अपनी-अपनी राय देनी आरम्भ की।
दो डॉक्टरों ने उन्हें न्यूयार्क जाकर विद्युत चिकित्सा कराने की सलाह दी। एक डॉक्टर ने राय दी कि उन्हें चेकोस्लोवाकिया जाकर 'कार्लोविवारी' के चश्में में स्नान करना चाहिए। इस तरह बारी-बारी से डॉक्टर अपनी राय व्यक्त कर रहे थे। 27 वें नम्बर पर डॉक्टर संघटिया से अपने विचार प्रकट करने को कहा गया। डॉक्टर संघटिया ने इसे गंभीर रोग कहा और बताया क़ि यह साधारण शारीरिक उपचार द्वारा ठीक न होगा। उनकी बात महाराज उत्सुकतापूर्वक सुनने लगे। डॉक्टर संघटिया ने कहा— “मुझे इस प्रकार के एक रोगी का अनुभव है। कई वर्ष से बंबई मेडिकल कॉलेज के एक मेहतर को ठीक इसी प्रकार घुटने जुड़ जाने और हृदय तथा सिर की पीड़ा का दुस्साध्य रोग...” अभी डॉक्टर संघटिया की बात पूरी भी न हुई थी कि महाराज मोहाना क्रोधाभिभूत हो उठे। उनके घुटने कांपने लगे और होंठ फड़फड़ाने लगे। दूसरे डॉक्टर विस्मित रह गए, फिर उन्हें अपने सम्मानित व्यवसाय के अपमान पर क्रोध आया और साथ ही उनके होंठों पर मुस्कान भी फिर गई।
महाराजा का इलाज कहानी की संवेदना और शिल्प की विवेचना
यशपाल हिन्दी साहित्य जगत के हस्ताक्षर लेखक हैं। इन्होंने आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं, तनावों का चित्रण अपने साहित्य में किया है। प्रस्तुत कहानी 'महाराजा का इलाज' व्यंग्यात्मक कहानी हैं। इसका व्यंग्य पूंजीवाद और पूंजीपति वर्ग की विशिष्टता पर प्रहार करता है। प्रभुतासम्पन्न वर्ग की मानसिक जकड़न कुछ इस तरह की हो गई है कि वे प्रत्येक बात में विशिष्टता चाहते हैं। कहानी का कलेवर इन तमाम बातों कों ध्वनित करता है।
कथानक के धरातल पर कहानी चरित्र प्रधान तो नहीं किन्तु घटना प्रधान अवश्य है। इस कहानी की घटना चरित्र से अनुस्यूत है। इस तरह दोनों मिलकर एकमेक हो गए हैं। कहानी का कथानक सुगठित एवं सुगुम्फित है। महाराज मोहान चूंकि प्रभुता संपन्न व्यक्ति है। इसलिए वे अपनी बीमारी की चर्चा सुनने के लिए भी व्याकुल रहते हैं। उनकी तीमारदारी के लिए डॉक्टरों की फ़ौज खड़ी रहती है। काफ़ी लम्बा अरसा हो जाने के बाद भी उनकी बीमारी लाइलाज ही बनी रही। स्थिति यह थी कि उनकी बीमारी पर बुलेटिन निकलने लगा। महाराज राजरोग को ठीक करना नहीं चाहते थे। यह बीमारी शारिरीक कम मानसिक अधिक थे। सुविधाभोगिता की उन्हें इतनी अधिक आदम लग चुकी थी कि कर्म क्षेत्र में बने रहने का दिखावा तो कर सकते थे, पर वास्तव में वे उससे भाग रहे थे। डॉ० संघटिया ही वे एकमात्र व्यक्ति थे, जो इस रहस्योद्घाटन के लिए हास्य का प्रयोग करते हैं। वस्तुतः यह शॉक-ट्रीटमेंट देने जैसा है।
कहानी के मुख्य पात्र वही है। उनका चरित्र सच्चाई, कर्मनिष्ठा, ईमानदारी की पहचान है। वे अपने कर्तव्य का पालन करने वाले व्यक्ति हैं। जब अन्य सभी डॉक्टर महाराज की खुशामद करके उन्हें प्रसन्न रखने का प्रयास कर रहे हैं तो डॉक्टर संघटिया महाराज की तुलना एक रोगी से करके उन्हें मनुष्यों की जमात में खड़ा करके उनकी विशिष्टता को तोड़ते हैं।अपने वातावरण और देशकाल की दृष्टि से महाराज का इलाज कहानी राजा-रजवाड़ाओं की मध्ययुगीनता को अपनाती है। इस रूप में यह प्रभुता संपन्न व्यक्ति को चिंतित करती है। महाराजा मोहाना की सोच और उनका जीवन ही कहानी की संवेदना का केन्द्र है।कहानी का उद्देश्य असामान्यता, विशिष्टता, प्रभुता को तोड़कर व्यक्ति को कर्म के मार्ग पर प्रशस्त करता है। कहानी किसी भी प्रकार की सुविधिभांगिता के विरूद्ध विद्रोह करती है।
महाराजा का इलाज कहानी की शीर्षक की सार्थकता
'महाराजा का इलाज' कहानी का शीर्षक घटना के समूचे इतिवृत्त को अपने में समेटे हुए है। यह शीर्षक महाराजा मोहाना के इर्द-गिर्द घूमता है। कहानी व्यंग्यात्मक है, किन्तु उसका शीर्षक पूरी तरह से अभिधामयी । महाराज मोहाना के राजरोग की चर्चा लखनऊ के गवर्नमेंट हाऊस तक में थी। उनकी बीमारी का निदान करने के लिए बहुत से डॉक्टर आते, किन्तु सभी अपनी फीस, आने-जाने का किराया और अतिथ्य पाकर लौट जाते। उनकी बीमारी का कोई निदान न हो पाता। हाँ, एक बुलेटिन इस पर अवश्य प्रकाशित होता था। डॉक्टरों की राय उन्हें सैर के लिए प्रेरित करती। महाराज के दोनों जुड़े हुए घुटने डॉक्टरों की राय पर व्यंग्य करते से लगते हैं। 'महाराजा की बीमारी' का इलाज तो होता है, किन्तु वह शून्यता को तोड़ने जैसा है। इस तरह अपनी क्रियाशीलता में जो शीर्षक अभिधार्थमयी भाषा में है। वही शीर्षक कहानी के तेवरों के साथ मिलकर व्यंग्यात्मक हो जाता है। महाराज का इलाज करते समय डॉ० संघटिया कहते हैं—“मुझे इस प्रकार के एक रोगी का अनुभव है। कई वर्ष से बम्बई मेडिकल कॉलेज के एक मेहतर को ठीक इसी प्रकार घुटने जुड़ जाने और हृदय तथा सिर की पीड़ा का दुस्साध्य रोग...“अभी डॉक्टर की बात भी पूरी न हुई थी कि महाराज मोहाना क्रोधाभिभूत हो गए, उनके घुटने कांपने लगे और होंठ फड़फड़ाने लगे। दूसरे डॉक्टर विस्मित रह गए।” इस तरह कहानी का शीर्षक एक ही घटनाक्रम को आधार बना कर चलता है। किन्तु कहानी में नीरसता नहीं आने देता। कहानी रोचक और मनोरंजक होने के साथ ही शिक्षाप्रद भी है और आधुनिक जीवन की लोलुपता को प्रश्नचिन्ह के कटघरे में खड़ा करती है।
महाराजा का इलाज कहानी का उद्देश्य
महाराजा का इलाज कहानी उच्चवर्ग की मानसिक जकड़न को तोड़ने वाली कहानी है। उच्चवर्ग, प्रभुतासंपन्न वर्ग, समर्थ वर्ग अपने सामने चापलूसी की जमात खड़ी करना चाहता है। महाराज मोहाना को राजरोग था। राजरोग अर्थात् सम्पन्न वर्ग को होने वाला रोग। उनके घुटने बरसों से एक साथ जुड़ गए थे। महाराज मोहाना उन्हें ठीक करवाने के लिए डॉक्टरों की जमात खड़ी कर लेते हैं।
कहानी उच्चवर्ग की इस मानसिक जकड़न पर व्यंग्य करती है। वह स्थितियों को व्यंग्यात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। मुख्य रूप से कहानी दो उद्देश्यों को लेकर परिणति को प्राप्त होती है -
- राजरोग जैसी स्थिति और मानसिकता समाज और राष्ट्र के लिए घातक है।
- मनुष्य को अपना कर्म ईमानदारी से करना चाहिए।
महाराज मोहाना पर मोहाना राज्य की पूरी जिम्मेदारी है। किन्तु वे अपने दायित्व का पूरी निष्ठा और तत्परता से पालन करने में असमर्थ दीखते हैं। वे अपनी बीमारी का प्रचार दूर-दूर तक करते हैं और चाहते हैं सभी लोग उनकी तीमारदारी करें। महाराज मोहाना के इर्द-गिर्द चापलूसों की जमात खड़ी हो जाती है। यह स्थिति बहुत खेद जनक है। कहानी में हम देखते हैं कि महाराज मोहाना का इलाज करने के लिए बड़े डॉक्टरों की भीड़ इक्ट्ठा होती है, वे सभा का आयोजन करते हैं और महाराज की बीमारी का बुलेटिन प्रकाशित करते हैं। महाराज को सुझाव देते हैं कि वे चेकोस्लोवाकिया आदि जगहों पर जाकर अपना इलाज करवाएँ, किन्तु कोई भी डॉक्टर अपने कर्म के प्रति ईमानदारी नहीं दिखाता। वे महाराज को देखने आते हैं, अपनी फीस लेते हैं, आने-जाने का किराया लेते हैं और आतिथ्य पाकर खुशी-खुशी चले जाते हैं। राजरोग और चापलूसों की यह जमात समाज को खोखला कर रही है। ठीक उसी तरह जैसे महाराज की बीमारी दूर नहीं होती। यह कहानी पढ़कर भारतेन्दु के अंधेर नगरी नाटक का स्मरण हो आता है। डॉ. संघटिया अपने पेशे के प्रति पूरे ईमानदार हैं। वे पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। महाराज मोहाना को वे गंभीरता पूर्वक देखते हैं, उनकी बीमारी का खाका तैयार करते हैं। और सभी डॉक्टरों के कह चुकने के बाद वे महाराज मोहाना के लिए शॉक ट्रीटमेंट का प्रयोग करते हैं। यह ट्रीटमेंट मानसिक अधिक है। वे महाराज मोहाना की बीमारी की तुलना एक मेहतर की बीमारी से करते हैं। हठधर्मिता के लिए इतना आघात काफ़ी था। महाराज मोहाना के बरसों से जकड़े पैर कांपने लगते हैं। संक्षेप में कहानी का मर्म बहुत तीखा है।
महाराजा का इलाज कहानी की भाषा शैली
यशपाल मार्क्सवादी विचारों के कहानीकार हैं। उनकी कहानी समाज की विविध स्थितियों को सामने रख देती है। यशपाल की भाषा सहज, सरल, सुबोध और प्राञ्जल है। उनके शब्दभंडार की विविधता और विपुलता देखिए- “वह पत्र काँच लगे चौखटे में मढ़वाकर महाराजा के ड्राइंगरूम में रख दिया गया था। ऐसे ही एक पोस्टकार्ड महात्मागांधी के हस्ताक्षरों में और एक पत्र महामना मदन मोहन मालवीय का भी महाराज की बीमारी के प्रति चिंता और सहानुभूति का विशेष गतिविधियों को दिखाया जाता था।” इस वाक्य में तत्सम तद्भव, अंग्रेजी और अरबी-फारसी के शब्द एक साथ हैं और खड़ी बोली के औदात्य को दिखा रहे हैं।
महाराजा की बीमारी पर व्यंग्य करने के लिए लेखक चित्र - शैली का सहारा लेता है । घटनाएँ अपने आप में इतनी प्रभावशाली है कि व्यंग्य की राशि को धनीभूत कर देती है— “महाराजा जब कभी कोठी से रिक्शा पर बाहर निकलते तो रिक्शा खींचने वाले चार कुलियों के साथ बदली के लिए अन्य चार कुली भी साथ-साथ दौड़ते चलते। सावधानी के लिए महाराज के निजी डॉक्टर घोड़े पर सवार रिक्शा के पीछे रहते थे ।"
यशपाल ने अधिकांश स्थलों पर वर्णनात्मकता का आश्रय लिया है। यह वर्णनात्मकता प्रसंग एवं भाव के अनुकूल है। कहानी को गतिशीलता देने और रोचकता को बनाए रखने में सहायक रही है. "उस वर्ष बम्बई मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर कोराल को भी महाराज मोहाना के रोग के निदान के लिए मसूरी में आयोजित डॉक्टरों के सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए निमंत्रण भेजा गया।"
वाक्य संयोजन में यशपाल ने संयुक्त वाक्यों का प्रयोग अधिक किया है। इससे वाक्य जटिल हो गए हैं—किन्तु शब्द का सार्थक प्रयोग होने से यह जटिलता दुरूह एवं दुर्बोध नहीं होने पाती- “सब डॉक्टर बारी-बारी से महाराजा की परीक्षा कर चुकते तो महाराज की बीमारी के निदान का निश्चय करने के लिए डाक्टरों का एक सम्मेलन होता और फिर डॉक्टरों की सम्मिलित राय से महाराजा की बीमारी पर एक बुलेटिन प्रकाशित किया जाता।"
कहानी में संवाद-योजना नहीं है। संवाद के रूप में एक आत्मगत कथन है, एक आदेशात्मक कथन है और शेष वृतांत है। यह कहानी की कमी नहीं बल्कि शक्ति है। घटनात्मक कहानी को लेखक बहुत तीव्रता से विकास की ओर अग्रसर करता है। भाषा इसमें उनकी पूरी तरह से सहायक होती है।
महाराजा का इलाज कहानी में निहित व्यंग
महाराज का इलाज कहानी आधुनिक समाज की पूंजीवादी मनोवृत्ति पर आधारित है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि पूंजीवादी संस्कृति, बाज़ारवादी संस्कृति से नितांत भिन्न है। दोनों के केन्द्र में पूंजी है, किन्तु एक में अधिकार भावना प्रधान होती है और दूसरे में कर्म की भावना केन्द्राभिमुख होती है।
महाराज मोहाना के घुटने आपस में जुड़ गए थे और इस बात को कई वर्ष हो गए। डॉक्टरों की फ़ौज खड़ी हो जाने के बाद भी महाराज मोहाना की स्थिति में कोई सुधार नहीं होता । लेखक इसे राजरोग कहकर व्यंग्य करता है। महाराज की बीमारी की चर्चा जिला कोर्ट की बार में, जिला मैजिस्ट्रेट के यहाँ और लखनऊ के गर्वनमेंट हाउस तक में थी । बम्बई मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ० कौशल को भी डॉक्टरों के सम्मेलन में बुलाया गया। महाराजा की बीमारी इतनी अधिक भयंकर थी कि डॉक्टर ने उन्हें प्रकृति के निकट जाकर स्वास्थ्य लाभ की सलाह दी। निश्चित रूप से कहानीकार पूंजीवादी मानसिकता उसे कर्म से पलायन करने की ओर उन्मुख करता है। जीवन में कार्य से बढ़कर प्रशस्ति अच्छी लगने लगती है। लोगों से मिलने वाले सर्टिफिकेट का मूल्य बढ़ जाता है। कहानी के व्यंग्य को दो स्थितियों में देख सकते हैं- “सब डॉक्टर अपनी फीस, आने-जाने का किराया और आतिथ्य पाकर लौट जाते, परन्तु महाराजा के स्वास्थ्य में कोई अंतर न पाया।” इसी तरह एक अन्य स्थान पर लेखक ने कहा है—'चिकित्सा शास्त्र के इतिहास में ऐसा रोग अब तक देखा-सुना नहीं गया।' 'ऐसे राजरोग को कोई साधारण आदमी झेल भी कैसे सकता है।
यह वास्तव मे महाराज की मानसिक जकड़न थी। वह मानसिक व्यथा थी, जिसके कारण उनके घुटने और सिर की पीड़ा का निदान नहीं हो पा रहा था। डॉ० संघटिया शॉक ट्रीटमेंट पद्धति से उनका उपचार करने में सफ़ल होते हैं। लेखक कहता है — “प्रायः एक वर्ष पूर्व ही डॉक्टर संघटिया वियमा में काफी समय अनुसंधान कर बम्बई मेडिकल में लौटे थे। डॉक्टर संघटिया अनेक रोगों का इलाज 'साइकोसोमेटिक' प्रणाली के माध्यम से कर रहे थे। डॉ० संघटिया ने महाराज के रोग का अध्ययन किया। बुलेटिन का अध्ययन करके वे महाराज के समक्ष अपने बात कहने लगते हैं। और अपनी बात में किसी मेहतर के इलाज की चर्चा की और महाराज से उसकी तुलना की। लेखक का यह सबसे करारा व्यंग्य है। उस मानसिकता पर समाज में दोहरा विभेद रखती है। इस ट्रीटमेंट से महाराज का इलाज होता है। ये महाराज समाज के प्रभुता सम्पन्न लोग हैं, जिनका इलाज मनुष्यता के लिए आवश्यक है। कहानीकार ने आधुनिक समाज को मानवीय चेतना से युक्त करने के लिए व्यंग्य शैली को कहानी में अपनाया है।


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