घीसा कहानी का सारांश समीक्षा उद्देश्य और प्रश्न उत्तर | महादेवी वर्मा

SHARE:

घीसा कहानी का सारांश समीक्षा उद्देश्य और प्रश्न उत्तर महादेवी वर्मा यह कहानी केवल एक गुरु और शिष्य के संबंध को नहीं दर्शाती, बल्कि समाज के सबसे निचले

घीसा कहानी का सारांश समीक्षा उद्देश्य और प्रश्न उत्तर | महादेवी वर्मा


हादेवी वर्मा द्वारा रचित 'घीसा' उनके संस्मरण संग्रह 'पथ के साथी' (या 'अतीत के चलचित्र') का एक अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी रेखाचित्र है। यह कहानी केवल एक गुरु और शिष्य के संबंध को नहीं दर्शाती, बल्कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की निश्छल गुरुभक्ति और स्वाभिमान का जीवंत दस्तावेज है।

घीसा कहानी का सारांश

घीसा महादेवी वर्मा का संस्मरण है। गंगा पर झूसी गांव के खंडहर और उसके आस-पास के गांवों के प्रति लेखिका का अकारण आकर्षण रहा है। अवकाश के समय लोग इष्ट मित्रों से मिलने जाते हैं, उत्सवों में सम्मिलत होते हैं और आमोद-प्रमोद करते हैं। उस समय को लेखिका खंडहर और क्षत-विक्षत चरणों पर पछाड़े- खाती हुई भागीरथी के तट पर सुख से काट देती है। पहचान और परिचय बताते हुए लेखिका कहती है- “ दूर-पास बसे हुए गुड़ियों के बड़े-बड़े घरौंदे के समान लगने वाले कुछ लिपे-पुते, कुछ जीर्ण-शीर्ण घरों से जो झुंड पीतल-तांबे के चमचमाते, मिट्टी के नये लाल और पुराने बदरंग घड़े लेकर गंगाजल भरने आता है, उसे भी मैं पहचान गई हूँ।"

उस गांव में ग्वालों के बच्चे अपनी चरती हुई गाय-भैंसों में से किसी को उस ओर बहकते देखकर लकुटी लेकर दौड़ पड़ते हैं। उस पार शहर में दूध बेचने जाते या लौटते हुए ग्वाले, किले में काम करने लग जाते या घर आते हुए मजदूर, नाव बांधते हुए अल्लाह 'चुनरी तो रंगाई लाल मंजीरी हो' गीत गाते थे। उनकी नज़र जब लेखिका पर पड़ती तो वे चुप हो जाते। लेखिका कहती हैं—“कुछ विशेष गर्व करने वालों से मुझे एक सज्जन नमस्कार भी प्राप्त हो जाता है।”

घीसा कहानी का सारांश समीक्षा उद्देश्य और प्रश्न उत्तर | महादेवी वर्मा
गांव वालों की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी, उनकी हड्डियाँ साफ़ नज़र आती थीं। 'कुछ उभरी पसलियाँ बड़े पैर और दुर्बल टांगों के कारण अनुमान से ही मनुष्य संतान की परिभाषा में आ सकते थे। लेखिका के साथ बूढ़ी भक्तिन सदा रहा करती थी, जो नौकरानी से अपने आपको अभिभावक मानने लगी थी।
 
धीरे-धीरे महादेवी के मन में ग्वाल-बालों को पढ़ाने का विचार आया। घीसा उनमें से एक था। लड़के उससे कुछ खींचे-खींचे रहते थे। इसलिए नहीं कि वह कोरी था, वरन् इसलिए कि, किसी की नानी, किसी की बुआ आदि ने घीसा से दूर रहने की नितांत आवश्यकता उन्हें कान पकड़-पकड़ कर समझा दी थी। वह पैर के बल घिसट-घिसट कर चलता था इस कारण उसका नाम घीसा पड़ गया। फिर धीरे-धीरे स्त्रियाँ लेखिका को घीसा की जन्मजात अयोग्यता के बारे में समझाने लगीं। उसका बाप कोरी था पर बड़ा ही अभिमानी और भला आदमी बनने का चाव था। उसने बढ़ईगिरी सीखी और दूसरे गांव की युवती लाकर गांव की सजातीय सुन्दरी बालिकाओं की उपेक्षा कर दी। ईश्वर से यह अन्याय न देखा गया और वह हैजे के प्रकोप में मर गया।

घीसा सब चीज़ों को सीखने और समय पर स्मरण करने के लिए प्रसिद्ध था। पुस्तक में एक भी धब्बा न लगाता, स्लेट को चमचमाती रखता और छोटे काम को भी पूरी जिम्मेदारी से निभाता । वह कर्त्तव्य परायण और गुरु भक्त था। महादेवी महीने में चार दिन ही उन्हें पढ़ाने के लिए आ पाती थीं। एक दिन उन्होंने न जाने क्या सोचकर बिना कपड़ों का प्रबंध किए ही उन बेचारों को सफाई का महत्व बताना शुरू कर दिया। दूसरे इतवार को सब जैसे-तैसे सामने थे। पर घीसा गायब था। पूछने पर पता लगा कि मां से कपड़े धोने का साबुन लाने के लिए जिद कर रहा है। मां को मजदूरी के पैसे आज मिले हैं। घीसा कपड़े धो रहा है। क्योंकि गुरु साहब ने कहा है—'नहा-धोकर साफ़ कपड़े पहन कर आना'। महादेवी को स्मरण हो आया कि द्रोणाचार्य ने अपने भील शिष्य से कैसे अंगूठा कटवा लिया था ।
 
एक दिन महादेवी अपने शिष्यों के लिए 5-6 सेर जलेबी ले गई। पर किसी को भी पांच-पांच से अधिक न मिल सकीं। सभी शिकायत करने लगे मेरी अमुक ने छीन ली, किसी को घर में सोते हुए छोटे भाई के लिए चाहिए, चौथे को किसी और की याद आ गयी। इस कोलाहल में अपने हिस्से की जलेबियाँ लेकर घीसा कहाँ खिसक गया, यह कोई न जान सका । एक नटखट अपने साथी से कह रहा था “यार, एक-दो पिलवा पाले हैं, आही को देय गया होई ।”
 
होली के कुछ पहले की बात है। घीसा दो सप्ताह से ज्वर में पड़ा था । इतवार को लेखिका घीसा को देखने चलीं । परन्तु पीपल के पास पहुँचते-पहुँचते ही सामने से घीसा आता दिखाई दिया। उसके सूखे शरीर में विद्युत सी दौड़ रही थी। मुल्लू के काका ने बताया कि शहर में दंगा हो गया है। तब उसे गुरु साहब का ध्यान आया। वह गुरु साहब के गोड़धर कर यहीं पड़ा रहेगा, पर उन्हें कहीं भी न जाने देगा। अचानक महादेवी के मुंह से निकला कि रेल में बैठ कर दूर-दूर से बहुत से विद्यार्थी आए हैं, जो अपनी मां के पास साल भर में एक बार ही पहुँचते हैं और उनके न जाने से वे घबरा जाएंगे। यह सुनकर घीसा ने महादेवी को न जाने देने की हठ छोड़ दी।

महादेवी जब जा रही थीं तो घीसा उनके लिए उपहार में तरबूज़ लेकर आया। घीसा के पास पैसा न था। वह अपने कुर्ते के बदले में तरबूज लेकर आया था तरबूज सफ़ेद न हो, इसलिए कटवाना पड़ा। मीठा है या नहीं, यह देखने के लिए उँगली से कुछ निकाल भी लेना पड़ा। इतना भावातिरेक देखकर लेखिका हतप्रभ रह गईं।
 

घीसा कहानी की समीक्षा

'महादेवी वर्मा' छायावादी काल की प्रतिष्ठित कवयित्री हैं। घीसा महादेवी जी का संस्मरण है। उनके संस्मरणों की एक विशेषता है कि वे रेखाचित्र के गुण को समाहित किए रहते हैं। इसी प्रकार घीसा संस्मरण में भी महादेवी पहले-पहले घीसा का रेखाचित्र खींचती हैं और इस प्रकार जो तस्वीर पाठकों के सामने आती है, वह दूर-देहात के मिट्टी में खेलने और सीखने वाले बच्चे की आती है, जिसके गांव की, परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है। महादेवी आरंभ में लिखती है कि इस, गांव के प्रति उनका आकर्षण अकारण ही रहा किन्तु इसे अकारण नहीं माना जाता है। लेखिका बहुत संवेदनशील है। वे सभी मनुष्यों को यह तस्वीर दिखाना चाहती है और कहना चाहती है कि बिना इस तस्वीर को बदले भारत को बदलना मुश्किल है। आज भी हमारे भारतवर्ष में ऐसे अनेक 'घीसा' हैं जिनके पास तन ढकने के लिए एक जोड़ी कपड़ा तक नहीं है। उन्हें यदि सफाई का उपदेश दें तो आत्मग्लानि से अधिक कुछ न होगा। कहानीकार लोगों के शून्यता बोध को जागृत करना चाहती है। कहानी की पीड़ा समाज पर चोट और मार्ग की दुरन्हता को उजागर करती है।
 
कथावस्तु को धरातल पर कहानी बहुत मार्मिक और संवेदनशील है। गंगा पर झूसी के खंडहर और आस-पासके गांव में लेखिका आती है। उनके साथ अपना समय गुजारती है। महादेवी के संपर्क में बहुत से लोग हैं, पर घीसा की स्मृति सदा के लिए उनके मानस पटल पर अंकित हो गई। घीसा के चरित्र को आधार बनाकर यह संस्मरण चलता है। उसके जीवन की आवश्यकताओं, कठिनाईयों को दिखाता है। उसकी गुरुभक्ति की सराहना करता है। उसके प्रेम की उदारता और गरिमा को रेखांकित करता है। वस्तुतः घीसा भारतीय परंपरा और संस्कृति का वह बालक है, जो निष्ठा, सम्मान और संस्कारों के इतिवृत्त में जीता है। यह उसकी नियति है। क्योंकि आर्थिक समस्या, घोर गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी की स्थिति में भाग्य ही सर्वोत्तम होता है और नियति को तोड़ने का एक अथक प्रयास उन लोगों के लिए छोड़ दिया जाता है, जो शहराती हैं। महादेवी का ध्यान घीसा के चरित्र की ओर जाता है और वे इसे पाठकों के सम्मुख लाना चाहती है। 

'घीसा' एक चरित्र-प्रधान संस्मरण है। महादेवी वर्मा घीसा से भावात्मक संबंध स्थापित करती है और वे घीसा के नाम की व्युत्पत्ति तक की खोज करती है। घीसा से उनके भावात्मक लगाव का मूल कारण ही घीसा की गुरु भक्ति है। वे कहती है कि पैर के बल घिसट-घिसट कर चलने के कारण ही उसका नाम घीसा पड़ा। घीसा के चरित्र में बहुत उदात्त गुण है। वह संस्कारवान बालक है, जिस की गुरुभक्ति ही उसकी निष्ठा का बखान करती है। बच्चों की मासूमियत, भोलापन और सरलता सबके हृदय को आकर्षित कर लेते हैं।
 
संस्करण देशकाल की दृष्टि से आधुनिक है और वातावरण की दृष्टि भारतीय, गांव के रूप को गढ़ता है। घीसा का परिचय हमारे गांव और देहातों में मिल जाता है। महादेवी सभी बच्चों से समान आत्मीयता रखती थीं, किन्तु सहजता और सरलता के कारण घीसा ही उन्हें अधिक प्रिय था।
 
संस्मरण का उद्देश्य घीसा की मार्मिक स्थिति का अंकन करना है। भारतीय परंपरा की गरिमा में पलते संस्कारवान बच्चों के लिए विकास के वातायान को खोलना है। 

घीसा पाठ की मूल संवेदना

गांव-देहात के उपेक्षित जीवन के प्रति लेखिका का अकारण लगाव था। अपने संपर्क में आए एक निरीह किन्तु गुरु भक्त बालक का स्मरण चित्र रखते हुए उन्हें किंचित समस्याओं को भी उजागर किया हैं- 
  1. उपेक्षित सामाजिक जीवन : गांव-देहात का कठिन और जटिल जीवन आम तौर पर सामाजिक उपेक्षा का शिकार रहता है। महादेवी उससे जुड़ती है और सामाजिक वस्तुस्थिति पर टिप्पणी भी करती है—“जिस अवकाश के समय को लोग इष्ट मित्रों से मिलने, उत्सवों में सम्मिलित होने, तथा अन्य आमोद-प्रमोद के लिए सुरक्षित रखते हैं, उसी को इस खंडहर और क्षत-विक्षत चरणों पर पहाड़ खाती हुई भागीरथी के तट पर काट ही नहीं सुख से काट रही हूँ।”
  2. आर्थिक समस्या : गांव के लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत कमज़ोर है, उनकी हड्डियाँ दीखने लगी हैं, चेहरे और शरीर पर मैल जमा है। कपड़े न होने के कारण वे लोग साफ़-सफ़ाई का ध्यान नहीं रख पाते। ग्वाले गाये-भैसें चराते हैं, औरतें मजदूरी करती हैं, मल्लाह नाव खेते हैं। उनके मुख करुण हैं, टांगें दुर्बल हैं, आंखें पीली हैं। 
  3. अशिक्षा : गांव में अशिक्षा की स्थिति को देखकर महादेवी बच्चों को पढ़ाने का दायित्व लेती है। वे महीने में चार दिन उनके पास आ पाती है। उन्होंने बच्चों को साफ़-सफ़ाई की शिक्षा दी तो सभी बच्चों ने बिना किसी प्रश्न के उसे मान लिया। कोई तर्क नहीं है। 
  4. घोर गरीबी : समाज में घोर गरीबी है। गरीबी के कारण लोग हड्डियों का ढांचा मात्र रह गए हैं – “उभरी हुई हड्डियों वाली गर्दन को संभालते हुए दिन पर खड़े हुए छोटे-छोटे रूखे बालों की उग्रता उसके मुख की संकोच भरी कोमलता से विद्रोह कर रही थी । उभरी हुई हड्डियों वाली गर्दन को संभालते हुए कंधों से, रक्तहीन मटमैली हथेलियों और टेढ़े-मेढ़े कटे हुए नाखूनों युक्त हाथों वाली पतली बाहें ऐसी झूलती थीं जैसे—ड्रामा में विष्णु बनने वाले की दो नकली भुजाएँ ।” 
महादेवी बहुत संवेदनशील प्रकृति की लेखिका हैं। वे अपने भावात्मक अंतःसंबंध को उद्घाटित करते हुए गांव के सामाजिक जीवन से सौहार्द्र पूर्वक सहज, सरल संबंध स्थापित करती है। उसकी आत्मीयता उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती है।
 

घीसा कहानी का उद्देश्य 

महादेवी वर्मा का संस्मरण 'घीसा' भावनाओं को जागृत करने वाला है। वर्तमान सामाजिक जटिलताओं में मनुष्य अपने आप में ही कहीं खो गया है। वह अपने आप से बाहर निकल कर प्रकृति की गोद में खेल रहे उन निरीह जनों की ओर संवेदना पूर्वक देखता ही नहीं, जो बहुत कठिनाई से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। यह संस्मरण घीसा के भोलेपन, गुरुभक्ति, हठधर्मिता, एकाग्रता, सरलता, निश्छलता, तन्मयता और सम्मान भाव को दर्शाता है। यह भावना का संबंध है। इसके लिए रागात्मकता चाहिए। उसमें भावना कां ज्वार इतना धनीभूत है कि वह लेखिका से अनन्य संबंध बना लेता है।

संस्मरण यह स्थापित करता है कि प्रेम और सदाचार, भावना और एकाग्रता पर किसी का अधिकार नहीं है। घीसा बहुत गरीब व्यक्ति है। वह गुरु की आज्ञा का पालन करने के लिए किसी भी स्थिति का सामना, करने को तैयार है। संस्मरण समाज की शोचनीय दशा को भी उजागर करता है। जहाँ लोग-बाग अपने जीवन के दायित्वों को पूरा करने के सभी प्रबन्ध हैं। घीसा गीले कपड़े पहन कर गुरु के सामने आता है और उसे गर्व होता है कि उसने आज्ञा का पालन किया। जहाँ एक मजदूरी पेट भरने के लिए भी काफ़ी नहीं होती। समाज की करुण दशा का बहुत मार्मिक अंकन लेखिका ने किया है। उनकी दशा देखिए- 'कुछ उभरी पसलियों, बड़े पैर और दुर्बल टांगों के कारण अनुमान से ही मनुष्य संतान की परिभाषा में आ सकते थे और कुछ दुर्बल, सूखे और मलिन मुखों की सौम्यता और निष्प्रभ पीली आंखों में संसार भर की उपेक्षा बटोर रहे थे।' मानो लेखिका के इस एक चित्र ने पूरी सामाजिक वस्तुस्थिति को उजागर कर दिया हो।
 

घीसा कहानी की भाषा शैली महादेवी वर्मा

महादेवी छायावाद काल की लेखिका हैं। उनकी भाषा अधिकांशतः संस्कृत-निष्ठ परिष्कृत हिन्दी है। किन्तु वह दुरूह या अस्वाभाविक नहीं लगती। जैसे यह वाक्य देखिए- “वह गोधूलि मुझे अब तक नहीं भूली। संध्या के काल में सुनहरी आभावाले उड़ते दुकूल पर रात्री ने मानों छिपकर अंजन की मूठ चला दी थी।" इस वाक्य में गोधूलि, संध्या, काल, आभा, दुकूल, रात्री, अंजन आदि तत्सम् शब्द है किन्तु ये वाक्य की संप्रेषणीयता में बाधक नहीं बनते हैं।
 
महादेवी की वाक्य संयोजन संयुक्त है और मिश्रित है। वे काफ़ी लम्बे-लम्बे वाक्य लिखती है। इस क्रम में कहीं-कहीं कठिनाई आती है—“फिर इतवार को माँ मजदूरी पर जाते ही एक मैले-फटे कपड़े में बंधी मोटी रोटी और नमक का थोड़ा चबेना और एक डली गुड़ बगल में दबाकर पीपल की छाया को एक बार फिर झाड़ने- बुहारने के पश्चात वह गंगा के तट पर आ बैठा और अपनी पीली सचेत आँखों पर क्षीण सांवले हाथ की छाया का दूर-दूर तक दृष्टि दौड़ता रहता।” संस्मरण पूरी तरह से अभिधा शैली में लिखा गया है और घीसा के जीवन कृत की घटनाओं को बताता है। भाषा तत्सम निष्ठ किन्तु प्रसादगुण संपन्न है। भाषा को सरल और प्रभावोत्पादक बनाने के लिए लेखिका ने कहावतों और लोकोक्तियों का प्रयोग भी किया है। और भाषा की भंगिमा को चित्रात्मकता प्रदान की है जैसे— “केवल कुछ गंगा में मुँह इस प्रकार धो आए कि मैल अनेक रेखाओं में विभक्त हो गई थी। कुछ ने हाथ पांव घिसे थे कि शेष मलिन शरीर में अलग जोड़े हुए से लगते थे। और न रहेगा बांस न बजेगी बांसूरी की कहावत चरित्रार्थ करने के लिए बीच से मैले-फटे कुर्ते घर पर छोड़कर अर्धनग्न रूप में उपस्थित हुए थे, जिससे उनके प्राण 'रहने का आश्चर्य है, गए अचंभा कौन,' की घोषणा करते जान पड़ते थे।

संक्षेप में महादेवी की भाषा साहित्यिक परिनिष्ठत हिन्दी है। मुहावरेदार, भाषा में लम्बे वाक्य उनकी विशेषता है। महादेवी ने चित्रशैली और बिम्बात्मकता का प्रयोग भी किया है।

घीसा महादेवी वर्मा का संस्मरण है

घीसा महादेवी वर्मा का संस्मरण है। इसमें उन्होंने समाज के उपेक्षितों का भावात्मक चित्र खींचा है तथा उनके नैतिक औदात्य को भी दिखाया है। स्पष्ट कीजिए, कैसे ? 

संस्मरण साहित्य की वह विद्या है, जिसमें लेखक अपनी स्मृति के आधार पर किसी ऐसे व्यक्ति का चित अपनी तूलिका की सहायता से बनाता है, जिससे वह पहले मिल चुका है। वह व्यक्ति लेखक के ऊपर अपना प्रभाव डाले हुये होता है और लेखक उस व्यक्ति को सदा स्मृतियों में रखता है। यह स्मृतियों की सहायता से किसी व्यक्ति का भावगत और बाह्य रूपांकन करना है।

घीसा महादेवी को उपहार के रुप में वह तरबूज दिया-जो वह अपनी कमीज़ देकर लाया था। वह गुरु साहब के कहने पर अपनी कमीज और अंगोछा धोया, उन्हें गीला पहनकर ही गुरुसाहब के पास आ गया। वह महादेवी वर्मा को न जाने के लिये बार-बार निवेदन कर रहा था।
 
घीसा गुरु का भक्त है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एकलव्य द्रोणाचार्य का भक्त था। वह गुरुसाहब के कहने पर पाठ कठस्थ कर लेता है। महादेवी उसकी भक्ति देखते हुए कह उठती हैं- “जब घीसा नहाकर गीला अंगोछा ही लपेटे और आधा भीगा कुर्ता पहने अपराधी के समान मेरे सामने आ खड़ा हुआ, तब आँखें ही नहीं, मेरा रोम-रोम गीला हो गया। उस समय समझ में आया कि द्रोणाचार्य ने अपने भील शिष्य से अगूंठा कैसे कटवा दिया होगा।"
 
घीसा बहुत परिश्रमी बालक था। वह प्रत्येक कार्य को पूरा मन लगा कर करता था। उसके चरित्र की इस विशेषता ने महादेवी वर्मा का मन मोह लिया। उन्हें एक बारगी उसे उसकी माँ से मांग लेने का मन किया। महादेवी लिखती हैं—– “पढ़ने, उसे सबसे पहले समझने, उसे व्यवहार के समय स्मरण करने, पुस्तक में एक भी धब्बा न लगाने, स्लेट को चमचमाती रखने और अपने छोटे-से-छोटे काम का उत्तरदायित्व बड़ी गंभीरता से निभाने में धीसा के समान चतुर कोई न था ।" 

घीसा गुरुजी की सभी आज्ञा का तत्परता से पालन करता था। महादेवी वर्मा को भी उससे विशेष लगान हो गया था। उसके नाम और गुण की, उसका कठोर चरित्र और क्षीण काया महादेवी के वात्सल्य को जगाने का कारण थी। घीसा का जीवन संघर्ष की गाथा है। उसके संघर्षों का अंदाज सिर्फ इसी से लग सकता है कि महादेवी ने उसे 'नियति के मनोविनोद का साधन है' इसी कारण महादेवी वर्मा को घीसा से विशेष लगाव होता है।

इस प्रकार 'घीसा' कहानी हमें यह सिखाती है कि श्रद्धा और प्रेम का कोई मूल्य नहीं होता। वह छोटा सा बच्चा अपनी गुरुभक्ति से महादेवी वर्मा जैसी महान विदुषी को भी निरुत्तर कर देता है। लेखिका ने अंत में स्वीकार किया है कि उन्होंने घीसा को पढ़ाया जरूर, पर सच्ची शिक्षा और गुरु-दक्षिणा उन्हें घीसा से ही प्राप्त हुई।

COMMENTS

Leave a Reply

You may also like this -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका