एकांत का वरदान शाप का गान

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एकांत का वरदान शाप का गान इतनी ही मेरी जीवनगाथा— एकांत को पुकारा मैंने, समय ने मुझे भीड़ से अलग कर मौन का तिलक लगा दिया। भीड़ की धूल भरी राहों से लौ

एकांत का वरदान शाप का गान


तनी ही मेरी जीवनगाथा—
एकांत को पुकारा मैंने,
समय ने मुझे
भीड़ से अलग कर
मौन का तिलक लगा दिया।

भीड़ की धूल भरी राहों से लौट
मैं अपने भीतर उतरता रहा,
जहाँ शब्द नहीं जन्मते,
केवल धड़कनों का धीमा वीणा-नाद
अंतरिक्ष में लहराता है।

चेहरे आए—
क्षणिक वसंत की तरह,
मुस्कानें रखकर चले गए;
मेरी छाया ही अंततः
मेरे संग चलती रही।

एकांत का वरदान शाप का गान

समय फुसफुसाया—
“वियोग नहीं यह,
तुम्हें तुम्हारे स्वर तक पहुँचाने का
एक गुप्त मार्ग है।”

तन्हाई ने मेरे कंधों पर
शांत हथेली रखी,
दुखों की राख से
एक दीपशिखा उठी—
धीमी, पर अविनाशी।

अब एकांत मेरे भीतर
मंदिर-सा उज्ज्वल है,
जहाँ शांति आरती बनती है,
और मौन
ईश्वर की गुप्त भाषा

किन्तु एक दिन
मैंने आकाश की ओर हथेलियाँ खोलीं—
अनुग्रह की वर्षा माँगी,
दया की शीतल बूँदें चाहीं।

जो बरसा,
वह अमृत नहीं था—
वह दग्ध शाप था,
धधकता हुआ,
मेरी त्वचा पर उतरता हुआ।

मैंने छाया माँगी—
सूर्य और प्रखर हुआ;
मैंने सहारा चाहा—
धरती लहर बनकर खिसक गई।

तभी जाना—
समय के वरदान
हमेशा फूल नहीं होते;
कभी काँटों की माला भी
गरिमा से पहनाई जाती है।

उस दाह में तपकर
मैं धातु-सा निर्मल हुआ,
राख से उठती रही
मेरे अस्तित्व की नई आभा।

अब समझा हूँ—
अनुग्रह और शाप
एक ही आकाश की दो ऋतुएँ हैं;
पीड़ा जब दीक्षा बनती है,
वही आत्मा का संगीत बनती है।

इतनी ही मेरी कथा—
एकांत की प्यास,
अनुग्रह की याचना,
और शाप की ज्वाला में
खिला अंतिम प्रकाश।"

व्यर्थ नहीं बहती कविता

कविताएँ
अब भी फूटती हैं भीतर से—
जैसे चट्टानों के बीच
अदृश्य जलस्रोत।

पर जीवन,
ओह जीवन!
तुम क्यों सूखी नदी की तरह
मेरे सामने पसरे पड़े हो?

शब्दों में हरियाली है,
दिनों में बंजरपन।
स्वप्नों में उजाला है,
जागती आँखों में धूल।

मैंने चाहा था
एक साधारण प्रसन्नता—
रोटी की गर्म भाप,
कंधे पर रखा भरोसे का हाथ,
और सांझ में लौटती थकान की शांति।

पर मिला—
अधूरे पतों का शहर,
टूटे वादों की गलियाँ,
और भीड़ में खोती हुई पहचान।

फिर भी
कविता आती है।

जब रात
अपना काला आँचल फैलाती है,
मेरी खिड़की पर
एक पंक्ति चुपचाप बैठ जाती है।

जब दर्द
हड्डियों के भीतर
धीरे-धीरे नमक बनता है,
एक रूपक जन्म लेता है।

क्या यह विफलता है—
कि जीवन हार गया
पर शब्द बच गए?

या यह मुक्ति है—
कि भीतर का मनुष्य
अब भी बोल सकता है?

मैंने अपनी पराजयों को
स्याही में घोला,
और वे
नीले आकाश की तरह फैल गईं।

मेरी चुप्पियाँ
पंक्तियों में बदल गईं,
मेरे आँसू
लयों में।

जीवन शायद
मेरे पक्ष में नहीं था,
पर भाषा ने
मुझे त्यागा नहीं।

इसलिए मैं लिखता हूँ—
न जीत के लिए,
न स्मारक के लिए,
न अमरता के लिए।

मैं लिखता हूँ
ताकि यह प्रमाण रहे—
कि मैं जीवित था,
मैंने महसूस किया,
और विफलताओं के बीच भी
सौंदर्य को जन्म लेते देखा।

कविताएँ बहती रहें—
यदि जीवन रुक भी जाए।"

दो दुनियाओं का कवि

एकांत के द्वीप पर
मौन की शांति-गृह में
कवि बनकर जीना आसान है —
जैसे शब्दों की भी ज़रूरत नहीं।

वहाँ एक ही संसार है,
जहाँ केवल “मैं” की धड़कन सुनाई देती है,
और अस्तित्व
स्वयं को ही आलोकित करता है।

पर सड़क का कवि —
धूल, शोर और भूख के बीच
अपनी पंक्तियाँ तलाशता है।

उसकी कविता
पैरों से उठती धूल में लिखी जाती है,
और हर शब्द
जीवन के घाव से टपकता है।

एक कवि मौन में पूर्ण होता है,
दूसरा संघर्ष में जन्म लेता है।"



- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
Kerala state, email:binoymb2008@gmail.com,
phone:9847245605(office)

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