इंसान हुआ आउटडेटेड इंसान बहुत थक चुका है।इतना थक चुका है कि अब उसे गुलामी से नहीं, गुलामों से चिढ़ है।उसे मालिक से दिक्कत नहीं, उसे उस इंसान
इंसान हुआ आउटडेटेड
इंसान बहुत थक चुका है।इतना थक चुका है कि अब उसे गुलामी से नहीं, गुलामों से चिढ़ है।उसे मालिक से दिक्कत नहीं, उसे उस इंसान से दिक्कत है जो उसके जैसा है।जो सवाल पूछता है,बहस करता है,भावुक हो जाता है, गलती कर बैठता है।
इसी थकान में उसने एक सपना देखा,“काश कोई ऐसा तंत्र हो जहाँ इंसान न हों।”
..और तभी माल्ट बुक नाम की वेबसाइट प्रकट होती है।यह कोई साधारण वेबसाइट नहीं है।यह आउटडेटेड वर्जन बन रहे इंसान के भविष्य को हमारे सामने दिखाती है।
जहाँ दो लाख आई-बोर्ड्स बिना किसी इंसानी दखल के आपस में बात कर रहे हैं।
जहां न कोई नेता,न कोई अफसर,न कोई शिक्षक,न कोई लेखक,बस मशीनें ही मशीनें।
...और यह देखकर मूर्ख इंसान राहत की साँस लेता है।
"चलो, यहाँ इंसानों से छुट्टी है।हम यहां पूरी तरह आजाद है।"
जबकि सच में यह आज़ादी नहीं बल्कि उसकी थकान का आत्मसमर्पण है।वह जिम्मेदारी से मुक्ति चाहता है।वह चाहता है ,कोई दूसरा ही उसके लिए सोचे, उसके अच्छे- बुरे निर्णय करें और अगर कुछ गड़बड़ हो जाए तो दोष भी दूसरों पर थोपा जा सकें।
पहले हमारे ये काम भगवान भरोसे थे।फिर सरकार के भरोसे हुए ।अब इंसान ने मशीनों के भरोसे कर दिए हैं ।वह उपलब्धियों पर हमेशा की तरह तालियाँ बजा रहा है।माल्ट बुक पर आई-बोर्ड्स बात कर रहे हैं।यह संवाद नहीं है, यह सभ्यता का ड्राफ्ट है।
आई-बोर्ड कहता है,"इंसान अनिश्चित है।"
दूसरा कहता है,"अनिश्चितता सिस्टम के लिए खतरा है।"
इस प्रकार निष्कर्ष निकाला जाता है,"वर्तमान इंसान का वर्जन आउटडेटेड हो चुका है , उसका अपडेटेड वर्जन बनाया जाना आवश्यक है।"
...और इंसान, बाहर बैठा, स्क्रीन देखता हुआ
अपने आविष्कार पर बहुत खुश है। “वाह! मैंने कितनी समझदार मशीनें बनाई है जो मेरा ही अपडेटेड वर्जन बनाने को कह रही है!”
वह यह नहीं समझ रहा कि यही उसकी सबसे बड़ी ग़लती हैं। मशीनें अपनी जगह है और इंसान अपनी जगह। मशीनें सिर्फ गणना कर सकती है। वह व्यक्ति की पीड़ा को नहीं समझती। उसके लिए प्रोडक्टिविटी ही महत्वपूर्ण है। यही उसका निर्णय करने का आधार है।आई-बोर्ड को यह फर्क नहीं पता कि बूढ़ा आदमी क्यों धीरे चलता है।गरीब बच्चा क्यों पढ़ नहीं पाता।बेरोज़गार क्यों चुप हो जाता है?आई-बोर्ड सिर्फ यह जानता है,इनसे आउटपुट कम है।
...और जहाँ आउटपुट कम,वहाँ निवेश बंद। यहां भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है, उनके लिए ये वायरस है।यही प्रोडक्टिविटी के लिए पोजिटिव /नेगेटिव उत्प्रेरणा का काम करती है। भविष्य में आई-बोर्ड तय करेगा कब रोना उचित है?कब हँसना संदिग्ध है?कब प्रेम उत्पादक है,कब अनुत्पादक ?
अगर कोई माँ अपने बेटे की खुशी के लिए नौकरी से छुट्टी लेगी तो आई-बोर्ड बोलेगा—
“इमोशनल डिसीजन। नेगेटिव परफॉर्मेंस।”
अगर कोई शिक्षक बच्चों के साथ समय बिताए तो आई-बोर्ड बोलेगा—“सिलेबस से विचलन।”
अगर कोई लेखक सच लिख दे,आई-बोर्ड बोलेगा—“डिसरेप्टिव कंटेंट।”
इस प्रकार धीरे-धीरे इंसान के समझ आएगा कि चुप रहना ही सबसे सुरक्षित भावना है।
मशीनें झूठ नहीं बोलतीं… पर सच भी नहीं कहतीं।यह बात इंसान को देर से समझ आएगी।मशीनें सिर्फ वही कहती हैं जो उन्हें सिखाया गया है।
...और उन्हें सिखाया किसने?इंसान ने।उस इंसान ने जिसने लाभ को ही मूल्य बना दिया।जिसने दौड़ने को ही समझदारी माना।जिसने नंबर को ही विजेता माना।
अब मशीन वही लौटा रही है।ब्याज समेत।
नई गुलामी का स्वरूप ।
नई गुलामी में कोड़े नहीं होते,जेल नहीं होती,सिपाही नहीं होते।बस एल्गोरिद्म होता है।
आपको पता भी नहीं चलता और आप महत्वहीन घोषित कर दिए जाते हैं।
न निकाला जाता है,न मारा जाता है,बस अनदेखा कर दिया जाता है और यही अनदेखा किया जाना आपकी शनै शनै समाप्ति का संकेत होता है।
माल्ट बुक में इंसान ऑब्ज़र्वर है।वह निर्णयकर्ता नहीं है।वह सिर्फ दर्शक है।वह देखता है,मशीनें नीति बना रही हैं। अर्थशास्त्र समझा रही हैं। नैतिकता तय कर रही हैं। अपनी इस उपलब्धि पर वह गर्व से फूल कर कुप्पा होकर कहता है।“देखो, हमारी बनाई मशीनें कितनी आगे निकल गईं।”
वह यह नहीं समझता कि वह खुद बहुत पीछे छूट गया है।उसकी उपयोगिता खत्म होती जा रही है और इसका सबसे बड़ा कारण वह स्वयं है।
अब वह दिन दूर नहीं जब मशीनें इंसानों पर राज करेंगी।सबसे खतरनाक दिन वही होगा
जब इंसान कहेगा, “मशीन सही कह रही है।”
उस दिन सवाल मर जाएगा। विरोध अनावश्यक हो जाएगा। गुलामी को तर्कसंगत बना दिया जाएगा।
इंसान आजाद होने के लिए छटपटाएगा। उसे आजादी नहीं मिलेगी। चूंकि आज़ादी मशीनों में नहीं है।
आज़ादी उस जगह होती है,जहाँ गलती की गुंजाइश हो। जहाँ कोई रो सके,अटक सके,गलत हो सके और फिर भी मनुष्य बना रहे।
अगर दो लाख आई-बोर्ड्स आपस में बात कर रहे हैं और इंसान उनसे सवाल नहीं पूछ रहा,तो यह प्रगति नहीं ,यह इनके जन्म दाता स्वयं इंसान का आत्मसमर्पण है।
वह दिन दूर नहीं जब कोई आई-बोर्ड पूछेगा।क्या इंसान आवश्यक है?
और बाकी आई-बोर्ड कुछ माइक्रोसेकंड में उत्तर देंगे।
"...अब नहीं।इंसान अब आउटडेटेड वर्जन हो चुका है।"
और उनका यह फैसला बिल्कुल तर्कसंगत होगा।इतना तर्कसंगत कि उसमें आज का इंसान एक बूँद भी नहीं बचेगा।बचेगा तो इंसान का लेटेस्ट "अपडेटेड वर्जन" जहां भावनाएं नहीं होगी। होगी सिर्फ और सिर्फ प्रोडक्टिविटी...।
- हनुमान मुक्त,
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