एक विचार : डॉ० कलाम कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनसे हमारा परिचय केवल पुस्तकों या समाचारों के माध्यम से होता है, फिर भी वे हमारे भीतर गहराई तक उतर
एक विचार : डॉ० कलाम
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनसे हमारा परिचय केवल पुस्तकों या समाचारों के माध्यम से होता है, फिर भी वे हमारे भीतर गहराई तक उतर जाते हैं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मेरे लिए भी ऐसे ही व्यक्तित्व रहे हैं। जब पहली बार उनकी आत्मकथा Wings of Fire पढ़ी थी, तब यह समझ में आया कि महानता किसी विशेष परिस्थिति की देन नहीं, बल्कि निरंतर साधना का परिणाम होती है।
रामेश्वरम की समुद्री हवा में आज भी नमक की गंध बसी होगी। वही हवा, जो कभी एक दुबले-पतले बालक के चेहरे से टकराकर उसके भीतर अनजाने ही सपनों की चिंगारी जगा देती थी। कंधे पर अख़बारों का थैला लटकाए, नंगे पाँव गलियों में दौड़ता वह बालक तब शायद स्वयं भी नहीं जानता था कि भविष्य में वही भारत की वैज्ञानिक चेतना का प्रतीक बनेगा।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन किसी चमत्कार की कहानी नहीं, बल्कि निरंतर श्रम, आत्मसंयम और नैतिक अनुशासन की लंबी साधना है। उनके जीवन को पढ़ते हुए बार-बार यह एहसास होता है कि वे परिस्थितियों से नहीं, अपने संकल्प से बने थे।
उनका जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के छोटे से तीर्थ नगर रामेश्वरम में हुआ। पिता जैनुलाब्दीन नाव चलाते थे और धार्मिक कार्यों से जुड़े रहते थे। माँ आशियम्मा सीमित संसाधनों में पूरे परिवार को सहेजती थीं। घर में न वैभव था, न सुविधा, पर संस्कारों की प्रचुरता थी।आज जब हम सुविधाओं के बावजूद असंतोष से घिरे रहते हैं, तब कलाम का बचपन हमें आत्ममंथन के लिए विवश करता है।
बचपन से ही उन्होंने अभावों को बहुत करीब से देखा। कई बार घर में पर्याप्त भोजन नहीं होता था, फिर भी चेहरे पर मुस्कान बनी रहती थी। शायद यहीं से उन्होंने सीखा कि सुख परिस्थितियों से नहीं, दृष्टि से जन्म लेता है।सुबह-सुबह अख़बार बाँटना उनके जीवन का हिस्सा था। गलियों से गुजरते हुए वे अकसर समुद्र किनारे रुक जाते। लहरों को देखते हुए उनके मन में अनगिनत प्रश्न उठते। मुझे लगता है, वहीं खड़ा वह बालक अनजाने ही अपने भविष्य से संवाद करता था।
रामेश्वरम की धार्मिक विविधता ने उनके भीतर सहिष्णुता और व्यापकता का बीज बोया। मंदिर, मस्जिद और चर्च — तीनों उनके जीवन का हिस्सा थे। यही कारण था कि वे जीवन भर संकीर्णता से दूर रहे।शिक्षा के प्रति उनकी लगन असाधारण थी। सेंट जोसेफ कॉलेज से लेकर मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी तक की यात्रा आसान नहीं थी। वायुसेना में चयन न होना उनके लिए गहरा आघात था। उस समय का उनका अकेलापन और आत्मसंघर्ष पढ़ते हुए लगता है, मानो वे हर युवा की कहानी कह रहे हों।
ऋषिकेश की यात्रा उनके जीवन का मोड़ बनी। वहाँ उन्होंने सीखा कि हार के बाद भी आगे बढ़ा जा सकता है। यह सीख आज भी हमें संबल देती है।DRDO और ISRO में उनका कार्यकाल भारतीय विज्ञान के स्वाभिमान का कालखंड है। सीमित संसाधनों में उन्होंने असंभव को संभव बनाया। वे केवल तकनीक नहीं गढ़ रहे थे, बल्कि आत्मविश्वास का निर्माण कर रहे थे।
एक असफल प्रक्षेपण के बाद जिस विनम्रता से उन्होंने जिम्मेदारी ली, वह नेतृत्व का दुर्लभ उदाहरण है। आज जब सफलता का श्रेय लेने की होड़ लगी रहती है, तब कलाम का यह व्यवहार विशेष महत्व रखता है।राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे वही सरल व्यक्ति बने रहे। राष्ट्रपति भवन में उनकी सादगी देखकर लगता था, जैसे सत्ता ने उन्हें नहीं बदला, बल्कि और निखार दिया हो।छात्रों से उनका संवाद मुझे हमेशा विशेष रूप से प्रभावित करता है। वे भविष्य को केवल आँकड़ों में नहीं, चेहरों में देखते थे। वे जानते थे कि राष्ट्र निर्माण प्रयोगशालाओं से अधिक कक्षाओं में होता है।उनका “विकसित भारत 2020” केवल नीति नहीं, नैतिक सपना था। वे ऐसा भारत चाहते थे, जो तकनीकी रूप से सशक्त होने के साथ-साथ मानवीय रूप से भी समृद्ध हो।
लेखन में भी उनकी संवेदना झलकती है। Wings of Fire पढ़ते समय लगता है कि कोई बड़ा वैज्ञानिक नहीं, बल्कि कोई आत्मीय मार्गदर्शक हमसे बात कर रहा है।निजी जीवन में उनका त्याग असाधारण था। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन हमें बताता है कि सच्ची सफलता त्याग से जन्म लेती है।27 जुलाई 2015 का दिन आज भी स्मृति में गूँजता है। मंच पर खड़े होकर छात्रों को संबोधित करते हुए उनका जाना जैसे यह संदेश दे गया कि जीवन का अंतिम क्षण भी सेवा में होना चाहिए।
डॉ. कलाम केवल अतीत नहीं हैं। वे वर्तमान और भविष्य दोनों में जीवित हैं। जब भी कोई साधारण युवक असाधारण सपना देखता है, वहाँ कलाम की छाया दिखाई देती है।उनका जीवन हमें यह विश्वास देता है कि महानता किसी पद से नहीं, चरित्र से आती है।आज के समय में, जब मूल्य और संवेदना अक्सर पीछे छूट जाती है, कलाम हमें याद दिलाते हैं कि विज्ञान का सर्वोच्च रूप — मानवता है।यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
रजत विश्वनाथ त्रिपाठी समकालीन हिन्दी साहित्य के संवेदनशील एवं विचारशील युवा रचनाकार हैं। उन्होंने इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय, प्रयागराज से हिन्दी साहित्य में परास्नातक शिक्षा प्राप्त की है। मूल रूप से कटरा, जनपद शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं।रजत विश्वनाथ त्रिपाठी की रचनाओं में ग्रामीण जीवन, राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों, सामाजिक यथार्थ तथा मानवीय संवेदनाओं का गहन और मार्मिक चित्रण मिलता है।


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