भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर भाषण

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भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर भाषण आदरणीय अतिथिगण, प्रिय शिक्षकगण, और मेरे प्यारे साथियों,आज मैं आपके समक्ष भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्य

भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर भाषण


दरणीय अतिथिगण, प्रिय शिक्षकगण, और मेरे प्यारे साथियों,आज मैं आपके समक्ष भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर कुछ विचार रखना चाहता हूँ। यह विषय केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि हमारे देश के भविष्य, हमारी खुशहाली और आने वाली पीढ़ियों के सपनों से जुड़ा हुआ है।

भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर भाषण
जब हम सुबह उठते हैं, सड़कों पर भीड़ देखते हैं, ट्रेनों में जगह नहीं मिलती, स्कूलों में बच्चों की संख्या क्लासरूम से बाहर निकल आती है, अस्पतालों में बिस्तरों की कमी महसूस होती है, और नौकरी के लिए लाखों युवा एक ही पद पर आवेदन करते दिखते हैं—तब समझ आता है कि हमारी बढ़ती जनसंख्या अब एक वरदान से ज्यादा बोझ बन चुकी है। भारत आज दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। हमारी जनसंख्या 147 करोड़ के पार पहुँच चुकी है और हर साल करीब 1.2 करोड़ नए लोग जुड़ रहे हैं—यानी हर दिन एक छोटे शहर जितनी आबादी बढ़ रही है।यह वृद्धि इतनी तेज़ है कि हमारी जमीन, पानी, जंगल, स्कूल, अस्पताल, रोजगार—सब कुछ उसी गति से नहीं बढ़ पा रहे। हमारे पास संसाधन सीमित हैं, लेकिन जरूरतें असीमित हो गई हैं।

जिस देश में पहले एक परिवार के पाँच-सात बच्चे होना सामान्य था, वहाँ आज भी कई जगहों पर परिवार नियोजन की जानकारी और सुविधाएँ कम पहुँच पाती हैं। गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक रूढ़ियाँ और लड़के की चाहत जैसी बातें अभी भी जन्म दर को ऊँचा रख रही हैं।इस बढ़ती आबादी का सबसे ज्यादा असर हमारे बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है। अच्छी शिक्षा के लिए सीटें कम पड़ जाती हैं। बेहतर नौकरी के अवसर सीमित हो जाते हैं। शहरों में झुग्गी-झोपड़ियाँ बढ़ती हैं, प्रदूषण बढ़ता है, पानी की किल्लत होती है। गाँवों में खेती की जमीन बँटती जाती है और प्रति व्यक्ति आय घटती जाती है। स्वास्थ्य सेवाएँ इतनी लोगों के लिए पर्याप्त नहीं रह पातीं। माँ और बच्चे की मृत्यु दर अभी भी चिंताजनक है। पर्यावरण पर दबाव इतना बढ़ गया है कि जंगल कट रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं और हवा साँस लेने लायक नहीं रह गई है।लेकिन दोस्तों, यह सब कुछ अपरिहार्य नहीं है। जनसंख्या वृद्धि कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है जिसे हम रोक नहीं सकते। यह वह समस्या है जिसे हम इंसान ने पैदा किया है और इसे इंसान ही सुलझा सकते हैं। 

जरूरत है जागरूकता की, शिक्षा की, परिवार नियोजन की स्वीकृति की। लड़कियों को पढ़ाना, उन्हें सशक्त बनाना, देर से शादी और कम बच्चों की सोच को बढ़ावा देना—ये छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं। सरकार की योजनाएँ, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मेहनत और हमारी व्यक्तिगत जिम्मेदारी मिलकर इस विस्फोट को नियंत्रित कर सकती है।आज प्रजनन दर घट रही है, कई राज्यों में यह प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ चुकी है—यह एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन हमें इसे और तेज करना होगा। क्योंकि अगर हम आज नहीं चेते, तो कल हमारे बच्चे उसी संसाधनों की कमी से जूझेंगे जो हम आज देख रहे हैं।

अंत में मैं बस इतना कहना चाहूँगा—जनसंख्या नियंत्रण कोई सरकार की जिम्मेदारी भर नहीं, बल्कि हर परिवार, हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। आइए हम संकल्प लें कि हम अपने परिवार को छोटा, सुखी और स्वस्थ रखेंगे। ताकि भारत न सिर्फ बड़ी आबादी वाला देश बने, बल्कि खुशहाल, समृद्ध और सशक्त देश बने।

भारत माता की जय!

धन्यवाद।


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