आदिवासी साहित्य का उद्भव और विकास आदिवासी साहित्य का उद्भव और विकास भारतीय साहित्य की उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है जो मुख्यधारा से अलग अपनी मौलिकता
आदिवासी साहित्य का उद्भव और विकास
आदिवासी साहित्य का उद्भव और विकास भारतीय साहित्य की उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है जो मुख्यधारा से अलग अपनी मौलिकता, मौखिक परंपरा और जीवन-संघर्ष की गहरी अभिव्यक्ति के साथ उभरा है। यह साहित्य उन समुदायों की रचनात्मक आवाज है जो भारत की प्राचीनतम निवासी परंपराओं से जुड़े हैं और जिन्हें सदियों से प्रकृति, जंगल, पहाड़ और सामुदायिक जीवन के साथ गहरा नाता रहा है। आदिवासी साहित्य की जड़ें प्राचीन काल में हैं, जब लिखित लिपि का विकास नहीं हुआ था और ज्ञान, इतिहास, मूल्य तथा अनुभव पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से गीतों, लोककथाओं, मिथकों, नृत्य-गीतों और अनुष्ठानों के माध्यम से संरक्षित होते रहे। यह मौखिक परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है, जिसमें जीवन के नियम, प्रकृति के साथ सामंजस्य, सामूहिकता, समानता और सहजीविता जैसे आदिवासी दर्शन के मूल तत्व छिपे हुए हैं। इन परंपराओं में प्रकृति को देवता के रूप में पूजा जाता था, जंगल को माँ माना जाता था और जीवन को उत्सवधर्मिता के साथ जीया जाता था। इस दौर में साहित्य कोई व्यक्तिगत रचना नहीं था, बल्कि सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक निरंतरता का माध्यम था।
औपनिवेशिक काल में आदिवासी साहित्य
औपनिवेशिक काल में आदिवासी जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। ब्रिटिश शासन ने उनकी भूमि पर कब्जा किया, जंगलों को छीना और उन्हें हाशिए पर धकेल दिया। इस दौर में आदिवासी साहित्य मुख्य रूप से बाहरी लेखकों द्वारा वर्णित हुआ, जहां उन्हें 'जंगली' या 'प्राचीन' के रूप में चित्रित किया गया। लेकिन इसी काल में कुछ आदिवासी लेखक उभरे जिन्होंने अपनी आवाज हिंदी या अंग्रेजी में उठानी शुरू की। सुशीला समद, जूलियस टिग्गा और एलिस एकका जैसे प्रारंभिक लेखकों ने बीसवीं सदी के प्रारंभ में अपनी रचनाएं प्रकाशित कीं। सुशीला समद छायावाद काल की कवयित्री थीं और एलिस एकका ने १९६० के दशक में कहानियां लिखीं, जो बाद में संग्रहित हुईं। स्वतंत्रता आंदोलन और संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा जैसे नेताओं ने आदिवासी अधिकारों की वकालत की, जिसने साहित्यिक अभिव्यक्ति को भी प्रेरित किया। फिर भी इस काल तक आदिवासी साहित्य मुख्य रूप से मौखिक ही रहा और लिखित रूप सीमित था।स्वतंत्र भारत में आदिवासी साहित्य का विकास
स्वतंत्र भारत में आदिवासी साहित्य का विकास नई गति से हुआ, खासकर १९७० और १९८० के दशक में। दलित आंदोलन के समानांतर आदिवासी सक्रियता बढ़ी, जिसमें भूमि अधिकार, भाषा अधिकार और सांस्कृतिक स्वायत्तता की मांगें प्रमुख थीं। इस दौर में दूसरी पीढ़ी के लेखक उभरे, जैसे लक्ष्मण गायकवाड़, लाको बोदरा और सीता रथनामल। इनमें से कुछ ने अपनी मूल भाषाओं में लिखना शुरू किया और यहां तक कि नई लिपियां भी विकसित कीं, जैसे लाको बोदरा ने हो भाषा के लिए वारंग चिति लिपि बनाई। यह संक्रमण महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे आदिवासी साहित्य मुख्यधारा की भाषाओं पर निर्भरता से मुक्त होने लगा और अपनी अस्मिता को मजबूती मिली। १९९० के दशक के बाद, खासकर १९९१ की आर्थिक उदारीकरण नीतियों के बाद, आदिवासी क्षेत्रों में विस्थापन, खनन, उद्योग और बाजारवाद के कारण शोषण तेज हुआ। इससे प्रतिरोध की रचनात्मक ऊर्जा जागृत हुई और समकालीन आदिवासी साहित्य का आंदोलन मजबूत हुआ। यह साहित्य अब अस्मिता, अस्तित्व की रक्षा और विकास के विरोध का माध्यम बन गया।
समकालीन आदिवासी साहित्य
नई सदी में तीसरी पीढ़ी के लेखकों ने आदिवासी साहित्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। रामदयाल मुंडा, हंसदा सोवेंद्र शेखर, जैसिंता केरकेत्ता, अनुज लुगुन, वंदना तेते, टेम्सुला आओ, मामंग दाई और रोज केरकेत्ता जैसे रचनाकारों ने कविताएं, कहानियां और आत्मकथाएं लिखीं। इनकी रचनाओं में विस्थापन, पर्यावरणीय संकट, सामाजिक भेदभाव, आर्थिक हाशिएकरण और सांस्कृतिक ह्रास जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। कविताओं में प्रकृति प्रेम के साथ प्रतिरोध की तीव्र भावना दिखती है, जबकि कहानियां दैनिक जीवन की चुनौतियों को गहराई से उकेरती हैं। हिंदी में लिखे जाने वाले अधिकांश आदिवासी साहित्य ने मुख्यधारा को चुनौती दी और 'आदिवासियत' को केंद्र में रखा, जिसमें समानता, सहजीविता और प्रकृति के साथ सामंजस्य प्रमुख हैं।
चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं
आदिवासी साहित्य के विकास में कई चुनौतियां रहीं, जैसे कई आदिवासी भाषाओं का लुप्त होना, मुख्यधारा में कम मान्यता और अनुवाद की कमी। फिर भी यह साहित्य अपनी मौखिक जड़ों से लिखित रूप तक की यात्रा में जीवंत रहा है। आज डिजिटल माध्यमों, अनुवादों और प्रकाशनों के कारण यह वैश्विक स्तर पर चर्चा में है। यह साहित्य न केवल आदिवासी पहचान का संरक्षण करता है, बल्कि भारतीय साहित्य को विविधता और न्याय की नई दृष्टि प्रदान करता है।
कुल मिलाकर, आदिवासी साहित्य का उद्भव प्राचीन मौखिक परंपरा में है और इसका विकास संघर्ष, प्रतिरोध और अस्मिता की खोज की निरंतर यात्रा है, जो हाशिए की आवाज को केंद्र में लाकर समाज को आईना दिखाता है।


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