हिंदी गद्य का उद्भव और विकास हिंदी गद्य का उद्भव और विकास हिंदी साहित्य की दुनिया में गद्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भाषा की अभिव्यक्
हिंदी गद्य का उद्भव और विकास
हिंदी गद्य का उद्भव
हिंदी गद्य का उद्भव प्राचीन और मध्यकालीन हिंदी साहित्य से जुड़ा हुआ है। हिंदी भाषा का जन्म अपभ्रंश से हुआ था, जो संस्कृत की एक विकसित रूप थी। प्राचीन काल में, विशेष रूप से वैदिक और महाकाव्य युग में, गद्य का प्रयोग धार्मिक ग्रंथों, दार्शनिक व्याख्याओं और प्रशासनिक दस्तावेजों में होता था, लेकिन यह मुख्यतः संस्कृत में था। हिंदी में गद्य का प्रारंभिक रूप मध्यकाल में देखने को मिलता है, जब इस्लामी प्रभाव के कारण फारसी और अरबी के संपर्क से भाषा में नई शैलियां विकसित हुईं। अमीर खुसरो (1253-1325) को हिंदी गद्य का प्रथम लेखक माना जाता है, जिन्होंने 'खालिक बारी' जैसे ग्रंथों में गद्य का प्रयोग किया। यह गद्य सरल था, लेकिन इसमें फारसी के प्रभाव से मुश्किल शब्दों का मिश्रण था। भक्ति काल (1350-1650) में कबीर, सूरदास और तुलसीदास जैसे संत कवियों ने पद्य के माध्यम से जनमानस को प्रभावित किया, लेकिन गद्य का विकास यहां धीमा रहा। फिर भी, कुछ टीकाएं और व्याख्याएं गद्य में लिखी गईं, जैसे नाभादास की 'भक्तमाल' की टीका। इस काल में गद्य मुख्य रूप से धार्मिक प्रचार के लिए उपयोग होता था, और यह पद्य की छाया में रहा। रीतिकाल (1650-1850) में भी काव्य प्रधानता बनी रही, लेकिन कुछ रीतिकालीन कवियों जैसे बिहारी और मतिराम ने गद्य में टीकाएं लिखीं, जो भाषा की शुद्धता और व्याकरणिक मजबूती को दर्शाती हैं। इस प्रकार, उद्भव काल में हिंदी गद्य अपरिपक्व था, लेकिन यह भाषा की नींव रख रहा था।आधुनिक हिंदी गद्य का प्रारंभ : भारतेंदु युग
उन्नीसवीं शताब्दी में हिंदी गद्य का वास्तविक विकास प्रारंभ हुआ, जब ब्रिटिश शासन के प्रभाव से शिक्षा और पत्रकारिता का प्रसार हुआ। इस काल को हिंदी गद्य का पुनर्जागरण काल कहा जा सकता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885) को आधुनिक हिंदी गद्य का जनक माना जाता है। उन्होंने 'कविवचनसुधा' और 'हरिश्चंद्र मैगजीन' जैसे पत्रिकाओं के माध्यम से गद्य को लोकप्रिय बनाया। उनके निबंध, नाटक और संपादकीय लेख सरल, व्यंग्यात्मक और सामाजिक जागृति से भरे हुए थे। भारतेंदु ने हिंदी को संस्कृतनिष्ठ से हटाकर खड़ी बोली को अपनाया, जो बोलचाल की भाषा थी। उनके लेखों में राष्ट्रीयता की भावना झलकती है, जैसे 'भारत दुर्दशा' नाटक में। इस युग में अन्य लेखकों जैसे बालकृष्ण भट्ट और प्रताप नारायण मिश्र ने भी गद्य को मजबूत किया। बालकृष्ण भट्ट के निबंधों में सामाजिक सुधार की बातें हैं, जबकि प्रताप नारायण मिश्र ने 'ब्राह्मण' पत्रिका के माध्यम से हिंदी को प्रचारित किया। इस काल में गद्य के रूप में निबंध, नाटक और पत्रकारिता का विकास हुआ, जो हिंदी को एक सशक्त माध्यम बनाता गया।
द्विवेदी युग : गद्य की परिपक्वता
द्विवेदी युग (1900-1920) में हिंदी गद्य और अधिक परिपक्व हुआ। महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938) ने 'सरस्वती' पत्रिका के संपादक के रूप में हिंदी गद्य को शुद्ध और व्याकरणिक रूप दिया। उन्होंने संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग बढ़ाया, लेकिन भाषा को सरल रखा। उनके निबंधों में नैतिकता, शिक्षा और साहित्यिक आलोचना का महत्व है। इस युग में रामचंद्र शुक्ल (1884-1941) जैसे आलोचकों ने गद्य को वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया। शुक्ल जी की 'हिंदी साहित्य का इतिहास' एक महत्वपूर्ण गद्य रचना है, जो हिंदी साहित्य की समीक्षा करती है। इस काल में गद्य के नए रूप उभरे, जैसे उपन्यास और कहानी। देवकीनंदन खत्री के 'चंद्रकांता' उपन्यास ने जासूसी और रोमांचक गद्य को लोकप्रिय बनाया, जबकि प्रेमचंद (1880-1936) ने यथार्थवादी गद्य का सूत्रपात किया। प्रेमचंद के उपन्यास जैसे 'गोदान' और 'कर्मभूमि' में ग्रामीण जीवन, सामाजिक असमानता और किसानों की पीड़ा का चित्रण है। उनका गद्य सरल, बोलचाल की भाषा में है, जो पाठक को सीधे प्रभावित करता है। इस प्रकार, द्विवेदी युग ने हिंदी गद्य को साहित्यिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
छायावाद और गद्य साहित्य
छायावाद युग (1920-1936) में हिंदी गद्य पर काव्य का प्रभाव पड़ा, लेकिन गद्य का विकास जारी रहा। इस काल में जयशंकर प्रसाद (1889-1937) जैसे लेखकों ने गद्य को भावुक और कलात्मक बनाया। प्रसाद जी के उपन्यास 'कंकाल' और 'तितली' में ऐतिहासिक और दार्शनिक गद्य है। निराला (1896-1961) ने 'अप्सरा' जैसे उपन्यासों में प्रयोगवादी गद्य का प्रयोग किया। इस युग में निबंध साहित्य भी समृद्ध हुआ, जैसे हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में भारतीय संस्कृति का विश्लेषण। छायावाद ने गद्य को अधिक लयबद्ध और भावपूर्ण बनाया, लेकिन यथार्थ से दूर नहीं किया।प्रगतिवाद और प्रयोगवाद युग (1936-1950) में हिंदी गद्य सामाजिक यथार्थवाद की ओर मुड़ा। प्रगतिवादी लेखकों जैसे यशपाल और नागार्जुन ने मार्क्सवादी विचारधारा को गद्य में स्थान दिया। यशपाल के 'दिव्या' उपन्यास में क्रांतिकारी संघर्ष का चित्रण है। प्रयोगवाद में अज्ञेय (1911-1987) ने 'शेखर: एक जीवनी' जैसे आत्मकथात्मक गद्य लिखा, जो मनोविश्लेषण पर आधारित है। इस काल में कहानी साहित्य का विकास हुआ, जहां प्रेमचंद की परंपरा को जैनेन्द्र कुमार और यशपाल ने आगे बढ़ाया।
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी गद्य का विकास
स्वतंत्रता के बाद हिंदी गद्य का विकास और तेज हुआ। नई कहानी आंदोलन (1950-1960) में मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव ने आधुनिक शहरी जीवन को गद्य में उतारा। मोहन राकेश के 'आषाढ़ का एक दिन' नाटक में अस्तित्ववादी दर्शन है। समांतर कहानी और जनवादी साहित्य ने गद्य को और विविधता दी। समकालीन हिंदी गद्य में उपन्यासकार जैसे उदय प्रकाश और अलका सरावगी ने वैश्वीकरण और स्त्री विमर्श को स्थान दिया। डायरी, यात्रा वृत्तांत और संस्मरण जैसे नए रूप उभरे, जैसे राहुल सांकृत्यायन के यात्रा वर्णन।
वर्तमान युग में हिंदी गद्य : चुनौतियाँ और संभावनाएँ
आज हिंदी गद्य डिजिटल युग में प्रवेश कर चुका है, जहां ब्लॉग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन पत्रिकाएं गद्य को नई दिशा दे रही हैं। लेकिन चुनौतियां भी हैं, जैसे अंग्रेजी का प्रभाव और भाषा की शुद्धता। फिर भी, हिंदी गद्य का विकास निरंतर है, जो समाज की नब्ज को पकड़ता है।समाप्ति में, हिंदी गद्य का उद्भव मध्यकाल से हुआ और विकास उन्नीसवीं शताब्दी से आधुनिक काल तक फैला। यह विकास भाषा की शक्ति को दर्शाता है, जो जनता की आवाज बनकर उभरी। हिंदी गद्य न केवल साहित्यिक है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी। भविष्य में यह और समृद्ध होगा, यदि हम इसकी जड़ों को मजबूत रखें।


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