भाग्य रेखा कहानी का सारांश, उद्देश्य, समीक्षा और प्रश्न उत्तर | भीष्म साहनी

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भाग्य रेखा कहानी का सारांश उद्देश्य समीक्षा और प्रश्न उत्तर भीष्म साहनी 1953 में प्रकाशित हुई थी यह प्रगतिशील यथार्थवाद की मिसाल है जहां लेखक अंधविश्व

भाग्य रेखा कहानी का सारांश, उद्देश्य, समीक्षा और प्रश्न उत्तर | भीष्म साहनी


भीष्म साहनी की कहानी भाग्य रेखा हिंदी साहित्य में एक क्लासिक छोटी कृति है जो उनके पहले कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी है और 1953 में प्रकाशित हुई थी यह प्रगतिशील यथार्थवाद की मिसाल है जहां लेखक अंधविश्वास और भाग्यवाद पर तीखा प्रहार करते हैं।

भाग्य रेखा कहानी का सारांश

कनाट सर्कस के बाग में जहाँ दिल्ली की सब सड़कें आकर मिलती हैं, शाम के समय रसिक और बेरोजगार आ बैठते हैं। वहीं एक चालीस पैंतालीस वर्ष का कुरूप सा आदमी खाँस रहा था और थूक रहा था। उसकी इस हरकत से लेखक को जब घृणा हुई तो उसने कहा- “सुना है विलायत में सरकार ने जगह-जगह पीकदान लगा रखें हैं।" उस
भाग्य रेखा कहानी का सारांश, उद्देश्य, समीक्षा और प्रश्न उत्तर | भीष्म साहनी
आदमी ने भरपूर निगाह से लेखक को घूरकर कहा, वहाँ के लोगों को खांसी भी न आती होगी। बड़ी नामुराद बीमारी है, आदमी घुलता रहता है, मरता नहीं। बातचीत का सिलसिला चल पड़ा। पता लगा वह आदमी कारखाने में मजदूरी करता था, मशीन से उसकी उँगलियाँ कट गई, अब जहाँ भी काम लेने जाता है, मालिक पूरी दस उँगलियाँ माँगता है। पहले वह कालका वर्कशाप में काम करता था। लेखक को नींद आने लगी, वह सो गया। नींद टूटने पर उसने देखा कि वही आदमी ज्योतिषी से अपना भविष्य जान रहा है। ज्योतिषी लाग-लपेट कर बता रहा था, तेरा भाग्य बहुत अच्छा है। उस आदमी ने ज्योतिषी के गाल पर थप्पड़ मार कर कहा, तीन साल से भाई के टुकड़ों पर पल रहा हूँ, तू कहता है, भाग्य अच्छा है। ज्योतिषी ने बात बदल कर कहा, तेरी नहीं तो तेरी घरवाली की रेखा अच्छी होगी। उसका भाग्य तुझे मिलेगा। यजमान ने कहा, वही तो चार बच्चे छोड़कर अपनी राह चली गयी। उस आदमी ने ज्योतिषी का हाथ देखकर कहा तेरा भाग्य तो बहुत अच्छा है, कितने बंगले हैं तेरे । वह कहने लगा “हमसे क्या मिलेगा ? जा किसी मोटर वाले का हाथ देख।"

अचानक बाग की आबादी बढ़ने लगी। लोगों की टोलियाँ एक-एक करके आने लगीं। पुलिस की लॉरी भी आ गयी। उसमें से पंद्रह-बीस लट्ठधारी पुलिसवाले उतरे और सड़क के पार कतार में खड़े हो गये। बाग की हवा में तनाव आने लगा। पेड़ों के तले भी कुछ मजदूर खड़े हो गये। ज्योतिषी ने इस भीड़ का कारण जानना चाहा। यजमान ने कहा, आज मई दिवस है, मजदूरों का दिन है। आज के दिन मजदूरों पर गोली चली थी। तभी जलूस आने लगा, नारे लगने लगे। सड़क के दोनों ओर भीड़ जमा होने लगी। शहर वाली सड़क पर से जलूस बाग की ओर बढ़ता नज़र आया। फुटपाथ वाले भी उसमें जा-जाकर मिलने लगे। जलूस का आकार बढ़ता ही गया। ज्योतिषी अपनी उत्सुकता में बेंच के ऊपर जाकर खड़ा हो गया । नारों की आवाज़ गूंजने लगी।

यह जलूस अजमेरी गेट, दिल्ली दरवाजा होता हुआ लालकिला जाना था। यजमान ने पूछा अगर कहीं गड़बड़ हुई तो, जलूस की ओर भागते हुए आदमी ने कहा गड़बड़ तो होती ही रहती है, तो जलूस रुकेगा थोड़े ही, दमे का रोगी जलूस के ओझल हो जाने तक, टिकटिकी बांधे उसे देखता रहा। फिर ज्योतिषी के कंधे को थपथपाता हुआ, उसकी आँखों में आँखें डालकर मुस्कराने लगा और कहने लगा : “फिर देख हथेली, तू कहता है कि भाग्य रेखा कमजोर है।”
 

भाग्य रेखा कहानी की समीक्षा भीष्म साहनी

'भीष्म साहनी' हिन्दी कथा-साहित्य के मूर्धन्य कहानीकार है। अपने उपन्यास 'तमस' से उन्हें बहुत ख्याति प्राप्त है। उनकी कहानियों में वर्तमान जीवन की विसंगतियों पर तीखा प्रहार मिलता है। 'भाग्य रेखा' कहानी इसी संदेश की ओर इंगित करती है कि भाग्य रेखा हथेली की अपेक्षा मनुष्य के कर्म में निहित रहती है। मजदूरों की क्रान्ति ही उन्हें शोषण से बचा सकती है। संगठन, समन्वय और आशान्वित दृष्टिकोण ही भाग्य रेखा का निर्माण काल है। व्यंगयात्मक लहजे में कहानीकार ने इस अभिव्यक्ति को मार्मिकता दी है।
 
कहानी एक दिन की घटना पर आधारित है। इस दिन कनाट सर्कस के बाग में तीन आदमी खड़ी धूप में बीड़ियाँ सुलगाए बातें कर रहे थे। उनमें से एक आदमी की उंगलियां कटी हुई थीं। वह अपनी राम-कहानी कहता रहा। कहानी की वस्तु रोचकता के साथ आरंभ होती है। इसका कथानक पूर्वापर प्रसंग के संबद्ध है तथा संवाद इस कथानक को प्रभविष्णु बनाते हैं। कहानी नाटकीय घटनाक्रम से युक्त है। रामकहानी सुनते-सुनते लेखक सो गया और जब उठा तो देखता है कि वही कटी उंगलियों वाला आदमी ज्योतिषी को अपना हाथ दिखा रहा है। कहानी में एक घटनावैचित्र्य उत्पन्न होता है, जब उस बाग के इर्द-गिर्द लोगों की भीड़ जमा होने लगती है, पुलिस की लारियाँ आने लगती हैं और भीड़ जुलूस का रूप ले लेता है। जुलूस नारे लगाता है। कहानीकार ने कहानी में तनाव तत्व की नींद रखकर कहानी की संवेदनीयता को बढ़ा दिया। यह संघर्ष का प्रकट रूप है, जो अन्याय का प्रतिकार करने के लिए संगठित होता है।

कहानी का मुख्य पात्र की खोज करें तो एक कठिनाई उत्पन्न होती है कि कहानी का केन्द्रीय चरित्र किसे कहा जाए। पर जटिलता आधुनिक जीवन की जटिलता की तरह ही है। कहानी का मुख्य पात्र कथानायक है, जो समूचे घटनाक्रम को देख रहा है, या फिर यजमान जो कर्मवादिता का कट्टर समर्थक है। वह भाग्य रेखा को पुरुषार्थी के लिए सहज मानता है। इसके समानान्तर कहानी में एक अन्य पात्र है यह पात्र है 'जुलूस' । यदि पात्र योजना को वैयक्तिकता तक सीमित न रखें और तनाव, द्वंद्व और संघर्ष की रुपरेखा को माने तो भीष्म साहनी की कहानी भाग्य रेखा का प्रधान या केन्द्रीय चरित्र यह 'जुलूस' ही ठहरता है। भारतीय साहित्यिक मानदंडों मे फल का भोक्ता मादक होता है, कथा को विकास की ओर ले जाने वाला नायक होता है। कहानी की चरम स्थिति और परिगति को बनाने वाला नायक होता है। इन तीनों स्थितियों में 'जुलूस' ही हमारे समझ प्रधानपात्र के रूप में आता है। पाश्चात्य स्थितियों के अनुकूल भी जुलूस ही कहानी का केन्द्रीय पात्र है। 'जुलूस' के कारण ही हवा में तनाव और वातावरण में भय तथा द्वंद्व की सृष्टि होती है। जुलूस ही संघर्ष तत्व को मनुष्य की चेतना का अंग बचता है और जुलूस ही शक्ति, संगठन, एकता और कर्मवादिता को मनुष्य के लिए उपयोगी और आवश्यक बनाता है। 

कहानी का देशकाल और वातावरण शहरी जीवन का तनाव और द्वंद्व है। पूंजीपति और सर्वहारा की लड़ाई है। अधिकार के रक्षण और हनन का संघर्ष है। शहरी जीवन की तमाम विक्रयताएँ ही इस कहानी के परिवेश का निर्माण करती है।

कहानी का संदेश यदि दिनकर जी के शब्दों में कहें तो होगा-
 
अधिकार खोकर बैठे रहना 
यह महा दुष्कर्म है 
न्यायार्थ अपने बंधु को 
दंड देना धर्म है।

XX X 
छीनता हो स्वत्व कोई और तू 
त्याग तप से काम ले यह पाप है 
पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे 
बढ़ा रहा तेरी तरफ़ जो हाथ है।

भाग्य रेखा कहानी का उद्देश्य 

भाग्य रेखा कहानी मनुष्य के दो-हाथों की शक्ति को दर्शाती है। यह कर्तव्य की प्रेरणा देने वाली कहानी है। कहानी अपने विकास में निम्नांकित उद्देश्यों को लेकर चलती है - 

1. संगठन का महत्व 
2. कर्म में विश्वास 
3. भाग्य गौणतत्व है 
4. पूंजी का विकेन्द्रीकरण।
 
मार्क्सवादी कहानीकार मजदूरों की एकता और संगठन को ही उनकी ताकत के रूप में देखता है। मई दिवस पर मजदूर अपनी एकता दिखाने के लिए जुलूस निकालते हैं। इस जलूस का अभिप्राय सांकेतिक नहीं है, अपितु यह भीमाकार जलूस भाग्य की जकड़न को तोड़ने वाला है। मजदूरों की विजय इसी संगठन के कारण संभव है। जुलूस की भागता हुआ दुबली काया का व्यक्ति यही बात कहता है अगर गड़बड़ हुई, तो भी जलूस रुकेगा थोड़े ही।
 
कहानी के आरंभ में चालीस पैंतालीस वर्ष का आदमी जो कालका वर्कशाप में काम करता था, कहता है—जहाँ भी जाओ मालिक दस उंगलिया मांगता है। कारखाने में काम करते हुए मशीन से उसकी उंगलियाँ कट गयी थीं। इसी तरह कहानी के अंत में वही आदमी ज्योतिषी से कहता है- 'तू कहता है भाग्य रेखा कमजोर है ?' कहानी की ये दोनों घटनाएँ कर्म में विश्वास और निराशा में अविश्वास दिखाती है।

मनुष्य के जीवन में कर्मबोध में ही सौन्दर्य है। भाग्य का तत्व गौण है। ज्योतिषी जब कटी उंगलियों वाले आदमी का हाथ देखकर कहता है कि तेरी भाग्यरेखा अच्छी है, तुझे बहुत सा धन मिलेगा, तो वह ज्योतिषी के गाल पर थप्पड़ मार कर पूछता है, कब मिलेगा धन, तीन साल से तो भाई के टुकड़ों पर पल रहा हूँ। बाद में वह ज्योतिषी को सुझाव देता है कि गाड़ी वालों के हाथ देखा कर, कुछ लाभ ही होगा। कहानीकार भाग्य को नहीं, कर्म को मनुष्य का साथी मानता है और कटी उंगलियों वाले आदमी की जीवरता इस विश्वास को और दृढ़ करती है।
 
समाज के खोखले होने का प्रधान कारण पूंजी का केन्द्रीकरण है। इसी कारण मजदूरों के जलूस पर गोली चलाई गयी थी और मजदूरों के जलूस के लिए पुलिस की लॉरी आती है। समाज के मेहनतकश वर्ग के लिए यह व्यंग्यात्मक रूपरेखा लेखक ने खींची है।
 
इस प्रकार भाग्य-रेखा कहानी अपनी अर्थ छवि में अभिधार्थक है और उद्देश्य के मर्म को धनीभूत करने में व्यंगयात्मक ।
  1. संगठन का महत्व : कलियुग में संगठन में ही शक्ति है। 'संघे शक्तिकलियुगे' मजदूरों के पास, शोषितों के पास इस संगठन के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग भी नहीं बचता। जयशंकर प्रसाद ने कहा था- शक्ति के विद्युतकण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं हो विरूपाय समन्वय उनका और समस्त विजयिनी मानवता हो जाए।
  2. शक्ति के केन्द्रीकरण का कारण - शोषक और शोषितों, पूंजीपति और सर्वहारा वर्ग के बीच अंतर आ गया है। भीष्म साहनी इसी अंतर को पाटने की रुपरेखा मजदूरों के संगठन में देखते हैं। इस संगठन पर पूंजीपति के रवैये पर व्यंग्य करता हुआ लेखक कहता है—'जुलूस आ रहा था। नारे गूंज रहे थे।' हवा में तनाव बढ़ रहा था। फुटपाथ पर खड़े लोग भी नारे लगाने लगे। पुलिस की एक और लारी आ लगी, और लाठीधारी सिपाही कूद-कूद कर उतरे । “आज लाठी चलेगी” यजमान ने कहा।
  3. कर्म में विश्वास : कहानी का सूत्रधार यजमान एक से अधिक स्थलों पर कर्मवादिता में विश्वास को दिखाता है। कहानीकार का सूत्रधार मशीन में अपनी उंगलियों के कट जाने पर खेद प्रकट करता है। कर्म के उत्साहित है, वह अपने भाई के दिए हुए टुकड़े नहीं खाना चाहता। वह ज्योतिषी के गाल पर थप्पड़ भी मारता है। मानो यह थप्पड़ भाग्यवादी मनुष्यों के गाल पर हो। अंत में अपनी हथेली ज्योतिषी के सामने रखकर प्रश्न करता है—तू कहता है भाग्य रेखा कमजोर है । यजमान बहुत स्पष्ट किन्तु मौन शब्दों में कहता है—पुरुषार्थी के भाग्य रेखा कभी कमज़ोर नहीं होती।
  4. भाग्य गौण तत्व है : यजमान कर्म के प्रति अपने दृढ़ विश्वास को तो रखता है, किन्तु वह भाग्य को गौण रूप में हमारे समक्ष नहीं रखता है। भाग्य, पुरुषार्थ के पीछे चलने वाली इकाई के रुप में हमारे सामने है। भारतीय परंपरा में ज्योतिष विज्ञान के इस नए रुप को दिखाने के लिए मानो ज्योतिषी को विडम्बनात्मक और व्यंग्यात्मक रुप में दिखाया है।
  5. पूंजी का विकेन्द्रीकरण : मार्क्सवाद मजदूरों की क्रान्ति में विश्वास रखता है और मानता कि जब सत्ता मजदूरों के हाथ में होगी तो शक्ति का विकेन्द्रीकरण होगा और समाज का विकास तीव्र गति से होगा। मजदूरों की शक्ति, संगठन, एकता अधिकारों के सतत्व की मांग को लेकर भी है।

भाग्य रेखा कहानी की भाषा शैली

भीष्म साहनी का आधुनिक हिन्दी कहानीकारों में अग्रणय स्थान है। इनकी भाषा सहज स्वाभाविक एवं प्राञ्जल है। साहनी जी की भाषा का विश्लेषण निम्नलिखित विशेषताओं में किया जा सकता है— 

(क) शब्द भंडार : साहनी जी का शब्द भंडार विपुल है। आपकी भाषा में प्रयुक्त शब्द बोलचाल की हिन्दी के स्वाभाविक शब्द हैं। तत्सम शब्दावली का प्रयोग भी यद्दपि हुआ है, फिर भी भाषा क्लिष्ट नहीं है। वह पूर्णतः स्वाभाविक रहती है। जैसे— “जब मेरी नींद टूटी तो मेरे नज़दीक धीमा-धीमा वार्तालाप चल रहा था।" इस छोटी सी पंक्ति में तत्सम्, तद्भव और अरबी-फ़ारसी के शब्द मिलते हैं। साहनी जी ने अंग्रेजी शब्दों का सहज प्रयोग किया है जैसे कनाट सर्कस, वर्कशाप आदि ।
 
(ख) वाक्य संयोजन : साहनी जी ने सरल, संयुक्त एवं किन्तु सभी प्रकार के वाक्यों का प्रयोग किया है। फिर भी, इसके वाक्य छोटे और अर्थगर्भित हैं जैसे- 'इधर अंगूठे के नीचे भी तिकोन बनाती है । तेरा माथा बहुत साफ़ है। धन जरूर मिलेगा आदि ।' लम्बे वाक्य भी जटिल नहीं होने पाए हैं। वे अपने अर्थ को सहृदय तक सहजता से संप्रेषित कर देते हैं जैसे— “ कनाट सर्कस के बाग में जहाँ नई दिल्ली की सब सड़कें मिलती हैं जहाँ शाम को रसिक और दोपहर को बेरोजगार आ बैठते हैं, तीन आदमी खड़ी धूप से बचने के लिए, छांह में बैठे, बीड़ियाँ सुलगाए बाते कर रहे हैं।' 

(ग) संवाद योजना : लेखन की भाषा में संवाद - योजना का विविध रूपेण प्रयोग हुआ है। संवाद कहानी में तनाव के तत्व को भी बढ़ाते हैं और जानकारी भी देते हैं और सामाजिकों के आपसी व्यवहार को दिखलाते हैं। जैसे— 
बैठ जा इधर ! कब से यह धंधा करने लगा है ?" 
ज्योतिषी चुप । दमे के रोगी ने पूछा : 
कहां से आया है ?" 
“पूर्वी बंगाल से।” 
" शरणार्थी है ?" 
“हाँ” 
“पहले भी यही धंधा था ?" 
ज्योतिषी चुप । यजमान धीरे से बोला । 
"हम से क्या मिलेगा ? जा किसी मोटर वाले का हाथ देख । " “वह कहाँ दिखाते हैं। जो दो पैसे मिलते हैं, तुम्ही जैसों से।"
 
(घ) चित्रात्मकता : चित्रात्मकता भाषा का गुण, इससे भाषा में दृश्य उत्पन्न होते हैं, जो सहृदय और लेखक कें तालमेल को बनाते हैं।, सहृदयी पाठक कहानी से बेहतर रूप से तदात्म्य स्थापित कर पाता है—“देखते ही देखते उसने ज्योतिषी के गाल पर थप्पड़ दे मारा।"
 
(ङ) वर्णनात्मकता : कहानी कुछेक स्थलों पर वर्णन करती चलती है। इससे कहानी तीव्रता से अपनी चरम स्थिति तक पहुँचती है। कहानी की रोचकता और द्वंद को बढ़ाने में यह बहुत सहायक है—“ज्योतिषी कोई बीस-बाईस वर्ष का युवक था। काला चेहरा, सफेद कुर्ता, और पाजामा जो जगह-जगह से सिला था। बातचीत के ढंग से बंगाली जान पड़ता था।"

(च) दो टूक शैली : कहानीकार दो टूक शैली में भावों को अभिव्यक्त करके भाषा की तीक्ष्णता को बढ़ाता है। ज्योतिषी और यजमान की बातचीत में यजमान कहता है “यह मेरी भाग्य रेखा है ? “तेरा भाग्य तो बहुत अच्छा है। कितने बंगले हैं तेरे ?" व्यंग्य करने में दो टूक शैली का बहुत तीखा और गहन प्रभाव पड़ता है ।
 
(छ) पूर्वदीप्ति शैली : पूर्व घटित बातों को अभिव्यक्त करने के लिए लेखक इसका प्रयोग करता । इससे कहानी का पूर्वोत्तर संबंध बना रहा है और मनोरंजकता के गुण की सृष्टि होती है—“आज के दिन मजदूरों पर गोली चली थी।
 
(ज) प्रश्न शैली : प्रश्न की धार व्यंग्य की सृष्टि करने में भी सक्षम है और सामान्य प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने में भी। कहानीकार ने अंतःसंबंध बनाने के लिए प्रश्न शैली का प्रयोग किया है— 
“कहाँ से अया है ?" 
“पूर्वी बंगाल से। 
“ शरणार्थी है ?" 
“हाँ।”
 
(झ) रेखाचित्रशैली : रेखाचित्र में शब्द के चित्र प्रस्तुत कर पात्र, घटना से तादात्मय बनाया जाता है। कहानीकार ने रेखाचित्र की शैली का प्रयोग भी किया है—“चालीस - पैंतालीस वर्ष का कुरूप सा आदमी, सफ़ेद छोटे-छोटे बाल, काला, छाईयों भरा चेहरा, लंबे-लंबे दांत और कंधे आगे को झुके हुए।”
 
(ण) मुहावरे : मुहावरे भाषा के प्राणतत्व हैं। मुहावरों के प्रयोग से भाषा में अद्वितीयता आ जाती है। कहानीकार ने मुहावरों को लोक प्रचलित प्रयोग किया है जैसे राम कहानी, नींद टूटना, लाग-लपेट करना आदि।
 
संक्षेप में भीष्म साहनी की भाषा अभिधा शब्द शक्ति में अपने अर्थ को अभिव्यक्त करने में सक्षम है। उसमें भाषा के विविध गुण मिलते हैं। जिनका विवेचन ऊपर किया गया है।


भाग्य रेखा कहानी का प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1 : भाग्य-रेखा कहानी भाग्य से अधिक कर्म पर विश्वास करता हूँ। स्पष्ट कीजिए कैसे ? 

उत्तरः मार्क्सवादी कहानीकार मजदूरों की एकता को ही उसकी ताकत के रुप में देखता है। कहानी आरंभ से अंत तक मजदूरों की एकता को दर्शाती है। कालका वर्कशाप में काम करने वाले आदमी की पाँचों उंगलियाँ कट चुकी है। इस तरह कहानी के अंत में वही आदमी ज्योतिषी से कहता है-'तू कहता है भाग्य रेखा कमजोर है ?' कहानी की ये दोनों घटनाएँ कर्म में विश्वास और निराशा में अविश्वास दिखाती है।
 
ज्योतिषी भाग्य देखता है, तो कटी उंगलियों वाला आदमी थप्पड़ मार कर कहता है— 'पांच वर्षों से तो भाई के टुकड़ों पर पड़ा हुआ हूँ।' मनुष्य के जीवन में कर्म ही सौंदर्य है। भाग्य का तत्व गौण है। मई दिवस पर मजदूर अपनी एकता दिखाने के लिए जुलूस निकालते हैं। इस जुलूस का अभिप्राय सांकेतिक नहीं है, अपितु यह भीमाकार जुलूस भाग्य की जकड़न को तोड़ने वाला है। 

सभी मजदूर अपनी एकता और संगठन को दिखाने के लिए बगीचे में एकत्र होते हैं। भीमाकार जुलूस आगेबढ़ता है। आशंका है कि पुलिस की कार्यवाई भी होगी। पर लोग-बाग डरते नहीं हैं। जुलूस नारे लगाता हुआ आगे बढ़ता है। जुलूस नारे लगाता है। कहानीकार ने कहानी में तनाव की नींव रखकर कहानी की संवेदनीयता को बढ़ा दिया। यह संघर्ष का प्रकट रूप है, जो अन्याय का प्रतिकार करने के लिए संगठित होता है। 'मजदूर दिवस' मजदूरों की सांकेतिक एकता का प्रतीक है। इस दिन मजदूरों पर गोली चली थी। जुलूस अजमेरी गेट, दिल्ली दरवाजा होता हुआ लाल किला जाना है। जुलूस आगे बढ़ता है। कहानी में तनाव की सृष्टि होने लगती है। जुलूस ही संघर्ष तथ्व को मनुष्य की चेतना का अंग बनाता है और जुलूस ही शक्ति, संगठन, एकता और कर्मवादिता को मनुष्य के लिए उपयोगी और आवश्यक बनाता है। लड़ाई पूंजीपति और सर्वहारा वर्ग के बीच में है। संघर्ष अधिकार के होने और खोने का है। शहरी जीवन की विशेषताएँ ही संघर्ष का निर्माण करती हैं और मनुष्य को दो हाथों की बंद मुट्ठी पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करती है।

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