आन का मान नाटक का सारांश शीर्षक की सार्थकता उद्देश्य समीक्षा प्रश्न उत्तर

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आन का मान नाटक का सारांश शीर्षक की सार्थकता उद्देश्य समीक्षा प्रश्न उत्तर औरंगजेब के पात्र को भी केवल खलनायक के रूप में न दिखाकर उसके भीतर के द्वंद्व

आन का मान नाटक का सारांश शीर्षक की सार्थकता उद्देश्य समीक्षा प्रश्न उत्तर


रिकृष्ण 'प्रेमी' द्वारा रचित 'आन का मान' ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित एक अत्यंत प्रभावशाली और आदर्शवादी नाटक है, जो राजपूती आन-बान, देशभक्ति और सांप्रदायिक सद्भाव की त्रिवेणी प्रस्तुत करता है। इस नाटक की मुख्य कथावस्तु मारवाड़ के वीर दुर्गादास राठौड़ के त्याग और उनके अडिग संकल्प के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें लेखक ने औरंगजेब की कट्टरता के विरुद्ध वीरता और मानवीय मूल्यों की विजय को दर्शाया है। नाटक की समीक्षा करते समय यह स्पष्ट होता है कि प्रेमी जी ने केवल इतिहास का चित्रण नहीं किया है, बल्कि उसे समकालीन समस्याओं, विशेषकर हिंदू-मुस्लिम एकता के संदर्भ में पुनर्परिभाषित करने का सफल प्रयास किया है।'आन का मान' केवल एक युद्धकथा नहीं है, बल्कि यह 'शक्ति पर भक्ति' और 'तलवार पर नैतिकता' की जीत का संदेश देती है। इसमें राजपूती गौरव के साथ-साथ सहिष्णुता के जिस भाव को पिरोया गया है, वह इसे केवल एक क्षेत्रीय नाटक न बनाकर राष्ट्रीय महत्व की कृति बना देता है। प्रेमी जी ने औरंगजेब के पात्र को भी केवल खलनायक के रूप में न दिखाकर उसके भीतर के द्वंद्व और अंत में उसके पश्चाताप की झलक दिखाकर नाटक को एक मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान की है।

आन का मान नाटक का सारांश

नाटक का प्रारम्भ मुगल शहजादी सफीयतुन्निसा और बुलन्द अख्तर के पारस्परिक बातचीत से होता है। दोनों अपने पिता अकबर के ईरान चले जाने के बाद वीर दुर्गादास राठौर के यहाँ पल रहे हैं। दोनों की बातचीत का विषय औरंगजेब की संकीर्ण विस्तारवादी नीति की आलोचना है। फिर दुर्गादास का प्रवेश होता है। वह औरंगजेब के हिंसक कारनामों को उनके सामने खोलता है, जिससे दोनों क्षुब्ध हो जाते हैं। दुर्गादास और शहजादा अख्तर थोड़ी देर में तुरही की आवाज सुनकर शत्रु का सामना करने के लिए चले जाते हैं। अकेली शहजादी सफीयतुन्निसा चाँदनी रात के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गीत गाने लगती है। गीत के स्वर को सुनकर अजीत सिंह पहुँच जाते हैं और दोनों में प्रेमालाप होने लगता है। इसी बीच वीरवर दुर्गादास वापस आ जाते हैं। वे दोनों के प्रेमालाप को उचित नहीं मानते और उन्हें समझाते हैं। फिर मुकुन्ददास खीची कोई गोपनीय सन्देश दुर्गादास के पास लाते हैं, जिससे अजीत सिंह को अविश्वास हो जाता है; किन्तु कासिम खाँ उसका निराकरण कर देते हैं। अन्त में औरंगजेब की ओर से शहजादी और शहजादे को वापस कराने के लिए ईश्वरदास सन्धि का प्रस्ताव लेकर आते हैं और शुजाअत खाँ को लेकर दुर्गादास से आमने-सामने बातचीत करा देते हैं। अजीत सिंह अपने उतावलेपन में आकर शुजाअत खाँ पर तलवार उठा लेते हैं, किन्तु दुर्गादास इसे अनुचित मानकर रोक देता है। नाटक के प्रथम अंक में बस इसी कथा का उल्लेख है।

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औरंगजेब की भी दो पुत्रियाँ हैं— मेहरु तथा जीनत । मेहरुं औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर किये जा रहे अत्याचारों का विरोध करती है। जीनत पिता की समर्थक है। औरंगजेब अपनी पुत्रियों की बात सुनता है तथा मेहरु द्वारा बताये अत्याचारों के लिए पश्चाताप करता है। औरंगजेब अपनी पुत्रियों को जनता के साथ उदार व्यवहार करने के लिए कहता है। औरंगजेब अपने अन्तिम समय में अपनी वसीयत करता है कि उसका संस्कार सादगी से किया जाए। इस समय ईश्वरदास दुर्गादास को बन्दी बनाकर औरंगजेब के पास लाता है। औरंगजेब अपने पौत्र-पौत्री बुलन्द तथा सफीयत को पाने के लिए दुर्गादास से सौदेबाजी करता है, परन्तु दुर्गादास इसके लिए तैयार नहीं होते।

तृतीय अंक सफीयतुन्निसा (शहजादी) के 'अगर पंख मैं भी पा जाती नभ के पार त्वरित उड़ जाती। गीत से प्रारम्भ होता है। फिर सफीयतुन्निसा और अजीत सिंह की बातचीत होती है, जिसमें एक ओर अजीत सिंह की भावुकता और दूसरी ओर सफीयतुन्निसा की सच्ची प्रेम-भावना का दिग्दर्शन कराया गया है। सफीयतुन्निसा अजीत सिंह से सच्चा प्रेम-भाव रखते हुए मारवाड़ और अजीत सिंह के हित में उससे विवाह करना नहीं चाहती। दूसरी ओर अजीत सिंह क्षणिक आवेश और भावुकता में सफीयतुन्निसा को जबर्दस्ती अपने प्रेम-पाश में बाँधे रखना चाहते हैं। भाई शहजादा बुलन्द अख्तर भी जाता है। वह भी अजीत सिंह को समझाने का असफल प्रयास करता है। बुलन्द अख्तर के चले जाने के बाद अजीत सिंह पुनः सफीयतुन्निसा से प्रेमालाप करने लगते हैं। इसी बीच दुर्गादास दो हृदयों के मधुर मिलन को नष्ट करने लगते हैं और अजीत सिंह को कर्त्तव्य का ध्यान दिलाते हुए सफीयतुन्निसा को औरंगजेब के हाथों में सौंपने का कारण बतलाते हैं- "राजपूत, शत्रु-परिवार की नारियों की उतनी ही प्रतिष्ठा करते हैं जितनी माँ-बहनों के सम्मान की। मुझे आज मारवाड़ में शहजादी की प्रतिष्ठा सुरक्षित दिखायी नहीं पड़ती।" अजीत सिंह दुर्गादास का विरोध करता है और अपने अधिकार से सफीयतुन्निसा को रोकने की घोषणा करता है; किन्तु दुर्गादास निर्भीकतापूर्वक इसका विरोध करता है। इस बीच मुकुन्ददास खीची मेवाड़ के राजपूत के आगमन की सूचना देते हैं, जो मेवाड़ की राजकुमारी के साथ मारवाड़ के महाराजा अजीत सिंह का विवाह सम्पन्न कराने हेतु सगाई का टीका लेकर आये हैं। अजीत सिंह इनका विरोध करते हैं, किन्तु सफीयतुन्निसा इस सम्बन्ध को मारवाड़ के हित में उचित मानकर इस सम्बन्ध को स्वीकारने हेतु अजीत सिंह को सहमति देती है।
 
इसी बीच बुलन्द अख्तर और कासिम खाँ एक पालकी के साथ आते हैं। शहजादी सफीयतुन्निसा सम्मान सहित पालकी पर बिठाकर औरंगजेब के पास भेज दी जाती है। दुर्गादास उसकी पालकी को अपने कन्धे का सहारा देकर शहजादी को सम्मान देते हैं। अजीत सिंह रोकना चाहते हैं, किन्तु कासिम खाँ और मुकुन्द दास उन्हें रोक देते हैं। अजीत सिंह क्रुद्ध होकर दुर्गादास को राज्य से निर्वासित कर देते हैं। पालकी बढ़ जाती है और इसी दृश्य के साथ तीसरा और अन्तिम अंक का पर्दा गिर जाता है।
 

आन का मान नाटक की ऐतिहासिकता

आन का मान' एक ऐतिहासिक नाटक है। प्रस्तुत नाटक में इतिहास और कल्पना का मणिकांचन संयोग हुआ है। नाटक के पात्र और उसकी घटनाएँ भारत के मध्यकालीन इतिहास से सम्बद्ध हैं। नाटक में प्रस्तुत पात्र औरंगजेब, उसका पुत्र अकबर, पुत्रियाँ जीनतुन्निसा व मेहरुन्निसा, पौत्र बुलन्द अख्तर, पौत्री सफीयतुन्निसा, शुजाअत खाँ तथा राजपूतों में दुर्गादास, अजीत सिंह, मुकुन्द दास आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। जोधपुर के महाराजा जसवन्त सिंह की अफगानिस्तान से लौटते समय मृत्यु होना, मार्ग में उनकी दोनों रानियों द्वारा पुत्रों को जन्म देना, औरंगजेब के द्वारा महाराजा के परिवार पर इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डालना, दुर्गादास राठौर के नेतृत्व में राजकुमार अजीत सिंह का निकल भागना, प्रतिशोध में औरंगजेब का जोधपुर पर आक्रमण करना, अकबर द्वितीय का ईरान भाग जाना और उसके पुत्र-पुत्रियों की देख-रेख दुर्गादास द्वारा किया जाना प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ हैं। साथ ही औरंगजेब की धर्मान्धता, राज्य विस्तार नीति, साम्प्रदायिक वैमनस्य, व्यापार व कला का ह्रास आदि ऐतिहासिक तत्त्वों को भी प्रस्तुत नाटक में सफलतापूर्वक दर्शाया गया है।
 
उपर्युक्त ऐतिहासिक तथ्यों के अतिरिक्त प्रस्तुत नाटक में अनेक काल्पनिक घटनाओं का भी समावेश किया गया है। शिलाखण्ड पर बैठी सफीयत और अजीत का प्रणय प्रसंग, दुर्गादास का पालकी में कन्धा देना तथा प्रमुख पात्रों के चरित्रांकन में भी कल्पना की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, जिससे नाटक रोचक और सफल बन पड़ा है। इसमें एक सफल नाटक के सभी गुण - कथानक, पात्र, कथोपकथन, देश-काल और वातावरण, उद्देश्य एवं अभिनेयता विद्यमान है। इस प्रकार 'आन का मान' एक सफल ऐतिहासिक नाटक है। 

आन का मान नाटक का नाटकीय तत्वों के आधार पर समीक्षा

नाटकीय तत्त्वों के आधार पर 'आन का मान' की समीक्षा निम्न प्रकार की जा सकती है- 
  • कथानक - इस नाटक का कथानक ऐतिहासिक है। एक छोटी ऐतिहासिक कथा में यथार्थ और कल्पना का सुन्दर समन्वय किया गया है। कथा में एकसूत्रता, सजीवता, घटना-प्रवाह आदि का निर्वाह भली-भाँति हुआ है। शीर्षक आकर्षक है। कथानक की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक एक सफल रचना है। नाटक के कथानक में औरंगजेब के समय का वर्णन है। औरंगजेब के अत्याचारों को प्रस्तुत किया गया है। उसके पुत्र अकबर द्वितीय की दुर्गादास सहायता करते हैं तथा उसे बादशाह घोषित कर देते हैं। अकबर ईरान भाग जाता है, उसके पुत्र और पुत्री दुर्गादास के पास रह जाते हैं। अकबर की पुत्री 'सफीयत' से 'अजीत सिंह' प्रेम करता है, परन्तु दुर्गादास इसका विरोध करते हैं और 'सफीयत' के साथ मारवाड़ को ही छोड़ देते हैं। कथानक का मुख्य स्वर राजपूती आन और 'दुर्गादास' का शौर्य है। 
  • पात्र तथा चरित्र चित्रण - पात्रों की कुल संख्या ग्यारह है। तीन स्त्री पात्र हैं। नाटक का नायक 'दुर्गादास' है। पात्र कथानक के विकास में सफल रूप से सहायक हुए हैं। दुर्गादास के चरित्र को आदर्श रूप में प्रस्तुत करना नाटककार का लक्ष्य रहा है। 'सफीयत' समझदार मुस्लिम युवती है। 'औरंगजेब' को धर्मान्ध और अत्याचारी शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। 'अजीत' मारवाड़ का शासक है तथा सामान्य युवक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। 
  • संवाद - योजना - नाटक में कथोपकथनों का त्रिपक्षीय कार्य होता है। वे कथानक को आगे बढ़ाते हैं, पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालते हैं और लेखक के सन्देशों को स्पष्ट करते हैं। कहना न होगा कि 'आन का मान' के कथोपकथनों में तीनों गुण पूर्णतः विद्यमान हैं। वे आवश्यकता के अनुकूल कहीं छोटे और कहीं लम्बे हैं। जहाँ लेखक अपनी मान्यताओं को स्पष्ट करता है, वहाँ कुछ लम्बे हैं। यद्यपि नाटक के कथोपकथन कहीं-कहीं आवश्यकता से अधिक लम्बे हैं और उनके द्वारा कथानक की गतिशीलता में बाधा भी पड़ी है। कुल मिलाकर कथोपकथन की दृष्टि से नाटक सफल रहा है। 
  • देश-काल (वातावरण) - नाटक में मारवाड़ और औरंगजेब के बीच लम्बे समय तक चलने वाले संघर्ष और औरंगजेब की जीवन-व्यापी गतिविधियों का वर्णन है। किन्तु इस नाटक का घटनाकाल केवल एक ही वर्ष का है और प्रायः सम्पूर्ण घटना एक सीमित स्थान पर हुई है। नाटक के कथानक का केवल तीन ही अंकों में विभाजन करना इसके दृश्य-विधान को उत्कृष्ट बना देता है। नाटक की कोई घटना दृश्य, वेश-भूषा तथा साज-सज्जा ऐसी नहीं है, जो उस काल तथा स्थान से मेल न खाती हो। कुल मिलाकर नाटक में तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक वातावरण का सफल चित्रण हुआ और इस प्रकार नाटक में उस युग की आत्मा बोलती हुई दिखाई देती है। 
  • भाषा-शैली- 'आन का मान' की भाषा सरल, सुबोध, प्रवाहपूर्ण तथा प्रसाद-गुण युक्त है। ओज और माधुर्य भाषा- सौन्दर्यवर्द्धन में सफल रहे हैं। नाटक में लोकोक्तियों, मुहावरों, सूक्तियों तथा गीतों का प्रयोग भी भली-भाँति किया गया है— 'दूध का जला छाछ को फूँक मारकर पीता है', 'सिर पर कफन बाँधे फिरना' तथा 'बद अच्छा बदनाम बुरा' इत्यादि । नाटक में तीन गीत हैं। वर्णनात्मक तथा संवाद शैली का प्रयोग किया गया है। 
  • उद्देश्य - 'प्रेमी जी' ने प्रस्तुत नाटक के द्वारा आदर्श मानव मूल्यों की स्थापना का सुन्दर प्रयास किया है। नाटक के उद्देश्य की पूर्ति दुर्गादास का चरित्र करता है। दुर्गादास कर्त्तव्यपरायण है, देशप्रेमी है तथा विश्व बन्धुत्व में विश्वास रखता है। 'दुर्गादास' को आदर्श मूल्यों को स्थापित करने वाला उदात्त नायक कहा जा सकता है। इन गुणों की स्थापना ही नाटक का उद्देश्य है। 
  • अभिनेयता या रंगमंचीयता - प्रस्तुत नाटक रंगमंच पर अभिनीत होने की दृष्टि से पूर्णतः सफल है। नाटक में तीन अंक हैं। प्रथम अंक में मरुभूमि के रेतीले मैदान का दृश्य है। समय रात का पहला पहर है तथा मंच पर चाँदनी फैली हुई है। इस सेट के लगाने में कोई असुविधा नहीं होती है। दूसरे अंक में दक्षिण में भीम नदी के तट पर ब्रह्मपुरी नामक कस्बे में औरंगजेब के राजमहल का एक कक्ष है। कक्ष की सजावट अति साधारण है। तीसरे अंक में प्रथम अंक का ही सेट है। इस तरह नाटक में केवल तीन बार परदा गिरता है और मात्र दो सेट तैयार करने पड़ते हैं। नाटक में रचनाकार ने वेश-भूषा का भी समुचित निर्देशन किया है। अभिनय को अधिक प्रभावपूर्ण बनाने के लिए कतिपय नाटकीय संकेत भी दिए गये हैं। गतिशील कथानक, कम पात्र, सरल भाषा, अंकों तथा सामान्य मंच-विधान की दृष्टि से नाटक पूर्ण सफल है। 

आन का मान नाटक के प्रमुख पात्र दुर्गादास का चरित्र चित्रण

दुर्गादास राठौर नाटक का मुख्य पात्र है। नाटक का सम्पूर्ण कथानक उसी के आदर्श चरित्र पर आधारित है। अपने आदर्श धीर, वीर और उदात्त चरित्र के कारण दुर्गादास राठौर 'आन का मान' नामक नाटक का नायक है। वह मारवाड़ के स्वर्गीय महाराज श्री जसवन्त सिंह का स्वामिभक्त सेवक है, जो अपनी बुद्धिमत्ता, वीरता और त्याग से मारवाड़ के सम्मान की रक्षा करने में सर्वथा समर्थ है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं- 
  1. वीर योद्धा - दुर्गादास एक वीर योद्धा है। वह औरंगजेब को नाकों चने चबवा देता है। औरंगजेब उससे परेशान है। वह उसकी वीरता, दृढ़ता और साहस का कायल है। वह कहता है – “देखो यह दुर्गादास हमारे सामने कैसा निःशंक और निर्भय खड़ा.. है। ध्रुवतारे की भाँति स्थिर, पर्वत की भाँति अडिग । यह व्यक्ति दिल्ली के तख्त पर बैठने के योग्य है।” 
  2. राजभक्त- दुर्गादास राजा नहीं है किन्तु राजवंश की रक्षा करता रहा है। उसके हृदय में मारवाड़ की रक्षा की बराबर चिन्ता रहती है। देश में बिखरे हुए छोटे-छोटे राज्यों के पारस्परिक मतभेद के प्रति उसके मन में क्षोभ है। वह इन्हें मिलाकर देश- हित में अत्याचार और अनाचार का विरोध करता है। नवजात शिशु अजीत सिंह को वह औरंगजेब के सैनिक घेरे से बचा लेता है। उसे मारवाड़ की राजगद्दी पर बैठाकर सिंहासन की रक्षा के लिए यावज्जीवन संघर्षरत रहता है। 
  3. उदार मानववादी- दुर्गादास दृढ़निश्चयी, उदार मानववादी दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति है। वह धार्मिक संकीर्णताओं से बहुत ऊपर उठा हुआ है। वह सफीयतुन्निसा को समझाते हुए कहता है, “मानवता सब धर्मों से ऊँचा धर्म है। मानवता पर मुझे विश्वास था और है।" वह धार्मिक संकीर्णताओं को तोड़कर अपने शत्रु औरंगजेब के पुत्र अकबर को मित्र बनाता है। उसकी रक्षा के लिए जी-जान से कोशिश करता है। शहजादे और शहजादी को अपने पास रख कर इस्लामी धर्म और संस्कृति की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था कराता है तथा उनके सम्मान को बराबर सुरक्षित रखता है। 
  4. कुशल राजनीतिज्ञ- दुर्गादास यद्यपि मारवाड़ का राजा नहीं है, किन्तु अपनी राजनीतिक कुशलता से ही राजा जसवन्त सिंह के मरणोपरान्त राजसिंहासन को सुरक्षित रख पाने में सफल होता है। औरंगजेब के पुत्र अकबर को मिलाकर औरंगजेब का विरोध करता है और वही दुर्गादास जब समय आता है तो ईश्वरदास के कहने पर औरंगजेब से मित्रता करने के लिए तैयार हो जाता है। यह उसकी राजनीतिक कुशलता का परिचायक है। उसके सामने देश-हित सर्वोपरि है। 
  5. धर्म-निरपेक्ष- वीर योद्धा होने के साथ-साथ दुर्गादास धर्म-निरपेक्ष सच्चा मानव है। उसके सामने धर्म की दीवार व्यर्थ है। वह किसी भी ऐसे सिद्धान्त को आदर्श मानने के लिए तैयार नहीं है, जो मानवता के विरुद्ध हो। वह भारत की राजनीतिक शान्ति के लिए सभी धर्मों में सामंजस्य स्थापित करके शासन करने का समर्थक है और संकीर्णता के कारण उसका औरंगजेब से विरोध है। 
  6. नारी के प्रति श्रद्धालु- वीर दुर्गादास समाज में नारी के प्रति घोर आस्था रखता है। वह अपने आश्रम में पल रही शहजादी सफीयतुन्निसा पर अजीत सिंह को आसक्त हुआ देखकर उन्हें समझाता है – “संसार को यह कहने का अवसर मत दो कि राजपूत शरणागत और विशेष रूप से नारी का सम्मान करना नहीं जानते।" वह ससम्मान शहजादी को उसके राजपरिवार पहुँचाने का निश्चय करता है और कहता है त" उसे कोई अधिकार नहीं कि उनके जीवन को डाल से टूटे हुए पत्ते की तरह निरुद्देश्य उड़ने दे।" वह आगे भी कहता है राजपूत शत्रु के परिवार की नारियों की उतनी ही प्रतिष्ठा करते हैं, जितनी माँ-बहनों के सम्मान की।" 
निःशंक और निर्भीक-वीर दुर्गादास अत्यन्त ही निर्भीक और निःशंक है। उसमें चारित्रिक दृढ़ता है। औरंगजेब के दरबार में उसकी धमकियों के आगे वह थोड़ा भी विचलित नहीं होता और निर्भीकतापूर्वक उत्तर देता है। वह कहता है — “राजपूत को मृत्यु का भय दिखाना व्यर्थ है जहाँपनाह! लेकिन दुर्गादास जानता है कि उसको इस समय प्राणों की चाह नहीं।" 

आन का मान नाटक के आधार पर औरंगजेब का चरित्र-चित्रण

औरंगजेब ‘आन का मान' नामक नाटक का प्रतिनायक है, जो दुर्गादास का प्रतिद्वन्द्वी है। नाटक में औरंगजेब के वृद्धावस्था का चित्रण हुआ है। उसकी अवस्था लगभग 77 वर्ष की है। नाटककार ने उसके चरित्र-चित्रण में काफी सहानुभूति से काम लिया है । औरंगजेब के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं— 
  • स्वभाव से क्रूर और अत्याचारी - औरंगजेब स्वभाव से अत्यन्त ही क्रूर और अत्याचारी है। वह राजसत्ता के लोभ में अपने भाइयों का वध कराता है। पिता शाहजहाँ को कैद करता है। अपने पुत्र अकबर को देखना नहीं चाहता। उसके भय से अकबर ईरान भाग जाता है। औरंगजेब की लड़की मेहरुन्निसा अपनी बड़ी बहन जीनतुन्निसा से औरंगजेब के आतंकवादी क्रूर चरित्र का चित्रण करते हुए कहती है- "अब्बाजान ने आपके उन कानों के पर्दे फाड़ डाले हैं, जो रूहों की बातें सुन सकते हैं।” एक दूसरी जगह वह कहती है- " अब्बाजान बाप कहाँ हैं, वह बेटा बन कर भी नहीं रहे तो बाप भी कैसे बन सकते थे ? भाई भी वह न बन सके।" 
  • कपटी, धोखेबाज और कूटनीतिज्ञ - औरंगजेब स्वभाव से अत्यन्त ही कपटी, धोखेबाज और कूटनीतिज्ञ है। वह अपने भाई को शराब में जहर मिलाकर पिला देता है और मार डालता है। जसवन्त सिंह के पुत्र को जहरीली शिरोपाँव पहनाकर मार डालता है। संभाजी को अपमानित करके गले में घण्टियाँ बाँधकर ऊँट पर बिठाकर नगर में घुमवाता है और अन्त में मार डालता है। जब अजमेर में उसका पुत्र अकबर राठौरों का समर्थन पाकर उस पर चढ़ाई करता है तो वह ऐसी कूटनीतिक चाल चलता है कि सभी राठौर योद्धा रातो-रात उसका साथ छोड़कर भाग जाते हैं। 
  • स्नेह और मानवता के लिए लालायित- जीवन के अन्तिम दिनों में औरंगजेब को अपने किये पर पश्चात्ताप होता है। वह दुर्गादास से निवेदन करता है- “सुनो दुर्गादास ! हमें इंसान बनने का अवसर दो। हम प्यार करना चाहते हैं, लेकिन किससे करें। हमारी सूरत में ऐसी क्या भयानकता है, जो हमारे बच्चे भी हमसे दूर भागते हैं।" इससे पहले वह कहता है- “हम बूढ़े हो गये दुर्गादास! हमारे अन्दर जो प्यार करने वाला दिल सोया था, वह जाग पड़ा है।" 
  • दृढ़ वीर किन्तु दुराग्रही- औरंगजेब स्वभाव से वीर और विचारों का दृढ़ है। स्वयं दुर्गादास इस तथ्य को स्वीकार करता है-“औरंगजेब की दृढ़ता और वीरता का दुर्गादास भी कायल है। उसने बलख और बुखारा-जैसे सुदूर स्थानों पर उसकी तलवार का चमत्कार देखा है।” किन्तु इसके साथ ही वह दुराग्रही भी है। वह किसी की बात नहीं मानता। जब दुर्गादास औरंगजेब से रक्तपात रोकने का निवेदन करता है तो औरंगजेब उसे अस्वीकार करते हुए कहता है- "हमारे सामने किसी ने हमारे विचारों के विरुद्ध बात करने का साहस नहीं किया है।" 
  • धार्मिक संकीर्णता का शिकार- औरंगजेब में धार्मिक संकीर्णता कूट-कूट कर भरी है। वह ब्रह्मपुरी को 'इस्लामपुरी' नाम रखवाता है। वह जसवन्त सिंह के नवजात शिशुओं को हरम में पालकर मुसलमान बनाकर जोधपुर की गद्दी पर बैठाने का आकांक्षी है। उसका भाई दाराशिकोह अपनी धार्मिक उदारता के कारण ही उसका शिकार हो जाता है। इस्लाम धर्म के प्रचार के लिए वह मन्दिरों को तुड़वाता है और मस्जिदों का निर्माण कराता है। 

आन का मान नाटक के शीर्षक की सार्थकता 

दुर्गादास राजपूतों को संगठित करके राजपूती आन एवं सम्मान की रक्षा हेतु प्रयासरत रहता है। दुर्गादास द्वारा जसवन्त सिंह के पुत्र अजीत सिंह को राजपूती आन की रक्षा हेतु तैयार किया जाना, अजीत सिंह में राजपूती परम्परा पर आधारित गुणों का विकास करना तथा अन्तिम समय तक औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय के साथ अपनी मित्रता का निर्वाह करना, शीर्षक की सार्थकता बताते हैं। दुर्गादास नारी के सम्मान की रक्षा हेतु सदैव तत्पर है। अपने मित्र अकबर द्वितीय के ईरान चले जाने पर उसने उसके बच्चों का पालन-पोषण स्वयं किया। अन्त में उन बच्चों को अकबर द्वितीय के पिता औरंगजेब को ही सौंपता है। अजीत सिंह का विरोध करके दुर्गादास ने सफीयतुन्निसा की मर्यादा की रक्षा करता है।

इस प्रकार अपने नामकरण की दृष्टि से 'आन का मान' नाटक पूर्णतः सफल है।

सफीयतुन्निसा का चरित्र चित्रण

सफीयतुन्निसा की आयु 17 वर्ष है और वह आकर्षक युवती है।विभिन्न परिस्थितियों में अपनी वाक्-पटुता का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन वह करती है। उसके व्यंग्यपूर्ण कथन तर्क पर आधारित हैं। वह एक उच्च कोटि की संगीत-साधिका भी है। उसका मधुर स्वर दूसरों का मन मोह लेता है।उसमें त्याग एवं बलिदान की भावना भरी हुई है। देशहित में वह अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तत्पर दिखाई देती है। देश के प्रति अपनी अनुकरणीय कर्त्तव्यनिष्ठा का परिचय देती है। राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करने के उद्देश्य से ही वह अपने भाई को युद्धभूमि में भेज देती है। वह चाहती है कि उसके देश में सर्वत्र शान्ति का वातावरण रहे तथा सभी देशवासी सुखी हों। किसी भी प्रकार के हिंसापूर्ण कार्यों का वह विरोध करती है। सफीयत जोधपुर के युवा शासक अजीत सिंह से सच्चा प्रेम करती है, किन्तु प्रेम की उद्वेगपूर्ण स्थिति में भी वह अपना सन्तुलन बनाए रखती है। वह अजीत सिंह को ढाढ़स बँधाती है और उसे लोकहित के लिए आत्महित का त्याग करने की राय देती है।

आन का मान नाटक का संदेश या उद्देश्य 

 प्रस्तुत नाटक में मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने का प्रयास किया गया है। राष्ट्रीय और मानवीय प्रगति में बाधक तत्त्वों के विरुद्ध संघर्षशील और कर्मण्य होने की प्रेरणा नाटक में विद्यमान है। राष्ट्रीयता, स्वदेश-भक्ति, भावात्मक एकता, अन्तर्राष्ट्रीय चेतना और मानवता आदि के प्रेरणाओं और आस्थाओं के प्रति युवा वर्ग द्वारा समर्पित जीवन बिताने का सन्देश नाटक से मुखर हुआ है। प्रस्तुत नाटक में दुर्गादास और उनके सहयोगियों के माध्यम से देशभक्ति का अद्भुत आदर्श प्रस्तुत किया गया है। देश की स्वाधीनता और गौरवरक्षा के लिए ये आजीवन संघर्ष करते रहे हैं। दुर्गादास का विश्वास है कि "मारवाड़ की भूमि अन्न देने में भले ही कंजूस हो, पर शीश बोने से इस भूमि में शीश अवश्य उपजते हैं।" नाटक का उद्देश्य निम्नलिखित है- (1) स्वदेश-प्रेम, (2) राष्ट्रीय एकता, (3) मानवतावाद, (4) सत्य, न्याय, कर्त्तव्यनिष्ठा, सदाचार आदि उदात्त मूल्यों की स्थापना, (5) गांधी दर्शन का समर्थन, (6) नारी-गौरव की रक्षा, (7) जनवादी विचारधारा का समर्थन आदि। 

निष्कर्षतः, यह नाटक बलिदान, उदारता और अपने वचन के प्रति प्राणपण से समर्पित रहने की उस भारतीय परंपरा का जीवंत दस्तावेज है, जिसकी प्रासंगिकता हर युग में बनी रहेगी।

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