मातृभूमि का मान

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मातृभूमि का मान Mathrubhumi ka Maan मातृभूमि का मान सारांश - मातृभूमि का मान श्री हरिकृष्ण प्रेमी जी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक एकांकी है ,जो की देश प्रेम तथा देश भक्ति पर आधारित है .

मातृभूमि का मान Mathrubhumi ka Maan


मातृभूमि का मान श्री हरिकृष्ण प्रेमी जी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक एकांकी है ,जो  देश प्रेम तथा देश भक्ति पर आधारित है।इस एकांकी में हाडा राजपूत वीरसिंह तथा उसके साथियों के बलिदान का चित्रण किया गया है ।
 

मातृभूमि का मान एकांकी का सारांश 

मातृभूमि का मान एकांकी राष्ट्रीयता से ओत प्रोत ऐतिहासिक एकांकी है। इस एकांकी का प्रारम्भ बूँदी के राव हेमू और मेवाड़ के सेनापति अभयसिंह के वार्तालाप से होता है। अभयसिंह मेवाड़ के महाराणा लाखा का यह प्रस्ताव राव हेमू को सुनाते हैं कि बूँदी मेवाड़ की अधीनता स्वीकार कर ले। उनकी बात सुनकर राव हेमू उनसे कहते हैं कि बूँदी सदैव से चित्तौड़ का सम्मान करता रहा है किन्तु मेवाड़ की अधीनता स्वीकार करना सम्भव नहीं। अभय सिंह कहते हैं कि महाराणा राजपूतों को एक सूत्र में पिरोना चाहते हैं इसलिए इस प्रस्ताव में कई दोष नहीं। राव हेमू कहते हैं कि हम सदैव से प्रेम का अनुशासन मानते आये हैं किन्तु एकता के बहाने मेवाड़ की अधीनता हमें स्वीकार नहीं। राव हेमू का उत्तर सुनकर अभय सिंह चले जाते हैं। बूँदी और मेवाड़ का युद्ध होता है जिसमें महाराणा की पराजय हो जाती है।
 
युद्ध में पराजित महाराणा बहुत व्यथित हो जाते हैं। वह इस पराजय को मेवाड़ के आत्मगौरव पर कलंक मानते हैं। वह दरबार में नहीं जाना चाहते हैं। अभय सिंह उनको बहुत समझाते हैं। महाराणा यह प्रतिज्ञा करते हैं कि जब तक सेना सहित वह बूँदी के दुर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। अभय सिंह महाराणा से कहते हैं कि महाराणा जी निश्चय ही बूँदी पर हमारी विजय होगी। किन्तु इसमें कितना समय लगेगा यह निश्चित नहीं है। इसलिए आपको ऐसी भीषण प्रतिज्ञा नहीं करनी चाहिए महाराणा अभयसिंह से कहते हैं कि जो प्रतिज्ञा हमने की है उसे अब वापस नहीं किया जा सकता। वह प्रतिज्ञा तो पूर्ण होनी ही चाहिए। 

नेपथ्य से वारणी के गीत की आवाज सुनायी देती है। इस गीत का अर्थ यह है कि सागर से निकले मोतियों की माला को मत तोड़ो अर्थात् चारणी महाराणा को यह सन्देश देना चाहती है कि उन्हें राजपूतों से आपसी युद्ध नहीं करना चाहिए। चारणी महाराणा से यह कहती है कि आप वीर राजपूतों में परस्पर स्नेह का बन्धन स्थापित कीजिए। तब महाराणा चारणी को अपनी प्रतिज्ञा की बात बताते हुए यह कहते हैं कि तुम बहुत देर में आयीं। चारणी महाराणा को बूंदी का नकली दुर्ग बनाकर उस पर विजय प्राप्त कर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने का उपाय सुझाती है।

महाराणा नकली दुर्ग का निर्माण कराकर प्रतिज्ञा पूरी करने का आयोजन करते हैं। नकली दुर्ग में मेवाड़ के सिपाही वीरसिंह और उसके साथियों को महाराणा का नकली प्रतिरोध करने के लिए भेज दिया जाता है। वीर सिंह बूँदी का रहने वाला था। वीर होने के साथ-साथ वह मातृभूमि के प्रति समर्पित भी था। मेवाड़ की सेना में होने पर भी वह अपनी मातृभूमि बूँदी के नकली दुर्ग को भी विजित होते हुए नहीं देख सकता। इसलिए वीर सिंह और उसके साथी महाराणा और उनकी सेना का नकली युद्ध में भी पूरी शक्ति के साथ प्रतिरोध करते हैं। उनका लक्ष्य महाराणा को बूँदी के सपूतों की वीरता दिखाना था। महाराणा वीर सिंह और उसके साथियों की वीरता पर मुग्ध हो जाते हैं । 

वीर सिंह और उसके साथी अपनी मातृभूमि के मान के लिए शहीद हो जाते हैं। महाराणा को उनकी मृत्यु पर बहुत पश्चाताप होता है। वह वीर सिंह के शव के पास बैठकर दुःख प्रकट करते हैं। उसी समय बूँदी के राव हेमू वहाँ आ जाते हैं और महाराणा से कहते हैं कि हम युग-युग से एक हैं और एक रहेंगे। इसके लिए हमें एक-दूसरे को अधीन करने की आवश्यकता नहीं। हम सभी राजपूत अग्नि के पुत्र हैं और हमें एक-दूसरे से अलग नहीं रहना चाहिए। महाराणा राव हेमू की बात को स्वीकार करते हुए वीरसिंह को श्रद्धांजलि देते हैं। 

मातृभूमि का मान एकांकी का आलोचनात्मक अध्ययन

हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ द्वारा रचित एकांकी 'मातृभूमि का मान' राष्ट्रीय चेतना को जगाता है तथा साम्प्रदायिक बंधुत्व की भावना को प्रोत्साहित करता है । इस एकांकी में यह दिखाया गया है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए, उसके मान के लिए क्या-क्या बलिदान नहीं करना पड़ता, यहाँ तक कि प्राण भी न्यौछावर करने पड़ जाते हैं। मातृभूमि की प्रतिष्ठा के लिए मित्र शत्रु सभी एक सूत्र में बँधकर स्वदेश प्रेम की भावना को जीवित रखते हैं। 'मातृभूमि का मान' एकांकी हमारे सामने एक आदर्श प्रस्तुत करता है। राव हेमू बूँदी के शासक हैं और महाराणा लाखा मेवाड़ के शासक हैं। दोनों ही महत्वाकांक्षी तथा स्वाभिमानी शासक हैं, एक-दूसरे से अपने को बड़ा मानते हैं। महाराणा लाखा अभयसिंह द्वारा बूँदी के शासक को यह सूचना भिजवाते हैं कि बूँदी राज्य उनके अधीन हो जाए तो केन्द्र मज़बूत हो जाएगा, सभी राज्य एकता के सूत्र में बँध जाएँगे । इस पर राव हेमू कहते हैं— 'हाड़ा-वंश किसी की गुलामी स्त्रीकार नहीं करेगा, चाहे वह विदेशी शक्ति हो, चाहे वह मेवाड़ का महाराणा हो ।' 

इस प्रकार यहाँ बूँदी राज्य के शासक राव हेमू के साहस, वीरता, मातृभूमि के प्रति मर मिटने की भावना का पता लगता है। वह स्पष्ट शब्दों में महाराणा लाखा से कहते हैं कि वे किसी भी स्थिति में किसी के अधीन नहीं रह सकते । पूरा एकांकी राष्ट्र प्रेम, मातृभूमि के प्रति बलिदान देने की भावना से ओतप्रोत हैं । पूरा एकांकी पाठक के हृदय में वीर रस की भावना का संचार करता है, इसको पढ़ कर पाठक के हृदय में भी मातृभूमि के प्रति त्याग और देशभक्ति की भावना उत्पन्न होना स्वाभाविक है । एकांकीकार राष्ट्रीयता की भावना को प्रस्तुत करने में पूर्णतया सफल हुआ है। जब महाराणा लाखा नीमरा के मैदान में बूँदी के राव हेमू से पराजित होकर भाग जाते हैं तभी से उनकी आत्मा उन्हें धिक्कारती रहती है। वे कहते हैं कि उनको तब तक शांति नहीं मिलेगी जब तक हाड़ाओं से बदला लेकर उन्हें परास्त न कर दें, वे हाड़ाओं को हराकर उनके बूँदी दुर्ग पर अपनी विजय का झण्डा फहराने की प्रतिज्ञा करते हैं । यद्यपि वे यह जानते हैं कि हाड़ाओं को पराजित करना आसान काम नहीं है। उनके सहयोगी भी उन्हें मना करते हैं किन्तु वे अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने में दृढ़प्रतिज्ञ हैं अंत में यह निर्णय किया जाता है कि बूँदी का नकली दुर्ग बनाया जाए और उस पर नकली आक्रमण किया जाए। लेकिन उसमें थोड़ी वास्तविकता भी होनी चाहिए। इस कारण महाराणा लाखा अपनी सेना के हाड़ा वंश के सेनानियों में से कुछ को बूँदी के नकली दुर्ग पर नकली युद्ध करने के लिए नियुक्त करते हैं किन्तु जब उनका प्रमुख सिपाही वीरसिंह (जो कि स्वयं एक हाड़ा है) देखता है कि बूँदी के नकली दुर्ग को युद्ध में परास्त कर महाराणा लाखा अपनी विजय का झण्डा फहराना चाहते हैं तब मातृभूमि के मान की रक्षा के लिए बलिदान की सारी सीमाएँ पार हो जाती हैं। वीरसिंह बूँदी के नकली दुर्ग की भी युद्ध में पराजय नहीं देख सकता तथा उस पर मेवाड़ का झण्डा नहीं देख सकता। इस कारण वह बूँदी राज्य को, अपनी मातृभूमि को, बचाने के लिए युद्ध में शहीद हो जाता है । 

एकांकी की भाषा अत्यन्त सरल तथा काव्यमय है। पात्रों का चयन भी एकांकी के अनुकूल है। महाराणा और राव हेमू एकांकी के प्रमुख पात्र हैं। इनके इर्द-गिर्द कहानी घूमती है । कथोपकथन भी प्रभावी है । पात्रों के कथोपकथन से एकांकी का विकास स्वाभाविक बन पाया है। एकांकी के तत्वों के आधार पर यह एकांकी सफल सिद्ध हुआ है । वीर रस के अनुकूल शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसका कथानक भी सशक्त है उसी के आधार पर एकांकी का सम्यक् विकास हुआ है । इस प्रकार सभी दृष्टि से यह एकांकी एक सफल रचना है । 


मातृभूमि का मान शीर्षक की सार्थकता 

मातृभूमि का मान श्री हरिकृष्ण प्रेमी जी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक एकांकी है . प्रस्तुत एकांकी का शीर्षक मातृभूमि का मान पूर्णतया ,सार्थक एवं उचित है .इस एकांकी के माध्यम से राजस्थान जो सदा से ही वीरता और पराक्रम का गढ़ रहा है के बूँदी के वीर हाड़ा वंश का वर्णन किया है . एकांकी में दिखाया है की बूँदी का शासक राव हेमू मेवाड़ शासक महाराणा लाखा की अधीनता स्वीकारने से इनकार कर देता है तब महाराणा उनके हराने और बूँदी पर मेवाड़ का झंडा पहराने की कसम खा लेता है . इस प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए एक चारण के प्रस्ताव पर मेवाड़ में ही नकली युद्ध के लिए बूँदी के दुर्ग के समान एक नकली दुर्ग बनवाया जाता है . लेकिन बूँदी का रहने वाला एक सिपाही वीर सिंह और उसके कई साथी अपनी जन्मभूमि का मान रखने के लिए इस नकली किले की भी रक्षा करना चाहते है . परन्तु मेवाड़ की भारी भरकम  सेना के सामने वे ठहर  नहीं पाते और उस दुर्ग की रक्षा करते  -करते शहीद हो जाते है . मर कर भी वीर सिंह तथा उसके साथी अमर हो जाते है क्योंकि वे मेवाड़ के सैनिक होते हुए भी उन्होंने बूँदी अर्थात अपनी मातृभूमि का मान के सम्मान पर आँच नहीं आने देते है . इस एकांकी का शीर्षक 'मातृभूमि का मान' सर्वथा उपयुक्त है क्योंकि पूरे एकांकी में मातृभूमि के मान को ही विशेष महत्त्व दिया गया है तथा अन्त में मातृभूमि का मान रखने के लिए ही स्वयं महाराणा का प्रमुख सिपाही वीरसिंह(जो कि एक हाड़ा है) शहीद हो जाता है । 

मातृभूमि का मान एकांकी का उद्देश्य 

मातृभूमि का मान श्री हरिकृष्ण प्रेमी जी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक एकांकी है .इस एकांकी का प्रमुख उद्देश मातृभूमि के प्रति प्रेम को दिखाना है . राजपूतों की वीरता ,शौर्य ,पराक्रम के साथ - साथ उनकी आन - बान और शान का प्रस्तुतिकरण भी प्रस्तुत एकांकी का उद्देश्य है . मेवाड़ की सेना का एक सिपाही वीरसिंह और उसके साथी ,जो की बूँदी के ही रहने वाले थे ,बूँदी के नकली दुर्ग को अभी अपनी मातृभूमि मान कर उसकी रक्षा करते - करते अपने प्राणों का बलिदान कर देते है . इस एकांकी में यह दिखाया गया है कि राजपूत अपनी जन्मभूमि या मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की बलि देने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं। वे अपनी मातृभूमि या जन्मभूमि को किसी अन्य राज्य के अधीन नहीं देख सकते । उसको सदैव स्वतंत्र देखना चाहते हैं। उसका सदैव मान और उसकी प्रतिष्ठा चाहते हैं। पूरे एकांकी में राजपूतों की मातृभूमि के प्रति कितनी अधिक निष्ठा है यही दिखाया गया है । मातृभूमि का मान उनके प्राणों से भी अधिक है । हमें भी अपनी मातृभूमि की मान-मर्यादा के लिए अपना तन-मन-धन न्यौछावर करने को तैयार रहना चाहिए। हमारे जीवन का उद्देश्य यही होना चाहिए— “पहले देश का मान, तब अपनी जान ।" 




एकांकीकार ने इन चरित्रों के माध्यम से देशवासियों में एकता अखंडता बनाए रखने ,राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए अपनी मातृभूमि से प्रेम ,उसकी रक्षा करते हुए बलिदान की भवन को जगाना ही इस एकांकी का उद्देश्य है .

मातृभूमि का मान चरित्र चित्रण

मातृभूमि का मान एक अत्यंत प्रभावशाली और प्रेरक एकांकी है। यह हमें मातृभूमि के प्रति प्रेम, देशभक्ति, त्याग, समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा, साहस, वीरता, पराक्रम, और परिवार के प्रति प्रेम और स्नेह की भावना से प्रेरित करता है।एकाँकी मे सम्मलित प्रमुख चरित्रों का विवरण निम्नलिखित हैं - 

महाराणा लाखा 

महाराणा लाखा मेवाड़ के शासक व एकांकी “मातृभूमि का मान" के प्रमुख पात्र हैं। वे वीर तथा सच्चे देशभक्त हैं । उन्हें अपने मेवाड़ पर नाज़ है । वह उनकी दृष्टि में सरताज है। वे उसे सबसे बड़े राज्य के रूप में देखना चाहते हैं । वे बूँदी और अन्य छोटे राज्यों को अपने राज्य में मिला लेना चाहते हैं ताकि चित्तौड़ एक शक्तिशाली केन्द्र हो जाय ।
 
महाराणा एक बार युद्धभूमि में बूँदी के राजपूतों से पराजित हो चुके हैं। वे आत्माभिमानी और प्रतिशोधी मनोवृत्ति के व्यक्ति हैं । वे अपनी पराजय सहन नहीं कर पा रहे हैं। वे इस पराजय और अपमान का बदला बूँदी के राजपूतों को हराकर बूँदी के किले पर अपना झंडा फहराकर लेना चाहते हैं। वे जोश में आकर प्रतिज्ञा कर बैठते हैं कि जब तक बूँदी पर विजय प्राप्त नहीं कर लेंगे, अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। यह कठिन प्रतिज्ञा पूरी करना आसान नहीं था । अत: प्रतिज्ञा के समाधान हेतु बूँदी का एक नकली किला बनवाकर उस पर विजय प्राप्त करने का सुझाव दिया गया । परंतु युद्ध में वास्तविकता लाने के लिए राणा के एक सिपाही वीर सिंह और उसके कुछ साथियों को जो बूँदी के रहने वाले थे, युद्ध का विरोध करने के लिए नकली दुर्ग में नियुक्त कर दिया जाता है। परंतु वीर सिंह अपनी जन्मभूमि का अपमान सहन नहीं कर पाता है । वह अपने साथियों के साथ युद्ध में शहीद हो जाता है ! महाराणा लाखा को वीर सिंह और उसके साथियों के शहीद होने का अत्यन्त दुःख होता है । वे पश्चात्ताप करते हैं तथा स्वीकार करते हैं कि उन्होंने बूँदी को अपने अधीन करने की जो प्रतिज्ञा की थी वह अनुचित थी । जिसके कारण इतने राजपूत मारे गये । वे स्वयं वीर थे और वीरों का आदर करना जानते थे । उन्होंने वीर सिंह के शव का आदर करके अपने को एक महान् शासक और महान् व्यक्ति होने का परिचय दिया ।
 
महाराणा लाखा आत्माभिमानी और प्रतिशोधी मनोवृत्ति वाले व्यक्ति हैं। वे अपनी जन्मभूमि की लाज और राजपूती आन-बान-शान के लिए युद्ध करना आवश्यक समझते हैं । वे प्रतापी एवं अत्यनत पराक्रमी हैं। वे महत्वाकांक्षी और योजना बनाने में कुशल षड्यंत्रकारी हैं। 

महाराणा वीर होने के साथ-साथ वीरों का सम्मान करना जानते हैं। अपनी भूल का पश्चाताप करने में पीछे नहीं हटते ! अपनी गलती को स्वीकार कर वे आत्मग्लानि की आग में जल कर स्वर्ण के समान पवित्र बन जाते हैं । 

राव हेमू 

राव हेमू बूँदी के शासक हैं, जो अत्यन्त स्वाभिमानी देशभक्त, कर्त्तव्यपरायण, निर्भीक, सच्चे राजपूत हैं । राजपूत जाति के प्रति उन्हें गर्व है । वे अपनी बूँदी को किसी भी प्रकार किसी के अधीन नहीं देखना चाहते। बूँदी के प्रति उनके हृदय में कितना मान है यह इसी बात से ज्ञात हो जाता है जब अभय सिंह बूँदी को मेवाड़ के अधीन बताते हैं ।यह बात सुनकर वे चकित हो जाते हैं और अभय सिंह से निर्भीकता के साथ कहते हैं- हाड़ा वंश किसी की गुलामी स्वीकार नहीं करेगा चाहे वह विदेशी शक्ति हो, चाहे वह मेवाड़ का महाराणा हो । 

अभय सिंह राजपूतों को एक सूत्र में बाँधने की आवश्यकता को बताते हैं और कहते हैं कि यह माला तैयार करने की शक्ति केवल महाराणा को प्राप्त है। इस पर राव हेमू कहते हैं कि ताकत की बात न छेड़ो अभयसिंह, प्रत्येक राजपूत को अपनी ताकत पर नाज़ है । इतने बड़े दम्भ को मेवाड़ अपने प्राणों में आश्रय न दे, इसी में उसका कल्याण है । 

राव हेमू एक साहसी, निर्भीक, कुशल शासक तथा राजपूतों के गौरव के प्रतीक हैं। वे जन्मभूमि की रक्षा के लिए प्राणों की बलि देने को भी तैयार हैं । वे अपनी बूँदी को किसी भी प्रकार नीचा नहीं देख सकते । यही कारण है कि वे साहसपूर्वक कहते हैं कि जो माला महाराणा ने बनाई है उसको तोड़ने का श्रीगणेश हो गया है । 

राव हेमू अपनी बूँदी की रक्षा के लिए सदैव युद्ध के लिए तैयार रहते हैं। वे कभी अपने में हीनभाव नहीं लाते, वे किसी भी शक्तिशाली शासक से अपने को कम नहीं समझते। जब अभय सिंह उनमें अनुशासन के अभाव की बात करते हैं और यह भी कहते हैं कि राज्यों के अनुशासन के अभाव से हमारे देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे, तब राव हेमू कहते हैं कि प्रेम का अनुशासन मानने को तो हाड़ा वंश सदा तैयार है किन्तु शक्ति का नहीं । इससे राव हेमू के हृदय की विशालता का परिचय मिलता है, उनकी भावुकता का पता लगता है, उनकी मानवता का पता लगता है, उनके पूरे व्यक्तित्व का पता हमें उनकी इन पंक्तियों से लगता है । मेवाड़ के महाराणा को यदि अपने ही जाति भाइयों पर अपनी तलवार आजमाने की इच्छा हुई है तो उससे उन्हें कोई नहीं रोक सकता। बूँदी स्वतंत्र राज्य है और स्वतंत्र रहकर वह महाराणाओं का आदर करता है, अधीन होकर वह किसी की सेवा करना पसन्द नहीं करता । 
 
जब वीर सिंह बूँदी के लिए लड़ने वाली लड़ाई में शहीद हो जाता है और महाराणा स्वयं वीरसिंह के शव के पास बैठकर अपने अपराध को स्वीकार करते हुए क्षमा माँगते हैं और राजपूतों की वीरता का लोहा मानते हैं तब राव हेमू महाराणा से कहते हैं – महाराणा ! हम युग-युग से एक हैं और एक रहेंगे । आपको यह जानने की आवश्यकता थी कि राजपूतों में न कोई राजा है, न कोई महाराजा; सब देश, जाति और वंश की मान रक्षा के लिए प्राण देने वाले सैनिक हैं। हमारी तलवार अपने ही स्वजनों पर न उठनी चाहिए। 

इस प्रकार राव हेमू मानवता के गुणों से युक्त, देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत तथा जाति और वंश की मान रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने वाले व्यक्ति हैं ।

वीर सिंह का चरित्र चित्रण

वीर सिंह का जन्म बूँदी में हुआ था और वह मेवाड़ की सेना में सैनिक था।वीरसिंह राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत था। वह अपनी मातृभूमि बूँदी के सम्मान की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान भी कर देता है। वह अपनी मातृभूमि के प्रति इतना समर्पित था कि बूँदी के नकली दुर्ग पर भी उसे मेवाड़ का ध्वज स्वीकार नहीं था। वीरसिंह कुशल योद्धा था। उसने और उसके कुछ साथियों ने मिलकर ही मेवाड़ की सेना को नकली दुर्ग में भी आसानी से प्रवेश नहीं करने दिया। महाराणा लाखा और राव हेमू ने भी वीरसिंह के त्याग के प्रति सम्मान दिखाते हुए उसे श्रद्धांजलि दी। 


अभय सिंह 

अभय सिंह मेवाड़ के शासन के सेनापति हैं । वे मेवाड़ के वफादार कर्त्तव्यपरायण सेनापति हैं । महाराणा सेनापति पर विश्वास करते हैं । महाराणा भी अभय सिंह को एक कुशल सेनापति, बुद्धिमान, कर्त्तव्यपरायण, अच्छा सलाहकार मानते हैं वे शासन का कोई भी कार्य बिना अभय सिंह की अनुमति से नहीं करते। महाराणा अपने हृदय की बात बूँदी शासक राव हेमू को इन्हीं के द्वारा पहुँचवाते हैं। अभय सिंह महाराणा के संदेश को अत्यन्त सुन्दर ढंग से राव हेमू के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं और महाराणा के विचारों से राव हेमू को प्रभावित करने में कुछ कसर नहीं रखते । 

अभय सिंह किसी भी बात को तर्क से सिद्ध करने में कुशल हैं। जब भी महाराणा किसी क्षेत्र में हतोत्साहित होते हैं या कोई निश्चित निर्णय नहीं ले पाते तब अभय सिंह सदैव उनको उत्साहित तथा निर्णय लेने में उनकी सहायता करते हैं। जब चारणी नकली दुर्ग बनाने का सुझाव महाराणा को देती है तब अभय सिंह इस सुझाव का समर्थन करते हुए नकली दुर्ग का निर्माण करवाते हैं । 

अभय सिंह महाराणा के दाहिने हाथ हैं। इसका उदाहरण इन पंक्तियों से मिलता है, जब महाराणा कहते हैं—“मैं महाराणा लाखा प्रतिज्ञा करता हूँ कि जब तक बूँदी के दुर्ग में ससैन्य प्रवेश नहीं करूँगा, अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा ।' इस पर अभय सिंह कहते हैं कि महाराणा छोटे से बूँदी दुर्ग को विजय करने के लिए इतनी बड़ी प्रतिज्ञा करने की क्या आवश्यकता है? बूँदी को उसकी धृष्टता के लिए दण्ड दिया ही जाएगा, लेकिन हाड़ा लोग बहुत वीर हैं, युद्ध करने में वे यम से भी नहीं डरते। यह अवश्य है कि अंत में विजय हमारी ही होगी, किन्तु समय लग सकता है । इन पंक्तियों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अभय सिंह एक अत्यन्त बुद्धिमान, वाक्पटु एवं कुशल सेनापति हैं । 

शत्रु की वीरता को भी पहचानते हैं और शत्रु की वीरता को नहाराणा के सामने इस प्रकार से कहते हैं कि महाराणा यह न समझें कि महाराणा उनसे युद्ध में हार जाएँगे । वे महाराणा को यह कहते हैं—उनके वीर होने के कारण युद्ध काफी दिन तक चल सकता है । लेकिन विजय आप ही की होगी । अपने महाराणा को वे कभी नाराज़ नहीं करना चाहते। उनकी कही हुई बात को सदैव पूरा कराने में सहायक होते हैं। महाराणा की मान-प्रतिष्ठा के लिए अभय सिंह पूर्ण रूप से समर्पित हैं। इसके अतिरिक्त जब नकली दुर्ग पर युद्ध होता है तब भी अभय सिंह पूर्ण सहयोग देते हैं और अभय सिंह नकली दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के बाद मेवाड़ का झण्डा फहराते हैं । 

मातृभूमि का मान प्रश्न उत्तर


प्र. १. अभय सिंह कौन हैं ? वह क्या कहते हैं ?

उ. अभयसिंह मेवाड़ के सेनापति हैं .वह कर्तव्यनिष्ठ एवं साहसी है तथा महाराणा के विश्वास पात्र हैं . वह राव हेमू से कहते हैं कि राजपूतों की असंगठित शक्ति बाहरी लोगों का सामना सफलतापूर्वक नहीं कर सकती हैं इसीलिए राजपूतों को एक साथ हो जाना चाहिए और उस संगठित केंद्र को चित्तौड़ के अधीन हो जाना चाहिए .

प्र. २. अभयसिंह किसका संदेस लेकर आये हैं ?

उ. अभयसिंह मेवाड़ के सेनापति हैं . वह महाराणा लाखा का सदेश बूंदी नरेश राव हेमू के लिए लाये हैं . इस सन्देश में यह कहा गया है कि बूँदी राज्य को चित्त्तौड़ की अधीनता स्वीकारी कर लेना चाहिए इससे राजपूतों की शक्ति एक हो जायेगी और यह संगठित केंद्र को चित्तौड़ के अधीन रहेगा .

प्र. ३.राजपूतों को किस बात पर गर्व था ?

उ. राजपूत अग्नि के पुत्र माने जाते हैं और बहुत बहादूर हैं . वह अपने देश के लिए रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान भी दे सकते हैं . राजपूतों को अपने साहस और शक्ति पर नाज़ हैं . वे बड़े से बड़े संकट का भी सामना बड़ी आसानी से कर सकते हैं ,इसी बात के कारण राजपूतों को गर्व था .

प्र. ४. बूँदी और मेवाड़ के युद्ध में किसकी विजय हुई ?

उ. बूँदी के शासक राव हेमू द्वारा महाराणा का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया तब महाराणा और राव हेमू के बीच युद्ध हुआ . राव हेमू ने रात्री में अचानक महाराणा के शिविर पर हमला कर दिया जिससे मेवाड़ की सेना हार गयी और महाराणा के पराजय का मुँह देखना पड़ा.

प्र.५. बूँदी के नकली दुर्ग की रक्षा के लिए वीर सिंह क्या कहता है ?

उ. वीरसिंह, बूँदी के दुर्ग की रक्षा के लिए आपने साथियों से कहते है कि हम अग्नि के पुत्र हैं . हम अपने वंश की आभा की खत्म नहीं होने देंगे . हम प्रतिज्ञा करते हैं कि हम इस नकली दुर्ग पर मेवाड़ का अधिकार नहीं होने देंगे
.
प्र.६. महाराणा किसकी वीरता से प्रभावित हैं और क्यों ?

उ. महाराणा वीर सिंह की वीरता से बहुत प्रभावित हुए .उन्होंने अभय सिंह से वीर सिंह और उसके साथियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि निश्चय ही इन वीरों की जन्मभूमि के प्रति आदरभाव सराहनीय हैं . धन्य हैं ऐसे वीर ! धन्य है वह माँ जिसने ऐसे वीर पुत्र को जन्म दिया . धन्य है वह भूमि ! जहाँ पर ऐसे सिंह पैदा होते हैं .

प्र. ७. मातृभूमि का मान एकांकी का उद्देश्य क्या हैं ? इसके माध्यम से एकांकीकार ने क्या कहने का प्रयन्त किया हैं ?

उ. मातृभूमि का मान श्री हरिकृष्ण प्रेमी जी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक एकांकी है .इस एकांकी का प्रमुख उद्देश मातृभूमि के प्रति प्रेम को दिखाना है . राजपूतों की वीरता ,शौर्य ,पराक्रम के साथ - साथ उनकी आन - बान और शान का प्रस्तुतिकरण भी प्रस्तुत एकांकी का उद्देश्य है . एकांकीकार ने इन चरित्रों के माध्यम से देशवासियों में एकता अखंडता बनाए रखने ,राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए अपनी मातृभूमि से प्रेम ,उसकी रक्षा करते हुए बलिदान की भवन को जगाना ही इस एकांकी का उद्देश्य है .



MCQ Questions with Answers Mathrubhumi Ka Maan


बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 
प्र. १. 'मातृभूमि का मान' एकांकी के लेखक है ?
a. हरिकृष्ण प्रेमी 
b. मोहन राकेश 
c. राजेन्द्र यादव 
d. यशपाल 

उ. a. हरिकृष्ण प्रेमी 

प्र. २. हरिकृष्ण प्रेमी का जन्म कहाँ हुआ था ?
a. भोपाल 
b. इंदौर 
c. दिल्ली 
d. गुना 

उ. d. गुना 

प्र. ३. हरिकृष्ण प्रेमी जी किस रचना के कारण प्रसिद्ध है ?
a. उपन्यास 
b. नाटक व एकांकी 
c. कविता 
d. रिपोर्टिंग 

उ. b. नाटक व एकांकी 

प्र. ४. मातृभूमि का मान एकांकी में महाराणा लाखा को किसने पराजित किया था ?
a. कुषाण वंश 
b. मुगलों ने 
c. शकों ने 
d. कुछ थोड़े से हाडाओं ने 

उ. d. कुछ थोड़े से हाडाओं ने 

प्र. ५. मेवाड़ का राजा कौन है ?
a. वीर सिंह 
b. राव हेमू 
c. चारनी 
d. महाराणा लाखा 

उ. d. महाराणा लाखा 

प्र. ६. बूंदी राज्य का राजा कौन है ?
a. राव हेमू 
b. वीर सिंह 
c. अभय सिंह 
d. महाराणा लाखा 

उ. b. राव हेमू 

प्र. ७. महाराणा लाखा ने क्या ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा की थी ?
a. भोजन 
b. मिठाई 
c. शहद 
d. अन्न - जल 

उ. d. अन्न - जल 

प्र. 8. हाडाओं ने मेवाड़ पर किस समय आक्रमण किया था ?
a. भोर के समय 
b. दोपहर के समय 
c. रात के समय 
d. शाम के समय 

उ. c. रात के समय 

प्र. ९. मेवाड़ राज्य को कठिन समय में कौन सहायता करता रहा है ?
a. सिसोदिया वंश 
b. शक वंश 
c. मुग़ल वंश 
d. हाड़ा वंश 

उ. d. हाड़ा वंश 

प्र. १०. मातृभूमि का मान एकांकी में कौन मुख्य पात्र है ?
a.  वीर सिंह 
b. चारनी 
c. महाराणा लाखा 
d. अभय सिंह 

उ. a. वीर सिंह 

प्र. 11. राव हेमू ने किसकी गुलामी स्वीकार करने से इनकार कर दिया ?
a. बूंदी 
b. अभय सिंह 
c. वीर सिंह 
d. महाराणा लाखा 

उ. d. महाराणा लाखा 

प्र. १२. वीर सिंह कहाँ का रहने वाला था ?
a. चित्तौड़ 
b. बूंदी 
c. मेवाड़ 
d. दिल्ली 

उ. b. बूंदी 

प्र. १३. 'प्राण जाए पर वचन न जाए ' - कथन का वक्ता कौन है ?
a. महाराणा लाखा 
b. वीर सिंह 
c. अभय सिंह 
d. राव हेमू 

उ. a. महाराणा लाखा 

प्र. १४. एकांकी में नकली दुर्ग बनाने का सुझाव किसने दिया था ?
a. स्वयं लाखा 
b. चारणी ने 
c. राव हेमू ने 
d. वीर सिंह ने 

उ. b. चारणी ने 

प्र. १५. एकांकी में वीर सिंह नकली दुर्ग में किससे युद्ध करता है ?
a. मुगलों से 
b. हाडाओं से 
c. सिसौदियों से 
d. शको से 

उ. c. सिसौदियों से 

प्र. १६. महाराणा लाखा की युद्ध की योजना किस प्रकार की थी ?
a. विवेकपूर्ण 
b. अविवेकपूर्ण 
c. बहकावे में आकर 
d. उपयुक्त में से कोई नहीं 

उ. b. अविवेकपूर्ण 



COMMENTS

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  1. i need a perfect intro on mathrubhumi ka maan to write in my project please can i get so! i actually need some intro on writer of the topic and some on the topic i m really in need if the this please can i get so? please please

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  2. Thanks for the notes.its help me lot in my examination. 👌

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. अमर बलिदान का उद्देश्य और मूलांकआन के बारे मे कुछ दीजिए Please...... मेरी परीक्षा है और ये questions मुझे नहीं मिल रही hai

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  5. Please add objective questions for matribhumi Ka maan plzzz fast!!!

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हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika: मातृभूमि का मान
मातृभूमि का मान
मातृभूमि का मान Mathrubhumi ka Maan मातृभूमि का मान सारांश - मातृभूमि का मान श्री हरिकृष्ण प्रेमी जी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक एकांकी है ,जो की देश प्रेम तथा देश भक्ति पर आधारित है .
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