सुरक्षित पहुंच के बिना मुश्किल है शिक्षा उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बसे अनेक छोटे गाँव आज भी शिक्षा के अधिकार की बुनियादी चुनौती से जूझ रहे हैं।
सुरक्षित पहुंच के बिना मुश्किल है शिक्षा
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बसे अनेक छोटे गाँव आज भी शिक्षा के अधिकार की बुनियादी चुनौती से जूझ रहे हैं। यहाँ स्कूल होना मात्र पर्याप्त नहीं है, बल्कि वहाँ तक सुरक्षित पहुँचना और लगातार शिक्षा प्राप्त करना सबसे बड़ी समस्या है। यह समस्या तब और अधिक जटिल हो जाती है जब किशोरियों के लिए शिक्षा के अधिकार का मुद्दा सामने आता है। बागेश्वर जिले के गरुड़ ब्लॉक से लगभग तीस किलोमीटर दूर स्थित एक दुर्गम गाँव सुराग की कहानी इसी सच्चाई को सामने लाती है। यह कहानी किसी एक लड़की की नहीं है, बल्कि उन सैकड़ों किशोरियों की है, जिनके लिए स्कूल जाना रोज़मर्रा का संघर्ष बन चुका है।
इस गाँव की किशोरियाँ सुबह अँधेरे में घर से निकलती हैं। पांच बजे के आसपास शुरू होने वाली यह यात्रा आठ बजे स्कूल पहुँचने पर खत्म होती है। कच्चे और संकरे रास्ते, घने जंगल, जंगली जानवरों का डर और मौसम की मार, यह सब उनके रास्ते का हिस्सा है। स्कूल पहुँचने के बाद भी उनकी चुनौतियां समाप्त नहीं होतीं। पढ़ाई के साथ घरेलू जिम्मेदारियां और सामाजिक अपेक्षाएँ, सब मिलकर उनके लिए शिक्षा को एक बड़ा चैलेंज बना देती हैं। शाम को घर लौटते-लौटते देर हो जाती है और फिर घर के कामों में जुट जाना उनकी दिनचर्या बन जाती है।
ग्रामीण इलाकों में यह स्थिति केवल भौगोलिक कठिनाइयों तक सीमित नहीं है। सामाजिक और आर्थिक कारण भी उतने ही प्रभावी हैं। कई परिवारों के लिए लड़कियों की पढ़ाई आज भी प्राथमिकता नहीं बन पाई है। जब रास्ता कठिन हो और जोखिम भरा हो, तो माता-पिता का डर स्वाभाविक है। इसी डर के कारण कई लड़कियों का स्कूल बीच में ही छुड़वा दिया जाता है। गाँव के बुजुर्ग भी यह मानते हैं कि लड़कियों के लिए इतना लंबा और असुरक्षित रास्ता मानसिक दबाव पैदा करता है, जिससे वे घबराए रहते हैं।
इस गाँव की एक किशोरी पिंकी की कहानी इस पूरे परिदृश्य को और स्पष्ट करती है। वह बताती है कि गांव में हाई स्कूल नहीं होने के कारण उसे सलानी स्थित हाई स्कूल जाना पड़ता था। जो घर से काफी दूर था। जहां आने जाने के लिए परिवहन की कोई सुविधा नहीं है। रोज़ाना भारी बैग उठा कर पहाड़ी रास्तों को तय करना और समय पर घर लौटने की चिंता, सब कुछ उसके लिए कठिन था। लेकिन शिक्षा के प्रति लगन के कारण वह और उसकी जैसी गांव की अन्य लड़कियां रोज इन मुश्किल हालातों का सामना करते हुए स्कूल जाया करती थी। उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन स्कूल आने जाने के लिए परिवहन की सुविधा भी शुरू होगी। हालांकि उसकी दसवीं पूरी हो गई, लेकिन आज तक गांव से सलानी के लिए लड़कियों को पैदल ही आना जाना पड़ता है।
ऐसी कहानियाँ इस गाँव तक सीमित नहीं हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में माध्यमिक स्तर पर पहुँचते-पहुँचते बड़ी संख्या में लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं, खासकर ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में। शिक्षा मंत्रालय के 2021–22 के आंकड़े बताते हैं कि दुर्गम क्षेत्रों में स्कूल छोड़ने की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। वहीं, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, किशोरियों के लिए स्वच्छ शौचालय और सुरक्षित परिवहन की कमी शिक्षा में निरंतरता की एक बड़ी बाधा है। स्कूल प्रशासन भी इन समस्याओं से अनजान नहीं है। वह जानते हैं कि किस प्रकार लड़कियां रोजाना दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होकर हर खतरों से गुजरते हुए स्कूल आती हैं। बारिश के दिनों में तो अक्सर कई दिनों तक वह अनुपस्थित रहती हैं। इसके पीछे मुख्य कारण पहाड़ के फिसलन भरे रास्तों का डर। कुछ किशोरियां तकनीकी या शैक्षणिक सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं, क्योंकि नियमित उपस्थिति संभव नहीं हो पाती। जब पढ़ाई में निरंतरता टूटती है, तो उनका मन भी धीरे-धीरे स्कूल से हटने लगता है।
गाँव की कुछ महिलाएं चाहती हैं कि उनके बच्चों विशेषकर उनकी लड़कियों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएं मिले। वे मानती हैं कि पढ़ाई ही भविष्य बदलने का रास्ता है। लेकिन संसाधनों की कमी और व्यवस्थागत बाधाएं उनके इरादों के सामने दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं। कई बार लड़कियों को घर के कामों में मदद के लिए स्कूल जाने से रोक लिया जाता है, क्योंकि परिवार की रोज़मर्रा की ज़रूरतें पहले आती हैं। हालांकि बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जैसे समग्र शिक्षा अभियान, किशोरियों के लिए छात्रवृत्ति योजनाएँ और निःशुल्क पाठ्य पुस्तकें। लेकिन इन योजनाओं का लाभ तब ही प्रभावी हो सकता है, जब लड़कियों के लिए स्कूल तक सुरक्षित पहुँच सुनिश्चित की जाए। सड़क, परिवहन और आवासीय विद्यालय जैसी सुविधाएँ पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा को सुलभ बना सकती हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट भी इस बात पर ज़ोर देती है कि दुर्गम इलाकों में शिक्षा के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश सबसे आवश्यक है।
इस पूरे परिदृश्य में यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा केवल किताबों और कक्षाओं तक सीमित नहीं है। यह सम्मान, सुरक्षा और अवसर से जुड़ा प्रश्न है। जब तक किशोरियों को सुरक्षित वातावरण, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ और सामाजिक समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक स्कूल उनके लिए अधूरा सपना बना रहेगा। यह आवश्यक है कि नीतियाँ जमीनी सच्चाइयों को समझते हुए बनाई जाएँ और स्थानीय समुदाय को भी समाधान का हिस्सा बनाया जाए। लेकिन सवाल उठता है कि क्या आने वाले समय में इन लड़कियों की राह आसान होगी? क्या स्कूल तक आसान पहुँच वास्तव में सुराग जैसे दूर दराज पहाड़ी इलाकों की किशोरियों के लिए सुलभ बन पाएगा? जब तक इन सवालों के ठोस जवाब नहीं मिलते, तब तक पहाड़ की इन किशोरियों की जद्दोजहद जारी रहेगी, और उनकी आवाज़ हमें बार-बार यह याद दिलाती रहेगी कि शिक्षा तक पहुँच अभी भी सभी के लिए एक जैसा नहीं है।(यह लेखिका के निजी विचार हैं).
- सरिता अरमोली
बागेश्वर, उत्तराखंड


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