हर मोड़ पर उजाला हर महिला और किशोरी का साथी बने

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गाँव तक योजना पहुंची है रोशनी नहीं भारत के गांवों में रात का अँधेरा सिर्फ अँधेरा नहीं, बल्कि सुरक्षा-संकट, अवसरों का नुकसान, स्वतंत्र आवाजाही में बाध

गाँव तक योजना पहुंची है रोशनी नहीं


भारत के गांवों में रात का अँधेरा सिर्फ अँधेरा नहीं, बल्कि सुरक्षा-संकट, अवसरों का नुकसान, स्वतंत्र आवाजाही में बाधा और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को जोखिम में डालने वाला अनुभव बन जाता है। यह वह मुश्किलें हैं जो उत्तराखंड के बागेश्वर जिला के एक दूर दराज गाँव जखेड़ा के लोगों को रोज झेलनी पड़ती है। इस छोटे से गांव में जहाँ लगभग 1546 लोग रहते हैं, रात के समय कच्चे रास्तों पर चलते हुए डर और असहजता आम बात है। बच्चों से लेकर पुरुष, महिलाएँ और बुजुर्ग सभी को अँधेरे से जूझना पड़ता है क्योंकि रास्तों पर पर्याप्त रौशनी नहीं होती है।

गाँव वालों का कहना है कि सड़क पर लाइट की व्यवस्था न होने की वजह से रात में चलना जोखिम भरा हो जाता है। जंगली जानवरों से लेकर ठोकर खाकर गिरने तक के भय के साथ लोगों की इस पर से गुजर होती है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार सोलर लाइट की व्यवस्था की जाती है, और जखेड़ा गाँव के कुछ रास्तों पर इसकी व्यवस्था भी है, लेकिन अभी भी गाँव के सभी रास्तों पर लोगों को इस सुविधा का इंतज़ार है।

देश स्तर पर भी सोलर स्ट्रीट लाइटें लगाने की कई योजनाएं मौजूद हैं। अटल ज्योति योजना के तहत अब तक 257 जिलों में लगभग 2.72 लाख सोलर स्ट्रीट लाइटें लगाई जा चुकी हैं, और यह प्रक्रिया अभी भी जारी है, ताकि उन इलाकों को रोशन किया जा सके जहाँ ग्रिड-बिजली भरोसेमंद नहीं है। राज्य स्तर पर भी कई योजनाएं चल रही हैं। हरियाणा में बिजली पहुँचाने के प्रयासों के तहत सोलर स्ट्रीट लाइटें लगाई जा रही हैं, लेकिन कई गांवों में अभी भी पर्याप्त संख्या में रोशनी नहीं पहुँची है।

गाँव तक योजना पहुंची है रोशनी नहीं
अब उत्तराखंड राज्य के उदाहरण को देखें तो यह राज्य हिमालयी भौगोलिक क्षेत्र में बसा हुआ है, जहां बिजली की निरन्तरता चुनौतीपूर्ण रही है। उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा) और अन्य विभागों ने ग्रामीण हिस्सों में सोलर लाइटों की स्थापना के लिए कदम उठाए हैं। चम्पावत जिले के ग्रामीण इलाकों के लिए उरेडा को लगभग ₹72 लाख की धनराशि मिली है, जिससे चार विकासखंडों में एलईडी-आधारित सोलर स्ट्रीट लाइटों की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह धनराशि सोलर लाइटें लगाने और ग्रामीण रास्तों, सार्वजनिक स्थानों को रोशन करने के लिए आवंटित की गई है जिससे अँधेरे में आवाजाही आसान हो सके।

इसके अतिरिक्त, अप्रैल 2025 में अल्मोड़ा जिले में लगभग ₹90 लाख की लागत से गाँवों में सोलर लाइट लगाई गई, जो छह ब्लॉकों में 72 स्थानों तक रात की आवाजाही को आसान बनाने में मदद कर रही है। इस तरह की पहल से यह क्षेत्र न सिर्फ अँधेरे को कम करता है, बल्कि रात में स्कूलों, बाज़ारों और चिकित्सकीय सेवाओं तक पहुँच भी सुलभ बनाता है। पिछले कुछ महीनों में नैनीताल जिले के लिए निजी कंपनी के CSR फंड और सांसद के सहयोग से लगभग 1400 सोलर स्ट्रीट लाइटों की व्यवस्था की गई, ताकि गाँवों की गलियों और सड़क किनारों को उजाला मिल सके। स्थानीय प्रशासकों ने कहा है कि पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा योग्य स्थलों का चुनाव किया जाना चाहिए ताकि रोशनी का लाभ सभी तक समान रूप से पहुँचे।

इन आँकड़ों और परियोजनाओं को देख कर यह समझ में आता है कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में सोलर लाइट की आवश्यकता सिर्फ एक तकनीकी समाधान नहीं है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता में वास्तविक बदलाव लाने वाली आवश्यकता भी है। जहां बिजली का ग्रिड की समुचित व्यवस्था नहीं पहुंच रही है, वहाँ सोलर स्ट्रीट लाइट गाँवों को रात में सुरक्षित महसूस कराने का एक सरल और टिकाऊ उपाय बन रही हैं, जो स्थानीय लोगों की आवाजाही, बच्चों की पढ़ाई, महिलाओं की स्वतंत्रता तथा बुजुर्गों की रात की सुरक्षा को बेहतर बनाती हैं।

जब हम जखेडा जैसा गाँव देखते हैं, जहाँ लोग रात में सड़क पर चलते समय डर महसूस करते हैं, उनकी ज़रूरत और अपेक्षा निर्विवाद रूप से स्पष्ट होती है। वे चाहते हैं कि हर रास्ता, हर घर मोड़ पर पर्याप्त रोशनी हो ताकि कोई भी रात के अँधेरे में अपने दैनिक कामों, घर-परिवार, और सामाजिक भागीदारी से वंचित न रहे। गांव वाले यह भी कहते हैं कि रोशनी बिना भेदभाव सब तक पहुँचनी चाहिए। किसी जाति, समूह या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न हो और यह कि सोलर लाइटें ऐसी हो कि उनकी बैटरियाँ सुरक्षित रहें, चोरी या क्षति से बची रहें और लंबे समय तक काम करें।

सोलर स्ट्रीट लाइटें गाँवों में सिर्फ उजाला प्रदान नहीं करती हैं बल्कि वे लोगों के दिलों में खुशी, निडरता और संवाद की भावना जगाती हैं। अंधेरे की रातें हलकी-सी रोशनी में बदलने से लोग शाम के समय बाजारों, सामुदायिक सभाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय हो सकते हैं। किशोरियों को पढ़ाई करने और महिलाओं को घर के बाहर सुरक्षित महसूस कराता हैं जिससे वे सामाजिक जीवन में अधिक भाग ले पाती हैं।

इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या सरकारी योजनाएं और स्थानीय प्रशासन की पहल जखेडा जैसे गांवों तक इतनी रोशनी पहुँचा पाएगी कि हर व्यक्ति विशेषकर महिलाएं और किशोरियां खुद को सुरक्षित महसूस कर पाएं? उत्तराखंड के उदाहरण से पता चलता है कि संसाधनों के सही उपयोग, स्थानीय लोगों की सहभागिता और योजनाओं की निरन्तर निगरानी से अंधेरे को रोशन किया जा सकता है। गाँव के लोग जब यह देखते हैं कि उनके रास्तों पर लाइटें लगी हैं, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे जरूरत के समय बेफिक्र होकर रात में बाहर निकल पाते हैं।

सोलर लाइट सिर्फ बिजली का विकल्प ही नहीं हैं बल्कि वे जीवन की गुणवत्ता में बदलाव लाती हैं और गांवों को रात के समय भी जीवंत बनाती हैं। यही वह उम्मीद है जो जखेडा के लोग उजाला की किरणों में देखना चाहते हैं एक सुरक्षित, सक्षम और रौशन जीवन, जहाँ अंधेरे की रातें सिर्फ भूली-बिसरी बात बन जाएँ और हर मोड़ पर उजाला हर महिला और किशोरी का साथी बने।(यह लेखिका के निजी विचार हैं)


- कविता हुलेरिया
सैलानी, उत्तराखंड

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