समुद्र की पुकार कराई पर खड़े लोग समुद्र के भीतर जाती नावों को चिंता भरी आँखों से देखते रहे, पुकारते रहे — लौट आओ, लहरों का समय ठीक नहीं, यही कहा उन्ह
समुद्र की पुकार
कराई पर खड़े लोग
समुद्र के भीतर जाती नावों को
चिंता भरी आँखों से देखते रहे,
पुकारते रहे — लौट आओ,
लहरों का समय ठीक नहीं,
यही कहा उन्होंने।
पर नावें फिर भी
धीरे-धीरे आगे बढ़ती रहीं,
मानो समुद्र ही
उनका भाग्य लिख रहा हो।
उधर तट के लोग
दोनों हथेलियों में
प्रार्थना समेटकर
आकाश निहारते रहे।
वे थके हुए हाथ
आँधी को भी
साधारण काम की तरह
स्वीकार करते रहे।
जल-पक्षी
नीचे उतरकर
नावों के साथ-साथ
घूमते रहे,
कोई संकेत खोजते हुए।
किनारे पर बैठे लोग
अपने मन की गणना में
हर क्षण को तौलते रहे—
भय भी,
आशा भी,
और सत्ता का खेल भी।
फिर भी सादा विश्वास
हर बार उन नावों के संग
लहरों में उतर पड़ता है,
थककर लौट आता है,
और अगली सुबह
फिर वही राह पकड़ लेता है।"
बचपन लौट कर नहीं आता
"मैंने सोचा —
एक दिन लौटूँगा वहीं,
जहाँ धूल में खेलते हुए
आसमाँ को छुआ था मैंने।
आँगन में खड़े पेड़ों ने
मुझसे पहले जाना था बारिश,
मैं सिर्फ़
भीगने का बहाना ढूँढता रहा।
वे रास्ते
अब भी वही हैं—
पर पैरों का भरोसा बदल गया,
और दिल ने सीखा
कि स्मृति ही दूसरा घर होता है।
बचपन!
तू पलक बंद करते ही आ जाता है,
और खुलते ही
दूर की पहाड़ी बन जाता है।"
गाँव की साँझ
"खेतों पर उतरती रोशनियाँ—
धीरे-धीरे
पत्तों की हथेली में समा जाती हैं।
माँ की आवाज़
रसोई की आँच के साथ गूँजती है,
और आँगन में
चुपचाप बैठ जाता है समय।
पकते धानों की गंध
पलकों पर टिक जाती है,
और मैं सोचता हूँ—
क्या सचमुच
इतना सरल था जीवन?
साँझ की पहली सितारा-रेखा
आसमान पर लिखती है—
घर वहीं है
जहाँ यादें साँस लेती हैं।"
पेड़ों की छाया
"पेड़ बोलते नहीं—
पर उनकी छाया
सबसे गहरी बात कह जाती है।
उन्होंने देखा
आते-जाते मौसम,
बिखरते मेले,
और लौटते हुए परिंदों की थकान।
वे खड़े रहे—
नम आँखों वाले प्रहरी की तरह,
और हमें सिखाते रहे
धीरज का हरा अर्थ।
कितनी बार
मैंने उनकी जड़ों के पास
अपने डर रखे—
और हल्का होकर लौट आया।
ओ पेड़ों!
तुम्हारी छाया में
जीवन उतना ही बड़ा दिखा
जितना हम देखने की हिम्मत कर पाए।"
टूटी उम्मीदों का रास्ता
जीवन के मोड़ों पर
अकसर धोखा ही मिला,
हाथों में पकड़े सपने
धीरे-धीरे रेत बने गए।
हर चाहत, हर उम्मीद
आधी-सी रह गई,
दिल के भीतर की आवाज़
खामोशी में बदल गई।
कंधों पर बोझ बढ़ा,
और रास्ते सिमटते गए,
मैंने सोचा — शायद यही
मेरी किस्मत में लिखे गए।
इच्छाएँ दीवारों पर
छायाओं-सी टंगी रहीं,
अनकहे शब्दों में
कितनी कहानियाँ दबती रहीं।
भीतर की लड़ाई
मैंने कई बार चाहा
अपने दरवाज़े खोल दूँ,
किन्तु हर बार टूटकर
फिर से खुद को जोड़ना पड़ा।
डर ने पाँव बाँध दिए,
सपनों ने मुँह मोड़ लिया,
अपने ही साए ने
मुझे पहचानना छोड़ दिया।
दोस्त भी थे पास,
फिर भी दूरी-सी रही,
अपनों की आँखों में
अजनबी-सी झलक दिखी।
समय ने सिखाया —
गिरना भी एक पाठ है,
और आँसुओं के भीतर
छुपा साहस साफ़ है।
नए सूरज की प्रतीक्षा
फिर भी कहीं गहराई में
एक छोटी-सी चिंगारी है,
जो हर रात कहती है —
कल का सूरज हमारी है।
अब मैं जीवन से
कम अपेक्षा करता हूँ,
पर हर छोटे उजाले में
एक नया अर्थ ढूँढता हूँ।
रास्ता लंबा सही,
मंज़िल अभी दूर भी,
पर कदम मेरे अब
थोड़े-से मजबूर नहीं — मजबूत हैं।
यही मेरे संघर्ष की पहचान,
यही मेरी छोटी-सी जीत है —
अँधेरों के बीच भी
उम्मीद अब तक जीवित है।
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