गिरफ्तारी का ग्लोबल शो सुबह-सुबह खबर आई।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति रहे निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया को “अरेस्ट
गिरफ्तारी का ग्लोबल शो
सुबह-सुबह खबर आई।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति रहे निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया को “अरेस्ट” कर लिया। खबर सुनते ही दुनिया भर के न्यूज़रूम में वही पुराना सवाल गूंजा।यह खबर है या ट्रंप का नया रियलिटी शो? एंकरों की भौंहें उतनी ही ऊँची उठीं, जितनी ट्रंप की दीवारें होती हैं।ऊँची, मोटी और अक्सर कल्पना से बनी।
अब यह गिरफ्तारी असल हो या प्रतीकात्मक, कानूनी हो या कैमरे की रोशनी में की गई, इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि दुनिया को एक बार फिर यह बताया गया।दुनिया एक मंच है, मंच पर अमेरिका है, और अमेरिका में ट्रंप हैं। बाकी सब सह-कलाकार।किसी को खलनायक बनना है, किसी को दर्शक। टिकट का पैसा डॉलर में।
ट्रंप की राजनीति हमेशा से इवेंट-मैनेजमेंट रही है। व्हाइट हाउस उनके लिए कोई प्रशासनिक भवन नहीं, बल्कि स्टूडियो है।जहाँ हर दिन नया एपिसोड शूट होता है। कभी टैरिफ की तलवार, कभी दीवार का ड्रोन-शॉट, कभी ट्वीट का क्लोज़-अप।...और इस बार गिरफ्तारी का ट्रेलर। ट्रेलर में मादुरो हैं, उनकी पत्नी हैं, और बैकग्राउंड में लोकतंत्र का म्यूज़िक।जिसका कॉपीराइट केवल अमेरिका के पास है।
मादुरो पर आरोप नए नहीं हैं।तानाशाही, ड्रग तस्करी, मानवाधिकार, चुनावी धांधली। दुनिया ने सुना है, देखा है, बहस भी की है। पर ट्रंप का तरीका अलग है। वे आरोप नहीं पढ़ते, वे पोस्टर बनाते हैं। पोस्टर पर चेहरे होते हैं, नीचे लिखा होता है—WANTED। न्याय उनके यहाँ अदालत में नहीं, कैमरे के सामने होता है। हथकड़ी से ज्यादा अहम माइक्रोफोन होता है। कानून से ज्यादा लाइक और रीट्वीट।अब सवाल यह नहीं कि मादुरो दोषी हैं या नहीं। सवाल यह है कि गिरफ्तारी किसकी है ।व्यक्ति की या संप्रभुता की?
जब एक देश का नेता दूसरे देश के नेता को पकड़ने का दावा करे, तो यह पुलिसिया कार्रवाई नहीं, भू-राजनीतिक कुश्ती होती है। और इस कुश्ती में रेफरी भी वही, खिलाड़ी भी वही, दर्शक भी वही। बाकी दुनिया पॉपकॉर्न लेकर बैठी है।कभी मानवाधिकार के, कभी तेल के।तेल! इस कहानी का सबसे ईमानदार पात्र। लोकतंत्र बोलता है, अधिकार रोते हैं, प्रतिबंध गाते हैं और तेल मुस्कुराता है।
वेनेजुएला का तेल बरसों से वैश्विक भूख का हिस्सा रहा है। जब तेल मीठा होता है, तब लोकतंत्र खट्टा नहीं लगता। जब तेल कड़वा हो जाए, तब मानवाधिकार की मिठास बढ़ जाती है। ट्रंप यह रसायन शास्त्र भली-भाँति जानते हैं। इसलिए गिरफ्तारी का स्वाद भी तेल में डूबा हुआ है।सिलिया की गिरफ्तारी पर तो और भी करुणा है।दुनिया ने पूछा, “पत्नी भी?” जवाब आया!“डेमोक्रेसी इज़ जेंडर न्यूट्रल।”
यानी जब दादागिरी हो, तो बराबरी पूरी होनी चाहिए। यह वही बराबरी है, जिसमें प्रतिबंधों की मार सबसे पहले आम आदमी पर पड़ती है,दवा, दूध, नौकरी सबको हथकड़ी लग जाती है। नेता तस्वीरों में बंद होते हैं, जनता रोज़मर्रा में।
ट्रंप की दादागिरी में एक खास किस्म की सादगी है। वे जटिल कूटनीति को सरल बना देते हैं।काले-सफेद में। दोस्त या दुश्मन। हाँ या ना। हमारे साथ या हमारे खिलाफ। यह सादगी बच्चों की कहानी जैसी है।जहाँ राजकुमार सही होता है और ड्रैगन गलत। फर्क बस इतना है कि ड्रैगन की जगह देश होते हैं, और कहानी का अंत हमेशा “टू बी कंटीन्यूड” रहता है।
संयुक्त राष्ट्र इस पूरी कथा में बुजुर्ग चाचा की तरह है,जो हर झगड़े पर शांति की अपील करता है, और बच्चे उसकी बात सुनकर फिर से खेल में लग जाते हैं। बयान आते हैं, प्रस्ताव जाते हैं, वोट पड़ते हैं और ट्रंप ट्वीट कर देते हैं।ट्वीट लोकतंत्र का सबसे तेज़ हथियार बन गया है ।जिससे सीमाएँ भी छोटी पड़ जाती हैं।
यूरोप ने चिन्तित स्वर में कहा,“यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हो सकता है।” अमेरिका ने जवाब दिया,“इंटरनेशनल लॉ इज़ फाइन, बट अमेरिका फर्स्ट।” लैटिन अमेरिका ने करवट बदली।कुछ ने ताली बजाई, कुछ ने आंखें मूँद लीं। पड़ोसियों को पता है।आज वेनेजुएला, कल कोई और। दादागिरी का मौसम बदलता नहीं, बस दिशा बदलती है।
मीडिया ने इस गिरफ्तारी को ‘साहसिक कदम’ कहा, ‘खतरनाक मिसाल’ कहा, ‘चुनावी स्टंट’ कहा। सबने कुछ न कुछ कहा, क्योंकि कहना ही काम है। पर किसी ने यह नहीं पूछा,क्या! यह दुनिया को बेहतर बनाता है? क्या! इससे वेनेजुएला के बच्चे स्कूल पहुँचेंगे? क्या! अस्पतालों में दवा आएगी?
इन सवालों का जवाब कैमरे में फिट नहीं बैठता।ट्रंप की राजनीति में न्याय एक ब्रांड है। ब्रांड का लोगो चमकदार है, टैगलाइन तेज़ है—Law & Order। लेकिन प्रोडक्ट अक्सर वही पुराना रहता है।दबाव, प्रतिबंध, धमकी। गिरफ्तारी भी उसी शेल्फ पर रखी गई है। उपभोक्ता भ्रमित न हों।यह पैकेजिंग बदली हुई है।
मादुरो और सिलिया की कथित गिरफ्तारी ने दुनिया को एक और सबक दिया।आज के समय में संप्रभुता एक ऐप है, जिसे ताकतवर जब चाहे अनइंस्टॉल कर दे। पासवर्ड वही रखता है, जिसके पास सर्वर है। लोकतंत्र क्लाउड पर है। ..और क्लाउड का मालिक है ट्रंप।
प्रश्न यह नहीं है कि ट्रंप ने क्या किया? प्रश्न यह है कि दुनिया इसे कैसे देख रही है।कोई ताली बजा रहा है ।कोई नैतिकता का पाठ पढ़ा रहा है।कोई तेल के दाम देख रहा है। और आम आदमी हमेशा की तरह कतार में खड़ा है। उसे न ट्रंप से गिरफ्तारी चाहिए, न मादुरो से भाषण। उसे चाहिए।रोटी, शांति और थोड़ा-सा सम्मान।
पर दादागिरी के इस लाइव प्रसारण में ये छोटी बातें अक्सर कट जाती हैं। कैमरा फिर से ट्रंप पर आता है।वे मुस्कुराते हैं, अंगूठा दिखाते हैं, और कहते हैं,“यू आर फायर्ड।”
दुनिया पूछती है,कौन?
जवाब आता है,आज कोई और। कल शायद हम।
..और इस तरह, गिरफ्तारी एक घटना नहीं, आदत बन गई है। "आदत" दुनिया को बताने की, कि ताकत ही न्याय है। जब तक ताकत है गिरफ्तारी इसी तरह होती रहेगी। लोकतंत्र ताकत का गुलाम है। लोकतंत्र की गुलाम ताकत नहीं।
- हनुमान मुक्त
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