रश्मिरथी राष्ट्रकवि श्री रामधारीसिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित एक कालजयी खण्डकाव्य है, जो महाभारत के प्रमुख चरित्र कर्ण के जीवन पर आधारित एक पौराणिक कृति
रश्मिरथी एक कालजयी खण्डकाव्य है
रश्मिरथी राष्ट्रकवि श्री रामधारीसिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित एक कालजयी खण्डकाव्य है, जो महाभारत के प्रमुख चरित्र कर्ण के जीवन पर आधारित एक पौराणिक कृति है। यह आज के युग की परिस्थितियों के चित्रण में पूर्णतः सफल रहा है। खण्डकाव्य की कथा का सार शौर्य, पराक्रम तथा दानवीरता ही यशस्वी महावीर कर्ण का दुर्बल पक्ष है जो उसे आजीवन आत्महीनता की आग में जलाता रहा। वह इतना कारुणिक है कि मन और मस्तिष्क को प्रभावित किये बिना नहीं रहता। जन्म होते ही माता द्वारा परित्यक्त होना, सूत-परिवार में पोषित होकर सूत-पुत्र कहलाना, शौर्य और साहस होते हुए भी राजकुमारों की प्रतियोगिता में अवसर न पाना, आचार्य द्रोण द्वारा उसे शिष्य रूप में ग्रहण न करना, द्रौपदी के स्वयंवर में तिरस्कृत होना, भीष्म द्वारा उसे महारथी न मानना आदि कर्ण के जीवन की ऐसी दुर्घटनाएँ हैं, जो उसे आजीवन अपमान का घूँट पीकर जीने को बाध्य करती हैं। 'रश्मिरथी' नामक खण्डकाव्य की कथा का आधार कर्ण के जीवन का यही कारुणिक पक्ष है।
कथा संगठन की विशेषताएँ
खण्डकाव्य की पूरी कथा सात सर्गों में विभक्त है। खण्डकाव्य के सभी नियमों और शर्तों को यह काव्य पूरा करता है। यद्यपि प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा का आधार महाभारत है, जिसमें कर्ण के चरित्र को इस प्रकार उरेहने का प्रयास किया गया है कि वह महाभारत का एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण चरित्र बन जाता है, फिर भी यहाँ पर कवि ने अपनी मौलिक सूझ के आधार पर घटनाओं को इस प्रकार चित्रित किया है कि कर्ण के चरित्र का शील-पक्ष, मैत्री-पक्ष, भाव और शौर्य विशेष रूप से निखर कर पाठकों के समक्ष आ जाता है। खण्डकाव्य के पाठोपरान्त पाठक इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि मैत्री तथा कृतज्ञता वे मानवीय गुण हैं, जिनके आधार पर उसने आज तक अपनी रक्षा की है एवं हजारों वर्ष पुरानी अपनी सभ्यता और संस्कृति को अक्षुण्ण रख सकता है। खण्डकाव्य के प्रारम्भ में ही कवि वर्ग-भेद से ऊपर उठकर मानवता के माप दण्ड को उद्घोषित करता है।
दुर्योधन के इस अहसान को कर्ण आजीवन नहीं भूलता। कृष्ण, कुन्ती, भीष्म किसी की प्रार्थना पर ध्यान दिये बिना वह अपने सहोदर पाण्डवों से लड़ता हुआ दुर्योधन के लिए आत्मोत्सर्ग कर देता है और पाठकों की सारी सहानुभूति समेट लेता है। अपमानों और षड्यन्त्रों के कुचक्र में कर्ण को दुर्भावनायुक्त खलनायक होने की सम्भावना हो सकती है। कवि ने अपनी काव्य- कला के आधार पर कर्ण के चरित्र को ऐसा उजागर किया कि वह सद्गुणों से युक्त मानवीय मूल्यों का प्रतिष्ठापक बन गया है ।
वर्णनात्मक काव्य होने के कारण कथा-क्रम में रोचकता के साथ-साथ तीव्रता है। भावों की बोझिलता से काव्य सर्वथा मुक्त है। खण्डकाव्य की सीमा के अन्दर वस्तु-चित्रण का अवसर प्रायः कम ही मिला है; किन्तु मार्मिक स्थलों के चित्रण में कवि को कमाल हासिल है। कथा-संगठन अत्यन्त ही सरल और स्वाभाविक है। संवादों और कथोपकथन की नाटकीयता से यथाक्रम में सजीवता आ गयी है। कहीं भी कलात्मक दुरूहता का आभास नहीं होता।
कर्ण का चरित्र इस खंडकाव्य में केवल एक योद्धा का नहीं, बल्कि एक ऐसे महामानव का है जो समाज के जातिवादी और रूढ़िवादी ढांचों से लड़ते हुए अपनी पहचान बनाता है। उसकी मित्रता दुर्योधन के प्रति एक अटूट प्रतिबद्धता है, जो जानते हुए भी कि वह गलत पक्ष में है, अपने मित्र का साथ नहीं छोड़ता। दिनकर ने कर्ण के भीतर चल रहे द्वंद्व को बहुत गहराई से उकेरा है, चाहे वह कुंती द्वारा अपनी असलियत बताए जाने पर पैदा हुआ भावुक क्षण हो या इंद्र द्वारा कवच-कुंडल मांगे जाने पर उसकी दानवीरता। वह एक ऐसा नायक है जो नियति की मार सहते हुए भी कभी झुका नहीं, और यही उसे 'महारथी' बनाता है।
इस काव्य में दिनकर ने युद्ध की विभीषिका के साथ-साथ शांति की अनिवार्यता पर भी जोर दिया है। उनकी शैली प्रबंधात्मक होते हुए भी मुक्तक की तरह प्रवाहमयी है, जहाँ शब्द अग्नि की तरह धधकते हैं और पाठक के हृदय में वीरता का संचार करते हैं। 'रश्मिरथी' केवल अतीत की कथा नहीं है, बल्कि यह हर युग के उस शोषित और वंचित व्यक्ति की आवाज है जिसे समाज उसकी योग्यता के बावजूद केवल उसके कुल या जाति के आधार पर पीछे धकेलता है। यह काव्य मनुष्य के भीतर छिपे उस स्वाभिमान की वंदना है जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानता और सूर्य के समान दैदीप्यमान रहता है। अंततः, रश्मिरथी एक ऐसी काव्य यात्रा है जो हमें बताती है कि विजय केवल रणक्षेत्र में नहीं जीती जाती, बल्कि चरित्र की शुद्धता और सिद्धांतों के पालन में भी निहित होती है।


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