कुंडली में धनयोग साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाय ।मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए ।। कबीर दास जी अपने प्रसिद्ध दोहे में लिखते हैं कि हे ईश्व
कुंडली में धनयोग
साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए ।।
कबीर दास जी अपने प्रसिद्ध दोहे में लिखते हैं कि हे ईश्वर, आप मुझे इतना ही दीजिए, जिससे मेरे परिवार का गुजारा हो जाए और साथ ही कोई भी मेहमान (साधु) मेरे घर से भूखा न जाए। इस दोहे में व्यक्त सादगी और उदारता की भावना मन को गदगद तो कर देती है, लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में सटीक नहीं बैठती, क्योंकि आज के युग में अधिकांश जातक विपुल धन-संपत्ति पाने की अभिलाषा रखते हैं। मानव जीवन में धन के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। हालांकि धन भावनात्मक व मानसिक शांति प्रदान नहीं कर पाता, लेकिन फिर भी युगों-युगों से धन को जीवन की मूलभूत आवश्यकता के तौर पर देखा जाता है। आज के मशीनी युग में धन से ही शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक दर्जा, मान-सम्मान आदि पाया जा सकता है। गोस्वामी तुलसीदासजी रामचरितमानस के बालकाण्ड में कहते हैं, "समरथ को नहीं दोष गोसाईं", अर्थात् सामर्थ्यवान् को दोषी नहीं ठहराया जाता। आज के समय में अक्सर धनी व्यक्ति को ही सामर्थ्यवान् माना जाता है। तभी तो धन के अभाव को जीवन की एक बड़ी कमी के रूप में देखा जाता है, क्योंकि इससे मानव को जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं में बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
धनयोग
पत्रिका में द्वितीय व ग्यारहवें भाव का सीधा संबंध धन से होता है। पत्रिका का पंचम व नवम भाव लक्ष्मी भाव कहलाते हैं। अतः पत्रिका के द्वितीय, पंचम, नवम व एकादश भाव धन योग बनाते हैं। जब पत्रिका में द्वितीय, पंचम, नवम व एकादश में से कीन्हीं दो या दो से अधिक भावों के भावेशों का आपस में कोई संबंध बनता हो तो उसे धन योग कहा जाता है। लेकिन किसी भी पत्रिका में धन योग बनाने वाले ग्रहों का नवांश में शुभ स्थिति में होना अति आवश्यक है। यदि धन योग बनाने वाले ग्रह नवांश में पीड़ित हों तो ऐसे धन योग जातक को शुभ परिणाम देने में लगभग असफल रहते हैं। भावार्थ रत्नाकर में धन योगों की बहुत अच्छी व्याख्या की गई है। पत्रिका का पंचम भाव बुद्धि, विवेक तथा पूर्वार्जित कर्मों का भाव है। द्वितीय भाव संचित धन का भाव होता है। अतः पंचमेश व द्वितीयेश का आपस में भाव परिवर्तन धनयोग कहलाता है। धनेश व लाभेश का भाव परिवर्तन भी धनयोग कहलाता है। चूँकि द्वितीय भाव मारक स्थान है तथा एकादश भाव भी अशुभ स्थान है इसलिए इसे राजयोग नहीं कहा जाता अपितु धनयोग ही कहा जाता है। इसके अतिरिक्त यदि पंचमेश पंचम भाव में ही स्थित हो तथा भाग्येश भाग्य भाव में ही स्थित हो तब भी यह धनयोग कहलाता है, क्योंकि इस स्थिति में जातक अपनी बुद्धि-विवेक व पूर्वार्जित पुण्यों के सहारे तथा अपने भाग्य के बल पर धनलाभ प्राप्त कर सकता है। यदि धनेश, नवमेश व लाभेश का अथवा या धनेश, लाभेश व पंचमेश का आपस में किसी भी प्रकार से कोई संबंध बन रहा हो तो यह भी धनयोग कहलाता है लेकिन यदि इस योग पर अष्टमेश का प्रभाव पड़ जाता है तो इस धनयोग का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
धन भाव के कारक बृहस्पतिदेव का संबंध धनेश से हो तो यह भी धनयोग कहलाता है, साथ ही इस योग में बुध का प्रभाव जातक को विपुल धन की प्राप्ति करवाने में सहायक हो सकता है। यदि धनेश धन भाव में हो, लाभेश लाभ भाव में हो तथा लग्नेश लग्न में ही स्थित हो तो भी यह धनयोग कहलाता है। इसके अतिरिक्त यदि धनेश व लाभेश दोनों लग्न में ही स्थित हों तो यह भी धनयोग कहलाता है। भावार्थ रत्नाकर में कहा गया है कि यदि चंद्रमा सप्तमेश होकर द्वितीय भाव पर स्थित हो तो यह धन प्राप्ति में सहायक होता है तथा इस योग के कारण जातक को नष्ट हुआ धन भी प्राप्त हो जाता है।
धन प्राप्ति के लिए सहायक ग्रह
मेष, सिंह व धनु अर्थात् 1, 5, 9 राशियाँ अग्नि तत्व, 2, 6, 10 राशियाँ पृथ्वी तत्व, 3, 7, 11 राशियाँ वायु तत्व तथा 4, 8, 12 राशियाँ जल तत्व राशियाँ कहलाती हैं। इसीप्रकार 1, 5, 9 भाव धर्म 2, 6, 10 भाव अर्थ 3, 7, 11 भाव काम तथा 4, 8, 12 भाव मोक्ष को इंगित करती हैं। एक आदर्श जातक जीवन में धर्म का पालन करते हुए धन कमाता है, फिर उस धन का उपयोग कामनाओं की पूर्ति के करता है। अंततः सभी कामनाओं की पूर्ति के उपरांत, जातक मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। बुध, शुक्र और शनि ये तीन ग्रह धन प्राप्ति और कामनाओं की पूर्ति के ग्रह हैं। जातक की पत्रिका में शुक्र, शनि व बुध के प्रबल होने पर जातक के द्वारा धन प्राप्ति व कामनाओं की पूर्ति होने की संभावनाओं में वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए यदि शनि गुरु की राशि, मीन राशि में एकादश भाव में स्थित हो तो जातक धन कमाकर अपने कामनाओं की पूर्ति करने में सक्षम तो होता है लेकिन संभव है कि उसकी कामनाएँ धर्म से या मोक्ष से जुड़ी। काल पुरुष की पत्रिका में दशम और एकादश भाव का स्वामी शनि होता है। दशम भाव अर्थ त्रिकोण का भाव है और एकादश भाव काम त्रिकोण का भाव है। दशम भाव पत्रिका का आकाश भाव कहलाता है, जिसकी कोई सीमा नहीं होती, इसके साथ ही वह उपचय भाव भी है। ग्यारहवाँ भाव सर्वोच्च उपचय भाव है।
अतः यदि पत्रिका में शनि प्रबल हो तो वह जातक को अत्यधिक सफलताएं दिलवाने में सहायक हो सकता है। काल पुरुष की पत्रिका में द्वितीय और सप्तम भाव के स्वामी शुक्र हैं। द्वितीय भाव से संचित धन का तथा सप्तम भाव से व्यापार व पति/पत्नी का विश्लेषण किया जाता है। जातक के लिए एक अच्छा पति या पत्नी भी सफलता में सहयोग प्रदान कर सकता है। इसके अतिरिक्त दशम का दशम भाव सप्तम होता है। काल पुरुष की पत्रिका में दशम भाव का स्वामी शनि तथा सप्तम भाव का स्वामी शनि के मित्र शुक्र है। अतः धन प्राप्ति के लिए पत्रिका में शुक्र का प्रबल होना शुभ होता है। काल पुरुष की पत्रिका में तृतीय व षष्ठम भाव का स्वामी बुध है। तृतीय व षष्ठम भाव उपचय भाव हैं। तृतीय भाव परिश्रम या पराक्रम का भाव है। छटवाँ भाव नवम भाव का दशम है अर्थात् यह भाग्य का कर्म है। अतः यदि जातक का भाग्य अच्छा हो तब ही जातक का परिश्रम सफल होता है व उसके अच्छे फलों की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि छटवाँ भाव रोग, ऋण व रिपु का भाव है, क्योंकि जातक को उसके कर्मों के आधार पर रोग, ऋण व रिपुओं से जूझना पड़ता है। इसप्रकार पत्रिका में प्रबल शुक्र, शनि व बुध धन प्राप्ति व कामनाओं की पूर्ति में सहायक होते हैं।
धन के स्रोत
पत्रिका का द्वितीय भाव धन भाव कहलाता है। अतः द्वितीय भाव, द्वितीय भाव में स्थित ग्रह, द्वितीय भाव को दृष्ट करने वाले ग्रह तथा द्वितीयेश की स्थिति को देखकर, जातक के द्वारा संचित धन का स्रोतों के बारे में जाना जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि पत्रिका का दशमेश द्वितीय भाव में स्थित हो जाए तो जातक के धन भाव पर उसके प्रोफेशन का नियंत्रण रहेगा अर्थात् जातक को धन उसके प्रोफेशन से प्राप्त होगा। यदि द्वितीय भाव में द्वादशेश स्थित हो तो जातक को द्वादश भाव के कार्यकत्वों के कारण ही धन की प्राप्ति होगी, जैसे विदेश से, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट से, इंवेस्टमेंट आदि से। इसके अतिरिक्त इस स्थिति में जातक जितना खर्च करता है, उसे उतना ही धन प्राप्त होता है क्योंकि बारहवाँ भाव खर्च का भी भाव है। यदि पत्रिका का अष्टमेश द्वितीय भाव में स्थित हो तो अष्टम भाव के कार्यकत्वों से जातक को धन की प्राप्ति होगी जैसे पैतृक संपत्ति के द्वारा अथवा ज्योतिष जैसी गुप्त विद्याओं के कारण या इंश्योरेंस के माध्यम से इत्यादि। यदि जातक की पत्रिका में आठवें भाव में बहुत सारे ग्रह स्थित हों और दूसरा भाव रिक्त हो तो आठवें भाव में स्थित ग्रह दूसरे भाव को सीधे दृष्ट करते है, अर्थात् वे सभी ग्रह दूसरे भाव को अपनी ऊर्जा देते हैं, इसलिए इस स्थिति में जातक को बहुत अधिक धन की प्राप्ति हो सकती है। लेकिन यदि द्वितीय भाव में बहुत सारे ग्रह स्थित हों तो जातक को जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि इस स्थिति में वे सभी ग्रह अष्टम भाव को दृष्ट करते हैं। यदि पंचम भाव में स्थित होकर कोई ग्रह (जैसे शनि) द्वितीय भाव को दृष्ट करता हो तथा द्वितीय भाव में कोई ग्रह न हो तो पंचम भाव के कार्यकत्वों के कारण जातक को धन की प्राप्ति होती है। जैसे जातक अपनी पढ़ाई अथवा रचनात्मकता का उपयोग करके धन प्राप्त कर सकता है। यदि द्वितीय भाव को कोई ग्रह दृष्ट करता है तब हमें यह देखना चाहिए कि वह ग्रह किन भावों का स्वामी है। तब उन भावों के कार्यकत्वों के द्वारा जिनका वह ग्रह स्वामी है अथवा उसे भाव के कार्यतत्वों के द्वारा जहाँ वह ग्रह स्थित है, जातक को धन की प्राप्ति हो सकती है
पत्रिका का ग्यारहवाँ भाव लाभ भाव कहलाता है। लग्न पत्रिका के ग्यारहवें भाव में स्थित ग्रह जातक के भौतिक लाभ के स्रोतों के बारे में जानकारी देते हैं। ग्यारहवें भाव में स्थित सभी ग्रह (शुभ या अशुभ) भौतिक लाभ के लिए अच्छे परिणाम देने वाले माने जाते हैं, इसलिए यह भी कहा जाता है कि किसी भी भाव से ग्यारहवें भाव में यदि अधिक ग्रह स्थित हों तो उस भाव की वृद्धि होती है। नवांश पत्रिका का इंक्यानवे वाँ (91th) नवांश जातक के आय के स्रोत को बहुत प्रभावित करता है। इस 91th नवांश में किसी भी ग्रह (शुभ या अशुभ) की स्थिति अच्छे परिणाम ही देती है। इंक्यानवे वाँ नवांश जानने के लिए सर्वप्रथम लग्न कुंडली के ग्यारहवें भाव को देखना चाहिए। तत्पश्चात् उस भाव में स्थित ग्रहों को नोट करना चाहिए। इसके बाद नवांश पत्रिका में सप्तम भाव में स्थित ग्रहों को देखना चाहिए। यदि वे ग्रह (जो लग्न पत्रिका के ग्यारहवें भाव में हों), नवांश पत्रिका के सप्तम भाव में स्थित हों तो वे इंक्यानवें वाँ नवांश में स्थित कहलाते हैं और जातक के जीवन में उस ग्रह से संबंधित लाभ का स्रोत प्रदान करने में सहायक होते हैं। यदि लग्न पत्रिका का ग्यारहवाँ भाव रिक्त हो तब नवांश पत्रिका के सप्तम भाव के स्वामी ग्रह को देखना चाहिए, वह इंक्यानवे वाँ नवांश का स्वामी होता है। अगर वह ग्रह (91th नवांश स्वामी ग्रह) लग्न कुंडली में ग्यारहवें भाव से संबंध बनाता हो या लग्न पत्रिका में ग्यारहवें भाव का स्वामी हो तो यह जातक की आय के अच्छे स्रोत प्रदान करता है तथा आय के स्रोतों के बारे में जानकारी भी देता है। इसके अतिरिक्त यदि वह ग्रह (91th नवांश स्वामी ग्रह) लग्न पत्रिका में द्वितीय भाव से संबंध बनाता है तब भी वह जातक की आय के स्रोतों के लिए शुभ परिणाम देता है। यदि 91th नवांश स्वामी ग्रह का संबंध लग्न पत्रिका में शुक्र या शनि से हो जाए तब भी वह जातक की आय के लिए अच्छे स्रोत प्रदान करता है, क्योंकि काल पुरुष की पत्रिका में ग्यारहवें भाव का स्वामी शनि और दूसरे भाव का स्वामी शुक्र है।
उपरोक्त उदाहरण में लग्न पत्रिका के ग्यारहवें भाव में शुक्र व केतु विराजमान हैं। शुक्र स्वराशि का है। नवांश पत्रिका के सप्तम भाव में शुक्र स्थित है, जो कि 91th नवांश में स्थित है। अतः जातक के लिए शुक्र आय के स्रोत के बारे में उचित जानकारी देने में सक्षम है। लग्न पत्रिका में शुक्र एकादशेश होने के साथ-साथ षष्ठेश भी है। यह जातक कास्मेटिक सर्जन है। इसप्रकार जातक के आय के स्रोत में शुक्र के नैसर्गिक कार्यकत्व तथा षष्ठम भाव के कार्यकत्व, दोनों का ही समावेश है।
धन प्राप्ति का समय
धन प्राप्ति के समय की गणना करने के लिए कई ज्योतिषीय सूत्र हैं, जिसमें से कुछ सूत्रों की व्याख्या निम्नानुसार है।
जातक को धन कब प्राप्त होगा यह जानने के लिए ग्रहों के गोचर की एक विशेष विधि का उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए सर्वप्रथम लग्न पत्रिका के ग्यारहवें भाव के स्वामी तथा द्वितीय भाव के स्वामी को नोट करना चाहिए। इसके उपरांत यह देखना चाहिए कि नवांश में ये दोनों ग्रह किन-किन राशियों में स्थित हैं। उन राशियों के त्रिकोण की राशियों को नोट करना चाहिए। जब बृहस्पतिदेव उन राशियों से गोचर करते हैं तब जातक को धन की प्राप्ति होती है, बशर्तें जातक की पत्रिका में धन योग हो। इस स्थिति में जब बृहस्पति किसी भी त्रिकोण राशि से गोचर कर रहे हों, तब लग्न पत्रिका में उस राशि स्वामी की डिग्री को नोट करना चाहिए। जब गोचर के बृहस्पति उस विशेष डिग्री पर आएँ तब जातक के लिए धनागमन की अत्यधिक संभावना होती है। यदि द्वितीय और ग्यारहवें भाव के स्वामी नवांश कुंडली में एक दूसरे से पंचम-नवम हों या एक साथ ही स्थित हों तब इस सूत्र से ज्यादा अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके अलावा जिस राशि से गुरु गोचर कर रहा हो लग्न पत्रिका में उस राशि में शुभ ग्रह का प्रभाव हो या यदि उस राशि में लग्नेश या भाग्येश स्थित हो या उस राशि का स्वामी शुभ प्रभाव में हो तब भी बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। गुरु जिस राशि से गोचर कर रहा हो, लग्न पत्रिका में उसका स्वामी पीड़ित न हो तथा शुभ प्रभाव में हो तब ही इस अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। यदि गोचर का गुरु वक्री हो तो इस नियम के तहत परिणाम प्राप्त नहीं होंगे। यदि गोचर का गुरु अस्त हो जाए तब इस नियम के तहत परिणामों में कमी आ जाती है।
उपरोक्त उदाहरण में लग्न पत्रिका का एकादशेश गुरु है तथा द्वितीयेश बुध है। नवांश पत्रिका में गुरु कर्क राशि में स्थित है तथा इससे पंचम व नवम राशियाँ वृश्चिक व मीन हैं। अतः जब भी गुरु कर्क, वृश्चिक या मीन राशि से गोचर करेगा, जातक को धन की प्राप्ति हो सकती है। उसीप्रकार नवांश पत्रिका में बुध वृश्चिक राशि में है। वृश्चिक से पंचम व नवम भाव में मीन व कर्क राशियाँ हैं। अतः इस स्थिति मे भी जब गुरु वृश्चिक, मीन व कर्क राशि से गोचर करेगा, जातक को धन की प्राप्ति हो सकती है। माना कि किसी समय गुरु कर्क राशि पर से गोचर कर रहा है, ऐसी स्थिति में कर्क के स्वामी चंद्रमा की डिग्री लग्न पत्रिका में देखेंगे। माना कि लग्न पत्रिका में चंद्रमा की डिग्री 20° है। अतः जब गोचर का गुरु कर्क राशि में 20° पर आएगा, तब जातक के लिए धन प्राप्ति की संभावना अधिक होगी। इसीप्रकार यदि किसी समय गुरु वृश्चिक राशि में या मीन राशि में गोचर कर रहा हो तो लग्न पत्रिका में क्रमशः मंगल या गुरु की डिग्री देखकर धन प्राप्ति के समय का निर्धारण कर सकते हैं।
यदि तीसरे, छटवें, आठवें या ग्यारहवें भाव में नीच के ग्रह स्थित हों और उसपर किसी अन्य ग्रह का प्रभाव न हो तो उस ग्रह की दशा अंतर्दशा में जातक को धन की प्राप्ति हो सकती है। उदाहरण के लिए महारानी एलिजाबेथ की मकर लग्न की पत्रिका के तीसरे भाव में बुध मीन राशि में स्थित होकर नीच का है। अतः वह नवम भाव अर्थात् भाग्य भाव को दृष्ट करता है, जहाँ उसकी उच्च की राशि है। इस स्थिति में बुध की दशा-अंतर्दशा में उन्हें बिना किसी परिश्रम के अकूत धन की प्राप्ति हुई। यदि तीसरे, छठवें, आठवें या एकादश भाव के भावेश नीच के होकर इन्हीं स्थानों पर कहीं स्थित हो जाएँ और उनपर किसी अन्य ग्रह का कोई प्रभाव न हो तो वे अपनी दशा-अंतर्दशा जातक को अकूत धन की प्राप्ति करवा सकते हैं।
अकूत धन की प्राप्ति होना अत्यंत भाग्य की बात होती है, और भाग्य हमारे कर्मों से ही निर्धारित होता है। यदि पूर्व जन्मों के हमारे कर्म अच्छे रहे हों तब ही हमें इस जन्म में माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।अतः पूजा-आराधना के साथ-साथ निरंतर सन्मार्ग पर चलना ही हमारी सफलता और संतोष की कुंजी है।
- डॉ. सुकृति घोष,
प्राध्यापक, भौतिक शास्त्र,
शा. के. आर. जी. कॉलेज,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश



COMMENTS