न बोल सकी पीड़ाएँ कितनी बार कहना चाहा मन की चुभती हुई छुपी चोटें; पर शब्द काँपते रहे, और होंठ मूक रह गए। मेरे भीतर जो तूफ़ान उठे— उन्हें किसे दिखा
न बोल सकी पीड़ाएँ
कितनी बार
कहना चाहा
मन की चुभती हुई
छुपी चोटें;
पर शब्द
काँपते रहे,
और होंठ
मूक रह गए।
मेरे भीतर
जो तूफ़ान उठे—
उन्हें किसे
दिखा पाती मैं?
दहका भीतर,
चेहरे पर
मुस्कान ओढ़ ली।
अपने ही
साये से डरकर
मैंने रातें
जाग-जाग काटीं।
हर रिश्ते का
भार उठाकर
मैंने खुद को
हल्का बताया।
जो टूट गया
मन के भीतर—
उसे फिर-फिर
जोड़ती रही।
औरों के लिए
आस बनकर,
अपने लिए
अंधेरा सहा।
मेरी चुप्पी
सिर्फ़ चुप्पी नहीं—
हज़ारों अनकहे
वाक्यों का बोझ है।
हे जीवन!
कितनी बार
घायल होकर
मैं उठी हूँ!
आज बस इतना—
मेरी थकी आत्मा को
एक पल
ठहरने दो…
जो कहना था
कह चुकी हूँ—
बाक़ी अब
तुम समझ लो।
मेरी पीड़ाएँ
आख़िर एक दिन
रात के आकाश में
तारों-सी घुल जाएँगी…
और तब—
मैं पूरी तरह
मुक्त होकर
भीगे ढोल की पुकार
"बंद ढोल-सा बजता है मन,
कहीं दूर, कहीं भीतर।
बारिश धागों-धागों गिरती,
हर बूँद एक नया सुर।
भीगी मिट्टी में धड़कन,
हवा में नम-सा कंपन।
दास-ताल की पुरानी थकान,
फिर भी उठता अनोखा गान।
अचानक — हा! जैसे खुला आकाश,
थमकर चमक उठे श्वास।
आवाज़ में मिल गया जल,
और जल में कोई उजास।
क्षण भर को सब मुक्त,
केवल लय — केवल विश्वास।"
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समय से ऊपर कलाकार
"समय बदलता है—रूप बदलते हैं,
चेहरों की ऊष्मा, सपनों के पल बदलते हैं।
लेकिन सच्चा कलाकार ठहर जाता है,
लहरों को चीरता हुआ किनारा बन जाता है।
वह समय के माथे पर साहस से खड़ा रहता है,
क्षणों की धूल से अपना मार्ग गढ़ता है।
जब घड़ी की सुइयाँ दिशाएँ बदलें,
वह अर्थों में नई रोशनी जलाए।
समय झुकता है, पर कला नहीं—
वहीं जन्म लेती है अमरता।"
अनंत
"देवताओं की
मृत्यु-डगरों पर
क्यों भटके
यह जीवन?
फिर भी —
दुनिया की दीवारों में
भरी हुई हैं
हज़ार दरारें,
रिसते हुए घाव,
नींद से भरे पत्थर।
सिसिफस की तरह
हम ढोते हैं
अपना ही बोझ—
पहाड़ दर पहाड़,
दिन दर दिन।
क्या अब भी
यही सहना
काफ़ी है?
हे करुणा,
ज़रा और पास आ!
दिलों में
हल्की सी बारिश कर,
थके कंधों को
एक पल ठहरने दे।
देवताओं की
मृत्यु-डगरों पर
मत ले चलो हमें —
अब चाहिए
जीवित स्पर्श,
सांत्वना का उजाला,
और एक अनंत साँस।"
भलाई का बोझ
"जीने की गहरी चाह में
एक अजीब-सी बात घटी —
आत्महत्या ने दस्तक दी,
पर मेरे लिए नहीं।
दूसरों के दुख
मेरी साँसों पर चढ़ आए,
मैंने अपने सपनों को
चुपचाप गिरवी रख दिया।
भलाई कभी-कभी
जान तक माँग लेती है।"
पानी से भरी मरुभूमि
"समुद्र कुछ और नहीं,
बस पानी से लबालब
एक थकी हुई मरुभूमि-स्त्री।
जिसके बालों में नमक है,
आँखों में अनंत प्यास,
होंठों पर टूटे हुए गीत।
वह लहरों की चूड़ियाँ पहनती है,
और ज्वार-भाटा के घाव छुपाती है।
दूर से वह उदार लगता है,
निकट आओ तो खालीपन बोलता है।
जल उसके पास बहुत है,
पर पीने को एक बूंद नहीं।
वह सूखी धरती-सी प्रतीक्षारत,
बादलों की छाया को निहारती है।
रेत की स्मृतियाँ भीतर
काँटों-सी चुभती रहती हैं।
नावें उसकी गोद में सोती हैं,
पर उसे नींद नहीं आती।
तूफानों में वह कराहती है,
फिर शांत होकर मुस्कराती है —
जैसे स्वीकार कर चुकी हो
अपने ही अभिशाप को।
समुद्र कुछ और नहीं,
बस समय से चिरा हुआ
मरु-देह, जल से सिला हुआ।
गहराइयों में सिसकारियाँ तैरती हैं,
और तट पर अकेलापन जमता है —
हम उसे विस्तार कहते हैं,
वह खुद को रेगिस्तान जानती है।"
कविता का पलटता मौसम
"मैं भी कभी सोचता था
कविता अब किस काम की,
जब पेट जल रहा हो
और पैरों के नीचे
जरा-सी मिट्टी भी न हो।
जब धरती पर
गैर-धोखेबाज़ कोई न बचे,
तब तक —
कविता मुझे लगती थी
बेकार, बेअसर, अनसुनी।
उस समय
समुद्र चीखता था,
उफनती लहरें
आसमान तक चढ़ती थीं,
और मैं खड़ा रहता था चुप।
समुद्र के पेट से चिपकी
एक कोमल-सी बच्ची,
हाथ रखकर अपनी छाती पर
क्षितिज को देखती हुई
बस इतना कहती —
"हाय!
क्या सुंदर है यह दृश्य!"
शहर के किनारे
आधी रात बीतती जाती,
दो बूढ़े प्रेमी
हाथ में हाथ लिए
सपनों की बुनाई करते —
भरोसे के धागे,
प्रेम के धागे,
कल के धागे,
और धीमे से कहते —
"देखो,
कितनी अच्छी चाँदनी है!"
इन्हीं सबके बाद
एक दिन
कविता के लिए
भीतर कहीं
सम्मान जन्म लेने लगा।
जैसे अचानक
दिल ने कहा —
"रुको,
यह बेकार नहीं,
इसमें किसी का जीवन धड़कता है।"
इस बदली हुई भावना को
कुछ लोग
बहुत बड़ा नाम देते हैं —
कहते हैं,
"यह तो personal revolution है!"
और वे,
जो अपने-आपको
साहित्य के हाथी समझते हैं,
अपनी ही छाया से
डरते रहते हैं।
कभी नर-नायक,
कभी नारी-नायक,
ऊँचे स्वर में घोषणा करते —
"देखो,
यह सब हमने ही खोजा!"
पर सच पूछो
तो मन कहता है —
शायद नहीं।
शायद यह
चुपचाप हुआ एक परिवर्तन था।
जैसे किसी सूखी डाल पर
अनायास
हरी कोंपल फूट जाए,
जैसे बंजर धरती
अचानक सुगंध से भर जाए।
चाहे समय
कितना भी कठोर क्यों न हो,
चाहे चारों ओर
सूखा ही क्यों न फैले,
आकाश में कहीं
एक बादल
फिर भी नम रहता है,
जैसे कविता का हृदय
कभी नहीं सूखता।
इसलिए लगता है —
कविता के पास
अपना अलग ही मौसम है,
जहाँ हर विराम के बाद
फिर से फूल खिलते हैं,
फिर से एक नया अर्थ जन्म लेता है,
और शब्दों के भीतर
कई-कई ऋतुओं का वसंत उतर आता है।"
बुखार की बारिश
"सूरज की जलती भट्टी में
आकाश पिघल-सा जाता है,
मंद-मंद काँपते बादल
अपना ताप छिपा न पाते हैं।
उनकी धड़कनों में चिंगारी,
आँचल में अटकी थरथराहट,
नीले कपास का बदन
बुखार से भीगने लगता है।
गाढ़ी-सी घुटन टपकती,
हवा में नमकीन सिसकियाँ,
दूर कहीं बिजली की रेखा
दर्द की रुलाई लिख जाती है।
थक कर झुकते हैं बादल,
आँखें बन जातीं हैं नदियाँ,
तपिश से निकला पसीना
बूँद-बूँद धरती पर गिरता है।
वही पसीना — जीवन बनकर
खेतों के होंठ भिगो देता,
सूखे दिलों में ठंडी साँस
धीरे-धीरे भर देता है।
आकाश का बुखार उतरते ही
मिट्टी मुस्कान पहन लेती,
सूरज की कठोर आग में
करुणा — बारिश बनकर बहती है।"
- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
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