मैला आँचल उपन्यास में कालीचरण का चरित्र चित्रण फणीश्वरनाथ 'रेणु' के कालजयी आंचलिक उपन्यास 'मैला आँचल' में कालीचरण एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली
मैला आँचल उपन्यास में कालीचरण का चरित्र चित्रण
फणीश्वरनाथ 'रेणु' के कालजयी आंचलिक उपन्यास 'मैला आँचल' में कालीचरण एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पात्र है। वह उपन्यास में नई पीढ़ी के राजनीतिक उभार, जोश और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा का प्रतीक है।
कालीचरण यादव टोली का प्रमुख शक्तिशाली युवक है। गाँव में उसका दबदबा है। उससे सभी सदैव डरते रहते हैं। वह हर समय लड़ने-मरने के लिए तैयार रहता है। गाँव में जो बलवा होता है, उससे वह जेल भी जाता है। चर्खा सेन्टर की मंगला देवी से उसका यौन-सम्बन्ध स्थापित हो जाता है । बीमार अवस्था में वह उसे अपने घर ले आता है और इलाज करता है। उसके चरित्र के विकास कथानक में निम्न प्रकार हुआ है-
जोशीला जवान
कालीचरण जोश और क्रोध में आकर अपना होश खो देता है। बालदेव उसे समझाते हुए कहते हैं-
'कालीचरण तुम बहुत बहादुर नौजवान हो, लेकिन जोश में होश भी रखना चाहिए।'
कालीचरण सोशलिस्ट पार्टी का है वह पार्टी के बारे में कांग्रेसी बासुदेव से कहता है-
“यही पार्टी असली पार्टी है, गरम पार्टी है। 'किरान्तीदल का नाम नहीं सुना था ? -बम फोड़ दिया फटाक से मस्ताना भगतसिंह ने, यह गाना नहीं सुने हो। वह पार्टी है। इसमें कोई लीडर नहीं, सभी साथी है, सभी लीडर हैं। सुना नहीं। हिंसाबात को बुरजुआ लोग बोलता है। बालदेवजी तो बुरजुआ है, पूँजीवाद है । — इस किताब में सब कुछ लिखा हुआ है। बुरजुआ, बेटी बुरजुआ है, पूँजीवाद, पूँजीपति, जालिम जमींदार कमाने वाला स्वापेसा, इसके चलते जो कुछ भी है। अब बालदेवजी को लीडरी नहीं चलेगी। हर समय हिंसाबात, कुछ करो तो सब अनसन । कपड़ा की मेम्बरी किसी तरह मिल जाये तब देखना।”
रंगीन स्वभाव
कालीचरण पक्का सोशलिस्ट लीडर है कालीचरण बहादुर होने के साथ में रंगीन स्वभाव का भी है। होली का हुड़दंग निकलता है, इसमें कालीचरण का दल बहुत बड़ा है। गाँव के छोटे-छोटे दल भी कालीचरण के दल में मिल गये हैं। कालीचरण डॉ. प्रशान्त का सहायक बन गया। वह और उसका दल एक-एक आदमी को पकड़कर उसके सुई लगवाता है।
व्याख्यान देने में पटु
वह सोशलिस्ट पार्टी का नेता है। व्याख्यान देने में पटु है। युगों से पीड़ित, दलित और उपेक्षित लोगों को कालीचरण की बातें बड़ी अच्छी लगती हैं -
“मैं आप लोगों के दिल में आग लगाना नहीं चाहता हूँ। सोये हुओं को जगाना चाहता हूँ। सोशलिस्ट पार्टी आपकी पार्टी है। सोशलिस्ट पार्टी चाहती है कि आप अपने हकों को पहचानें। आप भी आदमी हैं। आपको आदमी का सभी हक मिलना चाहिए। मैं आपको मीठी बातों में भुलाना नहीं चाहता। वह कांग्रेस का काम है। मैं आग लगाना चाहता हूँ।"
कालीचरण सोशलिस्ट है और समाजवादी विचारों का समर्थक है।
मंगलादेवी से प्रेम
मंगलादेवी चर्खा सेन्टर में हैं। वे बीमार पड़ जाती हैं। कालीचरण उनको यादव टोली के कीर्तन घर में ले आता है। कीर्तन-घर में ही सोशलिस्ट पार्टी का ऑफिस है। निम्न कथोपकथन मंगलादेवी और कालीचरण के प्रणयाकर्षण को प्रकट कर देता है-
'दवा पी लीजिए !'
'नहीं पिऊँगी ?'
'पी लीजिए मास्टरनी जी।.....'
'काली बाबू, एक बात कहूँ ?' 'कहिए !'
आप मुझे मास्टरनी जी न कहिए ।'
'तब क्या कहूँ ?'
'क्या मेरा नाम नहीं है ?'
'मंगलादेवी'
'नहीं'
'तो ?'
'सिर्फ मंगला ।'
'दवा पी लीजिए।'
'मंगला कहिए।'
'मंगला !'
कालीचरण का व्रत टूट गया। उसके पहलवान गुरु ने कहा था— 'पठ्ठे ! जब तक अखाड़े की मिट्टी देह में पूरी तरह रचे नहीं, औरतों से पाँच हाथ दूर रहना ।'
पाँच हाथ दूर रहकर मंगला देवी की सेवा नहीं की जा सकती थी। बिछावन और कपड़े बदलते समय, देह पोंछ देने के समय कालीचरण को गुरूजी की बात याद आ जाती थी, परन्तु वह विवश था।
कालीचरण को सेक्रेटरी साहब के आदेश पर पार्टी की रैली में पटना जाना पड़ता है। वहाँ उनको अस्पताल में भरती सैनिक जी की स्त्री की देखभाल का भार सौंप दिया जाता है। यहाँ —— कालीचरण को रह-रहकर मंगला की याद आती है। वह राह देख रही होगी। वासुदेव जाकर कहेगा कि दो दिन के बाद आयेंगे। सुनते ही उसका मुँह सूख जायेगा। चेहरा फक हो जायेगा? हत्तेरे की !'
सैनिक जी की स्त्री के व्यवहार से क्षुब्ध होकर कालीचरण मंगला के विषय में सोचता है—
मंगला देवी भी तो औरत ही है। हुँ ! कहाँ मंगला और कहाँ यह भुतनी ! गले की आवाज एकदम खिखिर (लोमड़ी) की तरह है खेंक-खेंक, बातें करती है तो लगता है मानो दाँत काटने को दौड़ रहा । शायद यह भी कोई रोग ही है।
घर लौटते समय रोतहट स्टेशन पर गाड़ी से उतरकर यह सोचते हुए जल्दी-जल्दी चलता है—
'....उसे देखते ही मंगला खुशी से खिल जायेगी। सन्तरा सूख गया होगा, बिहदान पड़ा होगा। दोनों ओर का रेल भाड़ा बचाकर कालीचरण ने एक पैकिट बिस्कुट खरीद लिया है। डाक्टर साहब ने मंगला को बिस्कुट खाने के लिए कहा है। कालीचरण ने कभी बिस्कुट नहीं खाया है। शायद इसमें मुर्गी का अण्डा रहता
। वह रह-रहकर बिस्कुट के डिब्बे को छूकर देखता है। इसके अन्दर कुड़कुड़ क्या बोलता है ! कहीं अण्टा फूटकर ... ।'
खाती ।'
बिस्कुट का पैकिट ले जाने पर कालीचरण को मंगला की प्यार भरी झिड़की मिलती है-
'किसने काह फिजुल पैसा खर्च करने को ? वह देखो तुम्हारा सन्तरा और वेदाना पड़ा हुआ है मैं नही
यहाँ भी दोनों की प्यार भरी मनुहार चलती है-
'खा लो मंगला ।'
'पहले तुम एक बिस्कुट खाओ।'
बिस्कुट मीठा, कुरकुरा और इतना सुआद वाला होता है ? इसमें दूध, चीनी और माखन रहता है, अण्डा नहीं ।
पक्का सोशलिस्ट
कालीचरण पक्का सोशलिस्ट है। वह कांग्रेस को अमीरों, पूँजीपतियों और जमींदारों की पार्टी कहता है। वह 'लाल पताका' अखबार में छपी हुई खबर को सही मानता है। बावनदास कहता है कि कांग्रेस सरकार ने जमींदारी प्रथा को खतम कर दिया। इस पर वह बावनदास को उत्तर देता है-
'जब तक लाल पताका' अखबार में खबर छपी नहीं हो, इस पर विश्वास मत करो। कॉमरेड ! यह सब कांग्रेस आई है। खैर, मैं कल ही सेक्रेटरी साहब से पूछ आता हूँ। तुम लोगों ने मेम्बरी का पैसा जमा नहीं किया आफिस में । सब कॉमरेड को खबर दे दो। इस बार आखिरी तारीख है, इनके बाद 'लाल पताका' में नाम निकल जायेगा ।'
संथालों से संघर्ष में बहुत से लोग जेल भेज दिये गये हैं। कालीचरण पूर्णिया आकर उनकी पैरवी करता है। पूर्णिया से लौटकर वह डाक्टर प्रशान्त से कहता है-
'....उम्मीद है कि गाँव के सभी लोग छूट जायेंगे। हम लोग को तो सत्तू बाबू बोकलि ने बहुत तोड़ना चाहा, मगर उनको भी मालूम हो गया।'
कालीचरण के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी का विशाल जुलूस निकलता है। डाकू चलित्तर को आश्रय देने का अपराध उस पर लगता है। इस पर उसे पार्टी को बदनामी होने के भय से ग्लानि होती है, वह सोचता- 'काली को जेल का डर नहीं पार्टी को कितनी बड़ी बदनामी हुई। अरे 'लाल पताका' के बड़े लीडर लोग कैसे मुँह दिखलावेंगे ? सब चौपट कर दिया।'
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि कालीचरण यादव टोली का एक बलिष्ठ युवक है, विचारधारा से वह समाजवादी है। वह सोशलिस्ट आन्दोलन में भाग लेता है और कांग्रेस आई की आलोचना करता है। वह साहदय, दयालु और प्रेमी भी है। जैसा कि मंगलादेवी के प्रति उसके व्यवहार से प्रकट है। वह आँचल का एक महत्वपूर्ण युवक है।


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