मैला आँचल उपन्यास में देशकाल वातावरण कांग्रेसी आन्दोलन को सम्पूर्ण देश के माध्यम से इस प्रकार देखा गया है कि वह एक सामाजिक यथार्थ की सी तीव्रता लिए हु
मैला आँचल उपन्यास में देशकाल वातावरण
देशकाल अथवा वातावरण अथवा युग-चित्रण उपन्यास का प्रमुख तत्व है। कारण ? उपन्यास के अन्य तत्व किसी न किसी रूप में इसी तत्व से सम्बन्धित होते हैं। 'देशकाल के अन्तर्गत सामान्य रूप से किसी भी देश अथवा समाज की सामाजिक' धार्मिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ, आचार-विचार, रहन-सहन, रीति रिवाज तथा समाज की कुरीतियाँ अथवा विशेषताएँ आदि समझी जाती हैं। देशकाल के अन्तर्गत युग की परिस्थतियाँ और विशिष्ट सन्दर्भ में किये गये आन्दोलनों आदि की व्यापक भूमिका भी प्रस्तुत की जाती है।' इस तत्व का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक होता है । साधारणतः कथा में विश्वसनीयता लाने, चरित्रों को यथार्थमय बनाने और उपन्यास में प्रभावोत्पादकता का समावेश करने के लिए उपन्यासकार इसे ग्रहण करता है । आँचलिक उपन्यास में तो, स्थानीयता या आँचलिकता लाने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है इसी से आलोचकों ने देशकाल विषयक विभिन्न विशेषताओं पर ध्यान देना आवश्यक माना है। वर्णन की सूक्ष्मता, विश्वसनी, कल्पना, देशकाल और उसके प्रस्तुतीकरण में उपकरणात्मक सन्तुलन आदि ऐसी ही विशेषतायें हैं। जहाँ तक प्रश्न है देशकाल प्रकार का मुख्यतः उसे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक-भौगोलिक आदि वर्गों में रख सकते हैं।
श्री रेणु का 'मैला आँचल' आँचलिक उपन्यास है जिसमें बिहार के पूर्णिया जिले के एक गाँव-मेलीगंज के वर्णन द्वारा प्रतीकात्मक रूप में भारत के पिछड़े ग्रामों की स्थिति का अंकन किया गया है। इस प्रकार उपन्यास की कथा और पात्रादि ग्राम्य जीवन से सम्बन्ध हैं। मेरीगंज के चित्रण में उपन्यासकार ने_भौगोलिक स्थिति, खण्डहरों-नदी-नालों, जलवायु, बारिश-बाढ़, उपज-उपादान, पशु-पक्षियों आदि का परिचय,मानो गाँव का सर्वांगीण मानचित्र दिया है। इस गाँव की राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का प्रायः तटस्थ प्रतिरूपण है। इनकी वर्ग-व्यवस्था, जातिगत विषमता, रीति-रिवाज, आचार व्यवहार, खान-पान आदि भी प्रकट हुए हैं। जहाँ तक प्रश्न है—–कथा काल का, वह मुख्यतः स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् अर्थात् सन् 1942 से सन् 1948 तक का है। इसके अन्तर्गत उपन्यासकार ने विविध साधनों से मेरीगंज (और इसके माध्यम से भारत के पिछड़े ग्रामों) की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक, भौगोलिक आदि सभी प्रकार की स्थितियों का विस्तृत, गहन, सूक्ष्म और सब मिलाकर संवेदनामय अंकन प्रस्तुत किया है।
राजनीतिक स्थिति
'मैला आँचल' मुख्यतः कांग्रेसी आन्दोलन पर रचित उपन्यास है जिसमें सन् 1942-48 की राजनीति का जीता-जागता और समूचा चित्र प्रस्तुत किया गया है। विशेषता यह है कि 'कांग्रेसी आन्दोलन को सम्पूर्ण देश के माध्यम से इस प्रकार देखा गया है कि वह एक सामाजिक यथार्थ की सी तीव्रता लिए हुए लगता है।' जनसेवक बलदेव और कट्टर गाँधी भक्त बावनदास ऐसे ही लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कथा का प्रारम्भ सन् 1942 के जन आन्दोलन-वर्णन से होता है। जबकि बहरा चेहरू को मलेटरी गिरफाम (गिरफ्तार) कर लेती है। यह समाचार एक-एक करके समस्त गाँव में हलचल मचा देता है । यहीं पर मिलट्री का अत्याचार, रिश्वतखोरी और पुलिस के हथकण्डे प्रकट होने लगते हैं ।
राजनीतिक विचार के आधार पर गाँव में अनेक दलों के लोग हैं। रामकृष्ण कांग्रेस आश्रम का कार्यकर्ता बलदेव, ‘भारतमाता के जार-बार रोने से दुखी' बावनदास कांग्रेसी है तो कालीचरण समाजवादी, वासुदेव कम्युनिस्ट और संचालक जी जनसंघी हैं। अन्य चरित्र भी किसी दल में विश्वास रखते हैं। गाँव से सम्बन्धित मूल प्रश्न- भूमि के आधार पर सभी अपने-अपने दलों का गुणगान करने के साथ-साथ दूसरों का विरोध भी करते हैं। इस प्रकार चुनाव प्रचार, दलबन्दी, हिंसा-अहिंसा और बावनदास का अकाल वध आदि के जैसे विविध चित्र यहाँ अंकित किए गए हैं। चारित्रिक कार्य-कलापों पर राजनीति हावी जैसे विविध बालदेव का बात-बात पर अनशन करना बावनदास का गांधी और भारत माँ की दुर्दशा की दुहाई देना, कालीचरण का नये-नये नारे और पैम्पलेट बँटवाना, वासुदेव का लेनिन की भाँति डाढ़ी रखना, संचालक जी का हिन्दी और हिन्दू-राष्ट्रीयता का गुणगान करना आदि ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। यहाँ तक कि वासुदेव जनसंघियों का 'बुद्ध' क्लास कहता है, बालदेव 'कामरेड' कहने पर ही चिढ़ जाता है और कालीचरण आदि चन्दे के पैसों से अय्याशी तक करते हैं। विविध घटनायें भी राजनीतिक स्थिति को मुखर करती हैं यथा स्वतन्त्रता- जुलूस और महात्मा गाँधी का असामयिक निधन। इस प्रकार प्रस्तुत उपन्यास में सन् बयालिस के विप्लव से लेकर महात्मा गाँधी का असामयिक निधन तक के चित्र अंकित हैं। राजनीतिक चेतना का किस तरह धीरे-धीरे देहाती जीवन में संचार होने लगता है इसका सूक्ष्म निरीक्षण तथा जीवन्त चित्रण उपन्यास में प्रस्तुत किया गया है।
कहीं-कहीं उपन्यासकार ने तत्कालीन राजनीति पर गम्भीर व्यंग्य भी किए हैं। गलत-सलत नारे (जयपरगास जिन्दाबाद, जयहिन्द), अहिंसा, चुनाव, चन्दा उगाही, भाई भतीजावाद, एम. एल. ए. आदि ऐसे ही कुछ विषय हैं। संक्षेप में, 'इस उपन्यास में विभिन्न पात्रों के व्यक्तित्वों के नये-नये पक्षों को उजागर करती है 'नवीनता यह है कि 'मैला आँचल में राजनीति जीवन की पृष्ठभूमि के रूप में ही है जो पात्रों के व्यक्तित्व को और भी उभारती है, चारों ओर से घेर कर उनका गला नहीं घोंटती ।
राजनीतिक मतवादों और वर्गगत संघर्ष के प्रस्तुतीकरण में उपन्यासकार ने बड़े भारी आत्मसंयम से काम लिया है उसने किसी भी विचारधारा को अथवा अपने किसी भी विचारधारा को अथवा अपने जीवनबोध और सौन्दर्य बोध पर हावी नहीं होने दिया है। आज इस बात से शायद सभी सहमत हों कि हिन्दी के कथा-साहित्य के तत्कालीन दौर में यह एक बड़ी सफलता थी ।
सामाजिक स्थिति
सामाजिक स्थिति के अन्तर्गत वेषभूषा, भाषा, रीति-रिवाज, सामाजिक, वर्ग-जाति, शिक्षा, व्यापार आदि अनेक वर्णन निहित होते हैं। सूक्ष्मता, यथार्थता और विश्वसनीयता तथा शैली की प्रभावोत्पादकता इस अंकन के आवश्यक गुण माने गये हैं।
प्रस्तुत उपन्यास में मुख्यतः मेरीगंज ग्राम के समाज का चित्रण है यद्यपि मि. मार्टिन ममता और काँग्रेसी नेताओं के उल्लेखों में नगर समाज-विशेषतः पटना, कलकत्ता और नेपाल का भी पर्याप्त प्रस्तुतीकरण किया गया है। मेरीगंज का समाज प्रत्येक दृष्टि से पिछड़ा है किन्तु इसमें भी उसकी विशेषता है। इस समाज में एक ओर तहसीलदार-जमींदार विश्वनाथ प्रसाद, हरगौरी महन्त रामदास लक्ष्मी, लरसिंघ जैसे धार्मिक, बलदेव, कालीचरण और वासुदेव जैसे नेता, बावनदास जैसे देशभक्त और डॉ. प्रशान्त जैसे पढ़े-लिखे गाँव के उच्चवर्गीय लोग हैं तो दूसरी ओर फूलिया, रामपियारिया और संथाल जैसे साधारण निम्न वर्गीय लोग भी हैं। उपन्यासकार ने इन सभी कथाओं में एक ओर तो जाति-प्रेम, वर्ग-भेद, ऊँच-नीच, भोगविलास जैसी सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया है तो दूसरी ओर इनके खान-पान (यथा गाँजा, चने की घूंघली, ताड़ी, संतोथा आदि) वेषभूषा (चादर, पजामा, पतलून, लुंगी-मिर्जई) जाति-विभाजन (विविध टोले), रीति-रिवाज (भंडारा, जाट-जट्टनी नृत्य) और भाषा आदि से उनकी सामाजिक स्थिति को भी प्रकट किया है। इतना ही नहीं वरन् उनकी अज्ञानता, मूर्खता, लागडाट, ईर्ष्या, स्वार्थ और सर्वाधिक चोरी छिपा व्यभिचार आदि उनकी विविध सामाजिक दुर्बलताओं के भी चित्रण यहाँ देखे जा सकते हैं। इनमें पुरुष वर्ग के साथ-साथ ग्रामीण नारी वर्ग भी एकदम जीते-जागते रूप में उपस्थित हैं। गनेसी की माँ फूलिया, रामपियरिया, कालीचरण की माँ और कमला की माँ की कथा इसी के उदाहरण हैं ।
आर्थिक स्थिति
आर्थिक दृष्टि से गाँव में 'जात दो ही हैं, गरीब और दूसरी अमीर परिणाम ? 'जमीन के मालिकों से धरती पर इनका (जन-साधारण का) किसी भी किस्म का हक नहीं जमने दिया है। जिस जमीन पर उनके झोपड़े हैं, वह भी उनकी नहीं। इसी से कुछ एक गिने चुने को छोड़कर सारे गाँव में निर्धनता का है । कपड़ा हो या धान सभी का इन पर अभाव है। इसी से कपड़ा, तेल, चीनी आदि सभी के लिए गाँव में इतना हाहाकार मचात है कि बलदेव तक घबरा जाता है। पुरुष तो क्या? बालिका, युवतियाँ और बुढ़ियाँ तक कमर में एक कपड़ा लपेटकर काम चलाती हैं ? कालीचरण जैसे समाजवादी अवश्य 'जो जोते सो काटे' जैसे नारे लगाते हैं परन्तु संथाल विद्रोह पर वे भी जमींदारों का साथ देते हैं। डॉक्टर प्रशान्त एक मानसिक सहानुभूति और काव्यात्मक भावुकता तक सीमित रह जाता है। 'उसकी आँखें इन्सान के उन टिकोलों पर लड़ती हैं जिन्हें आमों की गुठलियों, सूखे गूदे की रोटी पर जिन्दा रहना है। डॉक्टर यहाँ की गरीबी और बेबसी को देख कर आश्चर्यचकित होता है ओढ़ने को वस्त्र नहीं; सोने को चटाई नहीं पुआल नहीं । देह में कड़वा तेल लगाना भी भोगविलास में नगण्य है। बेजमीन आदमी नहीं; वह तो जानवर है। गरीबी और जहालत इस रोग के दो कीटाणु हैं। ऐसे सच्चे यथार्थपरक चित्र न जाने कितनी संख्या में उपन्यास में स्थान-स्थान पर भरें पड़े हैं जो इसके अंचल के मैलेपन को स्पष्ट कर देते हैं और पाठक अवाक होकर रह जाता है।
धार्मिक स्थिति
प्रस्तुत उपन्यास धार्मिक स्थिति का सर्वाधिक दिग्दर्शन कराता है — गाँव में स्थित मठ । एक ओर यहाँ साहेब की पूजा, भक्ति-भाव, निर्गुणवाणी, बीजक पाठ और भंडारा आयोजन जैसे धार्मिक कार्यकलाप होते रहते हैं। किन्तु यह सब केवल दिखावा है। वास्तव में अन्धे महन्त, उनका शिष्य और उत्तराधिकारी रामदास, नागा बाबा, लरसिंह और लक्ष्मी तक विषय-भोग में व्यस्त रहते हैं। गांजे की चिलम हर समय सुलगती है और भोगविलास की पराकाष्ठा रामपियरिया के आगमन पर हो जाती है।
गाँव में भी धार्मिक स्थिति का अंकन पर्याप्त रूप से दृष्टिगोचर होता है। ज्योतिषी जी भविष्यवाणियाँ, भंडारे में जाति-पाँति का प्रश्न और गनेसी की बानी को चुड़ैल मानने जैसे अन्धविश्वास आदि इसी के परिचायक हैं। साथ ही साथ श्राद्ध भोज, ब्राह्मण को दक्षिणा देकर हुक्का पानी खुलवाना, ब्रह्मभोज आदि के विविध उल्लेख ग्राम की तत्कालीन धार्मिक स्थिति को प्रकट करते हैं ।
सांस्कृतिक स्थिति
सांस्कृतिक स्थिति में रहन-सहन, वेषभूषा, लोक-साहित्य, गीत, नृत्य, उत्सव, रीति रिवाज आदि विविध प्रकार के वर्णन आ जाते हैं। कहना न होगा कि 'मैला आंचल' में इनकी अधिकता है। उपन्यासकार ने प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही प्रकार से मेरीगंज की सांस्कृतिक स्थितियों का विशद रूप में प्रस्तुतीकरण किया है । समस्त अंचल में व्याप्त निर्धनता विद्वेष, जाति-वर्ग-भेद और अन्धविश्वास आदि के वर्णन रहन-सहन के परिचायक हैं। इसी प्रकार कमला मैया, सदाब्रिजकुमार, विज्जेमान आदि लोक कथाएँ, विविध बंगला- मैथिली और भोजपुरी गीत, विदापत, विदेशिया, बलचाही, संथाली, जाट-जट्टनी नृत्य लीला और इन्द्रपूजा आदि गीत-नृत्य, होलिकोत्सव, श्राद्ध, भण्डार, भोज और बरही जैसे रीति-रिवाज, बीजक, रामायण, प्रेम सागर जैसे प्रचलित ग्रन्थ, महात्माजी, महन्तजी जैसे सम्बन्धित, विविध प्रकार की स्थानीय गालियाँ आदि न जाने कितने प्रकार के वर्णन वहाँ की तत्कालीन संस्कृति का परिचय देते हैं।
प्राकृतिक भौगोलिक स्थिति
घटना की अनुकूलता और प्रभाव व्यकता में वृद्धि करने के लिए कभी-कभी उपन्यासकार सम्बन्धित पात्रों के सुख-दुख के साथ प्रकृति का तादात्मय भी नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करता है। निःसन्देह कहीं-कहीं रेणु जी ने भी ऐसा किया "यहाँ गड्डों और तालाबों में कमल के पत्ते भरे रहते हैं... लेकिन यहाँ के लोगों को तुम लोटस ईटर्स नहीं कह सकती हो। गड्डों की परीक्षा कर रहा हूँ। यहाँ की धरती बारह महीने भीगी रहती है। इसी भाँति मलेरिया- कारण लक्ष्मी का मन-चिन्तन, कमला की प्रेम- कल्पना आदि के प्रसंग देखे जा सकते हैं ।"
भौगोलिक परिस्थिति में जलवायु, भौगोलिक सीमा, खेती-बारी या पैदावार नदियाँ-नालों आदि से सम्बन्धित उल्लेख आते हैं। रेणु जी इनका पररिचय भूमिका से ही देने लगते हैं- "कथानक है पूर्णिया। पूर्णिया बिहार राज्य का एक जिला है, इसके एक ओर है नेपाल, दूसरी ओर पाकिस्तान और पश्चिमी बंगाल । विभिन्न सीमा रेखाओं से इसकी बनावट मुकम्मल हो जाती है, जब हम दक्खिन में संथाल परगना और पश्चिम में मिथिला की सीमा रेखाएँ खींच देते हैं।" इसी प्रकार जलवायु (बंजर भूमि, वर्षा का अभाव, दलदल आदि के वर्णन), पैदावर (धान, ताड़, पाखर, साहुड़, पुरइन, गमकौसा आदि), नदी (कमला नदी) आदि के विवरण मेरीगंज की भौगोलिक स्थिति को प्रकट कर देते हैं ।
निष्कर्ष
मैला आँचल में उपन्यासकार ने अंचल विशेष के देशकाल का विविध साधनों से विस्तृत, सूक्ष्म और प्रभावशाली चित्रण किया है। यह चित्रण यथार्थ तो है ही, रोचक, उत्सुकतावर्धन और संतुलित भी है। उपन्यासकार को अपने अंचल का पूरा-पूरा ज्ञान है और उसके प्रस्तुतीकरण में उसका मन व्याप्त है। ग्राम्य जीवन का इतना विशद् चित्र हिन्दी में, प्रेमचन्द के पश्चात् रेणु ही उपस्थित कर सके हैं और यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।


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