रोटी के लिए भटकता हुआ एक कुत्ता | हिंदी कहानी उस रात घर में चूल्हा तो जला, पर दीपक ने खाना नहीं खाया। माँ ने थाली रखी, दीक्षा ने भैया-भैया पुकारा,
रोटी के लिए भटकता हुआ एक कुत्ता
आँगन के कोने में बैठा जैकी बार-बार दरवाज़े की ओर देख रहा था।उसे आदत थी दीपक के लौटने की, उसके हाथ से रोटी खाने की। लेकिन उस रात न दीपक लौटा, न रोटी मिली।
“भैया कमरे में भी नहीं हैं”
दीक्षा ने डरते हुए कहा।
माँ ने कोई उत्तर नहीं दिया। आँखें बंद कर लीं।
पति के जाने के बाद घर जैसे धीरे-धीरे सिकुड़ता जा रहा था। खर्च बढ़ते जा रहे थे, आमदनी शून्य थी। दीक्षा का दाख़िला, दवाइयाँ, राशन सब कुछ माँ के कमजोर कंधों पर टिक गया था।
“दिन भर कमरे में पड़ा रहता है… न नौकरी, न कोई रास्ता,”
माँ मन ही मन बुदबुदाईं।
“जिस घर में कभी रोटी की कमी नहीं थी, आज वहाँ दो रोटियों का भी भरोसा नहीं।”
उन्हें अपने पति की याद आई वर्दी में खड़ा, आत्मविश्वास से भरा।
काश, वे आज होते।
दीपक उस रात मंदिर की सीढ़ियों पर भी नहीं गया।
वह पहली बार ईश्वर से भी नाराज़ था। उसे लगा प्रार्थनाएं पेट नहीं भरतीं। वह स्टेशन पहुँचा, टिकट लिया और अमृतसर की ट्रेन में चढ़ गया। चलती ट्रेन में उसे बस एक ही डर सता रहा था। अगर अब भी नौकरी नहीं मिली, तो यह घर भूखा रह जाएगा।उसके पिता पुलिस में दारोगा थे। एक मुठभेड़ में लगी गोली ने पूरे परिवार की नियति बदल दी थी। अस्पताल में पिता के अंतिम शब्द दीपक के लिए जीवन का आदेश बन गए थे।
“मैंने किसी का बुरा नहीं किया दीपक …
अब सब कुछ तेरे हाथ में है।” और अंत में बस इतना कहा
“जैकी को रोज़ रोटी खिलाना मत भूलना।”
पिता के जाने के बाद दीपक ने नौकरी ढूँढ़नी शुरू की दफ़्तर, दुकानें, फैक्ट्रियाँ। हर जगह वही सवाल—
“सिफ़ारिश है?”
जब ‘न’ कहा, तो सारे दरवाज़े बंद हो गए।
उसे समझ आया इस समाज में आदमी की कीमत उतनी ही है, जितनी उसकी पहचान।
एक दिन माँ की दवा खत्म हो गई।दीपक के पास सिर्फ़ चार रुपये थे। उसने दवा नहीं खरीदी रोटी ले आया। रात को उसने अपनी थाली जैकी के सामने रख दी। माँ ने देख लिया।
“इंसान पहले होता है, जानवर बाद में,”
माँ की आवाज़ काँप गई।
दीपक कुछ नहीं बोला।
उस रात माँ ने खाना नहीं खाया, और जैकी ने पहली बार तीन रोटियाँ खाईं। पड़ोस की औरतों के ताने शुरू हो गए
“कुत्तों को रोटी खिलाने से घर नहीं चलता।” दीपक पहली बार सिर झुकाकर निकल गया।
उसे लगा समाज की नज़र में उसकी और जैकी की हैसियत एक जैसी हो गई है। रात को मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा वह प्रार्थना कर रहा था कि एक भूखा बच्चा पास आकर बोला
“भैया, रोटी है?”
उसके पास सिर्फ़ एक रोटी थी जैकी के लिए।
उसने रोटी दो हिस्सों में तोड़ दी। उस रात जैकी भूखा रहा।
अमृतसर में चाचा ने उसे सीमेंट फैक्ट्री में काम दिलवाया। दिन भर धूल, मशीनों का शोर और थकान। रात को स्टेशन पर सोना ताकि पैसे बच सकें।
फैक्ट्री में एक आवारा कुत्ता था। दीपक रोज़ अपनी रोटी का हिस्सा उसे देता। उसे लगता वह जैकी को रोटी खिला रहा है।एक दिन मशीन में एक मज़दूर का हाथ कट गया। काम कुछ देर रुका, फिर सुपरवाइज़र बोला— काम चालू करो। उसी शाम फैक्ट्री के कुत्ते को किसी ने पत्थर मार दिया। दीपक को समझ आ गया काम में आदमी और कुत्ते की कीमत बराबर है।
एक साल लगातार काम करके उसने पैसे जोड़ लिए। उसे लगा अब वह घर लौट सकता है।
स्टेशन पर उसने एक बूढ़े को कूड़े के ढेर से रोटी उठाते देखा। उसने अपनी रोटी दे दी। बूढ़ा बोला "भगवान तुझे घर पहुँचा दे"।
ट्रेन चली।
दीपक सपनों में था माँ ठीक है, दीक्षा का एडमिशन हो गया है, जैकी उसके पास बैठा उसे चाट रहा है।
उसे पिता की बात याद आई
“नियति बदल सकती है।” लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। रास्ते में ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई।
अगली सुबह पुलिस दीपक के कपड़े लेकर उसके घर पहुँची।
माँ रोई नहीं।
दीक्षा की आँखें सूखी थीं।
उस दिन जैकी को किसी ने रोटी नहीं दी। वह दरवाज़े पर बैठा रहा। हर आहट पर उठता रहा। शाम को माँ ने थकी आवाज़ में कहा—“वह अब नहीं आएगा।”
जैकी पहली बार बिना आवाज़ के रोया।
घर में लोग थे, बातें थीं,लेकिन भीतर एक अजीब ख़ामोशी थी मानो घर नहीं, कोई खाली शमशान हो।
और कहीं किसी स्टेशन, किसी फैक्ट्री, किसी गली में अब भी रोटी के लिए कोई कुत्ता भटक रहा था।


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