गोदान में यथार्थ और आदर्श | मुंशी प्रेमचंद

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गोदान में यथार्थ और आदर्श मुंशी प्रेमचंद होरी धनिया गोबर झुनिया परेसुरी दातादीन झींगुरीसिंह ग्रामीण अंचल का यथार्थ चित्र उभारा है

गोदान में यथार्थ और आदर्श | मुंशी प्रेमचंद


लोचकों का एक वर्ग प्रेमचन्द को आदर्शवादी मानता है तो दूसरा उन्हें यथार्थवादी, पर प्रेमचन्द अपने को आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहते हैं। उनकी मान्यता है- “वही उपन्यास उच्चकोटि के समझे जाते हैं जहाँ यथार्थ और आदर्श का समन्वय हो गया हो। उसे आप 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' कह सकते हैं। आदर्श को सजीव बनाने के लिए यथार्थ का उपयोग होना चाहिए और अच्छे उपन्यास की यही विशेषता है।

वे यह स्वीकार करते हैं कि उपन्यास मानव-जीवन का चित्र मात्र है। साथ ही वह मानव-जीवन को दिशा देने वाला होता है। वे आदर्श के महत्व को स्वीकार करते हैं, पर साथ ही यह भी स्वीकार करते हैं कि उसमें यथार्थ का ऐसा समन्वय होना चाहिए कि वह सत्य से टूटा हुआ न जान पड़े।” हमें भी आदर्श की ही मर्यादा का पालन करना चाहिए, यथार्थ का उसमें ऐसा सम्मिश्रण होना चाहिए कि वह सत्य से टूटा न जान पड़े।" इसी से वे आदर्शवाद का थोड़ा-सा विरोध करते दिखायी देते हैं- "निर्दोष चरित्र तो देवता हो जायेगा और उसे हम समझ ही न सकेंगे। ऐसे चरित्र का हमारे ऊपर कोई घुमाव नहीं पड़ सकता।” (प्रेमचन्द : कुछ विचार 51)

इसी कारण प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों में ऐसे आदर्शवाद की स्थापना की है, जिसका आधार यथार्थवाद है। उनका यथार्थवाद के बारे में मत था - "कला दीखती तो यथार्थ है पर यथार्थ ही तो नहीं । उसकी खूबी यही है कि वह यथार्थ न होते हुए भी यथार्थ मालूम हो। उसका मापदण्ड भी जीवन के मापदण्ड से अलग है। कला का रहस्य भ्रान्ति है, पर वह भ्रान्ति, जिस पर यथार्थ का आवरण पड़ा हो।”(प्रेमचन्द : कुछ विचार पृ. 33-34)
 

गोदान में यथार्थ का स्वरूप

गोदान में यथार्थ और आदर्श | मुंशी प्रेमचंद
गोदान में उन्होंने तत्कालीन सामाजिक, पारिवारिक राजनीतिक जीवन का कच्चा चिट्ठा उभारा है, जिसमें ग्रामीण जीवन और संस्कृति के यथार्थ चित्र हैं। होरी, धनिया, गोबर, झुनिया तथा परेसुरी, दातादीन, झींगुरीसिंह आदि के माध्यम से ग्रामीण अंचल का यथार्थ चित्र उभारा है। बेगार, कर्ज, पंचायत, दण्ड, आर्थिक विपुलता, नैतिक-सम्बन्ध आदि सभी क्रिया व्यापार यथार्थ के प्रत्यक्ष रूप ही हैं। रायसाहब को तत्कालीन जमींदारों के सच्चे प्रतिनिधि के रूप में उभारा गया है, मालती आधुनिक जीवन की शिक्षित महिला के रूप लेकर आती है, (बाद का उसका चरित्र आदर्शात्मक हो उठा है। खन्ना शुद्ध पूँजीवादी है तो ओंकारनाथ दिखावटी आदर्शवादी । खन्ना गोविन्दी सम्बन्ध भी हमारे समाज के सम्भ्रान्त परिवारों के जीते जागते चित्र हैं।

यथार्थ चित्रण की विशेषता ही यह है कि वे पात्र हमारे आस-पास के जीवन से उठाये गये हों और उनका व्यक्तित्व, कृतित्व, दुख-सुख, आशा-आकांक्षा सब कुछ वैसा ही है जैसा सामान्य व्यक्ति का होता है। प्रेमचन्द के पात्र इस दृष्टि से एक वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। होरी जहाँ साधारण विपुल धर्मभीरु किसान के प्रतिनिधि हैं, वहीं पारिवारिक गृह-कलह का प्रतिनिधित्व होरी और शोभा करते हैं। नई रोशनी में (शहर) रहकर लौटा गोबर उसी प्रकार का आचरण करता है। मेहता बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधि है। इसी प्रकार शेष पात्र भी हैं जो उस वर्ग विशेष की सभी विशिष्टताओं को अपने में समाहित किए हुए हैं।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है गोदान के पात्र जो विभिन्न वर्गों के हैं, अपने यथार्थ रूप में सामने आते हैं और अपनी उन सभी विशेषताओं के साथ सामने आते हैं जो वास्तविक हैं। प्रेमचन्द के बारे में कहा जाता है कि वे शोषण के विरुद्ध थे, प्रगतिशील चिन्तक थे । पर यहाँ एक प्रश्न उभरता है कि होरी की समस्त पीड़ाओं को वे कैसे सहते रहे ? क्या वहाँ क्रान्ति की भावना का समावेश नहीं हो सकता था, न जबकि गोबर क्रान्ति को मचलता दिखायी देता है, पर होरी उसे दबा देता है और यही गोबर के घर परित्याग का एक प्रमुख कारण भी बनता है।

गोदान का आदर्श-साथ ही गोदान के पात्रों के जीवन से आदर्श भाव की सृष्टि भी होती है। होरी दण्ड देता है, आदर्श भाई का रूप प्रस्तुत करता है। झुनिया को अपनाकर होरी-धनिया दोनों एक श्रेष्ठ आदर्श को प्रस्थापित करते हैं। डॉक्टर मेहता का चरित्र तो आत्म-संयम, अभिमान शून्यता निर्भयता, निशंक अभिव्यक्ति, परोपकार, नारी-सम्मान आदि आदर्शों से युक्त है। मालती के चरित्र का उत्तरार्द्ध भी आदर्श सेवा, भावी आत्मसंयमी रमणी का चरित्र बन गया है। साथ-साथ बीच-बीच में कई स्थलों पर आदर्श के रूप उभरे हैं। शिकार पर मेहता मालती का व्यवहार और वनवासी युवती की सेवा भावना। झुनिया के पुत्र की बीमारी में मेहता मालती की सेवा-भावना आदि।
 

गोदान में आदर्श प्रधान या यथार्थ

इन संकेतों से यह स्पष्ट है कि गोदान में यथार्थ निःसन्देह अपने यथार्थ रूप में ही उभरकर सामने आया है वहीं आदर्श का रूप भी कम उज्जवल नहीं है। वस्तुतः 'गोदान' उपन्यास के पात्रों का चरित्रांकन करते समय उसकी कथावस्तु की संयोजना करते समय 'यथार्थ दृष्टि' का प्रमुख हाथ रहा है और उसमें यथासम्भव आदर्श का पुट भी दिया गया है। होरी का कर्ज में पिसे रहकर जीवन में गाय खरीदने की अभिलाषा, घोर कष्ट में उसको मृत्यु-सभी सम्भव और वास्तविक घटनायें हैं। ग्रामीण जीवन के सारे चक्र भी यथार्थ हैं पर बीच-बीच में आदर्शवाद का समावेश करके प्रेमचन्द ने उसे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का ही रूप दे दिया है। डॉ. राजपाल शर्मा (गोदान पुर्नमूल्यांकन) का भी यही मत है-“संक्षेप में कहा जा सकता है कि गोदान में यथार्थ और आदर्श का गंगा जमुनी सम्मिश्रण है। उसके मालती, मेहता, होरी, गोविन्दी आदि पात्रों के चरित्रांकन में उपन्यासकार का दृष्टिकोण मूल्यतया आदर्शोन्मुखी ही रहा है, किन्तु धनिया, गोबर ग्रामीण महाजनों आदि के चरित्रांकन में वह उतना ही अधिक यथार्थ परक है।”

उपसंहार

प्रेमचन्द का चिन्तन आदर्शोन्मुख यथार्थवाद था, यह उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया है, और गोदान की इस संक्षिप्त समीक्षा से भी यह तथ्य स्पष्ट होता है। क्योंकि प्रेमचन्द यह भी संकेत देते हैं कि 'यथार्थवाद का यह आशय नहीं है कि हम अपनी दृष्टि को अन्धकार की ओर केन्द्रित करें।" इस कथन का आशय डॉ. राजपाल शर्मा के इस कथन से और अधिक स्पष्ट हो सकेगा कि अन्धकार केन्द्रित दृष्टि से वे क्या चाहते थे— “मुंशी प्रेमचन्द के आदर्शवाद और यथार्थवाद सम्बन्धी विचारों से स्पष्ट होता है कि वे अपने उपन्यासों की प्रभाव क्षमता बढ़ाने के लिए घटनाओं के संयोजन, पात्रों के संवाद, उनके चरित्रांकन जार भाषा-शैली में यथार्थता का पुट रखने या कम से कम यथार्थता की भ्रान्ति उत्पन्न करने के पक्ष में थे। किन्तु साहित्य को मूलतः एक समाजोपयोगी कला मानने के कारण उनकी आस्था घटनाओं और पात्रों के चरित्र-चित्रण में ऐसा पुट देने की ओर भी थी, जिसका पाठकों पर स्वस्थ प्रभाव पड़े, उससे उनके आसुरी भावों के स्थान पर देवोचित भाव-गुण जागृत अभिवृद्धि हो सके।

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