होनहार बिरवान के होत चीकने पात विषय पर हिन्दी निबंध

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होनहार बिरवान के होत चीकने पात विषय पर हिन्दी निबंध प्रतिभाशाली व्यक्ति अपनी पहचान छुपा नहीं सकता। उसकी प्रतिभा बचपन से ही उसके कार्यों और व्यवहार में

होनहार बिरवान के होत चीकने पात विषय पर हिन्दी निबंध


होनहार बिरवान के होत चीकने पात यह एक प्रसिद्ध हिंदी लोकोक्ति है जिसका अर्थ है कि प्रतिभाशाली व्यक्ति बचपन से ही अपने गुणों का प्रदर्शन करते हैं। जैसे, एक फलदार वृक्ष की कोंपलें भी हरी-भरी और मुलायम होती हैं।यह लोकोक्ति हमें सिखाती है कि प्रतिभा किसी भी परिस्थिति में दब नहीं सकती। कुशाग्र बुद्धि और प्रतिभा वाले व्यक्ति बचपन से ही कुछ न कुछ करतूत करके अपनी प्रतिभा का परिचय दे देते हैं।

यह सम्पूर्ण विश्व उसकी देन है, जिसे हम विश्वात्मा और अखिलेश्वर कहते हैं । यद्यपि वह विश्वात्मा और अखिलेश्वर आँखों से दिखाई नहीं देता, पर सृष्टि में पग-पग पर हमें यह अनुभव होता है कि वह और सर्वत्र है। पृथ्वी की अनंतता, आकाश की असीमता, सूर्य का तेज, चन्द्रमा की शीतलता, समुद्रों की गम्भीरता, पवन की व्यापकता और पर्वतों की ऊँचाई प्रतिक्षण हमें यह बताती है कि वह सृष्टि के भीतर ही है और सर्वत्र विद्यमान है। कभी-कभी ऐसे कार्य भी हो जाते हैं, जिनसे विश्वात्मा के होने का पूर्ण आभास मिलता है ।
 

प्रकृति के दृष्टान्त

यह सृष्टि, यह सम्पूर्ण विश्व विश्वात्मा की कृति है । जिस प्रकार कोई वस्तु जब पुरानी हो जाती है अथवा जब किसी वस्तु के ऊपर जंग लग जाती है, तब उसे धोकर स्वच्छ किया जाता है; उसी प्रकार जब यह सृष्टि मलिन हो जाती है तो स्वयं विश्वात्मा ही विश्व नामक अपनी रचना को अपने विशेष साधनों से परमोज्जवल बनाते हैं । विश्वात्मा अपनी वस्तु को परमोज्ज्वल बनाने के लिए हमारी भाँति न तो साबुन का उपयोग करते हैं और न उनमें चमक लाने के लिए रंग तथा पॉलिश का ही प्रयोग करते हैं, अपितु वे इसके लिए सृष्टि में ऐसी आत्माओं को भेजते हैं, जिनमें उनकी ज्योति का अंश होता है । वे महान् आत्माएँ सृष्टि में जन्म लेकर महान् कार्य करती हैं। उनकी पवित्रता से ही सृष्टि की मलीनता धुल उठती है और सृष्टि परमात्मा की भाँति ही परमोज्जवल बन जाती है ।
 

महापुरुषों के दृष्टान्त

होनहार बिरवान के होत चीकने पात विषय पर हिन्दी निबंध
महान् आत्माओं को ही हम सब महापुरुष कहते हैं। महापुरुष चाहे जिस किसी भी देश का हो, उसमें एक विशिष्ट प्रकार की शक्ति होती है । उसके व्यक्तित्व में एक महानता छिपी रहती है । वह मानव के रूप में विश्वात्मा का प्रतिनिधि होता है । उसका जन्म किसी एक विशेष उद्देश्य से होता है । समाज में रहता हुआ है भी वह समाज से पृथक् होता है । उसकी एक-एक गति में वैचित्र्य और विभिन्नता होती है । उसका खान-पान, उसकी चाल-ढाल, उसकी बातचीत, सब कुछ निराली होती है । बाल्यावस्था से ही उसके जीवन में छिपी हुई ज्योति जगमगाने लगती है । वह जिस कार्य के लिए जन्म लेता है, जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विश्व में आता है, उसका आभास उसकी बाल्यावस्था में ही मिलने लगता है । बाल्यावस्था में ही वह ऐसे-ऐसे आचरण करता है कि लोग उसे देखकर विस्मित हो जाते हैं और उसके भीतर छिपी हुई महानता की प्रशंसा करते हुए कह उठते हैं कि 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात' की कहावत को यह बालक चरितार्थ करेगा ।
 
वास्तव में जो बालक होनहार होते हैं, दूसरे शब्दों में जिनका भविष्य स्वर्णशलाकाओं से अंकित होता है, उनकी बाल्यावस्था उनसे भिन्न होती है, जिनका जीवन साधारण होता है । जिस प्रकार उन्नतिशील और परिपुष्ट होनेवाले पौधों के पत्ते अधिक चिकने और मुलायम होते हैं, उसी प्रकार उन्नतिशील और महान् बनने वाले बालकों के जीवन में प्रारम्भ से ही उन्नति के अंकुर दिखाई पड़ने लगते हैं । महान् और विद्वान् बनने वाले बालक अन्यान्य बालकों से भिन्न होते हैं । उनका आचरण, उनका व्यवहार, उनकी बातचीत, उनका उठना-बैठना, उनका खाना-पीना, उनका खेलना-कूदना, सब कुछ निराला होता है । कोई भी समझदार और चतुर व्यक्ति उन्हें देखकर यह कह सकता है कि भविष्य में ये कुछ करेंगे और महान् बनेंगे । जिस प्रकार उदय होने वाले सूर्य की ज्योति से उसके प्रचण्ड प्रकाश का पता चल जाता है, उसी प्रकार उन्नतिशील बालकों के आचरण से उनके भीतर छिपी हुई उस महानता का आभास मिल जाता है, जिसके कारण वे सदा-सदा के लिए संसार में अमर बन जाते हैं । 

क्या तुमने कभी ऐसे पौधे को देखा है, जो बढ़ने वाला होता है, जो अपने फल-फूलों से प्राणियों को संतृप्ति देनेवाला होता है ? यदि तुम ऐसे पौधे को देखो, तो तुम्हें यह दिखाई पड़ेगा कि उनमें कितना अनूठापन होता है । उसके पत्तों में कितनी सुन्दरता है, उससे फूटने वाले कल्लों में कितना बाँकापन है। उसकी जड़ों में गहराई को भेदने की कितनी शक्ति है और वे किस प्रकार वायु में लहरते हुए झूमते हैं । इसी प्रकार क्या तुमने बरसने वाले बादलों को देखा है ? बरसने वाले बादल अधिक गरजते नहीं-चुपचाप उमड़-उमड़कर आकाश में छा जाते हैं। उनकी गम्भीरता देखने योग्य होती है । जल से भरे हुए होने पर भी वे जिस प्रकार पृथ्वी की ओर झुकते हैं, वैसी विनम्रता तो कभी मानवों में भी नहीं दिखाई पड़ती।

महापुरुषों का प्रारंभिक जीवन

प्रकृति के राज्य में ही नहीं, मानव जगत् में भी होनहार बिरवानों के पात बड़े चीकने होते हैं अर्थात् उनकी महानता की सूचना, उनके महान् गुणों की ज्योति प्रारम्भ से ही उनमें झिलमिलाने लगती है। यदि तुम विश्व के महान् पुरुषों की जीवन-गाथाओं का अध्ययन करो तो इसकी सत्यता तुम्हें अपने-आप ज्ञात हो जाएगी । रूस के प्रसिद्ध क्रांतिकारी नेता लेनिन का नाम कौन नहीं जानता ? लेनिन ने रूस में क्रांति का शंख फूँककर उसकी रगों में जीवन का ऐसा स्रोत बहाया कि रूस की सारी निराशा की काई फट गई और वह संसार में एक जीता-जागता महान राष्ट्र बन गया । यदि तुम लेनिन के प्रारम्भिक जीवन का अध्ययन करो, तो तुम यह देखोगे कि उनके बाल-जीवन में ही उनके भावी जीवन के अंकुर फूटने लगे थे । लेनिन एक निराला बालक था। उसके हँसने, खेलने, बातचीत करने इत्यादि में एक नवीनता थी । एक बार बाल्यावस्था में लेनिन को जब उसके एक सम्बन्धी ने देखा, तो उसे देखकर उसके भाई से कहा था कि तुम्हारा यह भाई बड़ा होने पर संसार में अद्भुत कार्य करेगा । सचमुच बड़े होने पर लेनिन ने अद्भुत कार्य किया - इतना अद्भुत कार्य कि उसके कारण वह विश्व में युग-युगान्तर तक अमर रहेंगे ।
 
मुसोलिनी और हिटलर ने भी अपने कार्यों से विश्व को विस्मय में डाल दिया । मुसोलिनी बाल्यावस्था में एक अकिंचन बालक था, पर उसकी अकिंचनता में एक ऐसी दृढ़ता छिपी हुई थी, जो प्रतिक्षण उसकी महानता को प्रकट करती थी । हिटलर बाल्यावस्था में ही अपने भावी जीवन के वैचित्र्य को प्रकट करने लगा था । मुस्तफा कमालपाश बचपन में ही अपने भीतर सम्राटों की-सी शान रखता था । चन्द्रगुप्त की प्रतिभा को देखकर उसकी बाल्यावस्था में ही चाणक्य ने यह समझ लिया था कि यह बालक बड़ा होने पर भारत का चक्रवर्ती सम्राट होगा । शिवाजी और महाराणा प्रताप की बाल्यावस्था में ही उनके जीवन की महानताएँ झलकने लगी थीं । 

उपसंहार

होनहार बिरवारों का जीवन विचित्रताओं से परिपूर्ण होता है । उनके जीवन के कार्य सबसे पृथक् होते हैं । कार्यों की भाँति ही उनके कार्य का ढंग भी सबसे पृथक् होता है । उनकी सूझ-बूझ निराली होती है। उनके प्रत्येक कार्य में और उनकी प्रत्येक गति में निरालापन होता है । बाल्यावस्था से ही उनका निरालापन प्रकट होने लगता है । उनका एक-एक चरण - उनके चरण का एक-एक चित्र उनके अद्भुत व्यक्तित्व की सूचना देता है।

होनहार बिरवानों का जीवन जितना विचित्र होता है, उतना ही अधिक महत्त्वपूर्ण भी होता है। प्रारम्भ से ही उनका झुकाव आदर्श की ओर होता है । उनकी प्रकृति में प्रारम्भ से ही सत्य, धर्म, न्याय, बन्धुता और समता से सम्बन्ध जोड़ने का अनुराग होता है। ऐसा ज्ञान होता है, मानो युग-युगों से उनकी इन मानवी गुणों से पहचान हो । इस प्रकार संसार का इतिहास और महापुरुषों की जीवन-कथाएँ इस कहावत को सत्य सिद्ध करती हैं। 

"होनहार बिरवान के होत चीकने पात" एक प्रेरणादायी लोकोक्ति है जो हमें सिखाती है कि प्रतिभा किसी भी परिस्थिति में दब नहीं सकती। हमें अपनी प्रतिभा को पहचानना चाहिए, उस पर विश्वास करना चाहिए और कठोर परिश्रम करके सफलता प्राप्त करनी चाहिए।यह लोकोक्ति न केवल बच्चों के लिए, बल्कि हर व्यक्ति के लिए प्रेरणादायी है। यह हमें सिखाती है कि यदि हम दृढ़ संकल्प और लगन से प्रयास करें तो हम जीवन में सफलता अवश्य प्राप्त कर सकते हैं।

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