महादेवी वर्मा के काव्य में रहस्यवाद

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महादेवी वर्मा के काव्य में रहस्यवाद महादेवी वर्मा के काव्य में रहस्यवाद एक महत्वपूर्ण धारा है। उनका काव्य रहस्यवाद और प्रकृति-प्रेम से ओतप्रोत है।

महादेवी वर्मा के काव्य में रहस्यवाद


हादेवी वर्मा के काव्य में रहस्यवाद एक महत्वपूर्ण धारा है। उनका काव्य रहस्यवाद और प्रकृति-प्रेम से ओतप्रोत है। वे सौंदर्य और आनंद की खोज में रहस्यवादी मार्ग को अपनाती हैं। उनके काव्य में वेदना, आत्म-संघर्ष, और अज्ञात के प्रति आकर्षण का चित्रण मिलता है।

रहस्यवाद का अर्थ

महादेवी वर्मा के काव्य में रहस्यवाद
रहस्यवाद का आशय है अज्ञात, अव्यक्त प्रियतम (परमात्मा) के प्रति प्रेम। “इसके अन्तर्गत कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यन्त चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है।” - आचार्य शुक्ल

महादेवीजी की भावनाओं पर शंकर के अद्वैतवाद तथा बौद्धदर्शन का प्रभाव है। छायावादी तथा रहस्यवादी कवियों में इनका उच्च स्थान है। कहीं-कहीं तो इन्हें मिलन का आभास होता है। 

“तुम सो जाओ मैं गाऊँ। 
मुझको सोते युग बीते, तुम यों लोरी गाते। 
अब आओ मैं पलकों में स्वप्नों की सेज बिछाऊँ ।” 

अपने प्रियतम का स्मरण

रहस्यवाद के मूल में साधक के हृदय में अपने प्रियतम से मिलन की आकुल प्रेरणा रहती है। कवि की आत्मा मानो इस विश्व में बिछुड़ी हुई प्रेयसी की भाँति अपने प्रियतम का स्मरण करती है। उसकी दृष्टि में विश्व की सम्पूर्ण प्राकृतिक सुषमा उस अनन्त अलौकिक चिर सुन्दर की छायामात्र है, जिसे देखकर वह उस अनन्त रमणीय (प्रियतम) से मिलने को अकुला उठती है; अतः रहस्यवाद की साधना वस्तुतः विरह की साधना है। महादेवी भी प्रिय का स्मरण करती हुई उससे अपने तादात्म्य का अनुभव करती है- 

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ। 
दूर तुमसे हूँ अखण्ड सुहागिनी भी हूँ ।। 

महादेवी को अपने प्रियतम का परिचय सृष्टि की प्राकृतिक सुषमा से मिला है— 

कनक से दिन मोती-सी रात, 
सुनहली साँझ गुलाबी प्रात मिटाता रँगता बारम्बार, 
कौन जग का यह चित्राधार ? 

उस प्रियतम के स्मरण से उसका हृदय विरह-विह्वल हो उठता है, पीड़ा से भर जाता है। इसी कारण “वेदना महादेवी के काव्य-गगन में वायु-सी व्याप्त है। पीड़ा उन्हीं के दर्शन से प्राप्त हुई है; अतः वह त्याज्य नहीं। हार बनना है तो हृदय बिंधवाना ही होगा।” उनका प्रेम लौकिक न होकर अलौकिक है- 

तू जल-जल जितना होता क्षय, 
वह समीप आता छलनामय । 
मदिर मंदिर मेरे दीपक जल, 
प्रियतम का पथ आलोकित कर ।। 

अद्वैतवाद की भावना

रहस्यवाद के मूल में अद्वैतवाद की भावना निहित है। महादेवी भी स्वयं को परब्रह्म का ही अंश मानती हैं। वे उसे अपने अन्दर पाती हैं- 

तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय क्या ?
तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संस्कृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या?

वे उस प्रियतम की उपासना के लिए बाह्य उपकरणों की आवश्यकता नहीं समझतीं । उपासक का अपना शरीर एवं जीवन ही उन उपकरणों को जुटाता है- 

क्या पूजा क्या अर्चन रे । 
उस असीम का सुन्दर मन्दिर मेरा लघुतम जीवन रे । 

इस प्रकार छायावादी कवियों के अन्तर्गत एकमात्र महादेवी ही सच्ची रहस्यवादी मानी जा सकती हैं। आचार्य शुक्ल का भी यही मत है।महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की एक महान कवियित्री थीं। उनके काव्य में रहस्यवाद की भावना अत्यंत गहन और प्रभावशाली है। रहस्यवाद उनके काव्य को गहराई और अर्थ प्रदान करता है।


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