भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर

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भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर


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भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर पाठ का सारांश 

भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ - लता मंगेशकर लेखक कुमार गंधर्व जी के द्वारा लिखित है | इस पाठ में लेखक ने लता जी की अद्वितीय और अद्भुत गायकी पर प्रकाश डाला है |लेखक कहते हैं कि एक बार जब मैं बीमार था, तब मैंने रेडियो लगाया | तभी अचानक एक अद्वितीय स्वर मेरे कानों से टकराया | वाकई स्वर में कुछ विशेष जादुईपन था | मैं उसे तन्मयता से सुनता ही रहा | जब गाने का अंत हुआ तो गायिका का नाम घोषित करते हुए कहा गया --- " लता मंगेशकर " | 

आगे लेखक कहते हैं कि तब से मैं लता का गाना सुनता आ रहा हूँ | लता से पहले प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ का चित्रपट संगीत में अपना ज़माना था | लेकिन बाद में आई हुई लता उनसे आगे निकल गई | कला के क्षेत्र में इस तरह के चमत्कार भी कभी-कभार देखने को मिल जाते हैं | जैसे ख्यातिप्राप्त सितारवादक विलायत खाँ अपने पिता की तुलना में बहुत आगे निकल गए थे | लेखक का स्पष्ट मानना है कि भारतीय गायिकाओं में लता के मुकाबले कोई गायिका हुई ही नहीं | 

लेखक के अनुसार, चित्रपट संगीत के कारण लोगों को मधुर स्वर की समझ हुई है तथा कहा जा सकता है कि
लता मंगेशकर
लता मंगेशकर
लता का सामान्य मनुष्य में संगीत विषयक अभिरुचि पैदा करने में बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण योगदान है | आगे लेखक कहते हैं कि एक सामान्य श्रोता को जब शास्त्रीय गान और लता के गान में चुनाव करने बोला जाए तो वे निश्चित ही लता का गान ही पसंद करेंगे | इसका सीधा कारण है लता के गानों में गानपन का होना | गानपन से आशय गाने की वह मिठास व मधुरता से है, जिसे सुनकर श्रोतागण मस्ती से झूम उठे |

लेखक के अनुसार, लता जी के गानों की एक और विशेषता है, उसका नादमय उच्चार | उनके गीत के किन्हीं दो शब्दों का अंतर स्वरों के आलाप द्वारा बड़ी सुंदर रीति से भरा रहता है और ऐसा आभास होता है कि वे दोनों शब्द विलीन होते-होते एक-दूसरे में मिल जाते हैं | लेखक के अनुसार लता जी ने करूण रस के गानों के साथ न्याय नहीं किया है | उन्होंने मुग्ध श्रृंगार की अभिव्यक्ति करने वाले मध्य या द्रुतलय के गाने बड़ी उत्कटता से गाए हैं | लेखक कहते हैं कि लता का गाना सामान्यतः ऊँचे स्वर में रहता है | गाने में संगीत दिग्दर्शक उसे ज्यादा से ज्यादा ऊँचे स्वर में गवाते हैं और उसे बिना मतलब के चिलवाते हैं | 

लेखक के अनुसार, शास्त्रीय संगीत की उत्तम जानकारी चित्रपट संगीत गाने वाले को होना जरूरी है और यह लता जी के पास निःसंशय है | दोनों विद्या के बीच कोई तुलना नहीं किया जा सकता है | 

लेखक के अनुसार, शास्त्रीय संगीत की विशेषता उसकी गंभीरता है तथा चित्रपट संगीत की विशेषता उसकी सुलभता और लोचता है | चित्रपट संगीत का ताल प्राथमिक अवस्था का ताल माना जाता है, जबकि शास्त्रीय संगीत में ताल अपने परिष्कृत रूप में पाया जाता है | लेखक कहते हैं कि लता के एक-एक गानों संपूर्ण कलाकृति निहित होता है | उनके गानों में स्वर, लय और शब्दार्थ का त्रिवेणी संगम का अस्तित्व होता है | फिर चाहे वह चित्रपट संगीत हो या शास्त्रीय संगीत | गाने की सारी शक्ति उसकी रंजकता पर मुख्यतः निर्भर रहती है | 

आगे लेखक कहते हैं कि संगीत के क्षेत्र में लता का स्थान अव्वल दरजे के ख़ानदानी गायक के समान ही मानना पड़ेगा | यह बात सच है कि हमारे शास्त्रीय गायक बड़ी आत्मसंतुष्ट मिजाज के हैं | संगीत के क्षेत्र में उनका अलग हुक्मशाही स्थापित है | शास्त्र-शुद्धता के कर्मकांड को उन्होंने आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे रखा है | लेकिन चित्रपट संगीत द्वारा लोगों की अभिजात्य संगीत से जान-पहचान होने लगी है | केवल शास्त्र-शुद्ध और नीरस गाना उन्हें नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें तो सुरीला और भावपूर्ण गाना चाहिए | और यह क्रांति चित्रपट संगीत के कारण ही संभव हो पाया है |  

लेखक कहते हैं कि चित्रपट संगीत का तंत्र ही कुछ अलग सा है | यहाँ नवनिर्मिति की बहुत गुंजाइश है | आगे लेखक कहते हैं कि वैसे तो कई पाशर्व गायक-गायिकाएँ हैं, पर लता की लोकप्रियता इन सभी से कहीं अधिक है | उसकी लोकप्रियता के शिखर का स्थान अचल व अडिग है | ऐसा कलाकार शताब्दियों में शायद एक ही पैदा होता है | ऐसे कलाकार को हम अपनी आँखों के सामने साक्षात देख पा रहे हैं, क्या ये हमारे सौभाग्यशाली होने की निशानी नहीं है...!!" 


भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर के प्रश्न उत्तर 


प्रश्न-1 लेखक ने पाठ में गानपन का उल्लेख किया है | पाठ के सन्दर्भ में स्पष्ट करते हुए बताएँ कि आपके विचार में इसे प्राप्त करने के लिए किस प्रकार के अभ्यास की आवश्यकता है ? 

उत्तर- लेखक के अनुसार, पाठ में उल्लेखित "गानपन" से आशय गाने की उस मिठास व मधुरता से है, जिसे सुनकर श्रोतागण मस्ती से झूम उठे | लता जी के गानों में भी गानपन मौजूद रहता है | लता जी के समान ऐसी विशेषता हासिल करने के लिए गाने का नियमित अभ्यास करना अतिआवश्यक होता है | 

प्रश्न-2 लेखक ने लता की गायकी की किन विशेषताओं को उजागर किया है ? आपको लता की गायकी में कौन-सी विशेषताएँ नज़र आती हैं ? उदाहरण सहित बताइए | 

उत्तर-  प्रस्तुत पाठ में लेखक ने लता जी की गायकी की निम्नलिखित विशेषताओं को उजागर किया है --- 

• गानपन - गानपन से आशय गाने की उस मिठास व मधुरता से है, जिसे सुनकर श्रोतागण मस्ती से झूम उठे | 

• सुरीलापन - लता जी के सुरीले गीत से श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो जाते हैं | यह उनकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है | 

• स्वरों की निर्मलता - लता जी के गाने की यह एक प्रमुख विशेषता है | उनके स्वरों की निर्मलता और कोमलता के गुण समाहित हैं | 

• नादमय उच्चार - लेखक के अनुसार, लता जी के गानों की एक और विशेषता है, उसका नादमय उच्चार | उनके गीत के किन्हीं दो शब्दों का अंतर स्वरों के आलाप द्वारा बड़ी सुंदर रीति से भरा रहता है और ऐसा आभास होता है कि वे दोनों शब्द विलीन होते-होते एक-दूसरे में मिल जाते हैं |

• उच्चारण की शुद्धता - उच्चारण की शुद्धता लता जी के गाने की प्रमुख विशेषता रही है | 

प्रश्न-3 लता ने करुण रस के गानों के साथ न्याय नहीं किया है, जबकि श्रृंगारपरक गाने वे बड़ी उत्कटता से गाती हैं -- इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं ? 

उत्तर- लेखक के अनुसार, लता ने करुण रस के गानों के साथ न्याय नहीं किया है, जबकि श्रृंगारपरक गाने वे बड़ी उत्कटता से गाती हैं -- यह कथन बहुत हद सही नहीं है | हर गाना या विषय का अपना भाव होता है, जिसे गाने वाले से बेहतर कोई महसूस नहीं कर सकता | लता जी ने भी बहुत से ऐसे देशभक्ति गाने को मार्मिकतापूर्ण ढंग से गाया है, जिसे सुनकर इंसान की इंसानियत जाग उठती है | वह भावुक हो जाता है | लता जी के द्वारा काफी गाने करूण रस में गाए गए हैं, जो बेहद लोकप्रिय भी हैं | अत: मैं लेखक के कथन से सहमत नहीं हूँ | 

प्रश्न-4 संगीत का क्षेत्र ही विस्तीर्ण है | वहाँ अब तक अलक्षित, असंशोधित और अदृष्टिपूर्व ऐसा खूब बड़ा प्रांत है तथापि बड़े जोश से इसकी खोज और उपयोग चित्रपट के लोग करते चले आ रहे हैं - इस कथन को वर्तमान फ़िल्मी संगीत के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए | 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ और लेखक के अनुसार, संगीत का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है | संगीत से संबंधित बहुत सी ऐसी बारीकियाँ हैं, जिनमें अब भी काफी खोज व संशोधन बचा हुआ है | जैसे स्वर, राग, ताल, धुनें इत्यादि ऐसी हैं, जिनमें सुधार के बहुत गुंजाइश बाकी हैं | फ़िल्मी संगीत में शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ पाश्चात्य संगीत, लोकगीत व प्रांतीय गीतों को भी विशेष स्थान दिया जा रहा है | अत: हम कह सकते हैं कि वर्तमान समय में संगीत की दुनिया में हर रोज नए-नए प्रयोग हो रहे हैं | 

प्रश्न-5 चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए --  अकसर यह आरोप लगाया जाता रहा है | इस संदर्भ में कुमार गंधर्व की राय और अपनी राय लिखें | 

उत्तर-  "चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए" -- कुमार गंधर्व इस बात से सहमत नहीं हैं | उनका मत है कि चित्रपट संगीत में एक क्रांतिकारी प्रयोग व नवीनताओं का समावेश हुआ है | जिसके कारण अब लोगों में संगीत के सुरीलेपन की समझ विकसित होने लगी है | बेशक, चित्रपट संगीत ने समाज की अभिरूचियों में एक प्रभावशाली मोड़ लाया है | 

"चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए" -- यदि इस विषय पर मैं अपना मत रखूँ तो, वर्तमान फ़िल्मी दुनिया में चित्रपट संगीत जहाँ एक ओर लोगों को तनावमुक्त करने का साधन है, तो वहीं दूसरी ओर शोर से भरा और तनाव पैदा करने का ज़रिया भी बन गया है | जहाँ पुराने गीतों व संगीतों में सुरीलेपन का एहसास होता था, तो वहीं आजकल के गानों में बेमतलब की बातों व अश्लील चित्रण को परोसा जा रहा है | 

प्रश्न-6 शास्त्रीय एवं चित्रपट दोनों तरह के संगीतों के महत्त्व का आधार क्या होना चाहिए ? कुमार गंधर्व की इस संबंध में क्या राय है ? स्वयं आप क्या सोचते हैं ? 

उत्तर- शास्त्रीय संगीत हो या चित्रपट संगीत, दोनों में रसिक को आनंद देने की सामर्थ्य कितना अधिक है, इस पर उसके महत्त्व का आधार टिका है | कुमार गंधर्व के अनुसार, शास्त्रीय एवं चित्रपट दोनों तरह के संगीतों के महत्त्व का आधार रंजकता होना चाहिए | मुख्यतः गाने की मिठास व शक्ति उसकी रंजकता पर निर्भर रहती है | मेरे विचार भी पाठ के लेखक कुमार गंधर्व जी के समान ही है कि संगीत में मधुरता, मिठास, कोमलता तथा गानपन का होना अत्यधिक जरूरी है | 


भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर पाठ का शब्दार्थ 


• चित्रपट -           सिनेमा का पर्दा 
• लोकप्रियता -      प्रसिद्धि
• जलदलय -        द्रुत लय (तेज़) 
• नीरस -             उबाऊपन 
• अवलंबित -       निर्भर 
• अव्वल -           पहला, प्रथम 
• पर्जन्य -            बादल 
• अनभिषिक्त -     बेताज 
• शताब्दी -          सौ वर्ष का 
• तैलचित्र -          वह चित्र, जिसमें तैलीय रंगों का इस्तेमाल किया जाता है | 
• ध्वनिमुद्रिका -     स्वरलिपि
• मालिकाएँ -        स्वरों के क्रमबद्ध समूह
• त्रिताल -           सोलह मात्राओं का ताल |


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