पतंजलि के अष्टांग योग का पहला सोपान यम है। जानिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह कैसे समाज में शुचिता, विश्वास और सौहार्द लाते हैं।
सामाजिक शुचिता, विश्वास, सौहार्द्र व मजबूती के आधारभूत उपकरण: यम
भारतीय मनीषीयों ने जीवन को केवल व्यक्तिगत मोक्ष का साधन नहीं, सामाजिक निर्माण का आधार भी माना है। योग कोई गतिविधि मात्र नहीं, योग को प्रायः हम आसन और प्राणायाम तक सीमित कर देते हैं, पर महर्षि पतंजलि ने योग की अष्टांग यात्रा का प्रथम सोपान 'यम' को बनाया है। यम से पहले योग में प्रवेश ही नहीं है। जैसे भवन की नींव के बिना दीवारें नहीं टिकतीं, वैसे ही यम के बिना योग सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर अधूरा है।
यम पाँच हैं — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। ये पाँच सूत्र व्यक्तिगत आचरण नहीं, बल्कि सामाजिक शुचिता, विश्वास, सौहार्द्र और मजबूती के आधारभूत उपकरण हैं।
- अहिंसा — सामाजिक शुचिता का प्रथम सूत्र, अहिंसा का अर्थ केवल किसी को न मारना नहीं है। पतंजलि कहते हैं — अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः। अर्थात अहिंसा के प्रतिष्ठित होने पर उसके निकट वैर का त्याग हो जाता है। मन, वाणी और कर्म से किसी को भी दुःख न पहुँचाने का संकल्प ही अहिंसा है।आज समाज में जो अशुचिता है — गाली, ट्रोलिंग, हिंसक भाषा, सड़क पर क्रोध — वह हिंसा ही तो है। जब हम अहिंसा को धारण करते हैं, तो हम समाज को स्वच्छ करते हैं। शुचिता केवल शरीर को धोने से नहीं आती, वाणी और विचार को धोने से आती है। अहिंसक व्यक्ति के पास बैठकर हिंसक प्राणी भी वैर छोड़ देता है। यही सामाजिक शुचिता है। जिस समाज में अहिंसा होगी, वहाँ कानून कम और समझ अधिक होगी।
- सत्य — विश्वास का आधार, सत्यं प्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्। सत्य के प्रतिष्ठित होने पर वाणी और क्रिया में फल की सिद्धि होती है। सत्य सामाजिक विश्वास की मुद्रा है। परिवार, मित्रता, व्यापार, शासन — सभी का आधार विश्वास है और विश्वास का आधार सत्य है। एक बार झूठ बोलने से केवल एक संबंध नहीं टूटता, उस व्यक्ति के भीतर सत्य के प्रति श्रद्धा टूटती है। आज सामाजिक जीवन में अविश्वास का कारण ही सत्य का अभाव है। सोशल मीडिया पर झूठे समाचार, वादे और उनका टूटना, मिलावट — ये सब सत्य के अभाव के लक्षण हैं। सत्य का अर्थ केवल सच बोलना नहीं, अपितु प्रिय, हितकारी और यथार्थ बोलना है। सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्। जो सत्य अप्रिय और अनावश्यक है, वह भी हिंसा बन सकता है। इसलिए सत्य को अहिंसा के साथ ही साधना पड़ता है। जहाँ सत्य है, वहाँ विश्वास स्वतः बनता है।
- अस्तेय — सौहार्द्र और मजबूती के युगल उपकरण अस्तेय अर्थात चोरी न करना। स्थूल चोरी के साथ-साथ सूक्ष्म चोरी भी — दूसरे के विचार को अपना बताना, दूसरे के समय की चोरी करना, बिना अधिकार के संसाधनों का उपयोग करना — ये सभी अस्तेय के विरुद्ध हैं। जब समाज में अस्तेय आता है, तो सौहार्द्र आता है। जहाँ चोरी नहीं, वहाँ डर नहीं। जहाँ डर नहीं, वहाँ द्वार खुले रहते हैं। पुराने भारतीय गाँवों में ताले नहीं होते थे, क्योंकि अस्तेय जीवन मूल्य था। आज हर घर में ताला, हर फोन में पासवर्ड, हर फाइल में लॉक है — क्योंकि अस्तेय कमजोर हो गया है।
- अपरिग्रह- अपरिग्रह अस्तेय का ही विस्तार है — अनावश्यक संग्रह न करना। अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंबोधः। अपरिग्रह से जीवन के उद्देश्य का बोध होता है। भौतिक दौड़ में हम अनावश्यक वस्तुएँ इकट्ठा करते जा रहे हैं। यह संग्रह ही प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और संघर्ष को जन्म देता है। जिसके पास आवश्यकता से अधिक है, वह डर में जीता है — कहीं छिन न जाए। जिसके पास कम है, वह हीनता में जीता है। अपरिग्रह हमें इस दौड़ से मुक्त करता है। अपरिग्रही समाज ही मजबूत समाज है, क्योंकि वहाँ संसाधन कुछ लोगों के गोदाम में नहीं, सबके उपयोग में होते हैं। यह आर्थिक मजबूती भी है और नैतिक मजबूती भी।
- ब्रह्मचर्य — व्यक्तिगत व सामाजिक ऊर्जा का संरक्षण। ब्रह्मचर्य का संकुचित अर्थ काम-निरोध माना गया है, पर इसका व्यापक अर्थ है — ब्रह्म में विचरण, अर्थात अपनी इंद्रिय ऊर्जा को उच्च लक्ष्य की ओर मोड़ना। ब्रह्मचर्य शक्ति का संचय है। जिस समाज के युवा अपनी ऊर्जा को अश्लीलता, नशा और अनावश्यक भोग में नष्ट कर देंगे, वह समाज दुर्बल हो जाएगा। जिस समाज के युवा अपनी ऊर्जा को अध्ययन, सृजन, सेवा और साधना में लगाएँगे, वह समाज अजेय होगा। ब्रह्मचर्य व्यक्तिगत तप है, जिसका फल सामाजिक मजबूती है। यह संयम हमें सिखाता है कि हर इच्छा को तुरंत पूरा करना आवश्यक नहीं। यही संयम परिवार को टिकाता है, संस्था को चलाता है और राष्ट्र को बनाता है।
यम से सामाजिक निर्माण कैसे होता है? इन पाँच यमों को हम निम्न चार सूत्रों में देख सकते हैं:
- अहिंसा से शुचिता आती है — विचार और वाणी की पवित्रता।
- सत्य से विश्वास आता है — संबंधों की स्थिरता।
- अस्तेय और अपरिग्रह से सौहार्द्र और मजबूती आती है — संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और भय-मुक्त समाज।
- ब्रह्मचर्य से ऊर्जा की रक्षा होती है — जो शुचिता, विश्वास और सौहार्द्र को दीर्घकाल तक टिकाती है।
यम कोई धार्मिक उपदेश नहीं, यह सामाजिक तकनीक है। बिना यम के कोई नियम टिक नहीं सकता। आप नियम बना दीजिए कि कूड़ा मत फेंको, पर जब तक मन में अहिंसा और शुचिता नहीं, व्यक्ति कूड़ा फेंकेगा ही। आप कानून बना दीजिए कि भ्रष्टाचार मत करो, पर जब तक अस्तेय और अपरिग्रह नहीं, भ्रष्टाचार रहेगा। इसलिए भारतीय शिक्षा पद्धति में पहले यम सिखाए जाते थे, फिर विद्या।
आज हम सीधे विद्या दे रहे हैं, यम छूट गए हैं। परिणाम सामने है — विद्वान लोग हैं, पर विश्वासी लोग कम हैं। परिवार ही अविश्वास के कारण बिखर रहें हैं। व्यक्ति व समाज दोनों के विकास व स्थिरता के लिए यमों को स्वीकार कर आचरण में समाहित करना आवश्यक है। यमों को आचरण में समाहित किए बिना आसनों व प्राणायामों का भी संपूर्णता के साथ लाभ नहीं मिल पाएगा।
व्यक्ति, परिवार और संस्था तीनों को ही इस बात को समझना होगा कि व्यक्ति के चरित्र का निर्माण कानूनों से नहीं होगा। कानून दोषियों और अपराधियों के लिए होता है। परिवार व समाज व्यक्ति के चरित्र के आधार पर आगे बढ़ते हैं, विकसित होते हैं। परिवार के साथ आवासीय विद्यालयों में जहाँ हम चौबीस घंटे बच्चों के साथ रहते हैं, डे-बोर्डिंग विद्यालयों की अपेक्षा, यम का महत्व और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। समझने की आवश्यकता है केवल समय-सारणी से परिवार, समाज और संस्था नहीं चलते, मूल्यों से चलते हैं। संस्कृति, संस्कार और परंपरा से चलते हैं।
यम हमें भीतर से बाहर की ओर ले जाता है। यह कहता है — स्वयं को सुधारो, समाज सुधरेगा। यह पलायन नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रथम पाठ है।यदि हम प्रत्येक व्यक्ति में इन पाँच यमों का बीज बो दें, तो हमें पुलिस, न्यायालय और कानूनों की आवश्यकता बहुत कम रह जाएगी। समाज स्वयं ही पवित्र, विश्वासी, सौहार्द्रपूर्ण और मजबूत बन जाएगा। यही पतंजलि का स्वप्न था — एक ऐसा समाज जहाँ योग केवल व्यक्ति का नहीं, समष्टि का कल्याण करे। यम ही वह नींव है, जिस पर स्वस्थ समाज का भव्य भवन खड़ा हो सकता है।
- डा संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,

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