चित्रकला और कविता के अंतर्संबंध पर विस्तृत आलेख: अमृता शेरगिल और रज़ा की कला, एक्फ्रासिस की प्रक्रिया और हिंदी कविता में चित्रात्मकता का अध्ययन।
चित्रकला और कविता: अमृता शेरगिल व रज़ा के चित्रों से प्रेरित हिंदी कविताएँ
चित्रकला और कविता को प्रायः अलग-अलग कलाएँ माना जाता है। एक रेखा और रंग से बोलती है, दूसरी शब्द और लय से। पर दोनों का मूल एक ही है: देखे हुए संसार को भीतर की आँख से दोबारा देखना। रोमन कवि होरेस की उक्ति "ut pictura poesis" (जैसा चित्र, वैसी कविता) पश्चिम में इसी बात को कहती थी। भारतीय परंपरा में यह संबंध और भी पुराना है। 'विष्णुधर्मोत्तर पुराण' के चित्रसूत्र में चित्रकला को नृत्य, संगीत और काव्य के साथ जोड़कर देखा गया है। वहाँ रस और भाव का वही सिद्धांत चित्र पर भी लागू होता है जो नाट्य और काव्य पर होता है। अजंता की भित्तियों से लेकर पहाड़ी और मुग़ल लघुचित्रों तक, रागमाला के चित्रों में तो कविता और रंग एक-दूसरे में घुले ही मिलते हैं।
आधुनिक हिंदी साहित्य में यह रिश्ता और गहरा हुआ। महादेवी वर्मा स्वयं चित्र बनाती थीं और उनके काव्य-संग्रहों में उनके रेखाचित्र शब्दों के साथ चलते हैं। छायावाद की कविता में रंग, प्रकाश और आकृति की जो चित्रात्मकता है, वह चित्रकार की दृष्टि का ही विस्तार लगती है। इसी पृष्ठभूमि में अमृता शेरगिल और सैयद हैदर रज़ा के चित्र हिंदी कवि के लिए दो अलग दिशाएँ खोलते हैं। एक मनुष्य की देह, उसके एकांत और उसकी उदासी की ओर ले जाती है, दूसरी ब्रह्मांड, ध्यान और शून्य की ओर।
अमृता शेरगिल: रंगों में दर्ज एक भारतीय एकांत
अमृता शेरगिल (1913–1941) का जन्म बुडापेस्ट में हुआ। पिता भारतीय सिख थे और माँ हंगेरियन। पेरिस में प्रशिक्षण पाने के बाद वे 1934 में भारत लौटीं। यहाँ उन्हें लगा कि उनकी कला की असली ज़मीन यही है। उन्होंने स्वयं माना कि यूरोप ने पिकासो, मातिस और सेज़ान दिए, पर भारत ने उन्हें अपना रंग-बोध दिया। अजंता की भित्तिचित्र-परंपरा, पहाड़ी और मुग़ल लघुचित्रों की समतल रंग-योजना और दक्षिण भारत की यात्राओं में देखे गए ग्रामीण जीवन ने उनके चित्रों को वह मिट्टी जैसा, गर्म और उदास रंग-संसार दिया जो आज उनकी पहचान है।
'तीन लड़कियाँ', 'दुल्हन का श्रृंगार', 'ब्रह्मचारी', 'विश्राम' और 'ग्रामीण दृश्य' जैसे चित्रों में एक बात बार-बार दिखती है। उनकी स्त्रियाँ और पुरुष सजे-सँवरे नहीं हैं। वे थके हुए, चुप और अपने भीतर डूबे हुए हैं। उनकी आँखें दर्शक की ओर नहीं देखतीं। चेहरे लंबे, आँखें बादाम-सी और भावहीन लगती हुई भी बहुत कुछ कहती हैं। यह वही मौन है जिसे कविता में 'अनकहा' कहा जाता है। इसीलिए कवि के लिए अमृता का चित्र एक पूरी कविता का बीज बन जाता है, क्योंकि उसमें कथा नहीं, अधूरापन है और अधूरेपन में ही शब्दों के लिए जगह बनती है।
हिंदी कविता में अमृता से प्रेरित रचनाओं का स्वर आमतौर पर तीन तरह का होता है। पहला, स्त्री-जीवन की चुप्पी और प्रतीक्षा का स्वर। दूसरा, उनके छोटे-से जीवन (वे केवल अट्ठाईस वर्ष जीं) की त्रासदी और तेज़ी का स्वर। तीसरा, परंपरा और आधुनिकता के बीच खड़ी एक अकेली स्त्री-कलाकार का स्वर। उदाहरण के लिए, 'तीन लड़कियाँ' से प्रेरित एक कविता कुछ इस तरह उठ सकती है:
तीन लड़कियाँ बैठी हैं, पर तीनों के बीच
एक अनकहा आँगन फैला है।
एक की आँखें अपनी गोद में उतरी हैं,
दूसरी के हाथों में किसी पुराने इंतज़ार की गर्मी है,
तीसरी वहाँ देख रही है जहाँ दीवार नहीं है।
मिट्टी के रंग की इस दोपहर में
चुप्पी इतनी तपी है
कि शब्द भी छाँह ढूँढ़ने लगते हैं।
कैनवास के बाहर कोई पुकारता नहीं,
और भीतर कोई उत्तर नहीं देता,
बस रंग बोलते हैं, धीमे, थके हुए,
जैसे किसी ने पूरी उम्र को एक पल में रख दिया हो।
इस कविता में चित्र का वर्णन भर नहीं है। कवि चित्र के 'ख़ाली स्थान' में प्रवेश करता है और वहाँ अपना अर्थ रचता है। अच्छी चित्र-प्रेरित कविता की यही कसौटी है।
रज़ा: बिंदु से उठता ब्रह्मांड
सैयद हैदर रज़ा (1922–2016) की यात्रा अमृता से बिल्कुल भिन्न है। मध्य प्रदेश के मंडला के जंगलों में बीता उनका बचपन जीवन-भर उनके रंगों में लौटता रहा। 1947 में बंबई में प्रगतिशील कलाकार समूह के संस्थापकों में वे शामिल थे। फिर वे पेरिस गए और दशकों वहीं रहे। पर 1980 के आसपास उनके काम में निर्णायक मोड़ आया, जब उन्होंने 'बिंदु' को अपनी कला का केंद्र बनाया। भारतीय दर्शन में बिंदु सृष्टि का आदि-बीज है, ऊर्जा का वह केंद्र जिससे सब कुछ फैलता है। इसके बाद उनके चित्रों में काले बिंदु के चारों ओर लाल, नारंगी, नीले और हरे के ज्यामितीय क्षेत्र उभरने लगे। 'पुरुष-प्रकृति', 'सौराष्ट्र', 'अंकुर', 'माँ' और 'प्रकृति' जैसे चित्र और 'नर्मदा' या 'तपोवन' जैसे विषय उनकी इसी आध्यात्मिक खोज के पड़ाव हैं।
रज़ा का हिंदी कविता से रिश्ता चित्र-विषय तक सीमित नहीं था। वे हिंदी कविता के गहरे प्रेमी थे और उनके कई चित्रों में हिंदी की काव्य-पंक्तियाँ रंगों के बीच अंकित मिलती हैं। कवि अशोक वाजपेयी से उनकी घनिष्ठ मित्रता सर्वविदित है, और रज़ा फ़ाउंडेशन की गतिविधियाँ चित्रकला और कविता के संवाद को ही आगे बढ़ाती रही हैं। फ्रांसीसी कवि रेने शार से भी उनका आत्मीय संबंध रहा। इस तरह रज़ा के यहाँ रंग और शब्द एक ही साधना के दो रूप दिखाई देते हैं।
रज़ा से प्रेरित कविता का स्वर स्वभावतः अमूर्त, ध्यानपरक और दार्शनिक होता है। वहाँ दृश्य का वर्णन कम और अनुभव का विस्तार अधिक होता है:
एक बिंदु,
काला, जैसे सब रंगों की रात का बीज।
उसके चारों ओर नारंगी की साँस है,
नीले की गहराई, लाल की धड़कन।
लोग इसे शून्य कहते हैं,
मैं कहता हूँ, यह पूरा घर है,
जिसमें सारा आकाश लौटकर सोता है।
रेखाएँ यहाँ से निकलती हैं और यहीं लौट आती हैं,
जैसे नदी अपने उद्गम को याद करती हो।
बहुत देर देखने पर लगता है
बिंदु चित्र में नहीं है,
मैं ही उस बिंदु के भीतर खड़ा हूँ।
यहाँ कविता चित्र की व्याख्या नहीं करती। वह चित्र के साथ ध्यान में बैठ जाती है।
दोनों दृष्टियों का अंतर और कविता की भाषा
अमृता का चित्र मानवीय है और रज़ा का ब्रह्मांडीय। अमृता में चेहरा, हाथ और देह प्रधान हैं, रज़ा में ज्यामिति, रंग-क्षेत्र और ऊर्जा। इसलिए कवि को दोनों के लिए अलग-अलग भाषा खोजनी पड़ती है। अमृता के लिए ठोस बिंब, स्थानीय परिवेश और सूक्ष्म भावनात्मक संकेत काम आते हैं: चारपाई, आँगन, दोपहर, मिट्टी का रंग, झुकी पलकें। रज़ा के लिए लय, पुनरावृत्ति और प्रतीक: बिंदु, त्रिकोण, पंचतत्त्व, नदी और प्रकृति। पहले में कविता कथा की ओर झुकती है, दूसरे में मंत्र या ध्यान की ओर।
फिर भी दोनों के बीच एक साझा बात है। दोनों कलाकार भारतीय परंपरा को नए ढंग से देखते हैं। अमृता लघुचित्र और अजंता की परंपरा को आधुनिक देह-बोध से जोड़ती हैं, रज़ा तांत्रिक और उपनिषदीय चिंतन को अमूर्त रंग-भाषा में बदलते हैं। हिंदी कविता भी इसी तरह परंपरा और आधुनिकता के बीच अपना रास्ता बनाती रही है, इसलिए ये चित्र उसे अपने ही प्रश्नों के प्रतिरूप जैसे लगते हैं।
चित्र से प्रेरित कविता: एक पाठ्य-प्रक्रिया
चित्र पर कविता लिखना, जिसे 'एक्फ्रासिस' कहा जाता है, तीन स्तरों पर होता है। पहले स्तर पर कवि चित्र को देखता है और उसका रूप-वर्णन करता है। दूसरे स्तर पर वह चित्र के पात्रों के भीतर प्रवेश करता है, उनकी अनकही कथा या भावना को स्वर देता है। तीसरे स्तर पर चित्र एक निमित्त बन जाता है और कवि अपने समय, अपनी स्मृति और अपने प्रश्नों की कविता लिखने लगता है। श्रेष्ठ चित्र-कविताएँ प्रायः तीसरे स्तर पर पहुँचती हैं। वहाँ पाठक को चित्र देखे बिना भी कविता पूर्ण लगती है और चित्र देखने पर कविता नई रोशनी में दिखती है।
इस प्रक्रिया में एक खतरा भी है। कविता केवल चित्र का शब्दानुवाद बनकर रह सकती है, और तब वह दोनों कलाओं के साथ अन्याय करती है। चित्र जो कह चुका है, कविता को उसे दोहराना नहीं चाहिए। उसे वह कहना चाहिए जो चित्र नहीं कह सका: समय, ध्वनि, स्मृति और भीतर का स्वर।
शिक्षण और शोध की दृष्टि से महत्त्व
हिंदी के अध्यापक और शोधार्थी के लिए यह विषय कई अर्थों में उपयोगी है।विद्यार्थी जब किसी चित्र को देखकर कविता लिखते हैं, तो उनकी अवलोकन-शक्ति, बिंब-रचना और भाषा-संवेदना तीनों साथ विकसित होती हैं। अंतरानुशासनिक अध्ययन के रूप में यह साहित्य, कला-इतिहास और संस्कृति-अध्ययन को जोड़ता है। तुलनात्मक दृष्टि से भी यह रोचक है कि एक ही परंपरा में अमृता की यथार्थवादी करुणा और रज़ा की आध्यात्मिक अमूर्तता कविता में किस तरह भिन्न-भिन्न रूप लेती है।
उपसंहार
चित्र और कविता का रिश्ता प्रतिस्पर्धा का नहीं, संवाद का है।अमृता शेरगिल के चित्र हमें मनुष्य के मौन के सामने खड़ा करते हैं, और रज़ा के चित्र उस मौन के पार फैले असीम के सामने। हिंदी कविता जब इन दोनों के पास जाती है, तो वह केवल रंगों को शब्द नहीं देती, अपनी संवेदना का दायरा भी बढ़ाती है। अंततः चित्र और कविता दोनों हमें यही सिखाते हैं कि देखना भी एक रचनात्मक कर्म है और जो कुछ हम देखते हैं, उसे नए ढंग से कहना ही कला है।


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