निराला की कहानी 'न्याय' की समीक्षा: कथावस्तु, पुलिस-व्यवस्था पर व्यंग्य, शिल्प और सीमाएँ। जानिए यह कहानी आज भी क्यों प्रासंगिक है, पूरी समीक्षा पढ़ें।
न्याय कहानी की समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। कविता के साथ-साथ गद्य विधा—विशेषकर कथा-साहित्य—में भी उनका दृष्टिकोण यथार्थवादी, प्रगतिशील और समाज-सुधारक रहा है। उनकी कहानी ‘न्याय’ तत्कालीन समाज में मौजूद वर्गीय भेदभाव, सामंती मानसिकता, न्यायिक विसंगतियों और नैतिकता के दोहरे मानदंडों पर सीधा प्रहार करती है।
'निराला जी' 'द्वारा रचित इस कहानी में 'न्याय' के सम्बन्ध में पुलिस के रवैये पर करारा व्यंग्य किया गया है। कोई वारदात हो जाती है, तो हमारे देश की पुलिस का रवैया कितना अन्यायपूर्ण होता है तथा सही अपराधी को दण्ड मिले इसके लिए पुलिस प्रयास न करके जो भी उसके फँदे में फँस जाय उसी को अपराधी सिद्ध करने का प्रयास करती है।
प्रस्तुत कहानी की कला की दृष्टि से समीक्षा निम्नलिखित तत्त्वों के आधार पर की जायेगी जिसे आचार्यों ने कहानी के तत्त्व निर्धारित किया है -
(1) कथानक या कथावस्तु, (2) पात्र एवं चरित्र-चित्रण, (3) कथोपकथन या संवाद, (4) वातावरण (देशकाल), (5) भाषा-शैली, (6) उद्देश्य, (7) शीर्षक ।
कथानक
किसी बदमाश ने लखनऊ नगर के पास बहने वाली गोमती नदी में एक व्यक्ति को घायल करके डाल दिया है । वह सहायता के लिए चिल्लाता है, पर कोई उसकी सहायता नहीं करता । क्कील महेश्वरी प्रसाद उसे देखकर भाग आये और राजीव से वहाँ जाने को कहा। राजीव उस घायल व्यक्ति को उठाकर अपने निवास पर ले आया । यहाँ आकर पायल अचेत होता जा रहा था । राजीव ने उसके ब्यान लिखे । राजीव उसे अस्पताल ले जाने के लिए सवारी लेने बाहर आया । सवारी न मिलने पर राजीव जब अपने आवास में गया तो घायल मर चुका था। राजीव ने घायल के बयान की एक प्रति वसन्तावास में प्रतिभा के पास भेजी और स्वयं थाने में रिपोर्ट लिखाने गया । थानेदार राजीव की बात से असन्तुष्ट होकर उसके आवास पर और राजीव को उसका हत्यारा समझकर थाने ले गया तथा बन्द कर दिया । तभी प्रतिभा वहाँ पहुँची और उसने राजीव को निर्दोष बताया तथा थानेदार से कहा कि इस रिपोर्ट में घायल ने मारने वाले का नाम मह बताया । इसके बाद वह अचेत हो गया । प्रतिभा का कहना था कि मह का मतलब महतावअली है जो लखनऊ का नामी बदमाश है। उसे आपने पकड़ा और छोड़ दिया । मेरे पास इस बात के लिए तीस गवाह हैं कि यह हत्या महबूब अली ने की है । आपने राजीव को गलत पकड़ लिया है।न्यायालय में आपको लेने के देने पड़ सकते हैं । इसे सुनकर थानेदार शंकित हुआ और उसने राजीव को पकड़ लिया ।
पात्र एवं चरित्र-चित्रण
इस कहानी का प्रमुख पात्र राजीव नामक युवक, दरोगा और प्रतिभा नामक युवती है। अन्य पात्रों में वकील महेश्वरी प्रसाद, एक रईस महोदय, किरायेदार, ताँगे वाला, राजीव का नौकर, घायल युवक और पंच लोग हैं।इनमें से कुछ का परिचय प्रस्तुत है-
किरायेदार - युवक के बँगले में तीन-चार भले आदमी किरायेदार रहते हैं। जब युवक घायल को लेकर आया था, तब वे लोग थे। घायल की मौत होते ही वे गायब हो जाते हैं ।
ताँगेवाला— ताँगेवाला भी अन्य लोगों की भाँति युवक की सहायता नहीं करता । वह ताँगे को बुलाता है । ताँगा युवक के बँगले पर आता है परन्तु घायल को देखकर बिगड़करं कहता है "आप हमें फँसाना चाहते हैं
आप हमें फँसाना चाहते हैं ? यह रास्ते भर को न होगा ।" तात्पर्य रास्ते में ही मर जाएगा, अस्पताल तक जीवित न रहेगा ।
नौकर और सिपाही—इन पात्रों के अतिरिक्त अन्य गौण पात्रों में युवक राजीव का नौकर है जो अपने स्वामी के कहने पर चिट्ठी लेकर प्रतिभा को दे आता है । सिपाही थानेदार के कहने पर वकील महेश्वरी प्रसाद के बँगले पर उन्हें बुलाने जाता है और आकर बताता है कि वकील साहब तो कल अदालत से लौटकर शाम वाली गाड़ी से अपने घर चले गये हैं ।
कथोपकथन
कथोपकथन या संवाद यों तो नाटक के तत्त्व हैं, परन्तु कहानी में लेखक स्वाभाविकता लाने के लिए कथोपकथन की योजना करता है । इस कहानी के कथोपकथन बहुत स्वाभाविक एवं कथा के विकास में सहायक हैं । यहाँ उदाहरण के रूप में थानेदार और राजीव युवक के बीच हुए संवादों को प्रस्तुत किया जाता है—
थानेदार आपने इसे कहाँ देखा है ?
राजीव-कई बार कह चुका हूँ
थानेदार—आप वहाँ कैसे गये ?
राजीव- मुझसे वकील बाबू महेश्वरी प्रसाद ने कहा। वह उस तरफ बँगले में रहते हैं । थानेदार—फिर आपने क्या किया ?
राजीव- मैं इसे उठा लाया ।
इन कथोपकथनों की भाषा आम बोलचाल की है तथा अत्यन्त स्वाभाविक है । अन्य कथोपकथन कथा को आगे बढ़ाने वाले तथा पुलिस के रवैये को स्पष्ट करते हैं । यहाँ जब थानेदार युवक से ताँगे का नम्बर पूछता है । भला, कोई सवारी ताँगे का नम्बर भी नोट करती है।
थानेदार—वह कितने नम्बर का ताँगा था ?
राजीव- मुझे मालूम तो था नहीं कि आप नम्बर पूछेंगे ।
वातावरण
न्याय कहानी का आरम्भ उषा काल की लालिमा, सूर्यदेव के मनोरम उदय, आकाश की केशों तुल्य नीलिमा, कोमल, स्पर्श, प्रकाश, छोटी-सी तूलिका के समान दिशा के छोरों से उतरकर तन्द्रा से अलस जीवों का जगना, अमलतास के फूलों से स्वर्णिम दिखने वाली शाखाएँ मानो तरुणी बालिकाएँ स्वागत कर रही हों, वायु का उषा के दर्शन का मधुर संदेश देना, पक्षियों का अपने घोंसलों में गाना- आदि का मनोहारी चित्रण किया गया है। इस सुन्दर वातावरण में प्रातःकाल गोमती तट पर टहलने वालों के वर्णन से कहानी का आरम्भ होता है।
वातावरण का एक दूसरा स्वरूप देखने को मिलता है थाने में, जहाँ युवक राजीव घायल युवक के विषय में रिपोर्ट करने जाता है। थाने में पुलिस राजीव से अनेक बेढंगे प्रश्न करती है, मानो रिपोर्ट करने वाला ही दोषी है जो बेचारा गोमती के जल से घायल युवक के प्राण बचाने को उसे उठाकर अपने बँगले पर लाया, उसकी दया एवं सहानुभूति का यह बदला कि थानेदार उसको कैद कर लेता है ।
तीसरे इस कहानी में देश के सामाजिक वातावरण का भी चित्रण किया गया है । युवक घायल को अस्पताल ले जाने के लिए पड़ौस के रईस महोदय से मोटर माँगता है । वे घड़ी की ओर देखकर कहते हैं-छः मिनट रह गये हैं, उन्हें डिप्टी कमिश्नर से मिलने जाना है और निगाह फेर लेते हैं। मोटर न देने का बहाना बना देते हैं। युवक के ही बँगले में तीन किरायेदार रहते हैं, वे उस समय मौजूद थे, जब युवक घायल को अपने बँगले पर उठाकर लाया था, परन्तु सहायता करना, हाल-चाल पूछना तो दूर, वे चुपचाप वहाँ से खिसक लेते हैं । ताँगा खाली होने पर भी ताँगे वाला घायल युवक को अस्पताल ले जाने को तैयार नहीं होता, उल्टे युवक से कहता है कि वह उसे (ताँगेवाले को) फँसाना चाहता है । इस प्रकार समाज के स्वार्थी वातावरण का लेखक ने यथार्थ चित्रण किया है।
भाषा शैली
घटनाक्रम के अनुरूप इस कहानी की भाषा सामान्य बोलचाल की भाषा है; यथा—“उसी रास्ते के दूसरी ओर वकील लाला महेश्वरी प्रसाद रहते हैं । रोज सुबह उसी रास्तें घड़ी और छड़ी लेकर टहलने जाते हैं।"
उर्दू एवं अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग-लेखक ने कहानी में स्वाभाविकता लाने के लिए यथा-स्थान उर्दू एवं अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया है ।
संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग-लेखक ने बीच-बीच में संस्कृत के तत्सम शब्दों का भी पर्याप्त प्रयोग किया है जिससे यथास्थान कथा-वर्णन में स्वाभाविकता आ गई है।
शैली— इस कहानी में वर्णनात्मक, व्यंग्यात्मक, आलंकारिक तथा काव्यात्मक शैलियों का प्रयोग हुआ है ।
उद्देश्य
कहानी का कोई-न-कोई उद्देश्य अवश्य रहता है । कहानीकार कहानी के माध्यम से कोई-न-कोई संदेश समाज को देता है। प्रस्तुत 'न्याय' कहानी में लेखक का उद्देश्य यह प्रतीत होता है कि न्याय के मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ हैं । व्यक्ति को बड़ी कठिनाइयों से न्याय मिल पाता है। जिस युवक ने बदमाश द्वारा छुरे के प्रहार से घायल व्यक्ति को उसकी प्राण रक्षा के लिए दया और सहानुभूति की भावना से गोमती के जल से निकाला था और अपने घर पर उठाकर लाया था, वही थाने जाने पर मुसीबत में फँस जाता है तथा थानेदार उसी को कैद कर लेता है। क्या यही न्याय है कि बचाने वाले को ही मारने का दोषी मान लिया जाय ? फिर कोई किसी को बचाने के चक्कर में क्यों पड़ेगा।
लेखक का एक अन्य उद्देश्य है—पुलिस के काम करने के तरीके, उसके रवैये की पोल खोलना । ये पुलिस वाले वारदात की गहराई में न जाकर निर्दोष लोगों को भी फँसा देते हैं । लेखक ने बड़े संवेदनापूर्ण ढंग से न्याय कहानी में यह दिखाने में सफलता प्राप्त की है कि आज की व्यवस्था में न्याय का पाना कितना कठिन है ?
शीर्षक
प्रस्तुत कहानी का शीर्षक 'न्याय' बिल्कुल सटीक है और कहानी का अन्त मुख्य पात्र राजीव को न्याय मिलने के साथ होता है ।
इस प्रकार न्याय, केवल एक घटना या अदालती फैसले की कथा नहीं है, बल्कि यह उस संपूर्ण सामाजिक व कानूनी तंत्र की समीक्षा है जहाँ सत्य और साधनहीनता अक्सर पराजित हो जाते हैं। निराला जी ने इस कहानी के माध्यम से पाठक को यह सोचने पर विवश किया है कि क्या कानूनी प्रक्रिया का पालन मात्र ही वास्तविक ‘न्याय’ है, या मानवीय संवेदना और सामाजिक समता के बिना न्याय अधूरा है।


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