निराला के सामाजिक निबन्धों में जाति-प्रथा, वर्ण-व्यवस्था, सामाजिक पराधीनता और नारी-शिक्षा पर उनके प्रगतिशील विचारों का विश्लेषण पढ़ें।
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' के निबंधों में जाति प्रथा और नारी विमर्श
हिन्दी साहित्य में सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' की पहचान प्रायः छायावाद के एक सशक्त कवि के रूप में है। पर उनका गद्य, विशेषकर उनके निबन्ध, उनके विचार-जगत को कहीं अधिक स्पष्टता से सामने रखते हैं। साहित्य समाज का दर्पण है, और निराला के सामाजिक निबन्ध इस कथन के सटीक उदाहरण हैं। इनमें वे अपने समय के समाज को केवल देखते नहीं, उसकी जड़ों तक जाकर परखते भी हैं।
साहित्य समाज का दर्पण कहा गया है, जिसका अभिप्राय यही है कि साहित्य में समाज की बहुआयामी परिस्थितियों और उसकी दशा का प्रतिबिम्ब सहज ही देखा जा सकता है । प्रत्येक काल का साहित्य बहुत कुछ तद्युगीन जीवन का इतिहास सा होता है । इतिहास में राजनैतिक घटनाक्रमों और तिथियों आदि की प्रधानता होती है तो साहित्य में सामाजिक जीवन में होने वाले परिवर्तनों और उसकी तद्युगीन सामाजिक स्थिति का रूपायतन होता है । वैदिक काल से लेकर आज तक का लिखा गया साहित्य अपने-अपने युग का दर्पण बनकर तत्कालीन जीवन का दिग्दर्शन कराता है । साहित्य की प्रत्येक विधा में समाज का चित्रांकन ही प्रमुख होता है । अस्तु, निबन्ध में भी इस विधा के रचनाकारों में समाज का विवेचन, विश्लेषण करने के साथ-साथ उसकी चिरंतन गतिविधियों को भी सम्मूर्तित करने का प्रयास किया गया है।
निराला जी ने भी अपने सामाजिक निबन्धों में तत्कालीन समाज की ज्वलन्त समस्याओं पर विचार प्रकट किए हैं जिनमें सामाजिक पराधीनता, वर्णाश्रम धर्म और स्त्री-जाति से सम्बद्ध समस्याएँ प्रमुख हैं । अंग्रेजों के शासन-काल में भारतवासी केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही परतन्त्र नहीं थे अपितु सामाजिक, धार्मिक, मानसिक एवं शैक्षिक दृष्टि से भी परतन्त्र बन गए थे। निराला जी के अनुसार वे शास्त्रों का अन्धानुकरण करते थे, धर्म में बाह्याडम्बरों पर विश्वास रखते थे, समाज में ऊँच-नीच के भेदभाव को प्रश्रय देते थे और पौराणिक गाथाओं पर बिना बिचारे अगाध श्रद्धा रखते थे । उन्होंने इसके लिए भारत की दूषित शिक्षा-प्रणाली को उत्तरदायी माना है और यह विचार व्यक्त किया है कि प्राचीन शिक्षा-व्यवस्था के आमूल परिवर्तन से ही उक्त पराधीनता समाप्त हो सकती है । उस समय जातिगत भेदभाव और उससे सम्बद्ध विचार-चर्चा भी अपने चरम उत्कर्ष पर थी । निराला जी ने भी अपने निबन्धों में इस प्रकार विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है । 'अधिकार समस्या' शीर्षक निबन्ध में उन्होंने सभी वर्गों के लोगों को समान मानकर उसमें खान-पान, विवाह आदि सम्बन्धों को अनुचित नहीं माना है। उन्होंने जाति-प्रथा को कर्म से प्रेरित मानकर शूद्र जाति की अवनति को भी कर्म श्रृंखला से सम्बद्ध किया है।
वे मनुष्य को योग्यता के मापदण्ड से आँकते हैं-वही मनुष्य अधिकार को भोगने का अधिकारी है जिसने अपने जीवन में अच्छे कर्म किए हैं। शूद्र भी यदि पढ़-लिख कर विद्वान बन गया है तो कर्म से ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है; और उस स्थिति से वे सब अधिकार अनायास प्राप्त हो जायेंगे जो ब्राह्मणों को विरासत से प्राप्त होते रहे हैं। 'सामाजिक पराधीनता' और 'वर्तमान हिन्दू समाज' शीर्षक लेखकों में भी उन्होंने इसी विचारधारा को प्रकट किया है। वास्तव में शूद्र से उनका अभिप्राय दास से है— इसीलिए उन्होंने मुस्लिम शासन-काल में सभी वर्गों को शूद्र की संज्ञा दी है और अंग्रेजी राज्य में भी 'शूद्रत्व' को समाज का प्रबल संस्कार' माना है । उनके अनुसार जाति-प्रथा मुसलमानों के शासन काल में ही टूटने लगी थी, जबकि शूद्रों ने मुस्लिम धर्म स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया था और धर्म-सुधारकों ने हिन्दू-धर्म की रक्षा के लिए धार्मिक कट्टरता को कम किया था। 'हमारा समाज' में भी उन्होंने उक्त प्रश्न पर यथार्थवादी शैली में विचार प्रकट किए हैं और जाति प्रथा को दूर करने का श्रेय राजनीति को दिया है । इसी प्रकार शिक्षा का चतुर्दिक प्रसार भी इस प्रथा की रूढ़िवादिता को कम करने में सहायक सिद्ध हुआ है । उन्हें पूर्ण विश्वास है कि भावी भारत में ब्राह्मण और वैश्य केवल कर्म के ही निर्णायक होंगे, पद की उच्चता के नहीं । वे इस तथ्य से परिचित थे कि ब्राह्मणों में भी भंगी, शराबी और कबाबी हैं, किन्तु फिर भी समाज में उनका स्थान शूद्रों से बहुत ऊँचा माना जाता है । इस प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए उन्होंने देश की उन्नति के लिए चारों वर्णों की एकता को आवश्यक माना है । वस्तुतः निराला जी वर्ण-व्यवस्था को समूल नष्ट कर यूरोपीय सभ्यता के प्रसार के पक्ष में नहीं थे, अपितु आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरुप कतिपय परिवर्तन लाने के इच्छुक थे । उनके अनुसार भारत अपनी मौलिकता को सुरक्षित रखकर ही भोगवादी देशों के सम्मुख खड़ा हो सकता है । इसी प्रेरणा से उन्होंने आर्यसमाज, ब्रह्मसमाज, रामकृष्ण मिशन, आदि संस्थाओं और उनके संस्थापकों के कार्यों एवं उपलब्धियों की सराहना की है । जिन्होंने मुस्लिम और अंग्रेजी सभ्यताओं के प्रवाह में बहते हुए समाज में पुन: धर्म के प्रति आस्था उत्पन्न की है।
वर्ण-व्यवस्था के अतिरिक्त निराला जी ने नारी-जीवन के विविध पक्षों का भी विस्तृत चित्रण किया है। उन्होंने 'कला और देवियाँ', 'राष्ट्र और नारी', 'रूप और नारी', तथा 'बाहरी स्वाधीनता और स्त्रियाँ', शीर्षक निबन्धों में नारी-जीवन से सम्बन्धित निम्नलिखित चार समस्याओं का विश्लेषण किया है— नारी की परतन्त्रता और उससे हानियाँ, नारी की शिक्षा और उससे देश को लाभ, आधुनिक नारी का स्वरूप, विधवा-विवाह । इनमें से प्रथम दो समस्याओं को उन्होंने विशेष विस्तार प्रदान किया है।
वास्तव में निराला जी महिमामयी नारी को आदर और सम्मान की प्रतिमूर्ति मानते हैं, जिसके निरादर में लक्ष्मी और सरस्वती का निरादर निहित है। इसी हेतु वे नारी-शिक्षा के प्रबल समर्थक रहे हैं । वस्तुतः उनके विचार में अब उत्तरदायित्व इतने बढ़ गये हैं कि नारी के लिए भी स्वावलम्बी होना अत्यावश्यक है । शिक्षित नारी गृह-प्रबन्ध अधिक निपुणता से कर सकती है और मातृत्व सम्बन्धी कर्त्तव्य को अधिक अच्छी तरह निभा सकती है। वह पुरुष की सहयोगिनी अथवा उसकी प्रेरणा बन सकती है, जिससे पुरुष में शान्ति संचार तो होगा ही, साथ ही परस्पर स्पर्द्धा के कारण कार्य भी मात्रा और गुण में अधिक और श्रेष्ठ होगा । स्त्री की प्रतिभा शिक्षा के अभाव में व्यर्थ जाती है, जिससे देश को भी हानि होती है।
निराला जी के विचार से आधुनिक भारत का उत्थान तब तक सम्भव नहीं जब तक कि स्त्री-जाति को न उठाया जाय । निराला जी के मन में स्त्रियों के प्रति, उनकी हीन दशा के प्रति, पुरुष जाति के द्वारा किये गये प्रतारण के प्रति सहानुभूति थी । उन्होंने इस सिलसिले से सुधार की माँग की । विशेष रूप से लेखक के चित्त, ग्रामीण-समस्या में स्त्रियों के ऊपर किये जाने वाले अत्याचार थे । रुढ़ियों में बँधा हुआ समाज किस प्रकार उन्हें पीड़ित करता है, उसका वर्णन निराला जी इस प्रकार करते हैं-"हमारे देश में स्त्रियों की शिक्षा के अभाव में कैसी दुर्दशा हो रही है, उसकी वर्णना असम्भव है । उनका लाँछन देखकर पाषाण भी गल जाते हैं। प्रतिदिन भारतवर्ष का आकाश स्त्रियों के क्रन्दन से गूँजता रहता है। युवती विधवाओं के आँसुओं का प्रवाह प्रतिदिन बढ़ता जाता है ?" निराला जी ने देश के भावी विकास के लिए नवीन पीढ़ी के उत्कर्ष के लिए स्त्रियों का शिक्षित होना आवश्यक माना है।
नारी के प्रति निराला जी का दृष्टिकोण आदर और सम्मान का रहा है । उनके साहित्य में नारी को (विशेष रूप से कथा-साहित्य में) प्रमुख स्थान दिया गया है । उनके उपन्यासों व कहानियों में जैसी-नायिकाएँ चित्रित की गई हैं, वे सब निराला जी की दृष्टि से भारतीय नारी के प्रतिरूप हैं-आत्मनिर्भर, बुद्धिमती और मनस्विनी । प्राचीन भारत में नारी अपने सम्मानित आसन पर थीं— "यहाँ एक समय था, जब ज्ञान का इतना प्रकाश फैला हुआ था कि बच्चों को पालने पर झुलाती हुई माता गाती थीं— 'त्वमसि निरंजनः ।' क्या कोई इस समय कल्पना भी कर सकता है कि वह कितना उज्जवल युग था ?" स्पष्टतः निराला जी यहाँ पुनरुत्थान के स्वर में बात कर रहे हैं । उनका आशय स्त्री-जाति को उसी गौरव पर प्रतिष्ठित करना है जैसी कि वह प्राचीन भारत में थी।
सामाजिक निबन्धों में निराला जी के उन विचारों का सूत्र साफ दिखायी पड़ता है, जिसकी परिणिति उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियों में हुई है । निराला जी के प्रगतिशील साहित्य की इस छानबीन में इन सामाजिक निबन्धों की पृष्ठभूमि महत्त्व रखती है । कृति लेखक को समझने के लिए, उसकी रचनाओं के अभिप्रेत को पकड़ने में, उसके विचारों व भावों का उपयोग स्वयं सिद्ध है।इन निबन्धों में निराला जी की प्रगतिशीलता का, उनकी चिन्तन प्रक्रिया का ठीक-ठीक निदर्शन होता है, यही उनकी अर्थवत्ता है।


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