सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' मूलतः छायावाद के महान कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं, किंतु उनकी निबंध कला भी हिंदी गद्य-साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण
निराला की निबंध कला की समीक्षा
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' मूलतः छायावाद के महान कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं, किंतु उनकी निबंध कला भी हिंदी गद्य-साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। उनके निबंध विचार, भाव और भाषा तीनों दृष्टियों से विशिष्ट हैं।
निराला जी का निबन्ध साहित्य, साहित्य की अनुपम उपलब्धि है । निराला जी के निबन्ध उनकी बहुमुखी प्रतिभा का संकेत करते हैं । साहित्य की प्रत्येक विधा में उनकी कलम बिना हिचक निर्भीक होकर चली है इसका मुख्य कारण यह था कि निराला जी का हृदय निर्मल, बहुविध विचार सम्पन्न तथा अत्यन्त संवेदनशील था । निराला जी के निबन्धों का प्रकाशन एक अवरोध लेकर होता रहा । उनके अधिकांश निबन्ध सन् 1923-24 ई. से 1956-57 ई. के बीच लिखे गये । इनका प्रकाशन संग्रह रूप में समय-समय पर होता रहा है । शैली के आधार पर उनके निबन्ध साहित्य को पाँच भागों में विभाजित कर सकते हैं- (1) सैद्धान्तिक (आलोचनात्मक), (2) विचारात्मक, (3) विवरणात्मक, (4) भावात्मक, और (5) हास्य व्यंग्यात्मक।
निराला जी के निबन्धों में विषय की दृष्टि से वैचारिक मौलिकता दृष्टव्य है। उन्होंने निबन्धों का मूल विषय साहित्य, साहित्य ही चुना।भाषा, लेखक और ग्रन्थों सामयिक साहित्य, साहित्य विवादों एवं साहित्यशास्त्र सम्बं उनके निबन्ध बड़े विचार पूर्ण हैं।आध्यात्मिक और दार्शनिक निबन्धों में उनकी बे-दृष्टि प्रभावकारी सिद्ध हुई है । कहीं-कहीं वे भारतीय संस्कृति के आख्याता के रूप में मुखर हुए हैं, जिससे उनका व्यक्तित्व मुमुक्ष होकर भी जीवन के शाश्वत सत्यों, करुणा, दया, प्रेम, और श्रद्धा को ग्रहण कर सका है। समाज विषयक निबन्धों में समाज की कुरीतियों के प्रति वे भारतीय नेता की शक्ति सम्पन्नता के प्रतीक बने हैं। लगता है कि आचार्य पीठ से उपदेश दे रहे हैं। इन निबन्धों में उनकी समाज के प्रति मंगलकारी दृष्टि का संकेत मिलता है।
डॉ. प्रेम प्रकाश भट्ट के कथनानुसार निराला जी का निबन्ध लेखन पत्र-पत्रिकाओं को ध्यान में रखते हुए हुआ है। सम्पादक-लेखक को अपने पाठकों को भी लक्ष्य बनाना पड़ता है । अतएव पाठकों के हित-चिन्तन के अनुसार ही निबन्धकार को लेख की सामग्री और प्रतिपादन का ढंग निर्धारित करना पड़ता है । अर्थात लेखक बहुत सीमा तक अपने पाठकों के प्रति बंधा रहने के कारण अपने लेख में पूर्णतया स्वछन्द नहीं हो सकता है । निराला जी के निबन्धों के बारे में अगली बात यह उल्लेखनीय है कि सामाजिक विवादों के उत्तर में जो निबन्ध लिखे गये हैं, उनमें अक्सर लेखक अपने को संयत न रख सका है । भावावेश का सहज परिणाम यह निकला कि निबन्ध रचना-शिल्प की दृष्टि से शिथिल हो गये हैं।बीच-बीच में भाव और विचार अलग-अलग खण्डों में विकसित होने लगे हैं और मूल विचारसरणि से उनका सम्बन्ध क्षीण-सा हो गया है।इस प्रकार निबन्ध-रचना में विचारों व भावों की जो कसावट आपेक्षित है, निराला जी में वह बहुधा नहीं दिखाई देती है।
निराला जी साहित्य की अन्य विधाओं की भाँति निबन्ध के क्षेत्र में भी पूरी सक्रियता से संलग्न हुए थे । उन्होंने गद्य रूपों के अनेक क्षेत्रों में कार्य किया और सभी में अपनी शैली की विशिष्ट छाप छोड़ी है । परन्तु उनके निबन्धों की शैली उनके द्वारा रचित अन्य गद्य रूपों से पर्याप्त भिन्न रही है। डॉ. निर्मल जिंदल का विचार है कि तत्कालीन निबन्ध साहित्य की तुलना में उनके निबन्धों का स्वरूप विशिष्ट और मौलिक रहा है। सुविधा के लिए उनके निबन्ध कला पर दो शीर्षकों के अन्तर्गत विचार करना उचित होगा । विषय निरूपण एवं भाषा शैली |
विषय निरूपण की दृष्टि से निराला जी के निबन्धों में पर्याप्त वैविध्य लक्षित होता है। उनकी रचना शैली विषयानुरूप परिवर्तित होती रहती है। उदाहरणार्थ संस्मरणात्मक निबन्धों में विषय-प्रतिपादन की शैली और साहित्यिक निबन्धों की रचना-पद्धति में प्रत्यक्ष अन्तर है। यही नहीं, साहित्यिक निबन्धों में भी आलोच्य विषय के अनुरूप शैली में अन्तर आ गया है । अतः प्रस्तुत शीर्षक के अन्तर्गत उनके निबन्धों में विषय-निरूपण की दृष्टि से साम्य-वैषम्य का चित्रण किया जायेगा । सर्वप्रथम उनके निबन्धों के शीर्षकों पर विचार करना अधिक उचित प्रतीत होता है । निबन्ध का प्रतिपाद्य और उसकी लोकप्रियता बहुत कुछ शीर्षक पर भी निर्भर करती है । किन्तु, निराला जी ने इन्हें रोचक और आकर्षक बनाने का प्रयत्न प्रायः नहीं किया है । उनके द्वारा रखे गये शीर्षकों से प्रतिपाद्य विषय का तो पूर्ण स्पष्टीकरण हो जाता है, किन्तु पाठकों को एक ही दृष्टि में आकृष्ट करने का गुण उनमें नहीं है । विषय को दृष्टि में रखकर उनके शीर्षकों को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है—
- व्यक्ति-विशेष के आधार पर रखे गये शीर्षक; जैसे—श्री देव रामकृष्ण परमहंस, युगावतार भगवान श्रीराम कृष्ण, श्री नन्द दुलारे बाजपेयी, आदि;
- घटना विशेष का निरूपण करने वाले शीर्षक, जैसे—प्रान्तीय साहित्य- सम्मेलन फैजाबाद, गाँधी जी से बातचीत नेहरू जी से दो बातें, आदि;
- काव्यगत प्रवृत्तियों के आधार पर रखे गये शीर्षक, जैसे—हमारे साहित्य का ध्येय, भक्त जी और प्रकृति-निरीक्षण, श्री चकोरी जी की कविता, तुलसीकृत रामायण के अद्वैत तत्व, आदि;
- विशिष्ट सन्दर्भों की पृष्ठभूमि में रखे गये सांकेतिक शीर्षक, कथा-साहित्य का फूल, अपने ही वृत्त पर, एक बात, शून्य और शक्ति, साहित्यिक सन्निपात या वर्तमान धर्म, आदि । संक्षेप में निराला जी के निबन्धों के शीर्षक पर्याप्त वैविध्यपूर्ण हैं। उनसे निबन्धगत उद्देश्य का परिचय सहज ही प्राप्त होता है ।
निराला जी ने अपने निबन्धों में तत्कालीन निबन्धों की सभी प्रचलित एवं प्रतिष्ठित शैलियों का प्रयोग किया है। आलोचनात्मक, विवरणात्मक, विचारात्मक, भावात्मक एवं हास्य-व्यंग शैलियों में से आलोचनात्मक और हास्य-व्यंग्य शैलियाँ उनके निबन्धों में अधिक मुखर हुई हैं । हास्य, व्यंग्य शैली में जहाँ व्यंग का स्वस्थ एवं गम्भीर रूप मिलता है वहीं निराला जी कहीं-कहीं व्यक्तिगत विद्वेष के कारण पूर्वाग्राही हो उठते हैं; जिससे निबन्धों में कटुता आ गई है। यह बात उन्होंने 'चाबुक' की भूमिका (निवेदन) लिखते समय स्वीकार की है।
निबन्ध में लेखक की अर्थगत विशेषताओं से उत्पन्न शैली तत्त्व ही वह कसौटी है जिस पर उसकी कलात्मकता निर्भर करती है । निबन्ध लेखन यदि अपनी शैली में अपना व्यक्तित्व डाल सका है, यदि निबन्ध में उसके व्यक्तित्व की विशेषताएँ उभर सकी हैं तो उसे एक सफल निबन्धकार कहा जायेगा । निराला जी के निबन्धों में हालाँकि आत्म-प्रकाशन के लिए उतना अवकाश न था, जैसाकि व्यक्तिगत निबन्धों में होता है, फिर भी उनके सशक्त व्यक्तित्व की झलक उनके निबन्धों में मिल ही जाती है । निराला जी के अधिकांश निबन्ध विषय प्रधान हैं, विषयी प्रधान नहीं, तब भी उनके बहुचर्चित व्यक्तित्व को निबन्धों के लिए विषय ढक नहीं पाये । अन्ततः वह इतस्तत: दिखाई पड़ ही जाता है । उनकी निबन्ध कला का निदर्शन मुख्यतया दो प्रकार से होता है— पहला विषय प्रतिपादन में और दूसरा अभिव्यंजना के ढंग में । निराला जी ने अपने निबन्धों में विषय प्रतिपादन के लिए कई युक्तियों का प्रयोग किया है । निबन्ध का प्रारम्भ, उसका मध्य और अन्त इन युक्तियों पर आघृत है । विषय की प्रकृति को समझते हुए उन्होंने विषय प्रतिपादन के ढंग चुने हैं । जैसे दार्शनिक निबन्धों में गम्भीर विवेचना से उन्होंने निबन्ध प्रारम्भ किये हैं। "शून्य या बिन्दू सब शास्त्रों से, सब तरफ सब समय स्वयं सिद्ध हैं । उद्भव, स्थित और प्रलय का शून्य ही मूल रहस्य है ।"
"ब्रह्म की व्यापकता के साथ शक्ति की भी व्यापकता सिद्ध होती है। ब्रहमा और उसकी शक्ति दोनों अभिन्न हैं।" इसी प्रकार 'संग्रह' के बाहर और भीतर नामक निबन्ध में भी गम्भीर विवेचन को ही अपनाया गया है-"संसार में दो दल हैं। एक दल बाहर मुड़ता है और दूसरा भीतर घुसता है । एक दल बाहर के सुधार के लिए कमर कसता है और दूसरा भीतर के दर्द की दवा करता है।"
साहित्यिक व राजनीतिक विवादों की प्रेरणा से लिखे गये निबन्धों में उन्होंने व्यंग्यपूर्ण ढंग से निबन्ध शुरू किये हैं। अपने विरोधियों पर आक्रमण करने के लिए यह व्यंग्य जहाँ तलवार का काम करता है, वहाँ अपनी रक्षा के लिए इससे ढाल का भी काम लिया गया है।
डॉ. निर्मल जिन्दल का कहना है कि “निराला जी सजग युगद्रष्टा थे। वे जानते थे कि साहित्य समाज का दर्पण है और इस अधिकार से साहित्यकार समाज की समस्याओं पर भली-भाँति विचार कर सकते हैं। फलतः उन्होंने अपने निबन्धों में प्रत्येक विषय का विवेचन और मूल्यांकन युगीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में किया है। किन्हीं निबन्धों में से परिस्थितियाँ प्रारम्भ में चित्रित हुई हैं और कहीं इन्हें विषय के तटस्थ वर्णन-विश्लेषण के उपरान्त अन्त युगीन वातावरण से सम्बद्ध कर दिया गया है।" इस दृष्टि से 'शून्य और शक्ति' निबन्ध उल्लेखनीय है। इसमें इन दोनों तत्त्वों के सांगोपांग निरूपण के पश्चात् अन्तः शक्ति का सम्बन्ध तत्कालीन परतन्त्र भारत से जोड़ते हुए उसे युगधर्म के रूप में चित्रित किया गया है । इसी प्रकार मुसलमान और हिन्दू कवियों में विचार-साम्य निबन्ध में दोनों जातियों के साहित्यकारों की भागवत समानता का निरूपण करते हुए यथार्थ जगत् में दोनों को मिलाकर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान की गयी है : "भारतवर्ष में जो सबसे बड़ी दुर्बलता है, वह शिक्षा की है। हिन्दुओं और मुसलमानों में विरोध के भाव दूर करने के लिए चाहिए कि दोनों को दोनों के उत्कर्ष का पूर्ण रीति से ज्ञान कराया जाय । परस्पर के सामाजिक व्यवहारों में दोनों शरीक हों और दोनों एक-दूसरे की सभ्यता को पढ़े और सीखें ।" स्पष्टतः उनके निबन्धों में सामयिक दृष्टि की प्रधानता थी । ब्रज-भाषा की अपेक्षा खड़ी बोली और रीतिकालीन कविता की अपेक्षा छायावादी कविता का पक्ष-समर्थन भी उनकी सामयिक दृष्टि का परिणाम था ।
'खड़ी बोली के कवि और कविता' निबन्ध के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि ब्रज-भाषा में नवीन भावों को वहन करने की शक्ति विद्यमान थी। उनके शब्दों में, "कला के विकास के साथ-साथ साहित्य में नई भाषा भी विकसित होती है । हरा केंडेदार मजबूत डंठल की कृशांगी नवीन कला को चाहिए।" यहाँ युगीन विचारधारा के अनुरूप खड़ी बोली के महत्त्व एवं आवश्यकता की प्रतिष्ठापना की गई है। ऐसे स्थलों पर निराला जी का लोकसंग्रही रूप प्रकट हुआ है। जिस प्रकार आचार्य शुक्ल किसी भी विषय में अन्तिम निर्णय समाज, संस्कृति आदि के आधार बनाकर दिया करते थे, उसी प्रकार निराला जी ने प्रायः समकालीन सामाजिक साहित्यक वातावरण की पृष्ठभूमि में विषय प्रतिपादन किया है। निराला जी के निबन्धों में विषय-निरूपण उनके विशिष्ट उद्देश्यों द्वारा परिचालित रहा है। अभिप्राय यह है कि निबन्ध के माध्यम से वे अपने जिस प्रयोजन की पूर्ति चाहते थे, उसी को समक्ष रखकर उन्होंने निबन्ध में विषय का प्रस्तुतीकरण किया है । उदाहरणस्वरूप 'नन्ददुलारे बाजपेयी', 'मौन कवि', 'पं. बनारसीदास का अंग्रेजी ज्ञान' आदि निबन्धों में उनका लक्ष्य व्यक्ति-विशेष के सम्बन्ध में मन्तव्य प्रकट करना था, अतः इनमें उक्त व्यक्तियों के साहित्य का विवेचन बहुत कम हुआ है । इसके विपरीत 'कवि गोविन्ददास की कुछ कविता', 'मेरे गीत और कला', 'खड़ी बोली के कवि और कविता', 'काव्य साहित्य', आदि निबन्धों में साहित्यकारों के कृतित्व का विवेचन उनका प्रमुख लक्ष्य रहा है, फलतः इनमें व्यक्तित्व पक्ष की चर्चा प्रायः नहीं हुई है । वस्तुतः निराला जी अपने निबन्धों में जो कुछ कहना चाहते थे, उसका चित्र उनके मन में पूर्णतया स्पष्ट रहता था । यही कारण है कि विषय के प्रति अपने दृष्टिकोण को उन्होंने प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर दिया है ।
निराला जी के विषय-निरूपण की यह विशेषता रही है कि उन्होंने आलोच्य विषय के सभी पक्षों का विवचेन न करके एक ही पक्ष का गहन अध्ययन किया है और उसको विविध सन्दर्भों में अधिक-से-अधिक स्पष्ट करने का प्रयास किया है।इतना ही नहीं उनके निबन्ध में विविध प्रवृत्तियाँ भी दृष्टिगत होती हैं। व्याख्यात्मक प्रवृत्ति, सैद्धान्तिक प्रवृत्ति, तुलनात्मक प्रवृत्ति, निर्णयात्मक प्रवृत्ति और आत्म तत्त्व के समावेश की प्रवृत्ति इनमें मुख्य है।
सामान्यतया निराला जी की किसी कृति अथवा साहित्यकार की आलोचना करने से पूर्व एक निश्चित कसौटी निर्धारित कर लिया करते थे और पुनः उसी के आधार पर कृति की आलोचना किया करते थे । उदाहरणार्थ 'मेरे गीत और कला' में उन्होंने सर्वप्रथम कला की मौलिक परिभाषा दी है और तत्पश्चात् उसके आधार पर अपने गीतों की व्याख्या प्रस्तुत की है । हिन्दी साहित्य में उपन्यास निबन्ध में उन्होंने अपने समकालीन उपन्यासकारों की आलोचना भी स्वनिर्मित कसौटी के आधार पर की है । निराला जी ने अपने निबन्धों में अपनी आलोचनात्मक दृष्टि का भी परिचय दिया है । कभी-कभी उन्होंने दो साहित्यकारों की तुलनात्मक आलोचना भी की है, परन्तु ऐसे निबन्धों में वे किसी पूर्वाग्रह से जुड़े नहीं रहे हैं। उन्होंने निर्णयात्मक प्रवृत्ति को भी अपने निबन्धों में स्थान दिया है। वे किसी विषय पर तर्क-वितर्क प्रस्तुत करने के बाद आचार्य रामचन्द्र शुल्ल की भाँति सूत्र वाक्यों में निर्णय भी दिया करते थे । इन वाक्यों में उनकी तत्त्व ग्राहिणी प्रतिभा झलकती थी।
निराला जी के निबन्धों में आत्म तत्त्व का समावेश पर्याप्त मात्रा में हुआ साहित्य में लेखक के व्यक्तित्व के समावेश के विरोधी नहीं थे । निराला जी में अन्य है । वे छायावादी कवियों की तुलना में 'ईगो' सबसे अधिक था । फलत: जब भी कोई साहित्यकार उन पर आक्षेप करने का प्रयत्न करता तो वे तुरन्त उसका विरोध करने के लिए तत्पर हो उठते थे । किन्तु ये उल्लेखनीय है कि उस क्षणमयी आवेग स्थिति आ जाने पर उनका गुणग्राही व्यक्तित्व उभर कर सामने आ जाता था। वे एक स्थान पर यदि किसी कवि की निन्दा करते थे तो दूसरे स्थान पर उसी कवि की किसी अन्य विशेषता के कारण उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा भी करते थे । कहने का अभिप्राय यह है कि गुणग्राही थे । स्वयं सम्मान से जीना चाहते थे और दूसरों को सम्मान देने में तनिक भी संकोच नहीं करते थे । निराला जी की सिद्धान्तप्रियता भी इनके निबन्धों में प्रकट हुई है। वे हिन्दी भाषा और साहित्य से अगाध प्रेम करते थे । फलत: उन्होंने अपने निबन्धों में भी हिन्दी के सम्मान की रक्षा का पूरा प्रयत्न किया है।
निराला जी अंग्रेजी के महत्त्व को अस्वीकार नहीं करते थे और उन्होंने अंग्रेजी का गम्भीरता से अध्ययन भी किया था किन्तु वे यह जानते थे कि दूसरों से उधार ली हुई भावनाएँ कभी गौरवास्पद नहीं हो सकती है । फलस्वरूप उन्होंने विदेशी भाषा के अंधानुकरण की अपेक्षा हिन्दी भाषा के विकास पर बल दिया है । निराला जी साहित्य और राजनीति को दो भिन्न क्षेत्र मानते थे । फलतः राजनीति के प्रभाव के वे विरोधी थे । साहित्य समारोहों में राजनीतिज्ञों को साहित्यकारों की अपेक्षा अधिक आदर सम्मान देने को वे अनुचित मानते थे। उनकी दृष्टि में राजनीति की तुलना में साहित्य का स्थान बहुत ऊँचा है। समीक्षात्मक निबन्धों में निराला जी का सहृदय आस्वादक रूप प्रधान है उन्होंने रवीन्द्र नाथ ठाकुर, गुरुभक्त सिंह भक्त, रामेश्वरी देवी, चकोरी, आदि की कविताओं में निहित भावगत और कलागत विशेषताओं का उद्घाटन सहानुभूतिपूर्वक किया है ।
निराला जी के कतिपय निबन्धों में विषयान्तर भी दिखायी पड़ता है परन्तु वह सोद्देश्य है और बहुत कम स्थलों पर हुआ है । कतिपय निबन्धों में निराला जी ने अपने दार्शनिक दृष्टिकोण को भी अभिव्यकत किया है । निराला जी साहित्य में जहाँ-जहाँ दार्शनिक विचारधारा प्रकट होती है वहाँ-वहाँ अद्वैत मत का समर्थन दिखाई पड़ता है | उनका यह अद्वैत-चिन्तन अपने भीतर एक विचित्र रसात्मकता लिए हुए है । 'प्रबन्ध-पद्म' में संकलित उनका निबन्ध 'शून्य और शक्ति' उनके दार्शनिक विवेचन पर प्रकाश डालता है । 'शून्य और शक्ति' के रूप में निराला जी मानो अव्यक्त तत्त्व की मूलभूत एकता और नाना नामरूपों में व्यक्त होने वाली उसकी प्रकट सत्ता का व्याख्यान करते हैं-शून्य या बिन्दु सब शास्त्रों में सब तरफ, सब स्वयं सिद्ध हैं । उदभव् स्थिति और प्रलय का शून्य ही मूल रहस्य है।
निराला जी के निबन्धों की भाषा को लक्षित करते हुए डॉ. निर्मल जिन्दल ने लिखा है कि निराला जी के निबन्धों में भाषा का स्वरूप विषयानुरूप परिवर्तित होता रहा है । अन्य गद्य-रूपों की तुलना में उनके निबन्धों की भाषा अधिक व्यावहारिक, स्वाभाविक और स्वच्छंद रही है । वह जीवन के अधिक निकट जान पड़ती है । वस्तुतः निबन्धों में उन्होंने भाषा का प्रयोग विद्वता-प्रदर्शन के लिए न कर आन्तरिक भावों की अभिव्यक्ति के लिए किया है । अतः उनमें कठिन शब्दों के प्रति मोह लक्षित नहीं होता है।निम्नलिखित उर्दू-शब्दों का प्रयोग इसका प्रमाण है—मुखालफत, किताबत, मंजिल-मक्सूद, शिरकत, अदा, फतवा, मुद्दालेह, शरीक, दरकार, कैफियत, मुलाहजा, मिजाज, खुसूसियत, आदि । उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि निराला जी ने उर्दू के संज्ञा शब्दों को नहीं, क्रिया पदों को भी प्रयुक्त किया है। किन्तु, अंग्रेजी से उन्होंने केवल संज्ञाएँ ग्रहण की हैं। ये संज्ञाएँ अधिकांश स्थानों पर तो देवनागरी लिपि में लिखी गई हैं। यथा स्टाइल, लिंक, प्रोपोगैंडा, प्रेस रिर्पोटर, स्टेटों, प्रेसिडेण्ट, चीफ गेस्ट, स्टेज, कॉलम, फॉलोअर, फार्म आदि । किन्तु, कुछ स्थलों पर उन्होंने रोमन और देवनागरी दोनों लिपियों का प्रयोग किया है। ऐसे स्थलों पर रोमन लिपि में शब्द लिखकर निराला जी ने कोष्ठकों में उसका हिन्दी अनुवाद दे दिया है। वस्तुतः निराला जी ने अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग में पर्याप्त स्वच्छन्दता अपनाई है। उन्होंने हिन्दी शब्दों के साथ अंग्रेजी-शब्दों को कोष्ठकों में तो पर्याप्त मात्रा में दिया ही है, कहीं-कहीं अंग्रेजी के पूरे के पूरे उद्धरणों को भी उद्धृत कर दिया है। उन दिनों अंग्रेजी भाषा और साहित्य के प्रति लोगों की रुचि बढ़ रही थी । सम्भवतः इसी कारण निराला जी के निबन्धों में ऐसे शब्दों की बहुलता मिलती है । किन्तु, ये शब्द ऊपर से आरोपित न होकर भाषा के अंग बनकर आयें हैं और इनमें से प्रायः सभी शब्द सामान्य बोलचाल में प्रचलित हैं।
भाषा की दृष्टि से निराला जी के निबन्धों की दूसरी उल्लेखनीय विशेषता संस्कृत- सूक्तियों का अतिशय प्रयोग है। अपनी बातों के प्रमाणस्वरूप उन्होंने अनेक स्थलों पर संस्कृत-सूक्तियों को उद्धृत किया है।एक निबन्धकार के रूप में निराला जी की भाषा के जितने रूप हैं उतने संभवत: किसी आधुनिक निबन्धकार की भाषा के नहीं हैं। उन्होंने जीवन के सभी क्षेत्रों को अपने निबन्धों में समेटने का प्रयत्न किया है फलतः भाषा के भी विविध रूप होते गए हैं | उनकी भाषा में हमें एक ओर संस्कृत के तत्सम् शब्दों का बाहुल्य दिखायी देता है तो दूसरी ओर अरबी-फारसी और अंग्रेजी के शब्दों का ढेर-सा है। उन्होंने अरबी-फारसी के बहुत वाक्यांशों का भी प्रयोग किया है। जब वे एक विचारक की भाँति कोई बात स्पष्ट करते हैं तो वाक्य-रचना सुव्यवस्थित एवं सुगठित रहती है। लेकिन जब वे एक प्रवक्ता की भाँति कोई विचार प्रस्तुत करते हैं तब भाषा में व्यतिक्रम, विराम-दोष, मुहावरे और लोकोक्तियों के दर्शन होते हैं । भाषा की इस विविध रूपता के कारण उनकी भाषा के चार शैली-गत भेद हो गये हैं- (1) संस्कृत निष्ठ (साहित्यिक) रूप, (2) बोलचाल की भाषा का रूप, (3) सामान्य साहित्यिक रूप, (4) हिन्दुस्तानी या उर्दू मिश्रित रूप । इस प्रकार निराला जी जी की भाषा सभी वर्ग के पाठकों के लिए विविध रूपों में प्रकट हुई है। उनकी भाषा में शक्ति है, प्रवाह है।वह व्याकरण के भय से आक्रान्त नहीं हैं।
निराला जी का निबन्ध साहित्य अपने व्यक्तित्व की दो मनोवृत्तियों से नियन्त्रित रहा है। भाव-प्रदेश से उत्पन्न अधीरता और उस सम्पूर्ण के मूलोच्छेदन के प्रति प्रयत्नशील रहना जो भारतीय व्यक्तित्व के उन्नति-पथ पर अनपेक्षित परम्पराओं द्वारा अवरुद्धता उत्पन्न कर रहा है।इसके लिए समय-समय पर निराला जी अपराजेय होकर सर्वथा पौरुषेय वाणी में विकृतियों के विरुद्ध उद्घोष करते रहे हैं। हिन्दी, साहित्य को निराला जी का बौद्धिक उपहार उनका निबन्ध साहित्य है, यद्यपि तत्कालीन शीर्षस्थ समालोचकों के उदार भाव ने इस बहुमूल्य साहित्य-राशि के प्रति मूल्यांकन के सम्यक दायित्व का निर्वाह नहीं किया है।
समग्र रूप से देखा जाए तो निराला के निबंध पांडित्य और भावुकता, विद्रोह और संवेदना, तर्क और काव्यात्मकता का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करते हैं। यद्यपि शिल्पगत अनुशासन और वस्तुनिष्ठ प्रस्तुति की दृष्टि से वे रामचंद्र शुक्ल जैसे व्यवस्थित और संतुलित निबंधकारों से भिन्न प्रतीत होते हैं, फिर भी उनकी भाषा-सामर्थ्य, वैचारिक साहस और आत्मीय शैली उन्हें हिंदी निबंध-परंपरा में एक विशिष्ट, मौलिक और अविस्मरणीय स्थान प्रदान करती है। उनके निबंध केवल विचारों का संकलन नहीं, बल्कि एक संघर्षशील और संवेदनशील रचनाकार की आत्मा की अभिव्यक्ति हैं, जो आज भी पाठकों को गहराई से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।


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