नक्सलबाड़ी आंदोलन और हिंदी कविता

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नक्सलबाड़ी आंदोलन ने हिंदी कविता को नई भाषा और जनपक्षधर दृष्टि दी। जानिए धूमिल, नागार्जुन, गोरख पांडेय और आलोक धन्वा की कविता पर इसका प्रभाव।

नक्सलबाड़ी आंदोलन और हिंदी कविता


किसी बड़े सामाजिक आंदोलन का साहित्य पर प्रभाव अक्सर तत्काल दिखाई नहीं देता। वह धीरे-धीरे भाषा, बिम्ब, विषय और कवि की दृष्टि में उतरता है। नक्सलबाड़ी का मामला इस दृष्टि से कुछ अलग है। इसके बाद के कुछ ही वर्षों में हिंदी कविता का स्वर इतनी तेज़ी से बदला कि आलोचकों को साठ के दशक के उत्तरार्ध और सत्तर के दशक को अलग काव्य-कालखंड के रूप में पहचानना पड़ा। यह प्रभाव प्रत्यक्ष भी था और परोक्ष भी। कुछ कवियों ने आंदोलन को सीधे अपनी कविता का विषय बनाया। कुछ ने उससे उपजे मोहभंग और प्रश्नाकुलता को अपनी भाषा में ढाला। कुछ ने उसकी वैचारिक ज़मीन पर खड़े होकर लोकतंत्र, सत्ता और जनता के रिश्ते को नए सिरे से देखा। इसलिए "नक्सलबाड़ी और हिंदी कविता" का अर्थ केवल उन कविताओं से नहीं है जिनमें आंदोलन का नाम आता है, बल्कि उस पूरी संवेदना से है जो इस घटना के बाद कविता में आई।

नक्सलबाड़ी: घटना और उसका ऐतिहासिक संदर्भ

मई 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी, खोरीबाड़ी और फांसीदेवा क्षेत्र में संथाल आदिवासियों और भूमिहीन किसानों ने जोतदारों और जमींदारों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा। चारु मजूमदार, कानु सान्याल और जंगल संथाल इस संघर्ष के प्रमुख नाम थे। ज़मीन पर कब्ज़े और फसल पर अधिकार के इस प्रयास को दबाने के लिए पुलिस ने गोली चलाई और कई आदिवासी स्त्री-पुरुष मारे गए। यह घटना स्थानीय दिखती थी, पर इसकी गूँज बहुत दूर तक गई। आगे चलकर 1969 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का गठन हुआ और आंदोलन आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम, बिहार के भोजपुर और मुसहरी, उत्तर प्रदेश, पंजाब और देश के अन्य हिस्सों तक फैला।

इस आंदोलन की जड़ें उस असंतोष में थीं जो आज़ादी के बाद भी भूमि-सुधार के अधूरे रह जाने, सामंती शोषण के बने रहने और विकास के लाभ से बड़े वर्ग के वंचित रहने से पैदा हुआ था। साठ का दशक वैसे भी मोहभंग का दशक था। चीन से 1962 की पराजय ने राष्ट्रीय आत्मविश्वास को हिलाया था। नेहरू के निधन (1964) के बाद नेतृत्व का शून्य महसूस हुआ। खाद्य संकट, महँगाई और बेरोजगारी बढ़ रही थी। 1967 के चुनावों में कई राज्यों में कांग्रेस का वर्चस्व टूटा। यानी आज़ादी के साथ जुड़े सपनों और यथार्थ के बीच की खाई सबके सामने थी, और नक्सलबाड़ी ने इसी खाई से पैदा हुए आक्रोश को राजनीतिक रूप दिया।

नई कविता के बाद: साहित्यिक पृष्ठभूमि

नक्सलबाड़ी आंदोलन और हिंदी कविता
हिंदी कविता में पचास के दशक की नई कविता का प्रभाव साठ के दशक तक आते-आते क्षीण होने लगा था। अज्ञेय की अगुवाई वाली नई कविता में व्यक्ति की अनुभूति, क्षण की सत्ता, आधुनिकता-बोध और शिल्प की सजगता पर बल था। उसमें व्यक्ति-स्वातंत्र्य का आग्रह था, पर बहुत से पाठकों और नए कवियों को लगने लगा कि वह समाज के बड़े प्रश्नों से कटती जा रही है। इसी बीच गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता, जो उनके निधन (1964) के बाद अधिक व्यापक रूप में पढ़ी गई, यह दिखा रही थी कि कविता में आत्मसंघर्ष और सामाजिक संघर्ष एक साथ चल सकते हैं। मुक्तिबोध की 'अँधेरे में' ने एक पूरी पीढ़ी को सिखाया कि कविता का काम केवल सौंदर्य रचना नहीं, यथार्थ से जूझना भी है। नक्सलबाड़ी के दौर के कवियों के लिए मुक्तिबोध एक महत्त्वपूर्ण पूर्वज की तरह उपस्थित थे।

साथ ही नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेर की प्रगतिशील धारा भी बनी हुई थी, जिसने जनता के जीवन को कविता का विषय बनाए रखा था। इस प्रकार साठोत्तरी कविता के पास दोनों परंपराएँ थीं: एक ओर नई कविता का शिल्प-बोध और आत्मसंघर्ष, दूसरी ओर प्रगतिशील कविता की जनपक्षधरता। नक्सलबाड़ी ने इन दोनों को एक नई तीव्रता के साथ मिलने का अवसर दिया।

साठ के दशक के कविता-आंदोलन: अकविता और उसका आक्रोश

इसी दौर में अकविता, भूखी पीढ़ी, श्मशानी पीढ़ी और अस्वीकृत कविता जैसे आंदोलन उभरे। इन आंदोलनों की मूल भावना थी कि स्थापित मूल्य, भाषा और काव्य-रूढ़ियाँ खोखली हो चुकी हैं और उन्हें तोड़ना होगा। इनमें यौन-वर्जनाओं, धर्म, नैतिकता और राजनीति सभी के प्रति तीखा निषेध था। यह निषेध ऊर्जावान था, पर उसमें प्रायः कोई स्पष्ट सकारात्मक दिशा नहीं थी। इसी कारण आलोचकों ने इसे अराजक और नकारवादी कहा।

नक्सलबाड़ी की राजनीति ने इस आक्रोश को एक वर्गीय आधार दिया। अब सवाल केवल यह नहीं था कि कविता किसे अस्वीकार करती है, बल्कि यह भी कि वह किसके पक्ष में खड़ी है। यहीं से अकविता का निषेध-स्वर जनपक्षधर प्रतिरोध की कविता की ओर मुड़ने लगा। कई कवि, जो आरंभ में अकविता की हलचल से जुड़े थे, बाद में अधिक स्पष्ट सामाजिक पक्षधरता की ओर बढ़े।

धूमिल: लोकतंत्र का मोहभंग और सड़क की भाषा

सुदामा पांडेय 'धूमिल' (1936-1975) साठोत्तरी हिंदी कविता के सबसे महत्त्वपूर्ण कवियों में गिने जाते हैं। उनका पहला संग्रह 'संसद से सड़क तक' (1972) इस पूरे दौर की मनःस्थिति का दस्तावेज़ है। इसका शीर्षक ही अपने आप में एक कथन है: संसद वह जगह है जहाँ जनता के नाम पर निर्णय होते हैं, और सड़क वह जगह है जहाँ जनता सचमुच जीती है। दोनों के बीच का फ़ासला ही धूमिल की कविता का विषय है।

'रोटी और संसद' में वे एक प्रश्न उठाते हैं कि रोटी बेलने वाला, रोटी खाने वाला और रोटी से खेलने वाला, ये तीन अलग लोग हैं, और तीसरा आदमी जो रोटी से खेलता है, वही संसद है। इस छोटे-से बिम्ब में पूरा राजनीतिक अर्थशास्त्र समाया हुआ है। 'मोचीराम' में एक मोची के माध्यम से वे समाज की उस श्रम-आधारित समझ को सामने रखते हैं जिसमें हर आदमी का मूल्य उसके पेशे और हैसियत से तय होता है। मोची अपने काम के बीच ही यह समझ लेता है कि इस दुनिया में 'अच्छे' और 'बुरे' जूते जैसा कुछ नहीं, बस पैरों की हैसियत है। इस दृष्टि में एक ठोस, अनुभव से अर्जित वर्ग-चेतना है।

'पटकथा' धूमिल की लंबी कविता है, जिसमें आज़ादी के बाद के भारत की पूरी कथा एक तीखे प्रश्न के रूप में उभरती है। इसमें जनतंत्र, संविधान, नेता और जनता, सब पर संदेह की दृष्टि है। यह कविता नक्सलबाड़ी के बाद के मोहभंग को सीधे-सीधे पकड़ती है, यद्यपि धूमिल स्वयं किसी राजनीतिक दल या सशस्त्र आंदोलन से जुड़े कवि नहीं थे। यहाँ यह भेद करना ज़रूरी है कि धूमिल को 'नक्सलवादी कवि' कहना सरलीकरण होगा। वे उस व्यापक असंतोष के कवि हैं जिसने नक्सलबाड़ी को जन्म दिया और जिससे नक्सलबाड़ी स्वयं प्रभावित भी हुआ।

धूमिल की सबसे बड़ी देन उनकी भाषा है। उन्होंने कविता को अलंकार, कोमलता और बौद्धिक अमूर्तन से बाहर निकालकर बोलचाल की खुरदरी, आक्रामक और व्यंग्यपूर्ण भाषा दी। उनकी कविता में कटाव है, झुँझलाहट है, और एक ऐसा स्वर है जो पाठक को असुविधाजनक प्रश्नों के सामने खड़ा कर देता है।

नागार्जुन: जनकवि की दीर्घ परंपरा

बाबा नागार्जुन (1911-1998) का कवि-व्यक्तित्व नक्सलबाड़ी से बहुत पहले बन चुका था। वे किसान आंदोलनों, जेल यात्राओं और जनता के बीच रहकर लिखने वाले कवि थे। इसलिए जब सत्तर के दशक में बिहार और बंगाल के किसान संघर्ष तेज़ हुए, तो नागार्जुन के लिए यह कोई बाहरी घटना नहीं, अपने ही जनजीवन का विस्तार था।

उनकी कविता 'भोजपुर' भोजपुर क्षेत्र के किसान संघर्ष को संबोधित है और उसे नए इतिहास की रचना के रूप में देखती है। 'हरिजन-गाथा' (1977) बिहार के बेलछी जैसे नरसंहारों की पृष्ठभूमि में दलितों पर होने वाली हिंसा को कविता का विषय बनाती है। इन कविताओं में नागार्जुन की खास पहचान दिखती है: वे ज़ोर-ज़ोर से नारे नहीं लगाते, बल्कि लोककथा, लोकधुन, व्यंग्य और जीवंत बिम्बों के सहारे राजनीतिक कथ्य को कविता बनाते हैं। आपातकाल के दौरान उनकी तीखी राजनीतिक कविताएँ भी इसी परंपरा का हिस्सा हैं।

नागार्जुन का महत्त्व इस बात में है कि वे दिखाते हैं कि राजनीतिक कविता भी उच्च कोटि की कविता हो सकती है। उनके यहाँ पक्षधरता और कलात्मकता के बीच टकराव नहीं, बल्कि संतुलन मिलता है। यही कारण है कि नक्सलबाड़ी के बाद की जनवादी कविता के लिए वे एक आदर्श-पुरुष की तरह रहे।

गोरख पांडेय: आंदोलन की कविता और गीत

गोरख पांडेय (1945-1989) उन कवियों में हैं जिनका जीवन और कविता नक्सलबाड़ी की धारा से सबसे घनिष्ठ रूप से जुड़ा रहा। वे केवल कवि नहीं, राजनीतिक कार्यकर्ता और विचारक भी थे। जन संस्कृति मंच के गठन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी कविताएँ और गीत किताबों से अधिक आंदोलन के मंचों, सभाओं और गाँवों में जिए गए।

'स्वर्ग से विदाई' जैसी कविता में वे सुख-शांति के काल्पनिक स्वर्ग को छोड़कर धरती के संघर्ष को चुनते हैं। इसमें एक नैतिक निर्णय है कि कवि वहीं खड़ा होगा जहाँ जनता लड़ रही है। भोजपुरी लोक-परंपरा के गीत-रूपों का उन्होंने सजग उपयोग किया, जिससे कविता जनता की अपनी भाषा और धुन में पहुँचती थी। उनके गीतों में किसान, मज़दूर, स्त्री और दलित की पीड़ा के साथ-साथ बदलाव की उम्मीद भी दिखती है। गोरख पांडेय की कविता यह दिखाती है कि राजनीतिक कविता में सरलता कमज़ोरी नहीं, एक सचेत काव्य-रणनीति भी हो सकती है।

आलोक धन्वा: तीव्रता, बेचैनी और नया बिम्ब-विधान

आलोक धन्वा (जन्म 1948) की कविताएँ सत्तर के दशक में बहुत चर्चित हुईं। 'जनता का आदमी' और 'गोली दागो पोस्टर' जैसी कविताओं में उस दौर की बेचैनी, आक्रोश और युवा चेतना की तीव्रता मिलती है। 'गोली दागो पोस्टर' सत्ता की हिंसा के सामने खड़े एक युवा की चेतना को पकड़ती है। उसकी भाषा में गुस्सा भी है और सोच भी, और उसका बिम्ब-विधान पाठक को झकझोरता है।

आगे चलकर 'भागी हुई लड़कियाँ' जैसी कविता में आलोक धन्वा की संवेदना का दूसरा पक्ष सामने आता है, जहाँ स्त्री की स्वतंत्रता और समाज की रूढ़ियों का टकराव कविता का केंद्र बनता है। यह दिखाता है कि इस पीढ़ी के कवियों के लिए सामाजिक मुक्ति का प्रश्न केवल आर्थिक नहीं था, उसमें स्त्री, जाति और व्यक्ति की आज़ादी के प्रश्न भी शामिल थे।

अन्य कवि और व्यापक काव्य-परिदृश्य

इस दौर में और भी अनेक कवि अपने-अपने ढंग से इसी संवेदना से जुड़े। राजकमल चौधरी की कविता में स्थापित नैतिकता और पाखंड के विरुद्ध एक दुस्साहसी निषेध दिखता है। लीलाधर जगूड़ी की आरंभिक कविताओं में साधारण आदमी की यातना और व्यवस्था के प्रति विक्षोभ मुखर है। विजेंद्र जैसे कवियों ने जनपक्षधर परंपरा को आगे बढ़ाया। आगे चलकर मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल और राजेश जोशी जैसे कवियों की रचनाओं में भी इसी जनपक्षधर संवेदना का विस्तार और परिष्कार दिखता है, यद्यपि उनका स्वर अधिक संयत और बहुस्तरीय है।

अन्य भाषाओं की कविता और हिंदी में अनुवाद

नक्सलबाड़ी का प्रभाव केवल हिंदी तक सीमित नहीं था। बांग्ला में इस आंदोलन के दौर की कविता और कथा-साहित्य ने गहरा प्रभाव डाला, और महाश्वेता देवी की 'हजार चौरासी की माँ' जैसी रचनाएँ इसी परिवेश से जुड़ी हैं। तेलुगु में श्रीश्री की परंपरा और विप्लव रचयितल संघम (विरसम) के कवियों, विशेषकर वरवर राव, ने क्रांतिकारी कविता को नई ऊँचाई दी। पंजाबी में पाश की कविता ने प्रतिरोध की चेतना को ऐसा स्वर दिया जो भाषा की सीमाएँ पार कर गया। पाश की यह पंक्ति-चेतना कि सपनों का मर जाना सबसे खतरनाक है, हिंदी पाठकों के बीच भी बहुत लोकप्रिय हुई।

इन भाषाओं की कविताओं के हिंदी अनुवादों ने हिंदी के पाठक-जगत में प्रतिरोध की साझा चेतना बनाई। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि नक्सलबाड़ी का साहित्यिक प्रभाव किसी एक भाषा का नहीं, बल्कि बहुभाषी भारतीय साहित्य का सामूहिक अनुभव था।

काव्य-भाषा, बिम्ब और शिल्प में परिवर्तन

इस दौर की कविता में सबसे स्पष्ट बदलाव भाषा के स्तर पर दिखता है। कविता अभिजात शब्दावली और बौद्धिक जटिलता से उतरकर बोलचाल, मुहावरों और लोक-बोलियों तक आई। कई बार उसमें गाली-गलौज जैसी वर्जित मानी जाने वाली भाषा भी आई, क्योंकि कवि मानते थे कि जनता की सच्ची भाषा से परहेज़ करना भी एक तरह की वर्ग-सुविधा है।

बिम्बों के स्रोत भी बदले। अब चाँद, फूल और नदी के रोमानी बिम्बों की जगह खेत, खलिहान, फैक्ट्री, थाना, कचहरी, सड़क और संसद आए। शिल्प में छंदमुक्तता के साथ-साथ व्यंग्य, नाटकीयता, संवाद-शैली और पोस्टर-शैली का प्रयोग बढ़ा। कविता लिखित पन्ने से निकलकर नुक्कड़ सभाओं, जन-गीतों और पोस्टरों तक पहुँची। इससे कविता का श्रोता-वर्ग बदला: वह अब केवल शिक्षित साहित्य-पाठक तक सीमित नहीं रहा।

प्रतिरोध की कविता की सीमाएँ

इस काव्य-धारा की अपनी कमजोरियाँ भी रहीं, जिन्हें ईमानदारी से देखना आवश्यक है। राजनीतिक प्रतिबद्धता जब कलात्मक विवेक पर हावी हो गई, तो कविता सपाट नारेबाजी में बदल गई। कई रचनाएँ अपने समय के तात्कालिक उत्तेजन में लिखी गईं और उसी के साथ अपनी प्रभावशीलता खो बैठीं। विचारधारा के आग्रह ने कहीं-कहीं मानवीय संवेदना की सूक्ष्मता और जीवन की जटिलता को सरलीकृत कर दिया।

आलोचकों ने यह प्रश्न भी उठाया है कि आंदोलन की हिंसा, उसकी आंतरिक विसंगतियों और उसके कुछ राजनीतिक निर्णयों पर आलोचनात्मक दृष्टि इस कविता में कम दिखती है। दूसरी ओर, यह भी सच है कि राज्य के दमन, फर्जी मुठभेड़ों, यातनाओं और वंचित समुदायों के साथ होने वाले अन्याय को साहित्य में दर्ज करने का श्रेय इन कवियों को जाता है। इस प्रकार इस धारा का मूल्यांकन न तो अंध-प्रशंसा से हो सकता है, न अंध-निंदा से।

निष्कर्ष: एक स्थायी साहित्यिक विरासत

नक्सलबाड़ी आंदोलन ने हिंदी कविता को एक नई ज़मीन, नई भाषा और नया सरोकार दिया। उसने कविता को व्यक्ति के अकेलेपन से निकालकर समाज के संघर्ष से जोड़ा और यह प्रश्न सामने रखा कि कविता आख़िर किसके पक्ष में खड़ी है। धूमिल ने इसका उत्तर लोकतंत्र के मोहभंग में खोजा, नागार्जुन ने जनता की लोक-परंपरा में, गोरख पांडेय ने आंदोलन के गीतों में और आलोक धन्वा ने नई पीढ़ी की बेचैन चेतना में।

इस दौर की कविता का स्थायी महत्त्व इस बात में है कि उसने हिंदी कविता की जनपक्षधर परंपरा को नई दिशा दी। आज भी जब जल, जंगल और ज़मीन के प्रश्न, किसानों-मज़दूरों के अधिकार, विस्थापन और राज्य-सत्ता से नागरिक के रिश्ते पर बहस होती है, तो इन कविताओं की प्रासंगिकता महसूस होती है।नक्सलबाड़ी की राजनीति पर मतभेद हो सकते हैं, पर उसके साहित्यिक प्रभाव से इनकार करना कठिन है।उसने हिंदी कविता को यह सिखाया कि भाषा, बिम्ब और शिल्प, सब कुछ अंततः उस जीवन से जुड़ा है जिसे कविता संबोधित करती है।

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