दक्षिण भारत का शास्त्रीय साहित्य विषयक द्वि दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न
दक्षिण भारत का शास्त्रीय साहित्य विषयक द्वि दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न
केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली, मद्रास विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग एवं पूर्व छात्र संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘दक्षिण भारत का शास्त्रीय साहित्य’ विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन 30 सितंबर को संपन्न हुआ।
उद्घाटन सत्र में मद्रास विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. रीटा जॉन ने विज्ञान और साहित्य के बीच के गहरे अंतर्संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि विज्ञान और साहित्य को अलग-अलग खाँचों में नहीं देखा जा सकता। दोनों ही मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड को समझने की जिज्ञासा से उपजते हैं। उन्होंने कहा कि शास्त्रीय साहित्य में सदियों पहले व्यक्त किए गए जीवन-दर्शन और आधुनिक विज्ञान की अनेक अवधारणाओं के बीच संवाद स्थापित किया जा सकता है।
उन्होंने तमिल के महान ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ तथा अव्वैयार के ‘आत्तिचूड़ी’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें निहित सूक्ष्म जीवन-दृष्टि को आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन, विशेषकर क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) की अवधारणाओं के संदर्भ में भी समझने का प्रयास किया जा सकता है। उनके अनुसार, जिस प्रकार क्वांटम भौतिकी पदार्थ, ऊर्जा और प्रकृति के सूक्ष्मतम स्तर पर होने वाली जटिल प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास करती है, उसी प्रकार शास्त्रीय साहित्य मानव जीवन, आचरण और अस्तित्व के सूक्ष्म पक्षों को अपने विशिष्ट ढंग से अभिव्यक्त करता है।
डॉ. रीटा जॉन ने कहा कि साहित्य केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य के लिए दृष्टि विकसित करने का माध्यम भी है। दक्षिण भारतीय शास्त्रीय साहित्य में निहित ज्ञान, जीवन-मूल्य और वैज्ञानिक दृष्टि पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने ऐसे अंतरविषयी विमर्श को उच्च शिक्षा और शोध के लिए विशेष रूप से उपयोगी बताया।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उप निदेशक डॉ. नूर अहमद ने अपने संबोधन में केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा हिंदी के प्रचार-प्रसार, संवर्धन एवं विकास के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं और गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, ज्ञान और हमारी सामूहिक स्मृतियों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जोड़ने वाली सशक्त कड़ी है। दक्षिण भारतीय शास्त्रीय साहित्य में भारतीय ज्ञान-परंपरा का समृद्ध भंडार निहित है, जिसे व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने और उस पर नए दृष्टिकोण से विचार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने संगोष्ठी के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा कि इस आयोजन का मूल प्रयोजन दक्षिण भारत की शास्त्रीय साहित्यिक परंपराओं को हिंदी के माध्यम से राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ना, विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को सुदृढ़ करना तथा शास्त्रीय साहित्य में निहित जीवन-मूल्यों और ज्ञान-संपदा को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन भारतीय भाषाओं के बीच सेतु का कार्य करते हैं और हमारी बहुभाषिक साहित्यिक विरासत को एक व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय से पधारे हिंदी विभाग के प्रो. पवन अग्रवाल ने दक्षिण भारतीय शास्त्रीय साहित्य के विविध आयामों पर प्रकाश डालते हुए चारों शास्त्रीय भाषाओं—तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम—के महत्वपूर्ण साहित्यिक पक्षों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने इन भाषाओं की समृद्ध साहित्यिक परंपरा, काव्य-सौंदर्य, जीवन-दृष्टि, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि दक्षिण भारतीय शास्त्रीय साहित्य भारतीय साहित्य की व्यापक और बहुरंगी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मद्रास विश्वविद्यालय के तेलुगु विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो। संपत कुमार ने कहा कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्राचीन साहित्य में प्रकृति, प्रेम, वीरता, लोकजीवन, नैतिकता, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है। इन साहित्यिक परंपराओं का अध्ययन केवल अतीत को जानने का माध्यम नहीं, बल्कि वर्तमान समाज और भारतीय जीवन-मूल्यों को समझने की दृष्टि भी प्रदान करता है। उन्होंने दक्षिण भारतीय शास्त्रीय साहित्य को भारतीय भाषाओं के बीच सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संवाद का सशक्त सेतु बताया।
धारवाड़ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ टी. आर. भट्ट ने संगोष्ठी के आयोजन के लिए आयोजकों को साधुवाद देते हुए कहा कि दक्षिण भारतीय शास्त्रीय साहित्य पर केंद्रित यह आयोजन वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत की चारों शास्त्रीय भाषाओं में सदियों से संचित ज्ञान, जीवन-दृष्टि, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का समृद्ध भंडार है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से इस साहित्यिक विरासत को व्यापक स्तर पर समझने, उसके विविध आयामों पर विमर्श करने तथा नई पीढ़ी तक पहुँचाने का अवसर मिलता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि संगोष्ठी में होने वाला विचार-विमर्श भारतीय भाषाओं के बीच साहित्यिक संवाद को और अधिक सशक्त बनाएगा।
एम ओ पी वैष्णव कॉलेज के भाषा विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ आर राजेश्वरी ने कहा कि शास्त्रीय साहित्य को समकालीन संदर्भों से जोड़कर पढ़ने की आवश्यकता है, ताकि इसकी प्रासंगिकता नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुँच सके। उन्होंने ऐसे आयोजनों को भारतीय भाषाओं और साहित्यिक परंपराओं के बीच संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
बतौर मुख्य अतिथि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व संकुलपति तथा वर्तमान में शिक्षा मंत्रालय की भारतीय भाषा समिति के वरिष्ठ विशेषज्ञ प्रो. आर. एस. सर्राजू ने कहा कि शास्त्रीय साहित्य को केवल अतीत की धरोहर मानकर संग्रहालय में रखने के बजाय उसे वर्तमान जीवन और समकालीन चिंतन से जोड़ना होगा। इसके लिए शोध, अनुवाद और अंतरभाषिक संवाद को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने ऐसे आयोजनों को भारतीय भाषाओं के बीच संवाद और भारतीय ज्ञान-विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
मद्रास विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. चिट्टी अन्नपूर्णा ने सभी अतिथियों, विद्वानों एवं प्रतिभागियों का आत्मीय स्वागत-सत्कार किया। संगोष्ठी की परिकल्पना को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इसकी वैचारिक सूत्रधारिता ‘गाथा सप्तशती’ से जुड़ती है, जो दक्षिण भारतीय साहित्यिक परंपरा की प्राचीनता, समृद्धि और जीवन के विविध रंगों को अपने भीतर समेटे हुए है। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारतीय शास्त्रीय साहित्य की परंपरा केवल प्राचीन ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें तत्कालीन समाज, प्रकृति, प्रेम, लोकजीवन और मानवीय संवेदनाओं की सजीव अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि गाथा सप्तशती से लेकर तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम के समृद्ध शास्त्रीय साहित्य तक की यात्रा भारतीय साहित्य की बहुवर्णी और अखंड परंपरा का परिचय कराती है। इसी साहित्यिक विरासत को एक साझा मंच पर लाकर उसके विविध आयामों पर विमर्श करना इस संगोष्ठी की मूल परिकल्पना है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि दो दिनों तक चलने वाला यह बौद्धिक संवाद दक्षिण भारतीय शास्त्रीय साहित्य को नए दृष्टिकोण से समझने तथा भारतीय भाषाओं के बीच साहित्यिक सेतु को और मजबूत करने में सहायक सिद्ध होगा।
श्री बी एल अच्छा और डॉ पवन अग्रवाल की अध्यक्षता में संपन्न प्रथम और द्वितीय विचार सत्र तमिल शास्त्रीय साहित्य पर केंद्रित रहे। इन सत्रों में डॉ राजकुमार उपाध्याय (दिल्ली), डॉ ईश्वरी (चेन्नई), डॉ आर राजेश्वरी (चेन्नई), डॉ राजलक्ष्मी कृष्णन (चेन्नई), डॉ एन लावण्या (चेन्नई), डॉ बी संतोषी कुमारी (चेन्नई), डॉ एस लावण्या (चेन्नई), डॉ ए भवानी (चेन्नई) ने अपनी बात रखी तो तेलुगु शास्त्रीय साहित्य पर केंद्रित तीसरे विचार सत्र में डॉ नीरजा गुर्रमकोंडा (चेन्नई), डॉ नजीम बेगम (चेन्नई), डॉ चिट्टी अन्नपूर्णा (चेन्नई), डॉ आर एस सर्राजू (हैदराबाद) ने अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ संपत कुमार (चेन्नई) ने की।
डॉ पवन अग्रवाल (लखनऊ) की अध्यक्षता में संपन्न मलयालम शास्त्रीय साहित्य पर केंद्रित विचार सत्र में डॉ बाबू विश्वनाथ (कालडी), डॉ गांधीमती (तमिलनाडु), डॉ वत्सला किरण (चेन्नई) ने अपने विचार व्यक्त किए तो डॉ मंजुनाथ एन अंबिग (चेन्नई) की अध्यक्षता में संपन्न कन्ना शास्त्री साहित्य पर केंद्रित विचार सत्र में डॉ तमिलसेल्वी (चेन्नई) और डॉ टी आर भट्ट (कर्नाटक) ने अपनी बात रखी।
चर्चा सत्र में संगोष्ठी की उपलब्धता को रेखांकित किया गया।मद्रास विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ की ओर से डॉ. स्वाति पालीवाल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन साहित्य, संस्कृति और ज्ञान के विविध आयामों पर संवाद को समृद्ध करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
मद्रास विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ की ओर से समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित मद्रास उच्च न्यायालय की अधिवक्ता एवं कवयित्री श्रीमती सुषमा ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय एवं मद्रास विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी की सराहना करते हुए आयोजकों को साधुवाद दिया।
डॉ सुनीता जाजोदिया ने औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित किया। उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ नीरजा गुर्रमकोंडा ने कार्यक्रम का संचालन किया।
- नीरजा गुर्रमकोंडा,
सह संपादक 'स्रवंति',असोसिएट प्रोफ़ेसर
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान ,दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
टी नगर,चेन्नई - 600 017


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