मृत्यु की गवाही अनिरुद्ध जिस दिन मरा, उसके कमरे में एक टूटा हुआ आईना पड़ा था।
मृत्यु की गवाही
अनिरुद्ध जिस दिन मरा, उसके कमरे में एक टूटा हुआ आईना पड़ा था।
काँच के बिखरे हुए टुकड़ों में उसका चेहरा अनेक हिस्सों में बँटा था। हर टुकड़े में वही चेहरा दिखाई देता था, फिर भी हर चेहरा कुछ अलग था। जैसे एक ही आदमी अपने भीतर कई लोगों को लेकर जीता रहा हो, और उनमें से कोई भी पूरी तरह उसका अपना न बन पाया हो।
बाद में माया की नज़र उस आईने पर पड़ी, तो उसके मन में एक प्रश्न उठ खड़ा हुआ: किसी इंसान को भीतर से कितनी बार टूटना पड़ता है, इससे पहले कि उसकी आख़िरी टूटन दुनिया के लिए केवल एक समाचार बन जाए?
मेज़ पर एक पत्र रखा था।
“माया को दोष मत देना। मैं ख़ुद को समझ नहीं पाया।”
पत्र में बस यही दो वाक्य थे।
लेकिन मृत्यु के बाद शब्दों की क़ीमत अचानक बढ़ जाती है। जीवन भर किसी की आवाज़ अनसुनी करने वाला समाज, उसके मर जाने पर उसके आख़िरी शब्दों का अर्थ निकालने में जुट जाता है। जो बातें जीवित रहते हुए किसी ने नहीं सुनीं, मृत्यु के बाद उन्हीं कुछ शब्दों पर सब अपना-अपना दावा ठोकने लगते हैं।
पुलिस ने पत्र उठा लिया। मीडिया ने मृत्यु की ख़बर को अपने हाथों में ले लिया। समाज ने संदेह को।
और माया के सामने रह गया उसका मृत पति, साथ ही ऐसे प्रश्नों का एक पहाड़, जिनका उत्तर उसके पास नहीं था।
माया और अनिरुद्ध के प्रेम की शुरुआत में न कोई विचारधारात्मक घोषणा थी, न किसी आंदोलन की विजय का दावा। दो लोग थे, जिन्हें एक-दूसरे में अपने अकेलेपन की पहचान मिली थी।
माया ट्रांस महिला थी और अनिरुद्ध ट्रांस पुरुष। अपनी लैंगिक पहचान को स्वीकार करवाने के लिए दोनों ने लंबा संघर्ष किया था। जन्म के समय उनके शरीर को देखकर दुनिया ने जो पहचान तय कर दी थी, उससे अलग अपने वास्तविक अस्तित्व को जीने के लिए उन्हें वर्षों तक सफ़ाई देनी पड़ी थी।
इसलिए जब वे मिले, तो उनके बीच सबसे पहले शरीरों का अंतर नहीं, बल्कि दुनिया के सामने बार-बार ख़ुद को समझाने की थकान साझा हुई।
माया हँसती, तो अनिरुद्ध को लगता कि जीवन अब भी सहज हो सकता है। अनिरुद्ध चुप रहता, तो माया को उसके भीतर एक गहरी आत्मीयता महसूस होती। मगर समय के साथ उसे समझ में आया कि उस चुप्पी की जड़ में आत्मीयता से अधिक डर था।
जब दोनों ने विवाह करने का निश्चय किया, ट्रांस समुदाय ने उनका स्वागत किया। उनकी शादी केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए आशा का अवसर भी थी, जिन्हें समाज ने लंबे समय तक प्रेम और दांपत्य के अधिकार से वंचित रखने की कोशिश की थी।
विवाह के दिन सावित्री अम्मा ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा था,
“तुम दोनों ने अपने अस्तित्व के लिए दुनिया से बहुत लड़ाइयाँ लड़ी हैं। अब ऐसा घर बनाना, जहाँ तुम्हें एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ने की ज़रूरत न पड़े।”
माया ने इस आशीर्वाद को अपने भविष्य की तरह सँभाल लिया। अनिरुद्ध ने भी उस पर भरोसा किया।
लेकिन विवाह किसी सामाजिक संघर्ष की विजय का स्थायी प्रमाणपत्र नहीं होता। सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे का हाथ थाम लेना आसान हो सकता है; बंद कमरे में अपने भय, असुरक्षाएँ और कमज़ोरियाँ किसी दूसरे के सामने रख पाना कहीं कठिन है। विवाह में नारों से अधिक बातचीत की आवश्यकता होती है, और प्रेम को सबसे अधिक चोट तब पहुँचती है, जब संवाद के दरवाज़े भीतर से बंद कर दिए जाते हैं।
अनिरुद्ध के लिए यही दरवाज़ा खोलना मुश्किल होता गया।
शुरुआत के दिन छोटे-छोटे सुखों से बने थे। सुबह चाय किसकी बारी पर बनेगी, इस पर बहस होती। रात का भोजन साथ होता। वेतन मिलने पर किताबें खरीदी जातीं। रविवार की दोपहरें बिना किसी विशेष योजना के बीत जातीं।
उनकी ख़ुशी को देखने के लिए किसी दर्शक की ज़रूरत नहीं थी। न उन्हें तालियों की अपेक्षा थी, न किसी से अपने प्रेम की वैधता का प्रमाणपत्र चाहिए था।
फिर भी, धीरे-धीरे अनिरुद्ध अपने ही भीतर सिमटने लगा।
शारीरिक निकटता को लेकर उसकी आशंकाएँ बढ़ रही थीं। अपने शरीर के प्रति असहजता और यौन क्षमता को लेकर चिंता उसके आत्मविश्वास को प्रभावित करने लगी थी। समाज ने पुरुष होने की जो कसौटियाँ बना रखी थीं, अनिरुद्ध अनजाने में उन्हीं कसौटियों पर ख़ुद को परखता रहता था।
उसे लगता कि वह उन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहा। यही विचार उसके लिए पीड़ा का कारण बन गया।
वह अपनी उलझन माया से साझा नहीं कर सका।
एक दिन माया ने उससे पूछा, “अनी, तुम मुझसे इतने दूर क्यों होते जा रहे हो?”
“ऐसी कोई बात नहीं है।”
“तो फिर हमारे बीच यह चुप्पी क्यों बढ़ रही है?”
“मुझे थोड़ा समय चाहिए।”
“कितना?”
“मुझे नहीं मालूम।”
माया ने उसे ध्यान से देखा। वह उसके भीतर चल रहे संघर्ष को समझना चाहती थी, लेकिन उसके सामने एक बंद दरवाज़े के अलावा कुछ नहीं था।
“अगर कोई बात तुम्हें परेशान कर रही है और तुम मुझसे कह नहीं पा रहे, तो मैं तुम्हें अपनी बात कहने का पूरा अवसर दूँगी। लेकिन तुम कुछ बताओगे ही नहीं, तो तुम्हारे मन में क्या चल रहा है, मैं कैसे जान सकती हूँ?”
अनिरुद्ध ने कोई उत्तर नहीं दिया।
वह माया से प्रेम करता था। मगर अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करना उसे अपनी असफलता का ऐलान लगता था। उसे भय था कि अपने भीतर की बात कह देने से वह माया की नज़रों में छोटा हो जाएगा।
जबकि माया की अपेक्षा कुछ और थी। वह उससे किसी विशेष शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन नहीं चाहती थी। उसके लिए रिश्ते का अर्थ निकटता, विश्वास और एक-दूसरे के अनुभवों को सुनने की तत्परता था।
अनिरुद्ध इस प्रेम को समझने के बजाय उसे अपनी योग्यता की कसौटी बना बैठा।
माया का प्रश्न उसे आरोप लगने लगा। उसकी चिंता में उसे निराशा दिखाई देने लगी। उसके स्नेह के पीछे भी वह अपनी अयोग्यता का कोई छिपा हुआ निर्णय खोजने लगा।
इस प्रकार, माया से उसके रिश्ते के बीच जो दूरी बढ़ रही थी, उससे कहीं अधिक गहरी दूरी उसके और उसके अपने मन के बीच पैदा हो गई।
उसने इस भय को एक नाम दे दिया था: मर्दानगी।
एक रात माया ने सुझाव दिया कि वे किसी काउंसलर से मिलें।
“हम किसी ऐसे व्यक्ति की मदद ले सकते हैं, जो हमारी समस्याओं को समझने में हमारा साथ दे।”
अनिरुद्ध को यह सुझाव अच्छा नहीं लगा।
“क्या हमें अपने निजी जीवन की बातें किसी अनजान आदमी को बतानी चाहिए?”
माया ने शांत स्वर में कहा, “जब हम ख़ुद अपनी समस्याएँ नहीं समझ पा रहे, तो मदद लेने में बुराई क्या है?”
अनिरुद्ध ने तुरंत पूछा, “क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं हूँ?”
माया कुछ पल उसे देखती रही।
“मैंने ऐसा कब कहा?”
“तुम्हें कहने की ज़रूरत नहीं है।”
“अनी, मैं तुम्हारे ख़िलाफ़ नहीं हूँ।”
“फिर भी तुम्हें मुझसे कुछ चाहिए।”
“हाँ, चाहिए। मैं चाहती हूँ कि तुम मुझसे ईमानदारी से बात करो। तुम्हारे भीतर क्या चल रहा है, यह मुझे पता चले। और जब मुझे तकलीफ़ हो, तो तुम भी मेरी बात सुनो। क्या अपनी ज़रूरतें बताना तुम्हारा अपमान करना है?”
अनिरुद्ध वहाँ से उठकर चला गया।
माया अकेली बैठी रही। उसके सामने एक ऐसी विडंबना थी, जिसे वह समझ नहीं पा रही थी। जो व्यक्ति स्वयं समझे जाने की इच्छा रखता हो, वह किसी दूसरे को उसे समझने का अवसर देने से क्यों डरता है?
इस प्रश्न का उत्तर माया के पास नहीं था। अनिरुद्ध के पास भी नहीं।
उनका रिश्ता केवल इसलिए नहीं टूट रहा था कि प्रेम समाप्त हो गया था। प्रेम मौजूद था, लेकिन भय ने उसके और संवाद के बीच दीवार खड़ी कर दी थी।
अनिरुद्ध की मृत्यु के बाद वही घर, जहाँ कभी दो लोगों ने साथ जीने के सपने देखे थे, सार्वजनिक पूछताछ का केंद्र बन गया।
पुलिस वहाँ आई। पड़ोसी पहुँचे। पत्रकारों ने दस्तक दी। अनिरुद्ध के मित्र भी आए।
माया को रोते देखकर कुछ लोगों ने उसे दिलासा दिया। लेकिन जब वह चुप हो गई, तो वही लोग उसकी ख़ामोशी के अर्थ निकालने लगे।
मृत्यु के बाद समाज के पास सबसे बड़ा सवाल यही था: इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है?
किसी व्यक्ति के भीतर पलते भय, अपमान और मानसिक संघर्ष को समझने में समय लगता है। किसी एक को दोषी ठहरा देने में नहीं।
एक आरोपी मिल जाए, तो कहानी सरल हो जाती है। एक कारण घोषित कर दिया जाए, तो लोगों को लगता है कि उन्होंने घटना को समझ लिया। और यदि संदेह के घेरे में कोई स्त्री हो, तो समाचार के लिए सनसनीखेज़ शीर्षक तैयार करना और भी आसान हो जाता है।
अनिरुद्ध की मृत्यु के साथ माया का नाम जोड़ दिया गया।
समाचार प्रकाशित हुआ:
“वैवाहिक विवाद: ट्रांस युवक की आत्महत्या के मामले में पत्नी से पूछताछ।”
इस समाचार में माया की पहचान से अधिक उसकी लैंगिक पहचान को उभारा गया। एक ट्रांस महिला संदेह के घेरे में हो, तो समाज के पुराने पूर्वाग्रहों को नया अवसर मिल जाता है। उन पूर्वाग्रहों को किसी ठोस प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती; उनके लिए एक घटना ही पर्याप्त होती है, जिसे वे अपने पुराने विश्वासों के पक्ष में इस्तेमाल कर सकें।
अब माया के निजी जीवन पर उसका अपना अधिकार नहीं रह गया था।
उसके आँसू लोगों की चर्चा का विषय बन गए। उसका विवाह सार्वजनिक बहस में बदल गया। उसकी ख़ामोशी को शक की नज़र से देखा गया। यहाँ तक कि उसका दुःख भी लोगों को संदिग्ध लगने लगा।
पति को खोने के बाद उसे अपने शोक के साथ-साथ यह भी साबित करना पड़ रहा था कि उसका शोक सच्चा है।
ट्रांस समुदाय ने इस घटना पर आपात बैठक बुलाई।
कुछ सदस्यों का कहना था कि माया के साथ तुरंत खड़ा होना चाहिए। दूसरों ने सलाह दी कि जाँच पूरी होने तक कोई पक्ष नहीं लेना चाहिए।
सावित्री अम्मा ने सबकी बातें सुनीं और फिर उठकर बोलीं,
“जाँच अवश्य होनी चाहिए। लेकिन बिना प्रमाण किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने का अधिकार हम किसी को नहीं दे सकते।”
सभा में से एक आवाज़ आई, “तो क्या अनिरुद्ध को न्याय नहीं मिलना चाहिए?”
“क्यों नहीं? उसे न्याय मिलना चाहिए। लेकिन न्याय का अर्थ यह नहीं कि उसकी मृत्यु के बदले किसी और का जीवन नष्ट कर दिया जाए।”
एक सदस्य ने आपत्ति की, “अगर हमने माया का समर्थन किया, तो बाहर के लोग हमारे समुदाय पर सवाल उठाएँगे।”
सावित्री अम्मा ने उसकी ओर देखा।
“क्या हम अपनी छवि बचाने के लिए किसी निर्दोष को अकेला छोड़ दें? अगर हमारी एकता किसी दूसरे का हाथ छोड़ने की शर्त पर टिकी है, तो उस एकता का मूल्य ही क्या है?”
कुछ देर तक कोई नहीं बोला।
फिर उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाई।
“हम दुनिया से कहते हैं कि हमारे साथ अन्याय हुआ है। अगर हम अपने ही लोगों के साथ वैसा ही अन्याय करने लगें, तो हमारे संघर्ष का क्या अर्थ बचेगा? एकजुट रहना ज़रूरी है, लेकिन एकजुटता का अर्थ सच्चाई की जाँच बंद कर देना नहीं है।”
सभी लोग उनकी बात से सहमत नहीं हुए। कुछ को समुदाय की प्रतिष्ठा की चिंता थी। कुछ अनिरुद्ध की मृत्यु को लेकर आहत थे। कुछ माया की असहाय स्थिति को देख पा रहे थे।
आख़िरकार तय हुआ कि माया को कानूनी सहायता दी जाएगी, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी और जाँच में सहयोग किया जाएगा। साथ ही, पर्याप्त प्रमाण सामने आने से पहले किसी के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाएगा।
यह कोई ऐतिहासिक घोषणा नहीं थी। न ही इससे समाज के सारे पूर्वाग्रह समाप्त हो जाने वाले थे।
फिर भी, इस निर्णय में एक महत्त्वपूर्ण बात थी। इंसान को बचाने के लिए हमेशा किसी बड़े आंदोलन की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी न्याय की शुरुआत इस बात से होती है कि किसी को अकेला छोड़ने के बजाय उसका हाथ थाम लिया जाए।
जाँच कई महीनों तक चली।
अनिरुद्ध के फ़ोन में मौजूद संदेशों और उसकी डायरी की जाँच की गई। उसके मित्रों के बयान लिए गए। माया और अनिरुद्ध के दांपत्य जीवन में मौजूद तनावों के बारे में जानकारी जुटाई गई।
माया के विरुद्ध किसी अपराध को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले।
जाँच से अनिरुद्ध की मृत्यु का कोई एक निश्चित कारण भी सामने नहीं आया।
अपने शरीर को लेकर उसकी चिंताएँ, मानसिक संघर्ष, सामाजिक दबाव और वैवाहिक जीवन में संवाद की कमी, ये सब उसकी परिस्थितियों के हिस्से थे। लेकिन इनमें से किसी एक को उसकी मृत्यु का निर्णायक कारण घोषित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं था।
माया के विरुद्ध लगाए गए संदेह को कोई ठोस कानूनी समर्थन नहीं मिला। इसके बावजूद जाँच अपनी प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ती रही।
लेकिन समाज ने अपना मुक़दमा जारी रखा।
जिस ख़बर में माया पर संदेह किया गया था, उसे हज़ारों लोगों ने साझा किया था। जब जाँच के दौरान सामने आए तथ्यों ने उस संदेह को आधारहीन दिखाया, तो उन्हें सामने रखने वाली ख़बर को बहुत कम लोगों ने साझा किया।
अफ़वाहें सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैलती रहीं। तथ्यों को लोगों तक पहुँचने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा।
माया ने इस अंतर को महसूस किया।
सच सामने आने में महीनों लग गए थे।
झूठ को फैलने के लिए एक दोपहर भी पर्याप्त थी।
इसी दौरान एक दिन अनिरुद्ध की डायरी उसके हाथ लगी। उसमें लिखी अंतिम प्रविष्टियों में से एक ने उसे देर तक वहीं बैठाए रखा।
अनिरुद्ध ने लिखा था:
“मुझे मालूम है कि माया मुझसे प्रेम करती है। लेकिन जब मैं ख़ुद को स्वीकार नहीं कर पाता, तो उसके प्रेम को कैसे स्वीकार करूँ? जब वह मुझे सांत्वना देती है, तो मुझे अपनी असफलता याद आती है। जब वह चुप रहती है, तो लगता है कि वह मुझसे निराश हो गई है। मैं अपने डर का प्रमाण उसके चेहरे पर खोजता रहता हूँ।”
माया ने डायरी बंद कर दी।
उसकी आँखें भर आईं।
अनिरुद्ध के भीतर चल रहे संघर्ष का एक हिस्सा अब उसके सामने था। लेकिन इस समझ ने उसके दुःख को समाप्त नहीं किया। उलटे, एक नई पीड़ा जन्म ले गई। वह सोचने लगी कि अनिरुद्ध अपने मन के भीतर इतना अकेला था और वह उसकी उस अकेलेपन तक पहुँच ही नहीं सकी।
अगर उसने अपने शरीर को लेकर उठने वाले सवाल उससे साझा किए होते, तो क्या वह उसका सहारा बन सकती थी?
अगर दोनों ने समय रहते किसी विशेषज्ञ की सहायता ली होती, तो क्या उनका रिश्ता बच जाता?
इन प्रश्नों के निश्चित उत्तर किसी के पास नहीं थे।
मृत्यु के बाद मनुष्य अनगिनत संभावनाओं की कल्पना कर सकता है, लेकिन उन संभावनाओं में लौटकर जी नहीं सकता।
माया अनिरुद्ध को वापस नहीं ला सकती थी। वह अपनी ओर से उसकी मृत्यु का कोई अंतिम कारण भी तय नहीं कर सकती थी।
उसके सामने केवल एक रास्ता था: अनिरुद्ध के जीवन को उसकी असफलता की कहानी बनकर रह जाने से बचाना।
वह एक ट्रांस पुरुष था। उसे डर लगता था। उसने प्रेम किया था। वह कई बार ग़लत समझ बैठा था। अपने भीतर की उलझनों के लिए सहायता माँगने में उसे संकोच होता था।
इन सबके बीच वह एक इंसान था।
इस सच्चाई से उसकी मृत्यु के सारे रहस्य नहीं सुलझते थे। लेकिन इससे माया को यह समझने में मदद मिली कि किसी जीवन को केवल एक फ़ैसले, एक आरोप या एक असफलता में सीमित नहीं किया जा सकता।
कुछ समय बाद अनिरुद्ध की स्मृति में एक सभा आयोजित की गई।
सभागार में बहुत-से लोग उपस्थित थे। मंच पर अनिरुद्ध की तस्वीर रखी थी। उसके नीचे फूल सजे थे। पीछे एक बड़ा बैनर लगा था, जिस पर लिखा था:
“हमारा संघर्ष जारी रहे।”
माया उस वाक्य को कुछ देर तक देखती रही। फिर माइक के सामने आकर खड़ी हो गई।
“अनिरुद्ध मेरा पति था। मैं उसकी पत्नी थी। हम एक-दूसरे से प्रेम करते थे। हमारे रिश्ते में समस्याएँ भी थीं। हो सकता है कि मैं उसकी सारी पीड़ाओं को समझ नहीं पाई। यह भी संभव है कि वह मेरी पीड़ा को पूरी तरह नहीं समझ सका।”
उसने कुछ क्षण रुककर सामने बैठे लोगों को देखा।
“जब वह मरा, तो मैंने अपना पति खो दिया। लेकिन उसके बाद मुझे यह साबित करने के लिए भी खड़ा होना पड़ा कि मैंने उससे प्रेम किया था। मेरे रोने पर सवाल उठे। मेरी ख़ामोशी पर संदेह हुआ। जब मैंने बोलने की कोशिश की, तो कुछ लोगों ने कहा कि मेरे शब्द अनिरुद्ध की मृत्यु का अपमान कर रहे हैं।”
सभागार शांत था।
माया ने कहा, “मैं अनिरुद्ध को दोषी ठहराकर जीना नहीं चाहती। और न ही मैं अपने आपको दोषी मानकर जीना चाहती हूँ। हमारे रिश्ते में ग़लतियाँ हुई होंगी। हम दोनों कहीं-न-कहीं असफल भी हुए होंगे। लेकिन किसी रिश्ते की असफलता अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि एक व्यक्ति दूसरे की मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार है।”
उसकी नज़र फिर बैनर पर गई।
“हम अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं। अपनी पहचान को स्वीकार करवाने के लिए संघर्ष करते हैं। लेकिन क्या हमारे संघर्ष में उन लोगों के लिए भी जगह है, जो अपने भीतर डरते हैं, जो असफल होते हैं, जो मदद माँगने से घबराते हैं? जब कोई ट्रांस पुरुष अपने शरीर को लेकर अपनी चिंताएँ सामने रखता है, तो क्या हम उसे मर्दानगी की कसौटी पर परखे बिना सुन सकते हैं? जब कोई ट्रांस महिला अपने दांपत्य जीवन की तकलीफ़ बताती है, तो क्या हम उसकी स्त्री पहचान को कटघरे में खड़ा किए बिना उसकी बात समझने की कोशिश कर सकते हैं?”
उसकी आवाज़ में कंपन था, मगर वह रुकी नहीं।
“अनिरुद्ध की मृत्यु ने मुझे यह नहीं सिखाया कि प्रेम हर समस्या का समाधान है। प्रेम करने वाले लोग भी एक-दूसरे को समझने में चूक सकते हैं। इसलिए हमें बातचीत के लिए सुरक्षित जगहें चाहिए। काउंसलिंग की सुविधा चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बोलने का साहस चाहिए। किसी को अपने शरीर से जुड़ी चिंताएँ बताने के लिए अपमान सहने की नौबत नहीं आनी चाहिए।”
कुछ पल बाद उसने अपनी बात पूरी की।
“अनिरुद्ध को याद करने के लिए उसे संत बनाने की ज़रूरत नहीं है। मेरा साथ देने के लिए उसे दोषी ठहराना भी ज़रूरी नहीं है। किसी मृत व्यक्ति की पीड़ा को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि हम जीवित व्यक्ति की पीड़ा से मुँह मोड़ लें।”
वह मंच से नीचे उतर आई।
सावित्री अम्मा ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया।
उस स्पर्श में न कोई फैसला था, न कोई सवाल। वह केवल एक अनिश्चित संसार में एक इंसान का दूसरे इंसान पर किया गया भरोसा था।
इसके बाद माया ने ट्रांस समुदाय के कुछ मित्रों के साथ मिलकर एक सहायता केंद्र शुरू किया।
उसका नाम रखा गया, “इदम”।
वह ऐसी जगह थी जहाँ लोग अपने शरीर, यौन जीवन, दांपत्य संघर्ष और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं पर बिना अपमान के बात कर सकते थे।
केंद्र की दीवार पर एक वाक्य लिखा गया:
“आपका भय आपकी पहचान की असफलता नहीं है।”
एक दिन वहाँ आया एक युवा ट्रांस पुरुष माया के सामने बैठा था। कुछ देर हिचकिचाने के बाद उसने कहा,
“मुझे अपने शरीर को लेकर कुछ चिंताएँ हैं। मुझे डर लगता है कि भविष्य में अगर मैं किसी साथी के साथ जीवन बिताऊँगा, तो कहीं ये समस्याएँ मेरे रिश्ते को तोड़ न दें।”
माया ने उसकी बात बीच में नहीं काटी। उसने उसे अपनी बात पूरी करने दी।
फिर बोली, “अपने शरीर को लेकर चिंतित होने का मतलब यह नहीं कि तुम प्रेम के योग्य नहीं हो। लेकिन अगर तुम इन बातों को किसी से साझा किए बिना अकेले सहते रहोगे, तो इससे तुम्हें भी तकलीफ़ हो सकती है और तुम्हारे साथी को भी। हम मदद ले सकते हैं। अपनी समस्याओं को समझने की कोशिश कर सकते हैं।”
युवक ने कुछ देर बाद कहा, “मैंने यह बात आज तक किसी से नहीं कही।”
माया ने उत्तर दिया, “लेकिन अब तुमने कह दी है।”
उसने सिर उठाया। माया मुस्कराई।
उस क्षण माया को अनिरुद्ध का चेहरा याद आया। उसे लगा, यह उस बातचीत की शुरुआत है, जो अनिरुद्ध के जीवन में भी कभी होनी चाहिए थी।
लेकिन उसने उस युवक को अनिरुद्ध की कहानी नहीं सुनाई।
हर दुःख को दूसरों को सावधान करने वाली कहानी में बदलना आवश्यक नहीं होता। कभी-कभी इतना ही पर्याप्त है कि कोई दूसरा इंसान उसी पीड़ा से गुज़रने से बच जाए।
वर्ष बीतते गए। अनिरुद्ध की स्मृति माया के जीवन से कभी पूरी तरह विदा नहीं हुई।
लेकिन उसने अपने शेष जीवन को अनिरुद्ध के विरुद्ध शिकायत बनाकर नहीं जिया। उसने स्वयं को भी उस मृत्यु का अपराधी मानने से इनकार कर दिया।
उसे उनके प्रेम के दिन याद आते थे। साथ ही वे असफलताएँ भी याद आती थीं, जिनके बीच वे एक-दूसरे से प्रेम करते हुए भी एक-दूसरे की बात नहीं सुन सके थे।
माया ने अनिरुद्ध की मृत्यु को किसी विचारधारा के पक्ष या विपक्ष में इस्तेमाल होने वाला तर्क बनाने से इनकार कर दिया।
उसकी मृत्यु इस बात का प्रमाण नहीं थी कि ट्रांस लोगों के दांपत्य जीवन अनिवार्य रूप से असफल होते हैं। किसी एक व्यक्ति की मृत्यु के आधार पर पूरे समुदाय के जीवन के बारे में फ़ैसला सुनाना किसी के अधिकार में नहीं था।
दूसरी ओर, समुदाय के प्रति एकजुटता का अर्थ यह भी नहीं था कि उसके किसी सदस्य के हर व्यवहार को सही मान लिया जाए। वास्तविक एकता में तथ्यों की जाँच करने, ग़लतियों को स्वीकार करने और असहाय लोगों की रक्षा करने की क्षमता होनी चाहिए।
माया ने धीरे-धीरे समझा कि न्याय की कसौटी केवल अपराधी को खोज निकालना नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि पर्याप्त प्रमाण के बिना किसी निर्दोष को अपराधी न बना दिया जाए।
एक शाम वह अनिरुद्ध की क़ब्र पर फूल रखने गई।
वहाँ कुछ देर खड़ी रहने के बाद उसने धीमे स्वर में कहा,
“अनी, सबको हमारी ज़िंदगी का फ़ैसला सुनाने की जल्दी थी। लेकिन हमारी ज़िंदगी किसी भी फ़ैसले से कहीं अधिक जटिल थी।”
फिर वह वहाँ से लौट पड़ी।
पीछे पत्थर पर अनिरुद्ध का नाम खुदा था। सामने एक खुला रास्ता था।
मृत्यु ने उसके प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया था। जीवन भी उसके सामने कोई तैयार समाधान लेकर नहीं आया। उसने केवल एक नया प्रश्न रखा था: अब आगे क्या?
इस बार माया ने उस प्रश्न से बचने की कोशिश नहीं की।
उसने जीने का निर्णय लिया।
यह अनिरुद्ध से बदला लेने का निर्णय नहीं था। न ही उसकी स्मृति को भुला देने का।
वह अपने जीवन को किसी दूसरे की मृत्यु का मात्र परिशिष्ट बनने से बचाना चाहती थी।
क्योंकि किसी इंसान की मृत्यु अपने आप में किसी दूसरे के अपराध का प्रमाण नहीं होती। प्रेम भी किसी व्यक्ति के सारे घावों को भर देने की गारंटी नहीं है। फिर भी, एक-दूसरे को सुनने की जगह बनाना, सहायता माँगने की स्वतंत्रता देना और आरोपों के भय के बिना अपनी सच्चाई कह पाना, ये सब आज भी मनुष्यों के बीच संभव हैं।
माया ने अनिरुद्ध की मृत्यु को एक सरल निष्कर्ष में बदलने की कोशिश नहीं की।
उसने उससे अधिक कठिन रास्ता चुना।
उसने स्वीकार किया कि उस मृत्यु के भीतर ऐसी जटिलताएँ थीं, जिनका कोई एक उत्तर नहीं था। उसने अपने दुःख को दबाने के बजाय उसे जगह दी। और फिर, धीरे-धीरे, उसने अपने जीवन पर अपना अधिकार वापस हासिल किया।
यही उसका जीवित रहना था।
और यही थी उसकी गवाही।
- बिनॉय एम. बी.,
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