हिंदी कथा साहित्य में शिक्षक का चरित्र: मास्टर जी से कोचिंग माफिया तक

SHARE:

प्रेमचंद, श्रीलाल शुक्ल से समकालीन कथाकारों तक हिंदी कथा साहित्य में शिक्षक की छवि कैसे बदली? जानिए आदर्श मास्टर जी से कोचिंग माफिया तक की पूरी यात्रा

हिंदी कथा साहित्य में शिक्षक का चरित्र: मास्टर जी से कोचिंग माफिया तक

समाज का दर्पण कहे जाने वाले साहित्य में शिक्षक की छवि सदैव एक संवेदनशील विषय रही है। भारतीय परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समकक्ष रखा गया और 'गुरु गोविंद दोऊ खड़े' की उक्ति ने उसे ईश्वर से भी ऊँचा आसन दे दिया। किंतु साहित्य केवल आदर्श का गुणगान नहीं करता, वह यथार्थ का साक्षी भी होता है। इसीलिए हिंदी कथा साहित्य में शिक्षक का चित्रण एक स्थिर प्रतिमा के रूप में नहीं, बल्कि बदलते समय के साथ निरंतर रूपांतरित होते चरित्र के रूप में मिलता है। प्रेमचंद के त्यागी मास्टर से लेकर आज के बाज़ारू कोचिंग संचालक तक की यह यात्रा वस्तुतः भारतीय समाज, उसकी शिक्षा-व्यवस्था और उसके मूल्यबोध के पतन और परिवर्तन की कथा है।

आदर्श गुरु की परंपरा और प्रेमचंद का युग

हिंदी कथा साहित्य के आरंभिक दौर में शिक्षक प्रायः एक आदर्श पात्र के रूप में आता है। वह निर्धन है, पर स्वाभिमानी; अल्प वेतन पाता है, पर ज्ञान-दान को धर्म मानता है। प्रेमचंद का साहित्य इस दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि वे स्वयं भी शिक्षक और स्कूल-इंस्पेक्टर रहे थे और शिक्षा विभाग की भीतरी दुनिया को निकट से जानते थे। उनकी कहानियों में 'मंत्र' और 'पंच परमेश्वर' जैसी रचनाएँ भले सीधे शिक्षक पर केंद्रित न हों, पर उनके यहाँ गुरु, पंडित और मौलवी की छवि समाज के नैतिक आधार के रूप में उभरती है। 'बड़े भाई साहब' जैसी कहानी में शिक्षा-पद्धति पर जो सूक्ष्म व्यंग्य है, वह रटंत प्रणाली और परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था की उस समस्या की ओर संकेत करता है जो आगे चलकर और विकराल होने वाली थी।

इस युग का शिक्षक प्रायः गाँव का सम्मानित व्यक्ति है। उसकी हैसियत भले आर्थिक रूप से कमज़ोर हो, पर सामाजिक रूप से उसे आदर प्राप्त है। 'मास्टर जी' संबोधन में एक आत्मीयता और श्रद्धा दोनों समाई हुई हैं। वह बच्चों का ही नहीं, पूरे गाँव का मार्गदर्शक है, चिट्ठियाँ पढ़ने-लिखने वाला, विवाद सुलझाने वाला और नैतिक परामर्श देने वाला व्यक्ति। इस छवि के पीछे औपनिवेशिक काल में शिक्षा के सीमित प्रसार का भी हाथ था, जब पढ़ा-लिखा होना ही अपने आप में एक विशिष्टता थी।

स्वातंत्र्योत्तर मोहभंग और शिक्षक की बदलती छवि

हिंदी कथा साहित्य में शिक्षक का चरित्र: मास्टर जी से कोचिंग माफिया तक
स्वतंत्रता के बाद जब शिक्षा का विस्तार हुआ, तो शिक्षक की सामाजिक स्थिति और उसकी आंतरिक दशा, दोनों में परिवर्तन आने लगा। नेहरूयुगीन आशावाद के टूटने के साथ साहित्य में भी मोहभंग का स्वर प्रबल हुआ। अब शिक्षक आदर्श का प्रतीक होने के साथ-साथ व्यवस्था का शिकार भी दिखाई देता है। कम वेतन, अफ़सरशाही का दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप और संसाधनों का अभाव उसके जीवन को कठिन बनाते हैं।

इस दौर की सबसे उल्लेखनीय कृति श्रीलाल शुक्ल का 'राग दरबारी' है। यहाँ शिवपालगंज का कॉलेज शिक्षा-संस्थान कम और राजनीतिक जोड़-तोड़ का अखाड़ा अधिक है। वैद्य जी की सत्ता, प्रिंसिपल की विवशता और मास्टर खन्ना तथा मालवीय जी जैसे पात्रों के माध्यम से लेखक ने दिखाया कि शिक्षा की संस्था किस प्रकार स्वार्थी तत्वों के हाथों की कठपुतली बन गई है। शिक्षक यहाँ या तो इस तंत्र का हिस्सा बन जाता है या उससे जूझता हुआ टूट जाता है। यह उपन्यास शिक्षा-जगत की उस विडंबना को उजागर करता है जिसमें विद्यालय में पढ़ाई को छोड़कर बाक़ी सब कुछ होता है। यहीं से 'मास्टर जी' की आदर्श छवि पर पहली गहरी चोट पड़ती है।

संघर्षरत और उपेक्षित शिक्षक

साठ-सत्तर के दशक के बाद की कहानियों और उपन्यासों में शिक्षक का एक और रूप सामने आता है, वह है अभाव और अपमान झेलता मध्यवर्गीय शिक्षक। वह ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाने को विवश है, उसके बच्चे अच्छे स्कूलों में नहीं पढ़ पाते, और उसकी नैतिकता तथा आर्थिक ज़रूरतों के बीच निरंतर द्वंद्व चलता रहता है। यही वह बिंदु है जहाँ ट्यूशन की प्रवृत्ति साहित्य में प्रवेश करती है। आरंभ में यह मजबूरी का समाधान दिखती है, पर धीरे-धीरे यह एक स्वीकृत और फिर अनिवार्य व्यवस्था बन जाती है।

इस काल के लेखकों ने शिक्षक के भीतर चल रही इस टूटन को संवेदना के साथ चित्रित किया है। वह जानता है कि वह जो कर रहा है, वह उसके आदर्शों के अनुकूल नहीं, पर परिवार की ज़िम्मेदारियाँ उसे विवश करती हैं। यहाँ शिक्षक खलनायक नहीं, बल्कि परिस्थितियों का मारा हुआ मनुष्य है। साहित्य उसके प्रति सहानुभूति रखता है, क्योंकि लेखक समझता है कि पतन का दोष व्यक्ति से अधिक व्यवस्था का है।

उदारीकरण, बाज़ार और शिक्षा का व्यावसायीकरण

नब्बे के दशक में उदारीकरण और भूमंडलीकरण ने भारतीय समाज की संरचना को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। शिक्षा अब ज्ञान-प्राप्ति का माध्यम कम और रोज़गार पाने का साधन अधिक मानी जाने लगी। प्रतियोगी परीक्षाओं की होड़, इंजीनियरिंग और मेडिकल में प्रवेश की आपाधापी तथा सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण ने एक नई समानांतर व्यवस्था को जन्म दिया, जिसे हम कोचिंग उद्योग कहते हैं।

इस परिवर्तन ने शिक्षक की भूमिका और पहचान को पूरी तरह बदल दिया। जो विद्यालय कभी ज्ञान के केंद्र थे, वे प्रमाणपत्र बाँटने की औपचारिक संस्थाएँ बनते गए, जबकि वास्तविक 'पढ़ाई' कोचिंग संस्थानों में सिमट गई। शिक्षक अब 'सर' या 'फैकल्टी' हो गया, और 'मास्टर जी' शब्द में जो आत्मीयता थी, वह व्यावसायिक संबंध में बदल गई। विद्यार्थी अब शिष्य नहीं, उपभोक्ता है; और ज्ञान अब साधना का विषय नहीं, बिकाऊ पैकेज है।

कोचिंग माफिया: नए यथार्थ की कथा

इक्कीसवीं सदी के कथा साहित्य में कोचिंग संस्कृति एक प्रमुख विषय बनकर उभरी है। यहाँ शिक्षक का एक नया और अपेक्षाकृत स्याह रूप मिलता है। वह सितारा-शिक्षक है, जिसके विज्ञापन शहर की दीवारों पर चिपके हैं, जिसकी कक्षा में सैकड़ों विद्यार्थी हैं और जिसकी सफलता का पैमाना चयनित विद्यार्थियों की संख्या है। इस तंत्र में विद्यार्थी की मानसिक स्थिति, उसकी रुचि और उसका स्वास्थ्य गौण हो जाते हैं। कोटा जैसे नगरों की कहानियाँ इस बात की गवाही देती हैं कि किस प्रकार अपेक्षाओं के दबाव में किशोर मन टूटता है।

कोचिंग माफिया की अवधारणा केवल अतिशयोक्ति नहीं है। प्रश्नपत्र लीक कराने वाले गिरोह, फ़र्ज़ी परिणामों के दावे, भारी शुल्क की वसूली, संस्थानों के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा और कभी-कभी राजनीतिक संरक्षण, यह सब मिलकर एक ऐसा तंत्र रचते हैं जिसमें शिक्षा का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। समकालीन कथाकारों ने इस पूरे परिदृश्य को कभी व्यंग्य की धार से, कभी करुण यथार्थ के साथ और कभी रहस्य-रोमांच के ढाँचे में प्रस्तुत किया है। यहाँ शिक्षक का एक रूप वह भी है जो इस व्यवस्था में रहकर भी भीतर से असहज है, जो जानता है कि वह बच्चों से उनका बचपन छीन रहा है, पर इस चक्र से बाहर निकलना उसके लिए आसान नहीं।

आदर्श और यथार्थ के बीच: संतुलित दृष्टि की आवश्यकता

यह कहना उचित नहीं होगा कि हिंदी कथा साहित्य में शिक्षक का चित्रण केवल एकरेखीय पतन की कहानी है। हर युग में साहित्य ने ऐसे शिक्षकों को भी चित्रित किया है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों पर टिके रहे। समकालीन लेखन में भी कुछ ऐसे पात्र मिलते हैं जो सीमित संसाधनों वाले सरकारी स्कूलों में, किसी दूरस्थ गाँव में, बच्चों की आँखों में सपने जगाने का काम चुपचाप करते रहते हैं। इसी प्रकार, कोचिंग में पढ़ाने वाले सभी लोग शोषक नहीं हैं; उनमें भी अनेक ऐसे हैं जो ईमानदारी से विद्यार्थियों की सहायता करते हैं।

वस्तुतः साहित्य की शक्ति इसी में है कि वह इन जटिलताओं को सरल निष्कर्षों में नहीं बाँधता। 'आदर्श मास्टर जी' और 'कोचिंग माफिया' दो ध्रुव अवश्य हैं, पर इनके बीच मानवीय अनुभवों का एक विशाल क्षेत्र है, जहाँ शिक्षक अपनी कमज़ोरियों, विवशताओं और आकांक्षाओं के साथ एक पूर्ण मनुष्य के रूप में उपस्थित होता है।

उपसंहार

हिंदी कथा साहित्य में शिक्षक की यात्रा दरअसल भारतीय समाज की यात्रा का प्रतिबिंब है। ग्रामीण, कृषि-आधारित और परंपरा-प्रधान समाज में वह नैतिक अधिष्ठाता था; स्वातंत्र्योत्तर मोहभंग में वह व्यवस्था का शिकार बना; और बाज़ारवादी युग में वह या तो उसका संचालक बन गया या उसका मूक भागीदार। इस पूरे सफ़र में जो चीज़ सबसे अधिक क्षीण हुई, वह है गुरु-शिष्य संबंध की आत्मीयता और शिक्षा का उदात्त उद्देश्य।

फिर भी साहित्य हमें निराशा में नहीं छोड़ता। वह इन विडंबनाओं को उजागर करके हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षक को पुनः उसकी गरिमा लौटाएँ, शिक्षा को परीक्षा-सफलता की दौड़ से निकालकर सीखने के आनंद से जोड़ें, और यह स्मरण रखें कि जिस समाज में शिक्षक का सम्मान और उसकी नैतिकता सुरक्षित नहीं रहती, उस समाज का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता। हिंदी कथा साहित्य का यह शिक्षक-विमर्श इसी चेतावनी और इसी आशा का साहित्यिक दस्तावेज़ है।

COMMENTS

Leave a Reply

इन्हे भी अवश्य पढ़ें -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका