निर्मित साहित्य और सर्जनात्मकता का संकट : मलयालम साहित्य में!

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श्री आनंद का साहित्य ‘निर्मित साहित्य’ है, सर्जनात्मक साहित्य नहीं है, यह तथ्य मलयालम साहित्य में गंभीर चर्चा का विषय बनाया जाना चाहिए।

निर्मित साहित्य और सर्जनात्मकता का संकट : मलयालम साहित्य में!


श्री आनंद का साहित्य ‘निर्मित साहित्य’ है, सर्जनात्मक साहित्य नहीं है, यह तथ्य मलयालम साहित्य में गंभीर चर्चा का विषय बनाया जाना चाहिए। यहाँ ‘निर्मित’ शब्द का प्रयोग केवल कृत्रिमता के अर्थ में नहीं किया जा रहा है। इसके द्वारा उस रचनात्मक पद्धति की ओर संकेत है, जिसमें पूर्वनिर्धारित विचारों, बौद्धिक दृष्टिकोणों और भाषिक तकनीकों को पात्रों तथा घटनाओं पर आरोपित करके साहित्यिक कृति का निर्माण किया जाता है। आनंद की कहानियाँ और उपन्यास, लगभग बिना किसी अपवाद के, इस प्रवृत्ति के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

सर्जनात्मक साहित्य अनुभव की जैविक वृद्धि से जन्म लेता है। जीवन, मनुष्य, समाज, अंतर्विरोध, अवचेतन, स्वप्न, भय और आकांक्षा के जटिल अंतर्संबंधों से जब कोई कृति स्वाभाविक रूप से आकार ग्रहण करती है, तभी उसमें सर्जनात्मकता का प्राणतत्त्व उपस्थित होता है। लेकिन जब पहले से निर्धारित कोई विचार साहित्य की छत बन जाता है और पात्र तथा घटनाएँ उस विचार को सिद्ध करने के उपकरणों में बदल जाती हैं, तब रचना ‘निर्मित’ हो जाती है।

आनंद की रचनाओं का मूल्यांकन करते समय यह अंतर विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है। उनके साहित्य में इतिहास, राजनीति, दर्शन, मानवाधिकार और सत्ता-विमर्श अत्यंत प्रभावशाली रूप में उपस्थित हैं। किंतु केवल इन बौद्धिक तत्वों की उपस्थिति किसी रचना को सर्जनात्मक नहीं बना देती। विचार कितना ही महान क्यों न हो, यदि वह कलानुभूति में रूपांतरित नहीं होता, तो साहित्य की मूल समस्या वहीं बनी रहती है।

आनंद के साहित्य में कई बार लेखक की बौद्धिक उपस्थिति पात्रों और जीवनानुभवों से आगे निकलकर सामने आती दिखाई देती है। पात्र अपने अस्तित्व की स्वाभाविक जटिलता से बोलने के बजाय लेखक के विचारों के प्रवक्ता बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य साहित्य में जीवंत व्यक्तित्व से घटकर एक ‘विचार-चिह्न’ में बदल जाता है।

यहीं ‘उदात्त मानवतावाद’ की प्रतीति से संबंधित आलोचना प्रासंगिक हो जाती है। आनंद की रचनाओं में मनुष्य के प्रति चिंता, सत्ता के प्रति संदेह और स्वतंत्रता के प्रति आग्रह स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। लेकिन इस आलोचना का केंद्रीय तर्क यह है कि यह मानवतावाद कभी-कभी साहित्यिक अनुभव की स्वाभाविक अंतर्धारा बनने के बजाय पहले से निर्मित आदर्श-बोध के रूप में सामने आता है। इस दृष्टि से ‘मानवतावाद’ यहाँ जीवन के अंतर्विरोधों से फूटकर निकलने वाला अनुभव नहीं, बल्कि रचना की वैचारिक रीढ़ के रूप में कार्य करने वाला एक छद्म-आदर्श प्रतीत हो सकता है।

निर्मित साहित्य और सर्जनात्मकता का संकट : मलयालम साहित्य में!
‘छद्म-आदर्श’ शब्द-प्रयोग का भी यहाँ सूक्ष्मता से मूल्यांकन आवश्यक है। इसका अर्थ यह आरोप लगाना नहीं है कि लेखक जान-बूझकर पाखंडी है। बल्कि आशय यह है कि रचना में प्रतिष्ठित उदात्त आदर्श और उसे प्रस्तुत करने की कलात्मक पद्धति के बीच कभी-कभी एक गहरी दूरी उत्पन्न हो जाती है। मनुष्य के बारे में महान विचारों की घोषणा करना और मनुष्य को उसकी संपूर्ण जटिलता में कलात्मक रूप से सृजित करना, साहित्य की दो भिन्न प्रक्रियाएँ हैं।

इसके साथ मैथिल की रचनाशैली के साथ तुलना भी ध्यान देने योग्य है। मैथिल के भाषिक प्रयोगों में जेम्स जॉयस का प्रभाव खोजा जा सकता है। विशेष रूप से भाषा का मुक्त प्रवाह, चेतना-प्रवाह, वाक्य-संरचना का विखंडन तथा ध्वनि और अर्थ के संबंधों में प्रयोग इस साहित्यिक ऋण की ओर संकेत करते हैं। इसलिए किसी साहित्यकार की शैली में प्रयोगधर्मिता अधिक होना अपने आप में उसकी सर्जनात्मकता का प्रमाण नहीं है।

मैथिल की ‘स्वयं को निरंतर झकझोरती’ शैली विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जब भाषा निरंतर अपनी संरचना को तोड़ती और पुनर्निर्मित करती है, तब पाठक के सामने नए अनुभव-संभावनाओं के द्वार खुलते हैं, यह सत्य है। किंतु भाषिक कंपन आवश्यक रूप से अनुभव की गहराई में परिवर्तित हो, ऐसा नहीं है। शैली की प्रदर्शनात्मक जटिलता और जीवनानुभव की कलात्मक गहराई एक ही चीज़ नहीं हैं।

यहाँ जेम्स जॉयस के अनुकरण का आरोप भी अधिक सूक्ष्मता से जाँचा जाना चाहिए। प्रभाव, अनुकरण और अनुकूलन के बीच स्पष्ट अंतर है। विश्व-साहित्य के महान लेखकों की तकनीकों को अनेक भाषाओं के अनेक रचनाकारों ने अपनाया है। इसलिए केवल समानता मिल जाने के आधार पर किसी रचनाकार को ‘अनुकरणकर्ता’ घोषित नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि किसी लेखक की विशिष्टता के रूप में प्रस्तुत की जाने वाली शैली के पीछे किसी अन्य साहित्यिक परंपरा की सशक्त छाया दिखाई देती है, तो उसकी स्वतंत्रता पर आलोचनात्मक प्रश्न उठाना उचित है।

इसके विपरीत ओ.वी. विजयन की रचनाएँ सर्जनात्मक साहित्य का एक सशक्त उदाहरण बनकर सामने आती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि विजयन की रचनाओं में विचार नहीं हैं। राजनीति, इतिहास, आध्यात्मिकता, सत्ता, मनुष्य का अकेलापन और समय का विघटन वहाँ भी अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सक्रिय हैं। किंतु वे पात्रों और घटनाओं पर पहले से तैयार किसी निबंध की तरह आरोपित नहीं होते। वे जीवन के अनुभव की जटिलता और भाषा की अंतःचंचलता से स्वाभाविक रूप से उभरते हैं।

‘खसाक्किन्टे इतिहासम्’ इसका सबसे प्रासंगिक उदाहरण है। रवि केवल किसी विचार का प्रवक्ता बनकर नहीं रहता; वह अपराध-बोध, आकांक्षा, स्मृति, आध्यात्मिक खोज, देह-बोध और पराजय से निर्मित एक जटिल मानवीय उपस्थिति के रूप में सामने आता है। खसाक के मनुष्य, प्रकृति, मिथक और दैनिक जीवन जब परस्पर घुल-मिल जाते हैं, तब कृति किसी विचार को सिद्ध करने वाली संरचना तक सीमित नहीं रहती। इसके बजाय वह पाठक के अनुभव में नए अर्थों को जन्म देने वाली एक स्वतंत्र जीवन-दुनिया बन जाती है।

विजयन की भाषा भी इस सर्जनात्मकता का एक प्रमुख घटक है। वह केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संसार को नए ढंग से देखने की एक सृजनात्मक शक्ति है। यथार्थ और स्वप्न, मिथक और दैनंदिन जीवन, शरीर और आत्मा, व्यंग्य और करुणा एक ही भाषिक प्रवाह में सह-अस्तित्व रखते हैं। इसलिए विजयन की भाषा को केवल किसी पूर्वनिर्धारित शैली के प्रदर्शन के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। भाषा स्वयं अनुभव को रचती और विकसित करती है।

‘गुरुसागरम्’ और ‘धर्मपुराणम्’ जैसी रचनाओं में भी यही सर्जनात्मक स्वभाव दिखाई देता है। ‘धर्मपुराणम्’ यद्यपि राजनीतिक सत्ता और सामाजिक व्यवस्थाओं का व्यंग्यपूर्ण प्रतिपादन करता है, फिर भी वह केवल एक राजनीतिक घोषणा बनकर नहीं रह जाता। उसकी अतिशयोक्ति, व्यंग्य, विचित्रता और भाषिक स्वतंत्रता मिलकर सत्ता की मूर्खता और मनुष्य के भय को एक साथ अनुभव कराती हैं। वहाँ विचार कलानुभूति में रूपांतरित हो जाता है। इसीलिए कृति किसी तर्क का प्रमाण नहीं, बल्कि अपने आप में एक स्वतंत्र साहित्यिक संसार बन जाती है।

विजयन की सर्जनात्मकता की एक और विशेषता यह है कि उनके पात्र लेखक के पूर्ण नियंत्रण में बंद नहीं रहते। वे कई बार लेखक के पूर्वनिर्धारित निष्कर्षों को पार कर अपने अर्थों का निर्माण करते हैं। उनके व्यवहार की एकमात्र व्याख्या संभव नहीं होती। वे अंतर्विरोधों, अपूर्णताओं और अवचेतन प्रेरणाओं के साथ अस्तित्व में रहते हैं। यही खुलापन सर्जनात्मक साहित्य के प्रमुख लक्षणों में से एक है।

यहाँ ओ.वी. विजयन की तुलना आनंद या मैथिल से सरलतापूर्वक करना उद्देश्य नहीं है। बल्कि ‘निर्मित’ और ‘सर्जनात्मक’ कही जाने वाली दो रचनात्मक पद्धतियों के अंतर को स्पष्ट करने के लिए विजयन के साहित्य को एक उदाहरण के रूप में देखना चाहिए। विजयन की रचनाओं में विचार अनुभव से अलग होकर नहीं रहता; भाषा, पात्र और घटनाएँ मिलकर उसे निरंतर पुनर्सृजित करते हैं। इसलिए वहाँ विचार कृति पर आरोपित कोई बाहरी अलंकरण नहीं, बल्कि कृति की ही जैविक अंतर्धारा है।

इन सभी बातों से एक मूलभूत प्रश्न उठता है: क्या साहित्य केवल विचार का वाहक है, अथवा जीवन की स्वतंत्र कलात्मक सृष्टि?

विचार साहित्य के लिए आवश्यक हो सकता है। किंतु जब विचार साहित्य को नियंत्रित करने लगता है, तब कला की स्वतंत्रता संकुचित हो जाती है। पात्र विचारों के प्रतिनिधि बन जाते हैं; घटनाएँ तर्क के प्रमाण बन जाती हैं; भाषा अनुभव के माध्यम से बदलकर बौद्धिक घोषणा का उपकरण बन जाती है। तब साहित्य जीवन का पुनर्सृजन करने के बजाय जीवन के बारे में लिखे गए निबंध में बदल जाता है। आनंद और मैथिल, दो अलग-अलग रूपों में, इस यांत्रिक साहित्य के कुशल कारीगर के रूप में देखे जा सकते हैं।

इसके विपरीत ओ.वी. विजयन की रचनाएँ यह दिखाती हैं कि विचार और सर्जनात्मकता परस्पर विरोधी नहीं हैं। जब विचार जीवन के जैविक अनुभव में विलीन होकर पात्रों के अंतर्विरोधों और भाषा की सृजनात्मक गति के माध्यम से नया रूप ग्रहण करता है, तभी वह साहित्य में ऊँचाई प्राप्त करता है। विजयन की रचनाओं में राजनीति कविता में बदल जाती है; आध्यात्मिक खोज पात्रों की जीवन-पीड़ा में रूपांतरित हो जाती है; इतिहास व्यक्ति की स्मृति, अपराध-बोध और शरीर पर अंकित हो जाता है। यही रूपांतरण-क्षमता उन्हें सर्जनात्मक साहित्य का एक विशिष्ट उदाहरण बनाती है।

इसीलिए आनंद के साहित्य का मूल्यांकन करते समय केवल उनके विचारों की महत्ता को मानदंड बनाना पर्याप्त नहीं है। उनके विचार किस सीमा तक कलानुभूति में रूपांतरित होते हैं? क्या पात्र लेखक के विचारों से स्वतंत्र जीवित मनुष्यों के रूप में अस्तित्व बनाए रखते हैं? क्या भाषा अनुभव का सृजन करती है, अथवा केवल विचार को अलंकृत करती है? क्या मानववाद जीवन की जटिलता से उत्पन्न होता है, अथवा किसी पूर्वनिर्धारित आदर्श के रूप में कृति पर आरोपित किया जाता है?

इन प्रश्नों के माध्यम से आनंद के साहित्य को नए सिरे से पढ़ने की आवश्यकता है। साथ ही, ओ.वी. विजयन की रचनाओं द्वारा प्रस्तुत सर्जनात्मक प्रतिमान पर भी विचार किया जाना चाहिए। कोई कृति विचार-संपन्न है या नहीं, इसके बजाय अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह विचार किस प्रकार अनुभव में बदलता है, भाषा में कैसे जीवित रहता है, पात्रों की स्वतंत्रता में कैसे प्रतिबिंबित होता है और पाठक की चेतना में किस प्रकार एक नया संसार निर्मित करता है।

अतः ‘निर्मित साहित्य’ की संज्ञा को अंतिम निर्णय के रूप में देखने के बजाय आलोचनात्मक अन्वेषण के आरंभ-बिंदु के रूप में देखना अधिक फलदायी होगा। आनंद की रचनाओं की बौद्धिक शक्ति और मानवीय संवेदना को नकारे बिना भी उनकी कलात्मक स्वतंत्रता, चरित्र-निर्माण, भाषा की स्वाभाविकता तथा विचार और अनुभव के संबंध की कठोर जाँच की जा सकती है। इसी के साथ ओ.वी. विजयन के साहित्य में दिखाई देने वाली जैविक अनुभव-वृद्धि, भाषा की सृजनात्मक स्वतंत्रता और पात्रों की अप्रत्याशित आंतरिक गति को सर्जनात्मकता के मानदंडों के रूप में देखा जा सकता है।

ऐसी जाँच के माध्यम से ही यह महत्वपूर्ण साहित्यिक प्रश्न अधिक स्पष्टता के साथ सामने आएगा कि कोई कृति वास्तव में सर्जनात्मक रूप से जन्म लेती है, अथवा बौद्धिक रूप से निर्मित की जाती है।




- बिनॉय एम. बी.
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