शुभदा मिश्रा की कहानी 'छुपा लो दिल में': अपनी शिक्षिका के घर जुटे पुराने छात्रों की महफिल में रुचिरा और शैलेश का अधूरा, अनकहा प्रेम।
छुपा लो दिल में
सबेरे ही उसका फोन आ गया.....मैम प्रणाम। मैं रुचिरा बोल रही हूँ। आपसे मिलना चाहती हूँ। क्या दस बजे तक आ सकती हूँ।
सबेरे का मेरा समय तो अत्यंत व्यस्त रहता है। रुचिरा खुद अब एक गृहणी हो चुकी है। अच्छी तरह समझती होगी। मगर दस बजे तक का समय माँग रही है, तो जरूर कोई बात हैं। बोली... आ जाओ। बिल्कुल समय रहेगा।
आपको दिक्कत होगी मैम!
कोई दिक्कत नहीं आ जाओ।
सबेरे दस बजे तक जितने काम निपटा सकती थी, निपटा लियें। नहाकर धोकर संक्षिप्त सी पूजा भी कर ली। पूजा कर उठी ही थी कि रुचिरा की आवाज सुनाई दी...मैम मैं आ गई...
सामने जाकर देखा, रुचिरा बरामदे में चप्पलें उतार रही थी। बड़ी सुंदर और प्यारी लग रही थी। मुझे देखते ही झुककर मेरे पैर छुये। मैंने उसे गले लगा लिया। हम भीतर आ गए। मेरे अध्ययन कक्ष में ही। बैठे। मैं पूछने लगी...कब आई तू...
कल आई मैम। आज चली जाऊंगी। शाम को। मेरा बेटा भी जिद कर रहा था....आपकी मैम को देखने मैं भी जाऊंगा मम्मी। मैने मनाया...आज मुझे अपनी मैम से बहुत सी बात करनी है। तू नानी, मामी के साथ बातें कर। गुड्डू के साथ खेल। मुश्किल से माना। आपकी तबियत कैसी है मैम? अकेले में बहुत दिक्कत होती होगी।
तबियत मेरी ठीक है और कोई दिक्कत भी नहीं। जब से पढ़ाना छोड़ा है आराम ही आराम है। तू बता तू कैसी है। दिखती तो अभी भी वैसी ही सुंदर है जैसी तब थी, जब पढ़ने आती थी। हाँ ,मगर तब सामान्य सलवार सूट में सीधी सादी सी छा़त्रा थी, अब तो बकायदा गृहलक्ष्मी की तरह सजीली सुशोभित।
बातें होने लगीं। मैं उसके ससुराल के बारे में पूछने लगी। वह बताने लगी....पापाजी यानी ससुरजी तो पिछले दिनो बहुत ही बीमार पड़ गये थे। बिस्तर में ही मल मूत्र विसर्जन होता था। मैं ही सेवा करती। सास साफ बोल दीं...मैं खुद कमजोर। मुझसे नहीं हो सकता यह सब। मगर हाँ, वह घर की सारी व्यवस्था संभालती हंैं। राशन पानी, शाक सब्जी, घर का सारा सामान लाना, फ्रिज, टी.वी. कूलर,गैस कुछ भी गड़बड़ हो तो मरम्मत कराना ,सब वही देखती हैं। फोन करके मिस्त्रियों को बुलाती हैं। खड़े होकर काम करवाती हैं। काँय काँय भी करती जाती हैं। कामगारों से, मिस्त्रियों से, काम वाली बाई से, पति से। सबसे ज्यादा तो मुझसे। हाँ, बेटे से ,खूब प्रेम। शाम को बेटा काम से आया कि बस फिर उसमें मगन। कौर बना बना कर खिला रही हैं। मंदिर जा रही हैं तो बेटे के साथ। कोई विशेष चीज की खरीददारी करनी है तो बेटे के साथ। अड़ोस पड़ोस की, दुनिया जहान की बातें करनी है, तो बेटे के साथ। मैं भी कहती हूँ, जाओ मगन रहो। मुझे चैन से रहने दो।
तू क्या करती है?
मैम, मुझे तो दम मारने की फुरसत नहीं। तड़के पाँच बजे से पहले ही उठ जाती हूँ। नित्य कर्म से निपट फ्रेश होती हूँ। फिर पापाजी को टाॅयलेट ले जाती हूँ। उनको ब्रश कराके शरीर पोंछती हूँ। चाय बनाती हूँ। उनको चाय पिलाती हूँ। चाय और बिस्कुट या मठरी, जो हो। माँ बेटे के लिए चाय नाश्ता खाने की मेज पर रख देती हूँ। फिर अपने बेटे को उठाती हूँ। उसे स्कूल के लिए तैयार करती हूँ। मगर अब वह ग्यारह साल का हो गया है। उठने में ही दिक्कत करता है। बाकी स्वयं तैयार हो जाता है। बस जल्दी जल्दी रोटी सब्जी बनाती हूँ। बेटे का टिफिन तैयार करती हूँ। उसे कुछ थोड़ा सा खिलापिला कर प्यार से विदा करती हूँ। फिर खुद तैयार होती हूँ। आठ बजते बजते पहुँच जाती हूँ स्कूल। ऐसे ही बढ़िया से तैयार होकर, जैसा आप देख रही हें।
तेरे स्कूल का समय क्या हैं।
सुबह आठ बजे से दो बजे तक। ढाई बजे तक घर पहुँच जाती हँ। सब्जी रोटी बनाकर ही जाती हूँ। कूकर में चाँवल दाल भी जमा का जाती हूँ। दस बजे के करीब सासूमाँ कूकर चूल्हे में चढ़ाकर चाँवल दाल पका लेती हैं और अपने बेटे को प्रेम से खिलाकर विदा कर देती हैं। नहा धोकर, पूजापाठ कर खुद भी खा लेती हैं। मैं घर पहुँचते ही पहले बाथरूम जाकर फ्रेश हो लेती हूँ। फिर खाना गर्म कर पापाजी को खाना देती हूँ। पापाजी के खाते खाते मेरा बेटा भी आ जाता है। बस हम दोनो माँ बेटा प्रेम से खाना खाते है. थोड़ा आराम करते हैं। फिर शाम की चाय। चाय के बाद बेटे को पढ़ाती हूँ। उसे पढ़ाती रहती हूँ तो उसके एक दो दोस्त भी आ जाते हैं। उन्हें भी होमवर्क करा देती हूँ। सासूमाँ को यह पसंद नहीं। मगर मैं पर्वाह नहीं करती। पढ़ाने के बाद घर की साफ सफाई व्यवस्था देखना । कोई टूट फूट हो तो सुधारना। फिर शाम का खाना बनाना। खाने के बाद टी.वी. देखना। कोई सीरियल या समाचार। सासूमाँ अपने बेटे के साथ। मैं अपने बेटे के साथ। हमारे साथ पापाजी भी।
तू अपनी तनख्वाह क्या करती है।
सासूमाँ को दे देती हूँ। वही तो पूरा घर चलाती हैं मैम, तो उन्हें ही दे देती हूँ। कौन झंझट पाले।
तेरे अपने भी तो कुछ खर्चे होंगे।
उसके लिए मैं पहले ही कुछ पैसे बचा कर रख लेती हूँ। स्कूल जाने के रास्ते में एक बड़ी अच्छी दुकान हेै, ”श्रृंगार सदन“। वहाँ महिलाओं के जरूरत की सब चीजें मिल जाती हैं। अपनी चीजें मैं वहीं से ले लेती हूँ। कोई दिक्कत नहीं।
यह सब सुनकर तो लग रहा है, तू ससुराल में खूब अच्छे से जम गई है।
ससुराल में ही नहीं मैम, स्कूल में भी। रुचिरा मैम बहुत लोकप्रिय हेंैं। पा्रचार्य भी बहुत मानते हैं। सब आपका आशीर्वाद है मैम। आपकी शिक्षा है।
और यहाँ तेरे माता पिता का क्या हाल है?
अच्छे हैं मैम। पिछले दिनों पापा को लकवा मार गया था। उन्हीं को तो देखने आई हुँ। भाभी लोग पापा की देखभाल करती हैं। आप तो जानती हैं मैम, पापा की असली चिंता थी मेरे भाई। इतना इन्हें पढ़ाया। इतने कोर्स। इतनी कोचिंग। मगर नौकरी नहीं। पापा गहरे डिप्रेशन में। भाई पगलाये से। घर की सूरत ही भयावह। मुझे तो डर लगे कोई आत्महत्या न कर ले। मगर शेैलेश ने दोनो की नौकरी लगा दी। काया कल्प ही हो गया घर का। अब घर में सुख शांति है।
शेैलेश ने कैसे इनकी नौकरी लगा दी....मैंने धीरे से पूछा।
असल में जब ये लोग नौकरी के लिए भटक रहे थे तो इन्हें पता चला कि शैलेश एक नामी मंत्री का प्रिय आॅफिसर है। छोटा भाई बोला...दीदी, शैलेशजी तो तुम्हारे सहपाठी रहे हैं। उनसे मेरे लिए बोलो न। मैं बोली, मैं नहीं बोलती। तू जाकर अपनी समस्या बता देना। बातचीत में बता देना कि तू मेरा भाई है। उसने वैसा ही किया। शेैलेश ने सचमें उसकी नौेकरी लगा दी। बड़े भाई को भी इसने एक बड़ी निजी कंपनी में एकाउंटेंट लगवा दिया। दोनो भाई इसे बहुत मानते हैं। पापा भी। इसके कारण हमारे घर के तो दुर्दिन ही भाग गए। नौकरी लगते ही भाईयों की शादियाँ भी हो गईं। सुंदर बहुयें आ गईं। पोते पोती आ गए। पापा पोते पोती में मगन हैं। बढ़िया माहौल है घर मे अब मैम। कल तो आया था शैलेश हमारे घर। आपसे मिलने नहीं आया!
मुझसे मिलने तो अक्सर आता ही रहता है पर कल तो खैर नहीं आया हेै।
देखिये, मैं उसे फोन करती हूँ।
वह शेैलेश को फोन करने लगी...तुम खुद तो मैडम से मिलने आते रहते हो और मुझसे कह दिये कि सबेरे सबेरे मिलने मत पहुँच जाना। मैम को काम रहता है। अगर मैं सबेरे नहीं आती तो कब मिल पाती....वह फोन में ही झगड़ने लगी।
मुझे हँसी आ गई। जब शुरू शुरू में मेरे इंस्टीट्यूट में पढ़ने आई थी तब कितनी संकोची थी। वे दिन मेरे बेहद कड़की के थे। रोजी रोटी के लिये मैंने कोचिंग कक्षाऐं खोल ली थीं। शुरू में कुछ ही छात्र आए थे पढ़ने। उनमें शेैलेश और रुचिरा भी थे। दोनो अलग अलग काॅलेज के थे। पर थे बी.ए. प्रथम वर्ष के। सतरह अठरह वर्ष की उम्र। सीधे सरल संकोची। मुझसे अँग्रेजी पढ़ने आते थे। अँग्रजी सीखने की बड़ी ललक थी। वेैसे मेरे सभी छात्रों को थी। मैंने कह रखा था, जिन छात्रों को लेसन समझ में आ गया हो, वे उन छात्रों को समझा दिया करें जिन्हें समझ में नहीं आया हो। कक्षा मेरे घर में ही लगती थी। सामने वाले हाल में। इनकी बैच सुबह सात बजे लगती थी। छात्र अक्सर पंद्रह मिनट पहले ही आ जाते ओैर जब तक मैं भीतर तैयार होती रहती, हाल में बैठकर दिये गये होमवर्क, लेसन आदि के बारे में एक दूसरे से पूछते बतियाते रहते। मैं देखती कि एक कोने में शेैलेश और रुचिरा कुछ गहरे डूबे समझ समझा रहे हैं। कुछ ही दिनों में उनकी अंतरंगता भी स्पष्ट दिखने लगी। इन्हीं दिनों वह शरारती हो गई थी और शेैलेश को छेड़ने और सताने लग गई थी। एक दिन मेंैं छात्रों की कापियाँ जाँच रही थी। शेैलेश की कापी जाँचते समय अनायस ही कापी के कुछ पिछले पृष्ठ खुल गए जिसमें उसने कवितायें लिख रखी थीं। पढ़ते हुये मैं सनाका खा गई। कवितायें थीं तो किशोर अवस्था के प्रेम की, पर एक कविता में अपनी विवशता का बड़ा ही कारुणिक चित्रण था कि पास रहते हुए भी वह आकाश कुसुम को छू तक नहीं पाता है। भर नजर देख तक नहीं पाता। मुझे स्पष्ट हो गया कि यह सब वह रुचिरा को लेकर लिखा है। मैं चिंता में पड़ गई और उन दोनों पर कुछ विशेष ही नजर रखने लगी। मगर मेरी चिंता जल्दी ही तिरोहित हो गई क्योकि उनका कोर्स समाप्त हो गया। बैच की विदाई हो र्गईं। विदाई के समय सबकी आँखें भीगी थीं। रुचिरा और शेैलेश की कुछ ज्यादा ही।
मगर शैलेश अक्सर मुझसे मिलने आता ही रहता। वह “गायत्री शक्तिपीठ” से जुड़ा हुआ था। शक्ति पीठ के कार्यक्रम, पाँच कुंडी यज्ञ, वहाँ के किसी मनीषी का भाषण, भारतीय संस्कृति से संबंधित कार्यक्रम, उनके साहित्य का प्रचार आदि के संबंध में मुझे बताता रहता। समय मिलता तो मैं उन कार्यक्रमों में चली भी जाती। शक्तिपीठ से जुड़े युवक अक्सर समाजसेवा के कार्य भी करते। शेैलेश तो विशेष रूप से। शादी ब्याह, मौत मिट्टी, हारी बीमारी में वह अपनी टोली के साथ सेवा देने पहुँच जाता। उसका मुहल्ला शहर के अंतिम छोर में था। मुहल्ले का तालाब अत्यंत गंदा हो गया था। निम्न वर्ग के लोग उसी में नहाते धोते थे। शेैलेश ने उस तालाब को साफ करने का बीड़ा उठाया। जाने कैसे उसने प्रेरित किया कि आसपास के लोग भी सफाई अभियान में उसके साथ हो लिए जबकि उन दिनो स्वच्छता अभियान जैसे कार्यक्रम का कहीं कोई नामो निशान भी नहीं था। असली दिक्कत आई कीचड़ निकालने में। टनो कीचड़ जिसे यहाँ ”लद्दी“ कहते हैं, निकालना आदमी के बस का नहीं। मैंने सुझाव दिया, जिलाधीश से मिलो। वह मिला। जिलाधीश ने जे.सी.बी. मशीन भेजी।। तालाब साफ हुआ। पूरा मुहल्ला खुश हुआ।
यह सब वह पढ़ाई करते हुए करता था। साथ ही अपने पिताजी की छोटी सी दुकान में भी बैठा करता था। एक दिन मैं उसकी दुकान में कुछ खरीदने गई तो उसका चेहरा अद्भुत खुशी से दमक रहा था। बोला....मैम जानती हैं आज मेरी दुकान में कौन आया था।
कौन... मैने सोचा कोई नेताजी आ गए होंगे।
बोला...रुचिरा आई थी मैम।
मैं गंभीर हो गई...तो यह अभी तक उसे भूला नहीं है।
मेरी कोचिंग कक्षाओं का विस्तार हो रहा था। मैंने उसमें ”इंगलिश डिबेटिंग क्लब“ की भी शुरूआत कर दी थी। इस डिबेटिंग क्लब में मेरे इंस्टीट्यूट के छात्र तो रहते ही थे, बाहर के लोग जिनकी रुचि हो, वे भी आ सकते थे।ं दिन रखा गया शनिवार और समय शाम छह बजे से आठ बजे तक क्योकि नौकरी पेशा लोग अपने आॅफिस से छूटने के बाद ही आ सकते थे। वादविवाद के लिए उस समय के ताजा मुद्दे लिए जाते थे। अध्यक्ष और जूरी के लिये शहर के गणमान्य नागरिकों को आमंत्रित किया जाता था। अतिथियों का सत्कार से लेकर मंच संचालन, अंत में चाय पानी की व्यवस्था, सब छात्र छात्राऐं ही करते थे। मेरा काम सिर्फ गणमान्य अतिथियों का स्वागत और वक्ता छात्रों की गलतियाँ नोट करना होता जिसे मैं कार्यक्रम के बाद में उन्हें बताती। पिछली बैचों के छात्र काफी संख्या में इसमें शामिल हुये। शेैलश और रुचिरा भीं आए। बढ़चढ़कर भाग लेने लगे। वाद विवाद में भी और व्यवस्था संभालने में भी। कई छात्र वादविवाद के दिन के पहले अपना वक्तव्य तैयार करके लाते और मुझे बताते। मैं गलतियाँ सुधारती। समझाती। रुचिरा भी अपना वक्तव्य तैयार कर दिखाती। वह हमेशा शेैलेश के विपक्ष में बोलती। पूरी तैयारी से जमकर बोलतीं। शेैलेश भी मानो चुनौती स्वीकार करता। अंत में दो मिनट का समय मांगकर उसके सारे तर्क उड़ा देता। रुचिरा एकदम लड़ाई करने लगती। वह भी समय मांगती। खूब हंगामा मचता। हँसी के फौहारे छूटते रहते। चायपानी के साथ बेहद खुशगवार, माहौल में सब विदा होते। इस कार्यक्रम से मेरे कई छात्र बहुत अच्छे वक्ता बने। मगर एक दिन....
वह शनिवार का ही दिन था। सुबह से ही मूसलाधार वृष्टि हो रही थी। उन दिनों टेलीफोन की ऐसी व्यवस्था नहीं थी कि मैं सबको खबर कर पाती। अक्सर ऐसी वर्षा में छात्र खुद ही नहीं आते थे। ठीक साढ़े छह बजे दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो रुचिरा। तेज बौछारों के बीच छाता को किसी तरह संभाले एकदम भीगी भीगी सी खड़ी। बोली...मैम कोई नहीं आया क्या। मैंने उसे भीतर किया। खूब बिगड़ी.....कौन आयेगा इतने आँधी पानी में। तुमको भी नहीं आना था। वह हतवाक् सी देखने लगी....मैम शैलेश भी नहीं आया। मैं बिगड़ती रही...पागल नहीं है शैलैश तुम्हारी तरह। कैसे आने दिया तुम्हारे घर के लोगों ने। जरूर पापा नहीं रहे होंगे धर में। अब तुम फौरन जाओ। मौसम और बिगड़ेगा, फँस जाओगी। बड़बड़ाती हुई मैं पड़ोसी के घर गई। दरवाजा खुलवाया। बोली, भैया, इस लड़की को इसके घर पहुँचा दो।
लुटी पिटी सी रुचिरा उनके साथ चली गई। जाते जाते भी उसके मुँह से निकला...मैम शेैलेश सच में नहीं आया।
रुचिरा को विदाकर मैंने दरवाजा लगाया कि बिजली गोल। अँधेरे में मोमबत्ती ढूंढकर जलाने लगी कि किसी ने दरवाजा थपथपाया। खोला तो कड़कती बिजली के प्रकाश में देखा...शेैलेश। पूरी तरह भीगा हुआ। मैंने उसे अंदर किया। खूब बिगड़ी...ऐसे आँधी तूफान में आने की क्या जरूरत थी। तुम्हारा सिर फिर गया है। वह चुपचाप सुनता रहा। फिर कातर स्वर में बोला....मैम रुचिरा भी नहीं आई।
क्यों आयेगी, पागल है क्या। अब तुम शांति से चुपचाप बैठो। लाईट आयेगी तब जाना।
मोमबत्ती के नीम प्रकाश में वह चुपचाप बैठा रहा। आँखें डबडबाई। सिर झुकाये। मुझसे देखा न गया। दूसरी मोम बत्ती जलाकर मैं किचन में चली गई कि किसी ने दरवाजा थपथपाया। शेैलेश ने ही उठकर दरवाजा खोला। सामने पड़ोसी थे। मुझे देखते ही बोले...बहनजी,मैंने उस लड़की को उसके घर पहुँचा दिया है।
शेैलेश ने मुझे देखा...मैम रुचिरा थी न।
मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया।
अँधेरे में ही उसका चेहरा दमक उठा।
इस घटना ने मुझे चिंता में डाल दिया। हे भगवान, इसका अंजाम क्या होगा। रुचिरा का परिवार मेरा पुराना परिचित है। रुचिरा के पिता कट्टर ब्राह्मण हैं। अपने जमाने के नामी पहलवान। शेैलेश ब्राह्मण नहीं है। उसके पिता की एक छोटी सी दुकान है। उसी से घर चलता है। क्या मैं इस वादविवाद क्लब का ही कार्यक्रम कुछ दिनों के लिए बंद कर दूं। एक ही आश्वस्ति है, दोनो बहुत संस्कारी हैं। मगर प्रेम का आवेग उमड़ आये तो संस्कार भी तो धराशायी हो जाते हैं।
मगर मेरी चिंता एकदम शांत हो गई। चार पाँच दिन बाद रुचिरा के मातापिता ही आये। रुचिरा की शादी का निमंत्रण पत्र लेकर। बेहद खुश। घर भी अच्छा मिला है बहनजी। वर भी। जरूर आईयेगा।
मैं शादी में गई। रुचिरा शादी के जोड़े में घूंघट काढ़े सिर झुकाये विवाह वेदी पर बैठी थी। मैंने दूल्हे को गौर से देखा। ठीक ठाक ही लगा मगर शेैलेश से कोई तुलना नहीं। मैं विवाह की सारी प्रक्रियाओं के दोैरान बैठी रही। गौरी गणेश की, नवग्रहों की, देवी देवताओं की पूजा। सातोंफेरे, सातों वचन, कन्यादान, सिंदूरदान। आखिर अंतिम रस्म समाप्त हुईं। अक्षत छिड़कते हुए मंत्रोपचार के साथ लोगों ने वर वधू को आशीर्वाद दिया। वेदी से उतरकर वरवधू ने सभी बुजुर्गों के पेैर छूकर आशीर्वाद लिया। जाने रुचिरा को क्या हुआ। मेरे पास आने पर उसने मेरे कदमो में एकदम अपना सिर ही रख दिया। मेरी आँखें भर आईं। डबडबाई आँखों से उसके सिर पर हाथ रखकर मैंने उसे आशीर्वाद दिया।
रुचिरा ससुराल चली गई।शेैलेश का भी डिबेटिंग क्लब में आना बंद हो गया। इंस्टीट्यूट का, डिबेटिंग क्लब का कार्य पूर्ववत चलता रहा। मगर उन दोनो की याद मुझे बराबर बनी रही। छात्रों ने ही बताया, शेैलेश लोक सेवा आयोग की प्रतियोगिताओं की तैयारी कर रहा है। कोचिंग के लिये दिल्ली गया हें।
मैं सोच में पड़ गई। कैसे गया होगा। उसके पास तो इंस्टीट्यूट की फीस देने के लिय भी पैसे नहीं होते थे।कि एक अर्से के बाद अचानक शेैलेश आया। पैर छूकर प्रणाम किया। उसकी नियुक्ति प्रसाशनिक अधिकारी के पद पर हो गई थी।
मगर फिर वह अक्सर आने लगा। वह अपने विभाग के रग रग में बसे भ्रष्टाचार से बुरी तरह त्रस्त था। बेदाग व्यक्तित्व का वहाँ जीना मुश्किल था। क्या करे। नौकरी छोड़ दे। मैंने कहा... मैं कभी सरकारी नौकरी में नहीं रही हूँ। नहीं बता सकती, क्या करे। मगर तुम्हारे विभाग में एक दो साफ सुथरी छवि वाले आॅफिसर भी तो होंगे। उन पर गौर करो। वे कैसे निपटते हैं। उनसे मिलकर अपनी समस्याऐं भी कह सकते हो।
अपने विभाग से तो वह जरूर परेशान था पर लोगों से उसे खूब वाहवाही मिल रही थी। इतने गरीब घर का लड़का, बड़ा अफसर बन गया। जिम्मेदार पद पर है। शादी के लिये बड़े घरों से रिश्ते आने लगे। उसकी शादी में मैं गई तो देखा। शानदार शादी। भव्य रिसेप्शन समारोह। शहर की सभी बड़ी हस्तियाँ आई हुई थीं। शहर से बाहर की भी थीं। वह मंच पर अपनी सुंदर दुल्हन के साथ महाराजा की तरह विराजमान था। मुझे देखते ही दुल्हन सहित नीचे उतर कर आया। पेैर छूकर प्रणाम किया।
उसका तबादला होते रहता। एक शहर से दूसरे। दूसरे से तीसरे। तीसरे से चैथे। जब भी वह अपने मातापिता से मिलने अपने शहर आता, मुझसे मिलने जरूर आता। मगर अब वह भ्रष्टाचार या अपनी विभागीय परेशानियों की बात न करता। उसके हाथ में कोई न कोई किताब होती। अब वह किताबों की बात करता। कभी आचार्य चतुरसेन की ”वयम रक्षामः“, तो कभी कर्तुल एन हैदर की ”आग का दरिया“ तो कभी कलाम सर की ”विंग्स आॅफ फायर“। अधिकतर किताबें मेरी पढ़ी हुई होतीं इसलिये चर्चा लंबी हो जाती। फिर एक अंतराल के बाद आया तो किताबों की चर्चा ही नहीं किया। बताया कि अब वह एक मंत्रीजी के कार्यालय में ही अटैेच हो गया है। ”आॅफिसर आॅन स्पेशल ड्यूटी“। यहँा अखबार पढ़ने की तक फुरसत नहीं हैं। मेरे पूछने पर उसने मंत्रीजी की बड़ी तारीफ की। साफसुथरी छवि के हैं। जनता के प्रति समर्पित। विशेषरूप से अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता के प्रति। उसने अपनी पत्नी की भी बहुत तारीफ की। मुझे लगा, रुचिरा वाली वह गहन अंतरंगता उसके दिमाग से धुल पुंछ गई है।
मगर एक दिन वह आया पत्नी सहित तो साथ में रुचिरा भी। मैं चकित हुई, यह कैसे। बताया,. पता चला कि रुचिरा आई हुई है तो पत्नी को मिलाने उसके घर ले गया था। जब मैंने बताया कि अब हम लोग मैम के घर जाने वाले हैं, तो रुचिरा साथ हो ली।
मुझे राहत हुई। खुशी भी। अब स्वस्थ सुंदर संबंध बन गया है किशोरावस्था का वह आकर्षण।
और आज रुचिरा मेरे घर बैठी फोन में झगड़ रही थी...तुम खुद तो मैम से मिलते रहते हो और मुझे बहका रहे थे।
थोड़ी देर में वह आ भी गया। मुस्कुराता हुआ। हाथ में मिठाई, नमकीन वगैरह के पैकेट लिएं। हमेशा की तरह मेरे पैर छूकर प्रणाम किया। रुचिरा फिर उलझने लगी... तुम उतने मंहगे अस्पताल में पापा को भरती करने क्यों कह दिये। वहाँ उनके साथ रहेगा कौन। माँ अशक्त हैं। एक भाभी नौकरीवाली, दूसरी के बच्चा छोटा। भाई दोनो तुम्हारी बात से बौराए...
वह उसकी शिकायतों के मजे लेता रहा। फिर फोन करने लगा। अपने सहपाठियों को, जो इंस्टीट्यूट में उसकी बैच में थे। योगेश मनीष आदि इसी शहर में थे। छुट्टी थी, सो आ भी गए। मिठाई वगैरह लिए। महफिल ही जम गई। सब आपस में बतियाने लगे। किसकी नियुक्ति आजकल कहाँ हेै। किसके बच्चे क्या पढ़ रहे हैं। कौन मकान बनवा रहा हेै। किसके मातापिता की तबियत गड़बड़ चल रही है। वे अपनी बैच के अन्य छात्रों के बारे में जानने को उत्सुक थे। जो छात्र बीच बीच में मुझसे मिलने आते रहते थे , उनके बारे में मैं बताने लगी...सुयश चेन्नाई में है। किसी बड़ी कंपनी में। विकास अमेरिका में है। नीता उसी स्कूल में है। उसने दूसरी शादी कर ली हैं। पिछले दिनो आई थी तो बताया उसने। वह अपने स्कूल के किसी कार्यक्रम का संचालन कर रही थी। अतिथियों में एक सज्जन उसे गौर से देख रहे थे। बाद में वे सज्जन उससे अक्सर मिलने लगे। शादी का प्रस्ताव रखा तो बोली...मैं तो विधवा हूँ। मेरा एक लड़का भी है। बोले, यह तो और खुशी की बात है। सीधी सादी शादी हुई।ं दोनो के परिवार वाले शामिल हुए। आई थी तो बहुत खुश थी।
सुनकर सभी खुश हुए।
योगेश कहने लगा....शेैलेश तुम तो बाहर रहकर भी मैम से मिलने आ ही जाते हो। मैं तो इसी शहर में रहकर भी नहीं आ पाता। बेटे बेटी को स्कूल छोड़ने जाना पड़ता है। फिर लाने भी। पत्नी की ड्यूटी दस से पाँच तक रहती है। अभी तक मेरे माता पिता बच्चों की देखभाल करते थे। अब वे खुद बीमार रहने लगे हैं। कोई अच्छी कामवाली मिलती नहीं। बड़ी परेशानी है। तुम्हारे बच्चे कैसा पढ़ रहे हैं।
उससे क्या पूछते हो रुचिरा तपाक से बोली... उसे तो ये भी पता नहीं होगा कि उसके बच्चे किस कक्षा में हैं।
पता कैसे नहीं होगा...मैं बोली....आजकल के पिता बच्चों का पूरा खयाल रखते हैं।
यह नहीं रखता मैम, सब बोझ अपनी पत्नी पर छोड़ दिया है। वह बेचारी पढ़ाने जाती हेै। घर की सार संभार करती है। बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजती है। उनका होमवर्क कराती है। यह बस अपने मंत्रीजी में मगन।
किस मंत्रीजी के साथ हो शेैलेश...मनीष पूछने लगा।
अरे वही...रुचिरा बताने लगी... जो पिछले दिनों बोल गए....महिलाओं को शालीन कपड़े पहनने चाहिए। लड़कियों को गहरी लिपिस्टिक नहीं लगाना चाहिए...
अरे बाप ...योगेश मनीष का मुँह खुला का खुला रह गया.. मंत्रीजी की हिम्मत कैसे हुई जो महिलाओं को ऐसा बोल सके...
हाँ..फिर भुगते न मंत्रीजी....रुचिरा हँस हँसकर बताती रही....महिलाओं को तो फिर मिल गया मुद्दा। रोज प्रदर्शन। रोज हंगामा। मंत्रीजी की चुंधियाँ उड़ने लगीं। आखिर उन्होंने हाथ जोड़कर माफी मंागी...मैं तो अपनी बहन बेटियों को जैसे कहता हूँ वैसे ही आप लोगों को कह दिया। फिर तो महिलायें एकदम प्रचंड... इसका मतलब, आप अपनी बहन बेटियों को मनमुताबिक पहनने ओढ़ने भी नहीं देते।
सबका हँसते हँसते बुरा हाल।
मैं बताऊं भीतर की बात....रुचिरा मुँह मटका मटकाकर कहने लगी.... इसके आॅफिस में एक दो लड़कियाँ उल्टे सीधे कपड़े पहनकर, बाल छितराये, लाल लाल लिपिस्टिक लगाकर आती थीं। यह मंत्रीजी के कान में बार बार बोले....सर,.भारतीय संस्कृति के खिलाफ हेेै। बिचारे बोल गये। करतूत इसकी है।
सब खीखी...खीखी करने लगे....क्यों भई शेैलेश...
तुम जाओ तो शेैलेश कहने लगा....चाय बनाकर लाओ।
देखो देखो यह मुझे भगा रहा हेै। अभी तो इसकी और पोल खोलनी बाकी हेैं।
वह ऐसे ही पोल खोलती रही। ठहाके लगते रहे। स्पष्ट शेैलेश भी आनंद लेता रहा। रुचिरा कोने में रखे अखबार के बंडल से एक अखबार निकाल र्लाइं। योगेश मनीष उसे फाड़कर टुकड़े बनाने लगे। मैं प्लेट चम्मच लाने के लिए उठने लगी। सबने मना कर दिया.... हम लोग जैसे पहले कागज में जलेबी समोसा लेकर खाते थे, वैसे ही खायेंगे मैम। रुचिरा सबको अखबार के टुकड़ों में मिठाई, नमकीन रखकर देने लगी। शेैलेश से बोली....तुमको एक ही रसगुल्ला मिलेगा। तुम मोटे हो रहे हो।ं ं
अब सब मेरे साथ फोटो खींचने लगे। मनीष कहने लगा....शेैलेश की मोबाईल बहुत बढ़िया है। उसीसे फोटो खींचते हैं। रुचिरा ने मोबाइल हाथ में लेकर देखा....जरूर चालीस हजार का होगा। शेैलेश धीरे से बोला....छप्पन हजार का। छप्पन हजार का... रुचिरा एकदम चीख पड़ी... छप्पन हजार का मोबाइल! जरूर गिफ्ट का होगा।
सब ठहाका लगाकर हँस पड़े।
रुचिरा सिर हिलाहिलाकर कहने लगी....जाने और भी क्या क्या गिफ्ट लिया होगा। जरूर ये मैम का नाम डुबोयेगा।
महफिल लंबी हो चली थी। योगेश उठ खड़ा हुआ....मैम के सभी छात्र अपने अपने जीवन में बहुत अच्छा कर रहे हैं। कोई नाम डुबाने वाला नहीं। उठने का मन तो नहीं कर रहा है। पर बेटी को ट्यूशन से लाने जाना हेै। वह मेरे पैर छूने लगा...चलता हूँ मैम...
योगेश बहुत अच्छा भजन गाता था। मैं बोली....जाते जाते कोई भजन सुनाते जाओ योगेश।
हाँ.... हाँ... सब कहने लगे...इस महफिल का समापन तुम्हारे भजन से।
योगेश बैठ गया। आँखें बंद कर मगन होकर गाने लगा...
जिस बंशी ने प्रेम प्रकाश किया,
रसदायक रास विलास किया,
बज जाये वही बंशी घर घर,
हे श्याम सुंदर, हे मुरलीधर।
भजन समाप्त कर योगेश ने मनीष की ओर देखा....समापन तो मनीष के विदाई गीत से होना चाहिए।
मनीष ने गाया...
.तुम्हारी महफिल से जा रहे हैं, उठो हमारा सलाम ले लो,
खुदा निगेहबां हो तुम्हारा, धड़कते दिल का पयाम ले लो।
सब गमगीन हो गए। अब सबने शेैलेश की ओर देखा....समापन की अंतिम गीतांजलि तो तुम्हारी ही होगी।
लेकिन शैलेश का गला तो भरा हुआ था।
अखिर उसने दृष्टि नीची की और उसके स्वर निकलकर कमरे में तैरने लगे....
छुपालो दिल में यूं प्यार मेरा कि जैसे मंदिर में लौ दिये की...
अनायास ही मेरी नजर रुचिरा की ओर चली गई। इतनी देर से इतना हँसती खिलखिलाती, शरारती रुचिरा की आँखों में पानी उतर आया था।ं पानी में चमक सी उभरी कि नजरें झुकाकर उसने एकदम छुपा लियां। शेैलेश गा रहा था...
ये सच है जीना था पाप तुम बिन,
ये पाप मैंने किया है लेकिन,
बसी है मन में छवि तुम्हारी
कि जैसे मंदिर में लौ दिये कीं।
रुचिरा से सहा नहीं जा रहा था। वह उठकर भीतर चली गई।
गीत समाप्त हुआ। सब मंत्रबिद्ध से बैठे थे। शेैलेश का चेहरा भरे बदलों सा हो रहा था। जाने क्यों, वह मुझे समझाने लगा...मैम ये गाना मुझे इसलिए बहुत पसंद है, क्योंकि फिल्म में इसका पिक्चराइजेशन इतना सुंदर हुआ है, इतना मार्मिक...इतना ह्नदयग्राही.....वह मुझे मोबाइल में उस गाने का पिक्चराइजेशन दिखाने लगा... देखिये देखिये...
पिक्चराइजेशन तो अभी भी बहुत सुंदर हुआ है, बहुत हृदयगाही, ...मैं सोच रही थीं।
मुझे प्रणाम कर मेरा आर्शीवाद लेकर सब चले गए। मैं बुत बनी कमरे में बैठी ही रह गई। अभी घटा दृश्य मेरी आँखों में चल ही रहा था। वह पनीली आँखों में चमक सी उठती , वह नजर झुकाकर छुपा लेना, वह भरभराती सी आवाज में गूंजता गीत...छुपालो दिल में यूं प्यार मेरा ........
- शुभदा मिश्रा,
ईमेल: smdongargarh@gmail.com,
मोबाइल: 8269594598


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