विभाजित आकाश

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विभाजित आकाश शहर की भागदौड़ से थोड़ा दूर, पुराने रेलवे पुल के पास एक छोटे-से किराए के मकान में वे दोनों रहते थे।

विभाजित आकाश


शहर की भागदौड़ से थोड़ा दूर, पुराने रेलवे पुल के पास एक छोटे-से किराए के मकान में वे दोनों रहते थे।

अनन्या और देवन।

नाम सुनकर कोई भी उन्हें एक सामान्य दंपती समझ सकता था। लेकिन उनके जीवन में थोड़ा गहराई से झाँकने पर समझ में आता था कि वे दोनों अपने शरीर, समाज और परिवार के साथ वर्षों तक चले एक लंबे संघर्ष की अंतिम पंक्ति तक पहुँच चुके थे।

जब अनन्या का जन्म हुआ, तो सबने उसे लड़के के रूप में दर्ज किया था। बचपन में जब वह आईने के सामने खड़ी होती, तो उसे लगता था:

“जो मैं देख रही हूँ, वह मैं नहीं हूँ; असली मैं तो कुछ और हूँ!”

विभाजित आकाश
देवन भी इसी पीड़ा से गुज़रा था। जन्म प्रमाणपत्र में दर्ज लिंग उनके जीवन को परिभाषित नहीं कर सका।

उनकी राहें एक छोटी-सी पुस्तक-दुकान में आकर मिलीं।

अनन्या वहाँ अस्थायी रूप से काम करती थी। देवन कभी-कभी किताबें खरीदने वहाँ आता था।

एक दिन उसने पूछा:

“क्या आपको कविता पसंद है?”

अनन्या मुस्कुराई।

“कविता के अलावा और क्या है, जो हमें हमारा असली चेहरा दिखाती है?”

उस वाक्य पर देवन बहुत देर तक चुप रहा।

उस दिन पहली बार दोनों ने महसूस किया।

दोस्ती प्रेम में बदल गई।

और प्रेम साथ रहने के निर्णय में।

विवाह के अगले दिन वे अपने नए घर में केवल एक पुरानी मेज़ और दो कुर्सियाँ लेकर आए।

अनन्या ने पूछा:

“अब हमारे घर में और क्या चाहिए?”

देवन ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा:

“एक बड़ी-सी खिड़की।”

“क्यों?”

“बाहर की दुनिया हमें किस तरह देखती है, यह देखने के लिए।”

अनन्या हँस पड़ी।

“उसकी ज़रूरत नहीं। दुनिया हमें कैसे देखती है, उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम दुनिया को कैसे देखते हैं?”

उनके कोई बच्चे नहीं थे।

उन्होंने कभी यह नहीं माना कि बच्चों के बिना घर सूना होता है। एक-दूसरे को दुलारने के लिए उनके भीतर के बच्चे ही उनके लिए पर्याप्त थे।

देवन ने एक स्कूल में लाइब्रेरियन की नौकरी शुरू कर ली। अनन्या एक छोटी-सी डिज़ाइन संस्था में काम करने लगी। शाम को दोनों साथ मिलकर खाना बनाते।

कुछ दिनों में उनके बीच झगड़े भी होते।

“चाय में चीनी नहीं डाली!”

“तुमने ही तो कहा था कि चीनी कम करनी है!”

“लेकिन आज नहीं!”

ऐसे ही छोटे-छोटे झगड़े।

और उनके बाद बड़ी-बड़ी हँसी।

उनके पड़ोसियों के लिए शुरू में वे केवल एक कौतूहल थे।

फिर कौतूहल चर्चा में बदल गया।

और धीरे-धीरे चर्चा उपहास में।

एक दिन किसी ने उनके घर के दरवाज़े पर लिख दिया:

“यह समाज-विरोधियों का जमावड़ा है। इसे परिवार मत कहो!”

अनन्या बहुत देर तक उन शब्दों को देखती रही।

देवन उसके पीछे आकर खड़ा हो गया।

“मिटा दूँ?”

अनन्या ने सिर हिला दिया।

“नहीं।”

“क्यों?”

उसने कहा,

“अगर हम इसे मिटा देंगे, तो ऐसा लगेगा कि हमें उनकी बात से डर लगता है।”

उसने सफ़ेद रंग की एक डिब्बी उठाई।

उस लिखावट के नीचे उसने लिख दिया:

“परिवार केवल रक्त-संबंधों से नहीं बनता। जब कोई किसी दूसरे के दर्द के पास खड़ा होता है, तब भी एक परिवार जन्म लेता है।”

अगले दिन बहुत-से लोगों ने उन शब्दों को पढ़ा।

तीसरे दिन किसी ने उसके बारे में बात नहीं की।

लेकिन चौथे दिन एक वृद्ध पड़ोसिन उनके दरवाज़े पर आई।

उसके हाथ में एक बर्तन था।

“आज घर में पायसम बनाया है। थोड़ा तुम लोगों के लिए भी लाई हूँ।”

अनन्या ने आश्चर्य से वह बर्तन ले लिया।

“हमारे लिए क्यों, अम्मा?”

वृद्धा मुस्कुराई।

“पड़ोसी हो न तुम लोग?”

उस एक शब्द से अनन्या की आँखों में पानी भर आया।

पड़ोसी।

उन्हें किसी बड़े सम्मान या स्वीकृति की आवश्यकता नहीं थी।

उनके लिए वह एक छोटा-सा शब्द ही पर्याप्त था।

वर्ष बीतते गए।

एक बरसाती रात देवन की तबीयत बिगड़ गई। अस्पताल पहुँचने पर फ़ॉर्म भरने वाले कर्मचारी ने पूछा:

“रिश्ता?”

अनन्या एक क्षण के लिए चुप रही।

फिर उसने कहा:

“पत्नी।”

देवन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

कर्मचारी ने फिर पूछा:

“रिकॉर्ड में और कुछ दर्ज करना है?”

अनन्या ने शांत स्वर में कहा:

“नहीं। मैं उसके साथ हूँ। यही सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।”

अस्पताल के गलियारे में रात लंबी होती गई।

खिड़की के शीशे पर बारिश की बूँदें लगातार गिरती रहीं।

देवन ने कठिनाई से आँखें खोलीं।

“अनन्या…”

“क्या हुआ?”

“हमारा घर याद है?”

“हाँ।”

“वह बड़ी-सी खिड़की…”

अनन्या मुस्कुराई।

“हाँ।”

“उसे खुला रखना।”

“क्यों?”

देवन ने धीरे से कहा:

“हमारा आकाश छोटा नहीं होना चाहिए।”

अनन्या ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

अस्पताल की खिड़की के बाहर बारिश होती रही।

उनका जीवन आसान नहीं था।

लेकिन वे यह समझ चुके थे:

प्रेम केवल किसी के शरीर को स्वीकार कर लेने पर समाप्त नहीं होता।

उसके भय, उसके घाव और उसके सपनों को भी अपने भीतर समेट लेने पर ही प्रेम पूर्ण होता है।

भोर हो गई।

बारिश थम चुकी थी।

सूरज की किरणें खिड़की से होकर भीतर उतर आईं।

अनन्या ने देवन की ओर देखा।

देवन की आँखें बंद थीं।

उनके सामने उन्हें विभाजित करते हुए विधवापन का दिन धुंधला-सा उतर आया था।

एक और जीवन।

अनन्या ने गहरी साँस ली।

दो लोगों का आकाश।

अब उसे अकेले ही अपने भीतर की उस शून्यता को जीकर पूरा करना था।

अनन्या ने देवन की जमी हुई उँगलियों को धीरे-धीरे अपनी पकड़ से अलग कर दिया।



- बिनॉय एम. बी.,
फ्लैट नंबर: 5,डोर नंबर: 12/602/8
पहली मंज़िल,चेलूर सेवन्थ एवेन्यू
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